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भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अत्यंत विविधतापूर्ण और बहुआयामी रही है। वर्तमान दौर में जिसे व्यापक तौर पर एक विशिष्ट पौराणिक पहचान के साथ प्रस्तुत किया जाता है, उसके मूल में इतिहास, पुरातत्व और लोक-संस्कृति के कई ऐसे अध्याय छिपे हैं, जिनका पारंपरिक आख्यानों से गहरा मतभेद रहा है। विगत कुछ दशकों में बहुजन, दलित और मूलनिवासी विमर्श के चिंतकों, इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं ने इस बात पर गहन शोध और विमर्श प्रस्तुत किया है कि कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मनाया जाने वाला प्रकाश पर्व वास्तव में किसी पौराणिक नायक के राज्याभिषेक का पर्व न होकर, भारत की मूलनिवासी श्रमण परंपरा, कृषि संस्कृति और मौर्य सम्राट अशोक महान के ऐतिहासिक कार्यों से जुड़ा हुआ पर्व है। सांस्कृतिक आधिपत्य और इतिहास के पुनर्लेखन के इस दौर में यह आवश्यक हो जाता है कि हम उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों, बौद्ध ग्रंथों, साहित्यिक स्रोतों और लोक-परंपराओं के आलोक में दीपावली के वास्तविक स्वरूप की निष्पक्ष और तथ्यपरक पड़ताल करें। पारंपरिक रूप से यह मान्यता जनमानस में स्थापित की गई है कि त्रेतायुग में भगवान राम चौदह वर्ष के वनवास और लंका विजय के उपरांत जब अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में घी के दीपक जलाए थे, जिससे दीपावली का प्रारंभ हुआ। किंतु जब इस मान्यता को आधुनिक इतिहास, कालक्रम (क्रोनोलॉजी) और प्राचीन ग्रंथों की कसौटी पर परखा जाता है, तो कई गंभीर विसंगतियां सामने आती हैं:
महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में साक्ष्य का अभाव: वाल्मीकि रामायण को रामकथा का सबसे प्राचीन और मूल ग्रंथ माना जाता है। वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में जब राम के लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने और उनके राज्याभिषेक का विस्तृत वर्णन मिलता है, तो वहाँ स्पष्ट रूप से उल्लेख आता है कि राम का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल पक्ष में हुआ था। भारतीय कालक्रम में चैत्र मास वसंत ऋतु में आता है, जबकि दीपावली शरद ऋतु के कार्तिक मास की अमावस्या को पड़ती है। यदि राज्याभिषेक चैत्र में हुआ, तो कार्तिक अमावस्या को दीप जलाने का कोई तार्किक या ग्रंथपरक आधार प्राचीनतम रामायण में सिद्ध नहीं होता।
दीपकों और आतिशबाजी का कालक्रम: दीपावली के साथ जो आधुनिक आतिशबाजी, बारूद और व्यापक सजावट जुड़ी है, उसका प्राचीन भारत में कोई अस्तित्व ही नहीं था। बारूद का आविष्कार चीन में हुआ और भारत में उसका प्रवेश मध्यकाल में हुआ। इसके अतिरिक्त, प्राचीन काल में घी या तेल के लाखों दीयों का निरंतर जलाना किसी सामान्य जन-उत्सव का हिस्सा नहीं हो सकता था, जब तक कि उसका कोई सामूहिक, राजकीय या कृषि-आधारित ठोस आधार न हो।
