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धर्मांधता में पिस रहा बहुजन समाज

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2026-08-22 14:44:02

भारतीय भूमि अतीत से ही ब्राह्मणवादी अंधकार की भूमि रही है। बुद्ध काल में जब बुद्ध धम्म ने भारत भूमि पर अपना परचम फैलाया तब ब्राह्मणवादी संस्कृति के कथित अलंबरदारों ने बुद्ध धम्म की शरण में जाना ही उचित समझा। ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोगों में विशेष निपुणता यह है कि विषम सामाजिक परिस्थितियाँ आने पर वे अपने आपको परिस्थिति के अनुसार तुरंत बदल लेते हैं और उसी के अनुसार आचरण करने लगते हैं। बुद्ध काल के समय भारत भूमि पर बुद्ध का प्रभाव उस समय की शासन सत्ताओं पर भी पड़ा। बुद्ध धम्म की नीतियों को जनहित में मानकर उस समय के शासकों ने बुद्ध धम्म को आगे बढ़ाने के लिए पूर्ण सहयोग दिया और उसी प्रकार के सहयोग के बल पर पूरी भारत भूमि पर सर्वशक्तिमान बनकर सक्षम बन पाया। बुद्ध काल के समय ब्राह्मणों को छोड़कर बाकी समुदाय के सभी लोग अशिक्षित थे और सम्पदा विहीन भी थे। बुद्ध धम्म की फैलती ख्याति को देखकर ब्राह्मणवादी संस्कृति के समुदायों ने अपने आपको बुद्ध धम्म के शरणागत कर दिया। इतना ही नहीं चूंकि ब्राह्मण समुदाय के लोग अच्छे शिक्षित और विद्वान थे जिनमें से कुछेक भगवान बुद्ध के शिष्य बनकर अच्छे बौद्ध भिक्क्षु साबित हुए। कुछेक बुद्ध काल के विद्वान भिक्क्षु के नाम इस प्रकार थे-सारिपुत्त, महाकश्यप, उपाली, आनंद, मौग्ल्यायन, अनिरुद्ध, धम्मदिन्ना थेरी, पूर्ण मैत्राणीपुत्र आदि भिक्क्षु बहुत ही विद्वान और इनमें से अधिकतर मूल रूप से ब्राह्मण समुदाय से ही आए थे। ये सभी भिक्क्षु अर्हत अवस्था को प्राप्त कर चुके थे, अर्हत भिक्क्षु का अर्थ होता है कि जब कोई बौद्ध भिक्क्षु कठिन साधना से अपने सारे दुखों और मोह-माया को खत्म कर लेता है, तब वह अर्हत भिक्क्षु कहा जाता है। भगवान बुद्ध के इसी काल में बुद्ध धम्म बहुत तेज गति से आम जनता में फैला और आम जनता ने भी स्वेच्छा से उसे धारण करके बुद्ध की शिक्षाओं के अनुरूप आचरण करना शुरू किया था। इस काल की मुख्य विशेषता यह थी, उस समय के सभी शासकों ने भगवान बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर बुद्ध धम्म को अपनाया और अपनी इन शासन सत्ता के बल पर बुद्ध धम्म की शिक्षाओं को जमीन पर जनता में अवतरित किया।

