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अपने पैसे से अपना ही दमन क्यों खरीद रहा ‘बहुजन समाज’

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2026-11-02 16:43:59

लोकतंत्र में समाचार माध्यमों को ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाता है। इसका प्राथमिक दायित्व केवल दैनिक घटनाएँ बताना नहीं, बल्कि सत्ता और प्रभावशाली संस्थानों की जवाबदेही तय करना, शोषित वर्गों की आवाज बनना और समाज में समता, वैज्ञानिक चेतना तथा बंधुत्व को मजबूत करना है। भारत जैसे समाज में, जहाँ जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्र के आधार पर ऐतिहासिक विषमताएँ मौजूद हैं, प्रेस की भूमिका और भी अहम हो जाती है। यह मीडिया तय करता है कि कौन-सा मुद्दा ‘राष्ट्रीय’ बनेगा, कौन-सा दर्द ‘स्थानीय’ कहकर छोटा कर दिया जाएगा, और किसकी आवाज सुनी जाएगी। भारत में मुख्यधारा के व्यावसायिक घरानों के समाचार पत्रों और दूरदर्शन वाहिकाओं (टीवी चैनलों) का चरित्र इस लोकतांत्रिक कसौटी के ठीक उलट हो चुका है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यकों से मिलकर बना बहुजन समाज—जो इस राष्ट्र की कुल आबादी का 85 प्रतिशत से अधिक उत्पादकता का हिस्सा है—आज मुख्यधारा के संचार माध्यमों में सबसे अधिक उपेक्षित, विकृत और बौद्धिक रूप से शोषित वर्ग का संचार तंत्र है।

इस दोमुंहेपन का पर्दा उस समय पूरी तरह उठ गया जब देश के सबसे बड़े हिंदी समाचार पत्र दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्ता ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी मंच से सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि: ‘देखा जाए तो संघ और जागरण की विचारधारा भारतीय सनातन संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति निष्ठा एवं समर्पण के बिंदु पर एक ही है।’ यह वक्तव्य किसी व्यक्ति का निजी विचार नहीं है। यह भारत के 8 करोड़ से अधिक पाठकों तक पहुँचने वाले एक विशाल संचार संस्थान द्वारा निष्पक्ष पत्रकारिता के सिद्धांतों का खुला विसर्जन है। जब एक राष्ट्रीय दैनिक का शीर्ष नेतृत्व स्वयं को एक विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन की विचारधारा के साथ एकाकार घोषित कर दे, तो बहुजन समाज के सामने यह ज्वलंत प्रश्न खड़ा होता है कि क्या वह हर सुबह अपनी गाढ़ी कमाई से एक ऐसा पत्र खरीद रहा है जो स्वतंत्र सूचना का माध्यम है? या वह अपनी ही संतानों के मानसिक और सामाजिक दमन का वैचारिक हथियार स्वयं वित्तपोषित कर रहा है? किसी भी स्वतंत्र लोकतांत्रिक समाज में समाचार पत्र का काम सत्ता, राजनीति, प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं की निर्भीक व तथ्यपरक जांच-पड़ताल करना होता है। समस्या किसी व्यक्ति के निजी विश्वास से नहीं है; समस्या तब शुरू होती है जब एक संचार संस्थान जनता से तटस्थ, निष्पक्ष और सत्यवादी होने के नाम पर पैसा वसूलता है, लेकिन भीतर से वह एक विशेष वर्ण-व्यवस्था समर्थक विचारधारा का प्रचारक बनकर काम करता है। संजय गुप्ता ने नागपुर के मंच से अपने अखबार को ‘आस्तिक, आस्थावान, राष्ट्रभक्त और सनातन भारतीय मूल्यों का संवाहक’ बताया। उन्होंने यहाँ तक दावा कर दिया कि आजादी के बाद देश में सनातन मूल्यों के प्रचार का काम केवल संघ ने किया। यह वक्तव्य भारत के संपूर्ण बहुजन इतिहास, श्रमण परंपरा, तथागत बुद्ध, संत कबीर, गुरु रविदास, महात्मा ज्योतिराव फुले, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, पेरियार ई.वी. रामासामी, छत्रपति शाहू जी महाराज और बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर की समतावादी वैचारिकी को एक झटके में मिटा देने का प्रयास है। जिस सनातन व्यवस्था ने सहस्राब्दियों तक शूद्रों और अछूतों को शिक्षा, संपत्ति और मानवीय अधिकारों से वंचित रखा, उसी व्यवस्था का संवाहक होने का गर्व जब एक समाचार पत्र का मुख्य संपादक करता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उस अखबार के पन्नों पर बहुजन नायकों, आरक्षण और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के प्रति कैसा पूर्वाग्रह काम कर रहा होगा?

