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प्राचीन काल में ब्राह्मण धर्म ग्रंथों में किसी भी पुस्तक में कहीं पर भी हिन्दू शब्द को इस्तेमाल में नहीं लाया गया है। बुद्ध से लेकर चीनी यात्रियों अर्थात फाहियान एवं ह्वेनसांग तक किसी ने भी हिन्दू शब्द का इस्तेमाल नहीं किया । अर्थात हर्षवर्धन के समय तक भी हिन्दू का कथित नाम सुनने में नहीं आता। मुसलमानों के भारत आने से पहले तक न यह शब्द प्रचलन में था और न ही हिन्दू नाम का कोई धर्म अस्तित्व में था। भारत में पाये गए प्राचीनकालीन अभिलेखों में जब किसी भी अभिलेख में हिन्दू शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है तो हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है? मुसलमानों के आने के बाद तथा अंग्रेजों के आने तक ब्राह्मण स्वयं की पहचान हिन्दू की तरह नहीं करना चाहते थे। दयानंद सरस्वती ने हिन्दू शब्द अपनाने से इन्कार करते हुए सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि यह मुगलों की दी गई गाली है। फारसी डिक्शनरी में हिन्दू का अर्थ काला चोर, गुलाम इत्यादि के रूप में लिखा है। इसका मतलब है कि ब्राह्मण स्वयं हिन्दू शब्द से काफी नफरत करते थे एवं वे भारत के शूद्रों एवं अछूतों के साथ अपनी पहचान करने में अपमानित महसूस करते थे। इसीलिए अंग्रेजों के आने के पश्चात जो संगठन ब्राह्मणों ने बनाए उन संगठनों के नामों की विवेचना करते हैं।
ब्रम्हो समाज-राजाराम मोहन राय- ब्राह्मण
आदि ब्रम्हो समाज-देवेंद्र नाथ टैगोर- ब्राह्मण
प्रार्थना समाज- केशव चन्द्र सेन- ब्राह्मण
आर्य समाज- स्वामी दयानंद- ब्राह्मण
यदि ब्राह्मण स्वयं को हिन्दू मानते या भारत में प्रचलित धर्म को हिन्दू धर्म की तरह प्रचलित करने के इच्छुक होते तो उपरोक्त संगठन इस तरह के बनते जो इन नामों के हो सकते थे। हिन्दू समाज, आर्य हिन्दू समाज, आदि हिन्दू समाज एवं हिन्दी प्रार्थना समाज इत्यादि।
हिन्दू शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अबूरेहान, अलबरूनी ने किया। वो भी उस समुदाय के लिए इस्तेमाल किया जिससे उसे इस्लाम से पृथक करके देखा जाए एवं उन सभी लोगों के बारे में प्रयुक्त हुआ है जो इस्लाम से भिन्न थे। ए.एल. वाशम ने अपनी पुस्तक ‘अद्भुत भारत’ में एवं एस राधाकृष्णन ने ए.एल. वाशम द्वारा संपादित पुस्तक Cultural history of India में लिखा है कि हिन्दू का तात्पर्य सिन्धु नदी के आसपास में रहने वाले लोगों के समूह से है न कि हिन्दू धर्म से। यहां यह भी तथ्य हमें समझ लेना चाहिए कि सिंधु नदी को अंग्रेजी में Indus river कहा जाता है इसी river से इंडिका या इंडिया शब्द की उत्पत्ति हुई। यह इंडिया एक देश का नाम है और इंडियन उस देश में रहने वाले लोगों को कहते हैं।
भारत को स्वतंत्रता मिलते-मिलते हिन्दू शब्द का इस्तेमाल ब्राह्मणों ने शुरू कर दिया था, इसीलिए भी इस देश का नामकरण हिन्दुस्तान जैसे अपरिपक्व और फालतू के शब्द से नहीं करना चाहिए। उपरोक्त विवरण से यह बातें स्पष्ट हैं कि प्रारंभ में (अलबरूनी के समय ग्यारहवीं शताब्दी में) हिन्दू शब्द का इस्तेमाल एक विशेष क्षेत्र में या सिंधु नदी के आसपास रहने वाले लोगों को परिभाषित करता था न कि किसी धर्म को।
मुगलकालीन इतिहास में यह तथ्य प्रमुखता से दर्ज किया गया है कि ब्राह्मण जजिया कर नहीं देते थे, क्या ब्राह्मण स्वयं को अन्य भारतीय समाजों अर्थात क्षत्रिय वैश्य शूद्र व अछूतों से इतर मानते थे? हाल के दिनों या उन्नीसवीं शताब्दी के बाद से ऐसी क्या मजबूरी उत्पन्न हो गई कि ब्राह्मणों को न सिर्फ स्वयं को बल्कि क्षत्रिय वैश्य शूद्र और अछूतों को भी हिन्दू मानने में कोई आपत्ति नहीं थी यहां तक कि सत्तर के दशक के अंत तक इन्होंने यह भी नारा दिया कि ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’। किसी विशेष धर्म का होने में गर्व कैसा?
हिन्दू धर्म को इस नाम से प्रचलित करने वाले निम्नलिखित अवधारणाओं से इसका बखान करते हैं-
1- हिन्दू धर्म इस बात में यूनिक है कि यह कोई एक धर्म न होकर इसमें कई परंपराओं और दर्शनों को थोपा गया है।
2- यह सनातन एवं शाश्वत बताया जाता है जो सत्य नहीं है।
3- यह वैदिक धर्म है।
4- हिन्दू जैसा कोई धर्म नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की पद्धति है। यह भी प्रचारित किया जाता है कि इस धर्म का कोई संस्थापक नहीं है किन्तु निम्नलिखित पंथ/मार्ग/सेक्टर इसमें निहित हैं।
(क) शाकप (शिव), (ख) वैष्णव (विष्णु), (ग) शाकप (देवी), (घ) समर्थ (च) भागवत (कृष्ण)।
यदि इस धर्म को सनातन धर्म कहा जाता है तो सनातन शब्द सर्वप्रथम तथागत बुद्ध ने धम्म पद के 11वें भाग में धम्म को एस धम्मों सनंतनों किया है। यदि सनातन धर्म को बुद्ध धर्म से चोरी किया जाता है तो लिखित तौर पर इसकी व्याख्या सनातन की जानी चाहिए।
बुद्ध स्वयं धम्म पद में इस धर्म की व्याख्या करते हुए लिखते हैं अर्थात प्रकृति के नियम को भी सनातन धर्म कहा गया है तो फिर हिन्दू धर्म जिसके सारे धर्म ग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा लिखे गए हैं उसे सनातन धर्म कैसे माना जा सकता है? जो बाद में ब्राह्मणों द्वारा दिया गया गया और जिसमें वर्ण-व्यवस्था बनाई गई। वह निश्चित तौर से सनातन नहीं हो सकती है क्योंकि वह प्रकृति के विरुद्ध है।





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