जब ब्राह्मणवादी संस्कृति पड़ने लगे थी फीकी: भगवान बुद्ध के समय में जब उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार शासन सत्ता के बल पर भारत भूमि पर फैल रहा था तो देश की पाखंडवादी ब्राह्मणी संस्कृति की मान-मर्यादा और मान्यता तीव्र गति से घट रही थी। जिसे देखकर और समझकर कुटिल संस्कृति के कठोर ब्राह्मणवादी लोग मन ही मन में कुंठित थे और अपनी इस कुंठा के कारण बुद्ध के जीवन काल में अनेकों प्रपंचों की रचना की। कुटिल संस्कृति के ब्राह्मणों ने बौद्ध भिक्क्षु और खुद भगवान बुद्ध के ऊपर नाना प्रकार के षडयंत्रों के तहत अत्यंत निम्न स्तर के आरोप लगाए। लेकिन उन्हें सिद्ध करने में वे हमेशा ही भगवान बुद्ध के सामने फेल हुए जिसके कारण स्थानीय महापात्रों और शासकों के द्वारा कुटिल संस्कृति के ब्राह्मणवादीयों को दंडित और शर्मसार भी होना पड़ा। जिसे देखकर कुटिल संस्कृति के ब्राह्मणवादियों ने अपने मानसिक स्तर पर योजनाबद्ध काम करने की योजना बनाई। इस योजना के तहत उन्हें बुद्ध धम्म के अनुयायियों को परास्त करना था और ब्राह्मणों की बुद्ध धम्म के कारण खोई हुई मान-मर्यादा, सम्मान और दान-दक्षिणा को पुन: स्थापित करना था। इस प्रकार ब्राह्मण संस्कृति के कुटिल ब्राह्मणों को तत्कालीन समाज में अपना अस्तित्व, सम्मान, पुंर्स्थापित करने की चुनौती थी, जिसके तहत उन्होंने पूरी षड्यंत्रकारी योजना बनाई। योजना के तहत अशोक काल में और उसके वंशों के काल में कुटिल ब्राह्मणवादी संस्कृति सफल नहीं हो पाई। अंत में सम्राट अशोक के बाद दसवें बौद्ध शासक ब्रहद्रथ के समय में ब्रहद्रथ की एक मानवीय गलती के कारण उसकी हत्या हुई। चूंकि सम्राट ब्रहद्रथ ने अपना सेनापति एक ब्राह्मण को नियुक्त कर लिया था। जिसने राजा ब्रहद्रथ को शिकार के बहने जंगल में ले जाकर धोखे से उसकी हत्या की और उसके शासन सत्ता पर कब्जा कर लिया। पुष्यमित्र शुंग की यह चाल आकस्मिक नहीं थी चूंकि वर्षों से पुष्यमित्र शुंग अपनी षड्यंत्रकारी चाल को सफल बनाने के लिए अपने विश्वास पात्र सैनिकों को विभिन्न पदों पर स्थापित करने के लिए सालों से लगे हुए थे। इसीलिए ब्रहर्द्थ की हत्या के बाद शासन सत्ता में कोई विद्रोह नहीं हुआ यह एक सोची समझी ब्राह्मणवादी संस्कृति की षड्यंत्रकारी नीति थी। पुष्यमित्र शुंग ने अपनी इस नीति में सफल होने के बाद देश भर में बड़े पैमाने पर बौद्धों का कत्लेआम किया। ब्राह्मणवादी संस्कृति शायद दुनिया भर में सबसे ज्यादा षड्यंत्रकारी और अविश्वासनीय संस्कृति है जिस किसी ने भी आजतक इस संस्कृति पर विश्वास किया उसे हमेशा ही धोखा मिला।

ब्राह्मणवादी संस्कृति का पुनर्जागरण: ब्राह्मणवादी संस्कृति का भारत में पुनर्जागरण पुष्यमित्र काल से शुरू होता है। जिसने अपने अनधिकृत शासन सत्ता से बुद्ध सत्ता को देश से विस्थापित किया। यह ब्राह्मणी संस्कृति का एक योजनाबद्ध षड्यंत्र था। हमेशा से ही ब्राह्मणी संस्कृति का एक छिपा आचरण रहा है कि जब स्थिति विषम हो तो परिस्थिति से समझौता करते हुए भूमिगत हो जाओ। ब्राह्मणवादियों ने अपनी इसी संस्कृति का आचरण भारत में अंग्रेजी शासन आने तक किया। देश में जब मुस्लिम शासकों की सत्ता थी तो ब्राह्मणों ने मुस्लिम शासकों से हर प्रकार के समझौते किये और उनकी पूर्ण रूप से गुलामी की। जब देश में अंग्रेजों का शासन हुआ तब भी ब्राह्मण संस्कृति के कुटिल ब्राह्मण अंग्रेजों से समझौता कर रहे थे। देश की खुफिया जानकारी अंग्रेजों को मुहैया करा रहे थे और एक तरह से देश के साथ देशद्रोह कर रहे थे। बदले में अंग्रेजों से मासिक पेंशन पा रहे थे। आज अपने आपको राष्ट्रवादी कहने वाले संघी वास्तविकता के आधार पर देशभक्त नहीं, देश के दुश्मन है। देश की भोली-भाली जनता को इनके देशविरोधी कुकर्मों की जानकारी नहीं है इसलिए इनके छलावों में वे बार-बार फँसते रहते हैं। वर्तमान समय में मोदी और भागवत व उनके कुछ अंधभक्त संघी साथी इस शासन सत्ता के आखिरी प्रतीक है। चूंकि वर्तमान समय में हर रोज इनके कुकर्मों की कलई खुलती जा रही है और जनता का भरोसा जेन-जी और जेन-एल्फा आने के बाद इनसे पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। देश की आम जनता अब इन बहरूपिया संस्कृति के अलंबरदारों को फूटी आँख भी देखना पसंद नहीं करती। चूंकि इन ब्राह्मणवादी संस्कृति के अलंबरदारों ने देश की जनता में गहराई तक समाहित करके अंधभक्तों की दुनिया में परिवर्तित कर दिया है। देश की आम जनता अंधभक्तों को अब जूते मार रही है। जेन-जी और जेन-एल्फा के तेवरों को देखते हुए और समझते हुए देश के संवैधानिक न्यायालयों ने भी अपने तेवर बदलने शुरू कर दिये हैं।

वर्तमान मोदी सत्ता ने 2014 से लेकर अब तक मंदिरों, धार्मिक आयोजनों, कथाओं, सत्संगों आदि पर अधिक ध्यान दिया है। देशभर में धार्मिक चोला पहनाकर भोली-भाली जनता को लूटने के लिए धर्म प्रचारकों को बड़े पैमाने पर स्थापित किया है। इनके प्रत्येक धर्म प्रचारकों के पास अरबों रुपए की चल-अचल संपत्ति है, देश-विदेश में आश्रम स्थापित किये हुए हैं। देश की जनता नंगी-भूखी और त्रस्त है, उन्हें मुफ्त का राशन (अफीम की गोली) खिलाया जा रहा है। जिसके माध्यम से देश की अधिकांश जनता को आलसी और अकर्मण्य बनाया जा रहा है। जनता भी इस मुफ्त की गोली खाकर अपनी अकर्मण्यता में मदमस्त है। जनता को ऐसा बनाया जा रहा है कि उसमें काम करने की न इच्छा हो और न साहस हो। सिर्फ मुफ्त का राशन (अफीम की गोली) खाकर मदमस्त रहे और वर्तमान संघी शासन को निरंतरता में स्थापित करने के लिए अपना वोट देते रहे।

धार्मिक अंधता के कारण घटी घटनाएँ: मोदी-संघी काल में धर्मांधता के कारण अनेकों घटनाएँ घटी है परंतु यहाँ पर हम सबका जिक्र ना करके कुछेक प्रमुख घटनाओं को सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं-

2014 पटना गांधी मैदान: विजय दशमी के अवसर पर गांधी मैदान में लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हुई थी और इस समारोह के बाद अव्यवस्था के कारण भगदड़ मच गई, जिसमें 32 लोगों की मौते हुई थी। मरने वाले सभी आमतौर पर गरीब-वंचित समुदाय के लोग अधिक थे।

2015 आन्ध्र प्रदेश, गोदावरी पुष्करम: राज मुंदरी में पुष्करम स्नान के दौरान अत्यधिक भीड़ के कारण भगदड़ में करीब 30 व्यक्तियों की जाने चली गई। मरने वालों में अधिकांशतया वंचित शोषित समाज के ही रहे होंगे।

2022 जम्मू कश्मीर वैष्णो देवी मंदिर: नए साल की शुरूआत पर माता वैष्णो देवी के संकरे रास्ते पर हुई भगदड़ में 12 अंधश्रद्धालुओं की मौत हुई थी और आमतौर पर मरने वाले गरीब वंचित समाज के ही लोग होते हैं, शायद इसी वजह से ब्राह्मणवादी संस्कृति की सरकारें सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं करते?