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की ऐतिहासिक चेतावनी: बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लगभग सौ वर्ष पूर्व भारतीय प्रेस के सवर्ण और व्यावसायिक चरित्र को पहचान लिया था। उन्होंने 1920 में जब अपने पहले पाक्षिक पत्र मूकनायक की शुरूआत की, तो पहले ही संपादकीय में भारतीय समाज की तुलना एक बहुमंजिला इमारत से की थी, जिसमें सीढ़ियाँ नहीं हैं—जिसका जन्म जिस मंजिल पर हुआ, उसकी मृत्यु उसी में तय है। उन्होंने लिखा था कि इस अमानवीय व्यवस्था के शिकार लोगों के पास न अपनी बात कहने के लिए मंच है, न संसाधन और न ही समाचार पत्र। 1945 में अपनी ऐतिहासिक पुस्तक कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया के अध्याय व्यावसायिक प्रेस में बाबासाहेब ने भारतीय संचार माध्यमों का वह विश्लेषण प्रस्तुत किया जो आज भी अक्षरश: सटीक बैठता है: भारत का प्रेस एक ऐसा व्यवसाय बन चुका है जिसका मुख्य उद्देश्य जनता को शिक्षित करना नहीं, बल्कि जनमत का निर्माण इस तरह करना है जिससे सवर्ण वर्गों और पूंजीपतियों के विशेषाधिकार सुरक्षित रहें। यह प्रेस दलित-शोषित वर्गों के वास्तविक कष्टों, उनके राजनीतिक अधिकारों और उनके आंदोलनों को या तो पूरी तरह अनदेखा कर देता है या फिर उन्हें इस तरह विकृत करके पेश करता है जिससे वे समाज की नजर में अपराधी या विघटनकारी प्रतीत हों। बाबासाहेब भली-भांति जानते थे कि जो प्रेस अपने वित्तीय और सामाजिक चरित्र में बहुजन-विरोधी है, वह कभी उनका मित्र नहीं हो सकता। इसीलिए उन्होंने साधनहीनता के बावजूद मूकनायक (1920), बहिष्कृत भारत (1927), जनता (1930) और प्रबुद्ध भारत (1956) जैसे पत्रों को अपने खून-पसीने से सींचा। आज का बहुजन समाज बाबासाहेब के उस मूल मंत्र को भूलकर उन्हीं अखबारों का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है जो बहुजन समाज की जड़ों को काटने में लगे हैं।

समाचार कक्ष का जातिगत चरित्र: संचार संस्थान किस दृष्टि से खबर दिखाएंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि खबरों का चयन करने वाले, शीर्षक तय करने वाले और संपादकीय लिखने वाले कौन हैं। विभिन्न स्वतंत्र शोध संस्थानों, जैसे विकासशील समाज अध्ययन पीठ और आॅक्सफैम इंडिया द्वारा भारतीय संचार माध्यमों पर किए गए विस्तृत सर्वेक्षणों (राष्ट्र की रिपोर्टिंग कौन करता है रिपोर्ट) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं: भारत के शीर्ष समाचार पत्रों, दूरदर्शन वाहिकाओं और अंकीय प्रवेशद्वारों (डिजिटल पोर्टलों) में निर्णय लेने वाले नेतृत्वकारी पदों (प्रधान संपादक, प्रबंध संपादक, कार्यकारी संपादक, संभाग प्रमुख, आगत/निर्गत प्रमुख) पर 90 प्रतिशत से अधिक व्यक्ति केवल उच्च जातियों (ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ आदि) से आते हैं। देश की 85 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्गों की उपस्थिति इन निर्णयकारी पदों पर लगभग शून्य या नगण्य है। मुख्य समय की बहसों (प्राइम-टाइम डिबेट्स) में बुलाए जाने वाले विशेषज्ञों, परिचर्चा प्रतिभागियों और संपादकीय पृष्ठों पर स्तंभ लिखने वालों में भी 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा केवल एक सीमित सामाजिक पृष्ठभूमि का होता है। जब लिखने वाला, छापने वाला और नीति तय करने वाला वर्ग उस सामाजिक पृष्ठभूमि से आता ही नहीं जिसने कभी जातिगत अपमान, बेगारी, हाथ से मैला ढोने या भूमिहीनता का दंश झेला हो, तो वह कभी भी बहुजन समाज के वास्तविक संघर्षों के प्रति निष्पक्ष नहीं हो सकता। परिणाम यह होता है कि जब किसी दलित या पिछड़े वर्ग पर अत्याचार होता है, तो समाचार कक्ष में बैठी यह सवर्ण जमात अपराधियों के बजाय पीड़ितों की सामाजिक पृष्ठभूमि की पड़ताल में लग जाती है।

सामाजिक न्याय के विरुद्ध सतत षड्यंत्र: मुख्यधारा के हिंदी अखबारों, विशेष रूप से दैनिक जागरण का पिछला और वर्तमान आचरण यह साबित करता है कि जब भी बहुजन अस्मिता और सवर्ण सामंतवाद के बीच टकराव हुआ, अखबार ने हमेशा सामंती और वर्चस्ववादी संघी मनुवादी विमर्श का ही साथ दिया।

1. 2018 का कठुआ कांड

जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक आठ वर्षीय मासूम बकरवाल (मुस्लिम अल्पसंख्यक) बच्ची के साथ देवस्थान के भीतर योजनाबद्ध सामूहिक दुष्कर्म और बर्बर हत्या की गई। पूरी दुनिया इस वहशियाना अपराध से स्तब्ध थी। किंतु दैनिक जागरण ने 20 अप्रैल 2018 को अपने मुख्य पृष्ठ पर एक अत्यंत भ्रामक शीर्षक से खबर छापी: कठुआ मामले में बच्ची से दुष्कर्म नहीं हुआ। अखबार ने शव-परीक्षा रिपोर्ट के चुनिंदा हिस्सों की तोड़-मरोड़ कर व्याख्या की ताकि आरोपियों के पक्ष में माहौल बनाया जा सके। जब जम्मू-कश्मीर पुलिस की अपराध शाखा और न्यायवैद्यिक (फोरेंसिक) विशेषज्ञों ने इस झूठ को बेनकाब किया और जनता में भारी आक्रोश फैला, तो अखबार ने बिना किसी सार्वजनिक माफी के उस खबर को अपने अंकीय मंच से चुपचाप हटा दिया।

2. हाथरस कांड और पीड़िता का चरित्र-हनन

उत्तर प्रदेश के हाथरस में वाल्मीकि समाज की 19 वर्षीय बेटी के साथ सामंती दबंगों द्वारा की गई दरिंदगी और पुलिस द्वारा रात के अंधेरे में बिना परिजनों की सहमति के शव जलाए जाने की घटना ने मानवता को शर्मसार कर दिया था। उस समय मुख्यधारा के हिंदी संचार माध्यमों ने आरोपियों के परिजनों और जातिवादी पंचायतों की बैठकों को मुख्य जगह दी, झूठी चिकित्सकीय रिपोर्टों के हवाले से बलात्कार से इनकार करने की कोशिशें कीं और पीड़िता के परिवार पर ही तरह-तरह के लांछन लगाए।

3. आरक्षण और प्रतिनिधित्व के विरुद्ध सतत जहर

संविधान का अनुच्छेद 15(4) और 16(4) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए प्रतिनिधित्व (आरक्षण) की गारंटी देता है। यह कोई दया या खैरात नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से छीने गए अधिकारों की भरपाई है। लेकिन ये अखबार हर साल संघ लोक सेवा आयोग, राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के समय ऐसे आलेखों की झड़ी लगा देते हैं जिनमें यह स्थापित करने की चेष्टा की जाती है कि आरक्षण के कारण योग्यता की हत्या हो रही है। न्यायपालिका में 80% से अधिक जजों का सवर्ण होना, विश्वविद्यालयों में आचार्य (प्रोफेसर) के आरक्षित पदों का जानबूझकर उपयुक्त नहीं पाया गया घोषित कर खाली छोड़ दिया जाना, या निजी क्षेत्र में बहुजनों के साथ होने वाले संस्थागत भेदभाव पर ये अखबार कभी खोजी पत्रकारिता नहीं करते।

4. अंधविश्वास, भाग्यवाद और पाखंड का खुला व्यापार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51अ(एच) स्पष्ट निर्देश देता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा ज्ञानार्जन एवं सुधार की भावना का विकास करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है। इसके विपरीत, ये अखबार अपने पन्नों पर प्रतिदिन ज्योतिष, हस्तरेखा, कालसर्प दोष, तंत्र-मंत्र, रुद्राक्ष बेचने के विज्ञापन और अंधविश्वास फैलाने वाले धार्मिक पाखंडों को दो-दो पन्नों में छापते हैं। इसका सीधा सामाजिक उद्देश्य बहुजन समाज की युवा पीढ़ी को वैज्ञानिक सोच और तार्किक विद्रोह से दूर रखकर भाग्यवाद की अफीम चटाए रखना है, ताकि वह अपनी बदहाली के वास्तविक कारणों (पूंजी और सत्ता पर मुट्ठी भर लोगों का कब्जा) को न समझ सके।

दमन का अर्थशास्त्र: समाचार पत्र की आय का बड़ा हिस्सा विज्ञापन से आता है, और विज्ञापन दर प्राय: प्रसार संख्या तथा पाठकों की संख्या से जुड़ी होती है। इसलिए जब बहुजन पाठक किसी पत्र की प्रति खरीदता है, उसे विज्ञापन देता है, या उसकी वेबसाइट व यूट्यूब चैनल पर नियमित रूप से समय देता है, तो वह उस संस्थान की बाजार शक्ति बढ़ाता है। यह बात समझना जरूरी है। जो अखबार बहुजन समाज के अधिकारों, आरक्षण, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय के प्रति पक्षपाती रुख अपनाए, उसे उसी समाज की कमाई से मजबूत करना अपने ही विरुद्ध काम करना है। यह बहिष्कार नफरत या हिंसा का आह्वान नहीं है। यह एक नागरिक और उपभोक्ता का शांतिपूर्ण अधिकार है कि वह अपना धन, समय और ध्यान उन संस्थानों को दे जो समानता, संविधान और सामाजिक न्याय के प्रति जवाबदेह हों।

पाठक संख्या का आधार: राष्ट्रीय शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, दैनिक जागरण समूह 8.30 करोड़ से अधिक पाठकों तक पहुँच का दावा करता है। इसके सैकड़ों संस्करण हैं। यह पाठक वर्ग कौन है? उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, हरियाणा और दिल्ली के कस्बों, देहातों, तहसीलों और झुग्गियों में रहने वाला बहुजन समाज (मजदूर, किसान, छोटे दुकानदार, सफाईकर्मी, शिक्षक, छात्र और सरकारी कर्मचारी) ही इसका सबसे बड़ा ग्राहक है।

वित्तीय गणित: एक परिवार औसतन 200 से 300 रुपये प्रति माह अखबार पर खर्च करता है। जब करोड़ों बहुजन परिवार यह अखबार खरीदते हैं, तो मीडिया घरानों को न केवल अरबों रुपये का वितरण राजस्व मिलता है, बल्कि इसी भारी वितरण संख्या के आंकड़ों को दिखाकर वे केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और निजी व्यावसायिक घरानों से प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये के विज्ञापन हासिल करते हैं।

परिणाम: बहुजन समाज अपनी गाढ़ी कमाई देकर इन अखबारों को आर्थिक रूप से महाबली बनाता है; और वही अखबार उस धन का उपयोग बहुजन समाज के आरक्षण को कोसने, उसके महापुरुषों के विचारों को दबाने, पीड़ितों को बदनाम करने और मनुवादी राजनीति की नींव मजबूत करने के लिए करते हैं। यह स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसे कोई व्यक्ति अपनी जेब के पैसे से उस कसाई को कुल्हाड़ी खरीदकर दे जो उसकी ही गर्दन काटने की तैयारी कर रहा है। यहां केवल किसी अखबार को घर से बाहर निकालना पर्याप्त नहीं है। उस जगह को भरने के लिए बहुजन समाज को अपना सूचना-तंत्र खड़ा करना होगा। चाहे इसकी शुरुआत छोटे कदम से ही हो।

●स्वतंत्र बहुजन मीडिया, पोर्टल, पत्रिकाओं और यूट्यूब चैनलों को आर्थिक सहयोग दें।

●गाँव, बस्ती, छात्रावास और संगठन भवनों में पुस्तकालय तथा वाचनालय खोलें।

●संविधान, फुले, शाहू, अंबेडकर, बुद्ध, कबीर और रविदास का साहित्य उपलब्ध कराएँ।

●मीडिया साक्षरता बढ़ाएँ, ताकि लोग समझ सकें कि सुर्खी, चुनिंदा तथ्य और भाषा किस प्रकार जनमत बनाती है।

●अत्याचार, भूमि, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और आरक्षण पर स्थानीय रिपोर्टिंग को प्रोत्साहन दें।

●बहुजन समाज के छोटे-बड़े व्यापारी, चिकित्सक, अभियंता, अधिवक्ता, विद्यालय संचालक और शिक्षण संस्थान यह कड़ा संकल्प लें कि वे अपने प्रतिष्ठानों के प्रचार के लिए इन अखबारों को एक भी रुपये का विज्ञापन नहीं देंगे।

●बहुजन युवा अपने स्मार्टफोन का उपयोग करते हुए दैनिक जागरण जैसे अखबारों और उनके यूट्यूब चैनलों की सदस्यता सामूहिक रूप से रद्द करें, अनफॉलो करें और अवरुद्ध (ब्लॉक) करें।

बाबासाहेब ने कहा था कि जिस समाज का अपना कोई अखबार नहीं होता, उसकी हालत उस चिड़िया जैसी होती है जिसके पंख काट दिए गए हों। आज दर्जनों निष्पक्ष, दलित, बहुजन और स्वतंत्र पत्रकार सीमित संसाधनों में मुख्यधारा के झूठ का मुकाबला कर रहे हैं। बहुजन समाज जो पैसा हर महीने जातिवादी अखबारों को खरीदने में बर्बाद करता है, उस पैसे (100, 200 या 500 रुपये प्रति माह) से इन स्वतंत्र यूट्यूब चैनलों, वेबसाइटों और बहुजन पत्रिकाओं की सदस्यता या आर्थिक सहयोग ले। हर गाँव, कस्बे और मोहल्ले में सामुदायिक सहयोग से वाचनालय और पुस्तकालय खोले जाएं। वहाँ संविधान की प्रतियां, डॉ. आंबेडकर का संपूर्ण वांग्मय, ज्योतिराव फुले का साहित्य, पेरियार के विचार और निष्पक्ष वैचारिक मासिक पत्रिकाएं रखी जाएं, ताकि नई पीढ़ी को इतिहास और राजनीति की सही समझ मिल सके। आज हर बहुजन युवा के हाथ में जो स्मार्टफोन और इंटरनेट है, वह केवल लघु वीडियो (रील्स) देखने या मनोरंजन के लिए नहीं है। यह एक चलता-फिरता प्रेस और प्रसारण केंद्र है। आपके गाँव, तहसील या शहर में जहाँ भी दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों या महिलाओं पर अन्याय हो, तुरंत उसका वीडियो बनाएं, तथ्यों को दर्ज करें और सामाजिक संचार माध्यमों के जरिए उसे बिना किसी जातिवादी संपादक की अनुमति के पूरी दुनिया के सामने रख दें।

