




2026-04-08 17:39:10
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां पर प्रत्येक व्यस्क नागरिक अपना प्रतिनिधि चुनता है और सरकार बनाने के लिए जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही सरकार का निर्माण करते हैं। लोकतंत्र का अर्थ है-जनता का शासन, जनता के लिए। भारतीय संविधान में जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिनिधि का चुनाव आमतौर पर पाँच वर्ष की समयावधि पर होता है, परंतु कभी-कभी जरूरत पड़ने पर मध्यावती चुनाव भी कराने पड़ते हैं।
बहुजन समाज का मतदाता वोट किसे दे? मतदान का अधिकार देश के नागरिकों को आसानी से प्राप्त नहीं हुआ। जब देश की संविधान सभा में इस मुद्दे पर बहस हो रही थी, तो देश के कई लोगों का ऐसा मत था कि मतदान का अधिकार केवल ‘स्नातक’ तक शिक्षित व्यक्तियों को ही दिया जाए; कुछेक अन्य का मत था कि मतदान का अधिकार ‘आयकर’ देने वाले व्यक्तियों को ही दिया जाये; कुछ अन्य का ये भी मत था कि मतदान का अधिकार ‘संपत्ति’ के आधार पर दिया जाये। सोचो अगर इस तरह की धारणा के आधार पर मतदान का अधिकार मिला होता तो बहुजन समाज का मतदाता आज कहाँ खड़ा होता?
भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने उपरोक्त मतों पर संविधान सभा के सदस्यों के सामने तार्किक तरीके से जवाब दिये और उन्हें समझाया कि अगर हम मतदान करने का अधिकार शिक्षित वर्ग, टैक्स दाता और संपत्ति पर अधिकार रखने वालों को देते हैं, तो देश की आधी से अधिक जनता (बहुजन समाज) मतदान के अधिकार से बाहर हो जाएगी और फिर लोकतन्त्र का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपने तर्कों से संविधान सभा के सदस्यों को समझाया और सहमत कराया कि मतदान देने का अधिकार देश के प्रत्येक व्यस्क नागरिक को होना चाहिए। जिसमें किसी के साथ जाति, धर्म, लिंग व क्षेत्र के आधार पर भेदभाव न किया जाए। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के द्वारा प्रस्तावित प्रावधान को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से पारित किया, जो आज भारत के संविधान में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। जिसके तहत भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था संचालित हो रही है।
लोकतंत्र को फांसीवादी सत्ता से बचाओ: वर्तमान लोकतंत्र आज देश में फांसीवादी विचारधारा को मजबूत कर रहा है, जिसके कारण बहुजन समाज के लिए आज न रोजगार है, न उत्कृष्ट श्रेणी की शिक्षा है और न ही स्वास्थ्य के अच्छे संसाधन है। बहुजन समाज को आज सबसे पहले जरूरत है कि वे अपने समाज को एकत्र करे, संगठित करे और अपने महापुरुषों के बताए गए मार्ग को आत्मसात करके उसके अनुसार आचरण कराने का संकल्प लें। आज बहुजन समाज के नेताओं को इस बात की ज्यादा आवश्यकता है कि वे ब्राह्मणवादी नीतियों के शिकार न हों, उनके षड्यंत्र को समझें, चुनाव छोटा हो या बड़ा सभी में कथित सवर्ण समाज के लठैत प्रतिनिधियों को वोट न देने का संकल्प लें। अगर बहुजन समाज मनुवादी और फांसीवादी विचारधारा से मुक्त होना चाहता है तो सबसे पहले बहुजन समाज की जनता द्वारा मनुवादी-फांसीवादी सत्ता को इस देश से मुक्त करना होगा।
जनता को काम चाहिए, घोखली घोषणाएँ नहीं: मनुवादी संघी सरकारों में घोषणाओं की अधिक भरमार रहती है, काम नदारद है, महंगाई चरम पर है, बेरोजगारी सभी सीमाएं पार कर चुकी है, संघी सरकारें अपने अंधभक्तों द्वारा मचाए गए शोर से जनता की आवाज दबा देना चाहते हैं, जिसमें वे कुछ हद तक सफल भी है, लोकतंत्र में ऐसी सरकार देश को नहीं चाहिए।