2024 हाथरस, उत्तर प्रदेश: 2 जुलाई 2024 को एक अंधभक्ति के संतसंग के दौरान भीषण भगदड़ मची, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं थे जिसके कारण 121 लोगों की मौते हुई। इस घटना में मुख्य रूप से महिलाओं व बच्चों की मौते हुई थी।

2024 जहानाबाद, बिहार: अगस्त 2024 में बाबा सिद्धेश्वर नाथ मंदिर में अंधश्रद्धा में फंसे अंधभक्तों की भीड़ उमड़ी और इस दौरान हुई भगदड़ में कम से कम सात अंधश्रद्धा में फंसे लोगों की मौत हुई थी।

2025 तिरुपति मंदिर, आन्ध प्रदेश: तिरुपति मंदिर के पास टिकट काउंटर और प्रवेश द्वार पर अधिक भीड़ इकट्ठी होने कारण भगदड़ मच गई और 6 अंधश्रद्धालुओं की जान चली गई थी।

2025 प्रयागराज महाकुम्भ, उत्तर प्रदेश: जनवरी 2025 में मौनी अमावस्या के अवसर पर महाकुम्भ क्षेत्र में संगम पर अत्यधिक भीड़ के दबाव के कारण भगदड़ मच गई जिसमें योगी और संघी समर्थकों ने लगभग 17 से 30 लोगों की मृत्यु हुई बताई। जबकि अप्रत्यक्ष चश्मदीद निवासियों ने 100 से भी अधिक अंधश्रद्धालुओं की मौत की जानकारी अप्रामाणिक साक्ष्यों के आधार पर बताई थी।

2025 गोवा के लिरई देवी मंदिर उत्सव, पुरी रथ यात्रा और हरिद्वार मनसा देवी के पास कई भगदड़ की घटनाएँ हुई जिसमें करीब 20 से अधिक लोगों की जाने गई।

जब हम स्थानीय स्तर पर मेलों, पर्वों, छोटे-बड़े मंदिरों और अखबार में छपी सुर्खियों में आने वाली अन्य भगदड़ व भीड़ में हुई मौतों के आंकड़ों को जोड़ते हैं तो, 2014 से अब तक मरने वाले की संख्या 1000 के पार पहुँच जाती है जिसे देखकर सरकार को शर्मसार होना चाहिए और अपनी प्रशासनिक क्षमता में वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर सुधार करना चाहिए ताकि देश के जान-माल का नुकसान न हो पाये। चूंकि मरने वालों में अधिकांशतया शोषित-वंचित लोग ही होते हैं, इसलिए संघी मानसिकता की सरकारें पुख्ता इंतजाम नहीं करती।

उपरोक्त घटनाओं के अतिरिक्त देश में घटित कुछेक अन्य घटनाएँ भी है। जैसे- श्रीकाकुलम, आंध्रप्रदेश: श्री वेंकेटश्वर स्वामी के मंदिर में हुई 9 अंधभक्तों की जाने चली गई। मरने वालों में मुख्य रूप से महिलाएं और बच्चे थे, वे भी वंचित-शोषित समाज के अंधश्रद्धालु थे।

लखीसराय, बिहार अशोकधाम मंदिर: सावन के दौरान मंदिर परिसर में भीड़ के अत्यधिक दबाव और अफवाह के कारण भगदड़ मच गई जिसमें 7 अंश्रद्धालुओं की मौत हो गई।

तिरुपति मंदिर, आंध्र प्रदेश: अंधश्रद्धालुओं की अधिकता के कारण भगदड़ हुई जिसके कारण 6 अंधभक्तों की मौते हुई थी।

भारत में ब्राह्मणी संस्कृति मंदिर निर्माण और मंदिर दर्शन पर अधिक जोर देती है जिसके कारण जनता की मानसिकता से तार्किकता और वैज्ञानिकता खत्म होती जा रही है। देश में अंधविश्वास और अतार्किकता अधिक बढ़ रही है। जिसका प्रमुख कारण है देश के बारह बैठी हिन्दुत्व की वैचारिकी। वर्तमान संघी सरकार जनता के टैक्स से इकट्ठा हुए पैसे को जनता में अंधश्रद्धा और अवैज्ञानिकता बढ़ाने पर खर्च कर रही है। मोदी संघी सरकार की यह सोची समझी षड्यंत्रकारी नीति है ताकि देश की जनता जागरूक न हो सके। देश की जनता अपनी और अपने आने वाली पीढ़ी का विकास ठीक से न कर सके।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05