आत्मसम्मान या मानसिक दासता? किसी भी समाज की गुलामी की पराकाष्ठा तब होती है जब वह अपने शोषक की भाषा बोलने लगता है और अपने दमनकारी के औजारों को अपने ही संसाधनों से सजाने-संवारने लगता है। दैनिक जागरण के संपादक द्वारा संघ के मंच से दिया गया भाषण बहुजन समाज पर कोई उपकार नहीं है, बल्कि यह उस समाज के मुंह पर एक तमाचा है जो हर सुबह अपनी जेब से पैसे देकर यह अखबार खरीदता है। उन्होंने साफ कर दिया है कि उनकी निष्ठा संविधान के समतामूलक मूल्यों के प्रति नहीं, बल्कि उसी वर्णवादी व्यवस्था के प्रति है जिसने इस देश के बहुसंख्यक समाज को हजारों साल तक पैरों की धूल बनाकर रखा। अब निर्णय 85 प्रतिशत बहुजन समाज के हाथों में है क्या आप हर महीने 300 रुपये देकर अपने ही बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेलने वाले विषैले विमर्श को अपने घर के बैठक कक्ष में सजाएंगे? या फिर आप एक स्वाभिमानी कौम की तरह इस जातिवादी मीडिया तंत्र की आर्थिक रीढ़ तोड़कर अपने खुद के संचार माध्यमों, अपनी स्वतंत्र आवाज और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए उठ खड़े होंगे? तथागत बुद्ध ने कहा था: अत्त दीपो भव (अपना दीपक स्वयं बनो)। अपनी मशाल स्वयं जलाइए। आज ही अपने घर की चौखट से इन पक्षपाती अखबारों को बाहर फेंकिए और अपने स्वाभिमान की एक नई, स्वतंत्र सुबह की शुरूआत कीजिए!

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02 अक्टूबर (1869) : महात्मा गांधी जयंती

02 अक्टूबर (1904) : लाल बहादुर शास्त्री जयंती

02 अक्टूबर (1911) : मासूरिया दीन पासी जयंती

03 अक्टूबर (1957) : रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) का विधिवत गठन (नागपुर प्रेसीडियम)

05 अक्टूबर (1968) : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल स्मृति दिवस

06 अक्टूबर (1940) : डॉ. एस. पी. सुमनाक्षर जयंती

07 अक्टूबर (1951) : शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन द्वारा प्रथम आम चुनाव हेतु घोषणा-पत्र जारी

09 अक्टूबर (1900) : फातिमा शेख स्मृति दिवस

09 अक्टूबर (2006) : मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस

09 अक्टूबर (1924) : इमैनुअल सेकरन जयंती

13 अक्टूबर (1935) : नासिक के येवला सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा की

14 अक्टूबर (1956) : ऐतिहासिक धम्मदीक्षा दिवस: नागपुर दीक्षाभूमि में बाबा साहब द्वारा लाखों अनुयायियों संग बौद्ध धम्म ग्रहण किया गया।

15 अक्टूबर (1902) : कर्मवीर दादासाहेब भाऊराव कृष्णराव (बी. के.) गायकवाड़ जयंती

15 अक्टूबर (1931) : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जयंती

16 अक्टूबर (1956) : चंद्रपुर (महाराष्ट्र) में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को दी धम्मदीक्षा

19 अक्टूबर (1882) : महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दलित वर्गों में निरक्षरता के बारे में हंटर कमिशन को दिया ज्ञापन

20 अक्टूबर (2026) : अशोक विजय दशमी

22 अक्टूबर (1947) : जनकवि अदम गोंडवी (रामनाथ सिंह) जयंती

25 अक्टूबर (1800) : लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले जन्मदिवस

27 अक्टूबर (1920) : भारत के प्रथम दलित राष्ट्रपति के. आर. नारायणन जयंती

29 अक्टूबर (1912) : इंकलाबी कवि गुरदास आलम जन्म दिवस

31 अक्टूबर (2004) : त्यागमूर्ति आर.एल. चंदापुरी समृति दिवस

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