




2026-04-08 17:30:51
ज्ञातव्य हो की बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर की बहादुर जाति महार के नाम से अंग्रेजों ने 1815 में ‘महार रेजिमेंट’ बनाई थी जिसे सवर्णों की कुटिलता के कारण 1892 में ‘अमार्शल जातीय (Non Marshal Caste)’ आधार पर बंद कर दिया गया था। इसे 1941 में फिर से चालु कर दिया गया और आज यह देश की सबसे शक्तिशाली रेजीमेंट है जिसने शानदार दो जनरल: के वी कृष्णा राव और सुंदरजी, दिऐ हैं तथा परमवीर चक्र जैसे अनेक तगमे हासिल किए हैं। यह रेजिमेंट मुख्यत: महार जाति तथा अन्य अनुसूचित जातियो के लिये ही बनी थी, मराठा या महाराष्ट्र के नाम पर नहीं। आज केवल यही एक ऐसी रेजिमेंट है जिसमें हर जाति और धर्म के लोग भर्ती हो सकते हैं। डा. अंबेडकर कबीर पंथी ‘महार’ थे। उत्तर भारत के कबीर पंथी चमारों को ही महाराष्ट्र में महार; गुजरात में बुनकर; राजस्थान में बैरवा, रैगर, मेघवाल, कोली, बलई, इत्यादि नामों से जाना जाता है। अंग्रेजों को जब महशूस हुआ कि चमार एक ऐतिहासिक शक्तिशाली एवं सुपर मार्शल जाति है लेकिन इसे एक साजिश के तहत सवर्णों ने बहिष्कृत कर दबा रखा है तो उन्होंने चमारों की एक ‘बटालियन नं.10’ बनाई जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में न केवल जर्मनी को फतह किया बल्कि ईजराइल को आजाद भी कराया। साधारणत: एक बटालियन में 400 से 1000 सैनिक होते हैं लेकिन उसमें 30,000 से भी अधिक सैनिक हो गए थे लेकिन किन्हीं कारणों से उसका उन्नयन नहीं किया गया। उनके अद्वितीय युद्ध कौशल और बहादुरी को देखकर अंग्रेजों ने बटालियन नं.10 को मार्च 1943 में ‘चमार रेजिमेंट’ बनाया जिसने 1943 में विश्व की सबसे शक्तिशाली जापानी सेना को हराकर अविभाजित आसाम, ब्रह्मा और रंगून को भी फतह किया था। चमार रेजिमेंट की बहादुरी को देखकर इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने उन्हें उस समय के सर्वोच्च बहादुरी अवार्ड (Highest Gallantry Award) ‘कोहीमा अवार्ड’ से सम्मानित किया था। इससे कायल हो कर गांधी, नेहरू, आदि प्रभावशाली हिन्दुओं ने जाते जाते अंग्रेजों पर दबाव डालकर चमार रेजिमेंट को 1946 में बन्द करवा दिया। द्वितीय विश्व युद्ध में जब जापानी सेना ने ब्रह्मा और रंगून पर कब्जा कर आसाम को भी अपने आधीन कर लिया था तब अंग्रेजी हकूमत ने जापानी सेना को रोकने के लिए राजपूत और जाट रैजिमैंटों को आदेश दिया तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिऐ गये कि वे शक्तिशाली जापानी सेना का मुकाबला नहीं कर सकते। फिर अंग्रेजों ने बटालियन नं.10 के चमारों को याद किया तो वे खुशी खुशी जापानियों का मुकाबला करने के लिए तैयार हो तो गये लेकिन उन्होंने पहली बार अपनी विशाल बटालियन को रेजिमेंट बनाने के लिये माँग रखी जिसको तुरंत मान लिया गया। इसलिए अंग्रेजों ने 1943 में बटालियन नं.10 को ‘चमार रेजिमेंट’ बनाकर जापानी सेना के विरुद्ध लड़ने के लिऐ भेज दिया। चमार रैजिमैंट ने बड़ी बहादुरी और युद्ध कौशलता से लड़ते हुऐ न केवल आसाम को आजाद कराया बल्कि ब्रह्मा और रंगून को भी आजाद कराया। फलस्वरूप महारानी विक्टोरिया ने उन्हें उस समय का ‘कोहिमा अवार्ड’ नामक सर्वोच्च बहादुरी ईनाम (Highest Gallantry Award) से नवाजा था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सेना/आईएनए में भी 50% से अधिक सैनिक चमार ही थे।
01 जनवरी, 1818 को हुऐ ऐतिहासिक भीमाकोरेगाँव युद्ध के बारे में तो शायद आपको पता होगा जिसमें मशहूर बाजीराव पेशवा-2 की हाथी घोडो और आधुनिक हथियारों से लैश 28,000 सैनिकों की शक्तिशाली सेना को केवल 500 पैदल महार/चमार सैनिकों ने 24 घंटों में ही गाजर मूली की तरह काटकर पेशवाओं की पेशवी (हकूमत) हमेशा के लिऐ खत्म कर दी थी।
Sikh Light Regiment Infantry मजहबी सिखों और रामदासी चमारों से भरी पड़ी है। Pioneer Corp में भी लगभग 50% एसस और एसटी ही हैं।
22 मार्च 2015, को चमार रेजिमेंट के तीन जाबांज सैनिकों का ऐतिहासिक अभिनंदन और ‘चमार रैजिमैंट’ पुस्तक का विमोचन किया गया। चमार रैजिमैंट के अबतक बचे इन तीन जाबांज सैनिकों को देखने के लिए प्रबुद्ध नागरिकों का जन सैलाब उमड़ पड़ा। 70 साल के बाद मिले तीनों सैनिकों को भावुक होते हुए देख माहौल गमगीन हो गया। उन्हें देख कई प्रबुद्ध साथियों की आँखों से आदर के आँशु छलक गये। कई बार चमार रेजिमैंट को बहाल करने के लिऐ कई बार पार्लियामेंट में लम्बी लम्बी बहसें हो गई हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भी इसे बहाल करने के लिऐ भारत सरकार को लिखा है। अत: अब समय आ गया है कि हम सबको मिलकर चमार रेजिमैंट की बहाली के लिऐ एक जबरदस्त आंदोलन करना होगा।





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |