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डॉ. अंबेडकर ने कैसे बदल दी भारत की तकदीर और तस्वीर!

How Dr. Ambedkar Transformed Indias Destiny and Image!
News

2026-05-25 16:25:49



जिस समाज को कभी पढ़ना-लिखना तो दूर, यदि वेदों-पुराणों के शब्द भी उनके कानों में पड़ जाते, तो अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ता था; जहाँ ज्ञान और ऊँचे पद योग्यता से नहीं, बल्कि केवल जन्म और जाति के आधार पर तय होते थे—उसी रूढ़िवादी व्यवस्था के तले एक बड़े वर्ग ने कई सदियों तक गरीबी, लाचारी और घोर भेदभाव का जीवन जिया। ऐसा प्रतीत होता था मानो उन्होंने स्वयं को इंसानी गरिमा से परे, जंगलों में लावारिस छोड़ दिए गए मवेशियों या उनसे भी निम्न स्तर के समान मान लिया हो। लेकिन इस ऐतिहासिक अन्याय और सोच को बदला डॉ. अम्बेडकर रूपी महामानव ने। उन्होंने न केवल इस जन्म-आधारित भेदभावपूर्ण व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि करीब 5000 साल पुरानी सामाजिक कुरीतियों को समूल उखाड़ फेंका। हम बात कर रहे हैं आधुनिक भारत के निमार्ता, संविधान शिल्पी और भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की। एक वंचित समाज में जन्म लेकर भी उन्होंने अपनी विद्वता के दम पर पूरे देश की किस्मत बदल दी।

शिक्षा के दम पर वैश्विक पटल पर पहचान

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से कार्य और दायित्व वर्णों के आधार पर विभाजित थे, जिसमें शूद्रों को केवल सेवा कार्य तक सीमित रखने का प्रावधान। हालांकि, बाबासाहब का मानना था कि शिक्षा ही वह अचूक शस्त्र है जिसके दम पर समाज की सोच को बदला जा सकता है और आत्मसम्मान हासिल किया जा सकता है। उनका प्रसिद्ध नारा था: ‘शिक्षा शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह दहाड़ेगा।‘ जब महात्मा गांधी वर्ष 1915 में दक्षिण अफ्रीका से रंगभेद के खिलाफ आंदोलन जीतकर भारत लौटे, तब तक वे एक स्थापित जननेता बन चुके थे और उन्होंने कांग्रेस के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व संभाला। उसी दौर में, बाबा साहब विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उन्होंने अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में पहली बार स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का वास्तविक अर्थ देखा, जहाँ उन्हें जाति से नहीं बल्कि उनकी अद्वितीय योग्यता से पहचाना जा रहा था। वहाँ उन्हें अहसास हुआ कि भारत की वास्तविक गुलामी केवल अंग्रेजों की राजनीतिक गुलामी नहीं, बल्कि समाज में गहरे तक धंसा जातिवाद है।

अर्थव्यवस्था और आरबीआई की नींव

आधुनिक भारत के आर्थिक ढांचे को खड़ा करने में बाबासाहब का योगदान अतुलनीय है। उनके द्वारा लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में प्रस्तुत की गई डॉक्टरेट की थीसिस ‘द प्रॉब्लम आॅफ द रूपी: इट्स ओरिजिन एंड इट्स सॉल्यूशन’ (The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution) के आधार पर ही हिल्टन यंग कमिशन ने भारत में एक केंद्रीय बैंक की स्थापना की सिफारिश की थी। इसी के परिणामस्वरूप 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का गठन हुआ, जो आज भी देश की अर्थव्यवस्था और मौद्रिक नीति का मुख्य स्तंभ है।

महिला सशक्तिकरण के अग्रदूत:

डॉ. अंबेडकर केवल दलितों के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण नारी जगत के मसीहा थे। वे मानते थे कि किसी भी समाज का मूल्यांकन इस बात से होता है कि वहाँ महिलाओं ने कितनी प्रगति की है। उन्होंने महिलाओं को पुरुष सत्तात्मक सोच और उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने तथा संपत्ति, विवाह व गोद लेने जैसे मामलों में समान अधिकार देने के लिए 1951 में हिंदू कोड बिल संसद में पेश किया। तत्कालीन रूढ़िवादी राजनेताओं के विरोध के कारण जब यह बिल पास नहीं हो सका, तो बाबासाहब ने महिलाओं के अधिकारों से समझौता न करते हुए केंद्रीय कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में, सरकार को इसी बिल को चार अलग-अलग हिस्सों में (हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 आदि) पारित करना पड़ा। आज भारत की बेटियां शिक्षा, कॉपोर्रेट और अंतरिक्ष तक में जो परचम लहरा रही हैं, उसकी स्वतंत्र कानूनी नींव बाबासाहब ने ही रखी थी।

श्रमिक अधिकारों की बहाली

आज भारत के कामगार जिन अधिकारों का उपयोग करते हैं, वे बाबासाहब की ही देन हैं। ब्रिटिश काल में वायसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य (1942-1946) के रूप में उन्होंने मजदूरों के काम करने के घंटों को 12 घंटे से घटाकर 8 घंटे करवाया। इसके साथ ही उन्होंने: ➤कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई)

➤भविष्य निधि (पीएफ)

➤सवैतनिक अवकाश (पेड लीव)

➤महिला श्रमिकों के लिए प्रसूति अवकाश (मैटरनिटी अवकाश) जैसे युगांतकारी सुधार लागू किए।

राजनीतिक अधिकार और पूना पैक्ट का मोड़

वंचितों को राजनीतिक शक्ति देने के लिए बाबासाहब ने अथक संघर्ष किया। 1932 में ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए कम्युनल अवार्ड के तहत दलितों को दोहरा वोट (डबल वोट) का अधिकार मिला था। इसके विरोध में महात्मा गांधी यरवदा जेल में आमरण अनशन पर बैठ गए। अंतत: देश की एकता को ध्यान में रखते हुए 24 सितंबर 1932 को गांधी जी और डॉ. अंबेडकर के बीच ऐतिहासिक पूना पैक्ट हुआ, जिसके तहत दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र के बदले विधायिकाओं में आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गई।

धर्मनिरपेक्ष और समतावादी भारत का निर्माण

बाबासाहब एक ऐसा समाज चाहते थे जहाँ बंधुता और सामाजिक न्याय सर्वोपरि हो। जब उन्हें लगा कि स्थापित सामाजिक ढांचे में आमूल-चूल बदलाव संभव नहीं हो पा रहा है, तो उन्होंने घोषणा की थी, ‘मैं हिंदू पैदा जरूर हुआ था, लेकिन हिंदू मरूँगा नहीं।’ अपने वादे के अनुसार, जीवन के अंतिम वर्ष में 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की ऐतिहासिक दीक्षाभूमि पर उन्होंने अपने 3,65,000 समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया, जो स्वतंत्रता, समानता और करुणा पर आधारित है। 29 अगस्त 1947 को संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने भारत के संविधान का निर्माण शुरू किया। 26 नवंबर 1949 को तैयार हुआ यह संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करता है। उन्होंने सुनिश्चित किया कि भारत किसी एक विशेष धर्म का राष्ट्र न बनकर एक ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश बने जहाँ सत्ता की अंतिम शक्ति देश की आम जनता के हाथों में हो। यदि बाबासाहब ने देश को यह प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच पर आधारित संविधान न दिया होता, तो देश पुन: पुरानी रूढ़िवादी और मनुवादी व्यवस्थाओं की ओर लौट जाता। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने न केवल भारत का संविधान लिखा, बल्कि उन्होंने सदियों से शोषित करोड़ो भारतीयों को आत्मसम्मान के साथ जीने का हक देकर इस देश की तकदीर हमेशा-हमेशा के लिए बदल दी।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05