लक्ष्मी-गणेश पूजन का उत्तरवर्ती जुड़ाव: रामायण की कथा के साथ राम के लौटने की बात कही जाती है, किंतु विचित्र तथ्य यह है कि दीपावली की रात्रि में पूजन राम का न होकर धन की देवी लक्ष्मी और गणेश का किया जाता है। गणेश पूजन का जन-उत्सव के रूप में प्रसार और व्यापारी वर्ग द्वारा बही-खाता पूजन बहुत बाद के कालखंडों में, विशेष रूप से मध्यकाल और गुप्तकाल के बाद की ब्राह्मणवादी व्यवस्था में विकसित हुआ। यह विसंगति स्वयं दर्शाती है कि मूल उत्सव कुछ और था, जिस पर बाद में भिन्न-भिन्न आख्यान आरोपित किए गए।
दीपदानोत्सव का मूल: इतिहासकारों और बौद्ध परंपरा के अनुसार, कार्तिक अमावस्या का सीधा और प्रामाणिक संबंध मौर्य साम्राज्य के महान शासक सम्राट अशोक से है। सम्राट अशोक का शासनकाल (ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी) भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम काल है, जिसके पुरातात्विक प्रमाण शिलाओं, स्तंभों और अभिलेखों पर आज भी अक्षुण्ण रूप से विद्यमान हैं। कलिंग युद्ध के भीषण नरसंहार के पश्चात सम्राट अशोक ने युद्ध घोष (भेरीघोष) को त्यागकर धम्म घोष को अपनाया। उन्होंने तथागत गौतम बुद्ध के करुणा, समता, प्रज्ञा और अहिंसा के संदेश को न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में उतारा, बल्कि उसे अपने साम्राज्य की नीति बनाया। महावंश, दीपवंश और अशोकावदान जैसे ऐतिहासिक और पालि ग्रंथों में यह विस्तृत उल्लेख मिलता है कि सम्राट अशोक ने तथागत बुद्ध की अस्थियों और अवशेषों को आठ मूल स्थानों से एकत्र कर पूरे जंबूद्वीप (भारत उपमहाद्वीप) में 84,000 स्तूपों, चैत्यों और विहारों का निर्माण करवाया था। इन स्तूपों में सारनाथ, सांची, भरहुत, तक्षशिला और कुशीनगर जैसे प्रमुख केंद्र शामिल थे। बौद्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इन 84,000 स्तूपों और धम्म केंद्रों का निर्माण कार्य जब पूर्ण हुआ, तब सम्राट अशोक ने एक निश्चित तिथि पर संपूर्ण साम्राज्य में एक साथ इनके लोकार्पण का आदेश दिया। वह ऐतिहासिक दिन कार्तिक मास की अमावस्या का दिन था। उस दिन संपूर्ण मौर्य साम्राज्य में प्रत्येक स्तूप, विहार, नगर, ग्राम और नागरिक के घर पर तथागत बुद्ध के ज्ञान और धम्म के प्रतीक के रूप में दीप जलाए गए थे। चूंकि अमावस्या की रात सबसे घनी अंधेरी रात होती है, इसलिए अज्ञान रूपी अंधकार पर ज्ञान और प्रज्ञा रूपी प्रकाश की विजय के रूप में लाखों दीपकों से धरा को आलोकित किया गया था। इस ऐतिहासिक घटना को प्राचीन काल में दीपदानोत्सव (दीपदान उत्सव) कहा गया।
महाप्रजापति गौतमी और श्रमण संघ का योगदान: श्रमण परंपरा में दीप जलाने का अर्थ केवल रोशनी करना नहीं था, बल्कि बुद्ध का वह अंतिम उपदेश था—अप्प दीपो भव (आत्म दीपो भव - अपने दीपक स्वयं बनो)। अज्ञान, अंधविश्वास और सामाजिक विषमता के अंधकार को मिटाकर विवेक और तर्कशीलता के प्रकाश को फैलाने का यह दिन श्रमण संस्कृति का महापर्व बना।