नफरती बुलडोजर सरकार नहीं, समावेशी सरकार चाहिए: भारत के उच्च और उच्चतम न्यायालय बार-बार कह चुके हैं कि किसी का घर बिना पर्याप्त समय का नोटिस दिये बुलडोजर से ध्वस्त नहीं करना चाहिए। लेकिन न्यायपालिका के निदेर्शों के बावजूद भी मनुवादी संघी मानसिकता की सरकारें न्यायिक आदेशों का पालन न करके, इन सभी संवैधानिक अदालतों का अपमान कर रही है। देश की जनता न्यायपालिका से पूछना चाहती है कि यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में जो मनुवादी आक्रोश और उत्पात सोशल मीडिया के माध्यम से जनता को देखने को मिला, उसे शायद संघी मानसिकता की सरकारों का ही खुला समर्थन था, उच्चतम न्यायालय ने उस पर तुरंत स्वत: संज्ञान लेते हुए रोक लगाने की घोषणा कर दी थी। उच्चतम न्यायालय से इस देश की जनता न्याय के दृष्टिकोण से पूछना चाहती है कि देश और वैश्विक स्तर पर जो एफस्टीन फाइल की चर्चा जोरों पर है। देश के प्रधानमंत्री और उसके कई मंत्रियों के नाम उसमें शामिल होने की भी सुगबुगाहट चल रही है, इस तरह के शर्मसार करने वाले मुद्दो पर न्यायपालिका स्वत: संज्ञान लेकर सरकार को निर्देशित करके सच बताने को क्यों नहीं कह पा रही है, इस तरह के मुद्दों पर न्यायपालिका मौन क्यों है? जबकि भाजपा के ही वरिष्ठ सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी खुलेतौर पर प्रधानमंत्री और उसके मंत्रियों पर खुला आरोप लगा रहें हैं। ऐसे शर्मसार करने वाले कुुकर्मों को छिपाने के लिए ही मोदी बाबा ने महाराष्ट्र के कुकर्मी बाबा अशोक खरात को मीडिया में हाईलाइट करा रखा है। ताकि उनके कुकर्मों को जनता धीरे-धीरे भुला दे लेकिन लोग इसको समझ चुके हैं पर वह सामने आकर बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। इस मुद्दे पर अंधभक्तों की चुप्पी, स्वत: हाँ का ही संदेश है।
महाराष्ट्र की महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर भी बाबाओं के कुकर्मी जाल में फंसी नजर आई, जिसके उजागर होने पर उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। बहुजन समाज की जागरूक जनता से अनुरोध है कि जिन राजनैतिक नेताओं और अन्य के खिलाफ महिला शोषण व अन्य महिला अपराधिक मामले जुड़े है उन्हें कृपया अपना वोट न दें। यह शर्म की बात है कि आज संसद में 78 सांसद महिला है ंफिर भी बाबाओं के अपराधिक कुकर्मों और महिलाओं के साथ हो रहे शोषण के विरुद्ध वे आवाज क्यों नहीं उठा पा रही हैं? देश में बढ़ती धर्मांधता और बाबाओं के साम्राज्य को नष्ट करने के लिए सभी महिला सांसदों को आगे आना चाहिए और सभी पाखंडी बाबाओं के खिलाफ यौन शोषण की घटनाओं के विरुद्ध इकट्ठा होकर देश में कानून बनवाकर, बाबाओं के साम्राज्य को खत्म करना चाहिए। बहुजन समाज का अनुरोध है कि ऐसे कुकर्मों में फंसे राजनेताओं को न अपना वोट दे और न किसी भी प्रकार का समर्थन दे। यह भी सत्य है कि आज की संसद में सभी प्रकार के अपराधी भाजपा के पास हंै और सरकार उनके खिलाफ कोई सख्त कानून या एक्शन नहीं लेना चाहती। सरकार की ऐसी मानसिकता सभ्य समाज की नैतिकता के विरुद्ध है इसलिए ऐसे सभी राजनैतिक नेताओं, बाबाओं के खिलाफ सख्त से सख्त कानून बनाकर उन्हें जेल में डालना चाहिए, उनसे वोट का अधिकार भी छीनना चाहिए और उन्हें देश से भी निष्कासित कर देना चाहिए।
दलित मनुवादियों से रहे सावधान: दलित (एससी/एसटी) मतदाता इस देश में महत्वपूर्ण संख्या में हैं लेकिन वे अपने समाज के ही राजनैतिक दलालों द्वारा बार-बार ठगे जा रहे हैं। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर व अन्य महापुरुषों ने दलित व अन्य पिछड़ी जातियों को जागरूक करने के उद्देश्य से घूम-घूमकर यथासभव प्रयास किये और सभी को एक सीमा तक शिक्षित व जागरूक भी किया। लेकिन आज बहुजन समाज के मतदाता अपनी प्रतिबद्धता, ईमानदारी और निष्ठा के साथ काम करने के प्रति संकल्पबद्ध नहीं है, बल्कि इन सभी में अधिकांशतया लालच, बेईमानी और हर किस्म की फरेबी पैदा हो चुकी है। आज बहुजन समाज के जितने भी सामाजिक संगठन है उनके अधिकतर संचालक किसी न किसी लालच या दबाव में बिक चुके हैं, और वे छिपकर मनुवादियों के लिए काम कर रहे हैं। हमारा बहुजन समाज के मतदाताओं से निवेदन है कि वे अपने बुद्धि बल के आधार पर स्थिति का आंकलन करके यह तय करे कि हमारे द्वारा दिया जा रहा मत समाज और देश के हित में होगा या नहीं? आंकलन के बाद यदि आप पूर्ण रूप से संतुष्ट है तभी आप अपना मत समाज हितैषी कट्टर ईमानदार और संघर्षशील अम्बेडकरवादी प्रत्याशी को ही अपना वोट देकर बहुजन समाज को सत्ता में लाये। आज बहुजन समाज में बहुत सारे ऐसे सामाजिक और राजनैतिक नेता घूम रहे हैं जिनकी ऊपरी पोशाक अम्बेडकरवादी हैं और उनकी आंतरिक संरचना पूरी तरह से मनुवादी व संघी है, इस तरह के व्यक्तियों से समाज को दूरी बनाकर रखना है, उन्हें आपको किसी भी हालत में नहीं चुनना है। दलित मनुवादी वे हैं जो सामाजिक वर्गीकरण के अनुसार एससी/एसटी व अत्यंत पिछड़ी जातियों में गिने जाते हैं मगर अंदर से उनकी आंतरिक संरचना मनुवादी व संघी होती है, जो ऊपर से दिखाई नहीं देती मगर उनका मनुवाद उनके अंदर छिपा होता है, ऐसे लोग समाज के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं।
धार्मिक व अपराधी बाबा प्रत्याशियों को वोट न दे बहुजन समाज: भारतीय जनता पार्टी हमेशा से हिन्दुत्व के कट्टर प्रचारक को लोकसभा या विधायिका का चेहरा बनाती है। योगी आदित्यनाथ भी हिन्दुत्व का सिरमोर चेहरा बने, जिन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी की स्थापना करके अपनी मानसिकता के अनुसार गोरखपुर और उसके आसपास के इलाकों में, विशेषकर मुस्लिम समाज के ऊपर अनगिनत अपराधिक अत्याचार किए। उन्होंने अपने अनुयायियों को संदेश दिया था कि अगर एक हिन्दू मारा जाता है तो बदले में दस मुस्लिमों को मारो। योगी आदित्यनाथ और उनके अनुयायियों के ऊपर भड़काऊ भाषण देने के आरोप में लगभग दो सौ से अधिक मुकदमे दर्ज हुए, जिनकी तत्कालीन समय के न्यायालयों में सुनवाई हुई। महंत योगी आदित्यनाथ पर भी भड़काऊ भाषण देने के सैंकड़ों मामले दर्ज थे, लेकिन 2017 में अखिलेश की सरकार जाने के बाद उनकी हिन्दुत्ववादी कट्टर छवि को देखते हुए भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। केंद्र की भाजपा-योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में कट्टर हिन्दुत्ववादी वैचारिकी के लोगों को मंत्री बनाया। पिछड़े वर्ग के जातीय घटकों से कट्टर हिन्दुत्ववादी मानसिकता के गुलामों को चुन-चुनकर मंत्री बनाया गया ताकि वे अपने समुदाय का वोट एक छलावे के तहत भाजपा को दिलवा सकें और भाजपा सत्ता में आ सके। योगी आदित्यनाथ का ऐसा कृत्य बहुजन समाज के सामाजिक न्याय के विरुद्ध है इसलिए ऐसे गुलाम मानसिकता के प्रत्याशियों को बहुजन समाज की जनता अपना वोट न देने का फैसला करें।
बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों से निवेदन है कि वे जातिवादी मानसिकता को त्यागकर अपना अमूल्य वोट उस व्यक्ति को दे, जो मन मस्तिष्क और कर्म से ईमानदार हो, जातिवादी न हो, ब्राह्मणवादी न हो, जो समता, मानवता, बंधुत्व में विश्वास रखता हो, उसके मन और मस्तिष्क में किसी भी प्रकार का धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव व द्वेष न हो, वह सामंतवादी न हो, साथ ही वह व्यक्ति उत्कृष्ट श्रेणी का ईमानदार व स्पष्टवादी हो। जो बहुजन समाज के महानायकों जैसे बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, संत कबीर, संत रविदास, पेरियार, मान्यवर साहेब कांशीराम आदि महापुरुषों की विचारधारा में अटूट विश्वास रखता हो।





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