मूलनिवासी कृषि संस्कृति और प्रकृति-पूजा का आधार: यदि हम सम्राट अशोक के काल से भी पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता और आदिम मूलनिवासी समाज के जीवन चक्र को देखें, तो यह पर्व मूलत: भारत के कृषकों और श्रमजीवियों का ऋतु-पर्व (हार्वेस्ट फेस्टिवल) रहा है। भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है और यहाँ के मूल बाशिंदे—जिन्हें आज दलित, पिछड़ा वर्ग और आदिवासी (मूलनिवासी) कहा जाता है—खेतों, वनों और प्राकृतिक संपदा से सीधे जुड़े रहे हैं। कार्तिक मास वह समय होता है जब खरीफ की फसल (विशेष रूप से धान, तिल, सरसों, ज्वार, बाजरा) कटकर खलिहानों और घरों में आती है। वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन पर खेतों और घरों के आसपास अनगिनत जहरीले कीड़े-मकोड़े और कीट-पतंगे पैदा हो जाते थे। उस समय किसान अपने घरों, बाड़ों और खेतों की मुंडेरों पर तिल या सरसों के तेल के दीये जलाते थे। दीयों की लौ की ओर आकर्षित होकर हानिकारक कीट पतंगे जलकर नष्ट हो जाते थे, जिससे नई फसलों और घरों को सुरक्षा मिलती थी। यह एक वैज्ञानिक और कृषि-आधारित आवश्यकता थी, जिसे बाद में धार्मिक अनुष्ठान बना दिया गया।
इस पर्व का पूरा ढांचा मूलनिवासी श्रमजीवी समाज पर निर्भर है:
●कुम्हार (प्रजापति): जो मिट्टी से दीये, मटके और खिलौने गढ़ता है।
●तेली: जो तिल और सरसों से तेल निकालकर प्रकाश का साधन जुटाता है।
●किसान: जो नए अनाज (धान का लावा, खील, बताशे) की व्यवस्था करता है।
इस पर्व में किसी पुरोहित, वेदमंत्र या कर्मकांड की मूलत: कोई आवश्यकता ही नहीं थी। घर का किसान और श्रमजीवी परिवार अपने श्रम से उपजी फसल और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह उत्सव मनाता था।
गोवर्धन: दीपावली के ठीक अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन या गोधन उत्सव भी इसी बात का अकाट्य प्रमाण है। यह पर्व गाय, बैल और पशुधन के संरक्षण तथा पर्वत व वनों की रक्षा से जुड़ा हुआ है। मूलनिवासी समाज ने कभी भी काल्पनिक देवी-देवताओं की उपासना नहीं की, बल्कि जो प्रत्यक्ष रूप से जीवन देता है—जल, जंगल, जमीन, पहाड़ और पशु—उनकी पूजा की।
इतिहास का रूपांतरण: इतिहासकार डी.डी. कोसांबी, राहुल सांकृत्यायन और समाजशास्त्री डॉ. आम्बेडकर ने अपनी कृतियों में यह स्पष्ट किया है कि भारत में जब भी कोई श्रमण या लोक-आंदोलन जनमानस में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ, तो वैदिक और ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने उसे सीधे दबाने के बजाय उसका सांस्कृतिक समावेशन कर लिया। पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या के उपरांत जब प्रति-क्रांति का दौर आरंभ हुआ, तब बौद्ध स्थलों, विहारों और उत्सवों को धीरे-धीरे नए पौराणिक आख्यानों में ढाला गया। बुद्ध को विष्णु का नवां अवतार घोषित कर उनके स्वतंत्र दर्शन को समाहित करने का प्रयास इसी रणनीति का हिस्सा था। ठीक इसी प्रकार, सम्राट अशोक द्वारा प्रारंभ किए गए राष्ट्रव्यापी दीपदानोत्सव की व्यापकता और जनस्वीकार्यता इतनी अधिक थी कि उसे समाप्त करना संभव नहीं था। फलस्वरूप, उस तिथि के ऊपर त्रेतायुग के राम की काल्पनिक वापसी की कथा का आवरण चढ़ा दिया गया। गुप्तकाल और उसके पश्चात जैसे-जैसे सामंतवाद मजबूत हुआ, यह श्रमण और कृषक पर्व सामंती और व्यापारिक वर्ग के उत्सव में बदल गया। खलिहान के नए अनाज की जगह सोने-चांदी के सिक्कों और धन की देवी की पूजा ने ले ली। श्रम की महत्ता को पीछे धकेल दिया गया और भाग्य, विधाता तथा कर्मकांड को आगे कर दिया गया।
आज का परिप्रेक्ष्य: आज जब भारत का बहुजन समाज—जिसमें अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां और अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल हैं—अपनी खोई हुई सांस्कृतिक जड़ों और इतिहास को पुन: तलाश रहा है, तो यह विमर्श अत्यंत तीव्र हो उठा है। रामकथा का कोई पुरातात्विक या दस्तावेजी प्रमाण विश्व इतिहास में उपलब्ध नहीं है, जबकि मौर्य सम्राट अशोक, उनके 84,000 स्तूप, उनके शिलालेख और तथागत बुद्ध का जीवन दर्शन वैश्विक रूप से स्वीकृत और अकाट्य ऐतिहासिक सत्य है। मूलनिवासी समाज के लिए यह गौरव का विषय है कि उनका इतिहास मिथकों पर नहीं, बल्कि अशोक महान जैसे चक्रवर्ती सम्राट और तथागत बुद्ध जैसे विश्वगुरु के वास्तविक मानवीय दर्शन पर आधारित है। पौराणिक रूप में दीपावली आज अंधविश्वास, जुआ, अत्यधिक फिजूलखर्ची, और जानलेवा वायु व ध्वनि प्रदूषण (पटाखों) का पर्याय बन चुकी है। इसके विपरीत, मूल दीपदानोत्सव का संदेश सादगी, सामाजिक समता, ज्ञानार्जन, पर्यावरण के साथ सामंजस्य और प्रज्ञा का संदेश था।
सांस्कृतिक स्वाभिमान की पुनर्स्थापना: डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1956 में जब नागपुर की ऐतिहासिक भूमि पर बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी, तो उन्होंने 22 प्रतिज्ञाएं देकर बहुजन समाज को उन सभी मान्यताओं, अंधविश्वासों और मिथकों से मुक्त होने का आह्वान किया था, जिन्होंने उन्हें सदियों तक मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखा। दीपदानोत्सव को पहचानना उसी सांस्कृतिक मुक्ति आंदोलन का एक अनिवार्य कदम है।
निष्कर्ष: उपरोक्त ऐतिहासिक, पुरातात्विक, साहित्यिक और सामाजिक तथ्यों का समग्र विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि कार्तिक अमावस्या का प्रकाश पर्व मूलत: भारत के मूलनिवासियों, श्रमजीवियों और बौद्ध परंपरा का पर्व है। इसे राम के अयोध्या लौटने से जोड़ना बहुत बाद की एक पौराणिक कल्पना और सांस्कृतिक घालमेल है, जिसका प्राचीनतम वाल्मीकि रामायण में भी कोई समर्थन नहीं मिलता। यह पर्व वास्तव में सम्राट अशोक द्वारा 84,000 स्तूपों के निर्माण के उपरांत संपूर्ण भारत में तथागत बुद्ध के ज्ञान, करुणा और समता के संदेश के प्रसार का दीपदानोत्सव है। साथ ही, यह भारत की कृषक संस्कृति द्वारा खरीफ की फसल के घर आने पर प्रकृति और श्रम के प्रति आभार प्रकट करने का लोक-उत्सव है। अत: बहुजन समाज को मिथकों के भ्रमजाल से बाहर निकलकर अपने वास्तविक इतिहास, सम्राट अशोक की गौरवशाली विरासत और श्रमण संस्कृति के वैज्ञानिक मूल्यों को पहचानते हुए इस पर्व को ज्ञान, विवेक और समता के प्रकाश पर्व के रूप में मनाना चाहिए।





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