




2026-04-08 17:42:51
मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार शांति प्रिय होता है जब तक उसकी प्रवृति को बाह्य कारणों से प्रभावित न किया जाये। समाज के अंदर कोई भी आंदोलन या संघर्ष स्वत: ही पैदा नहीं होते, परिस्थिति के अनुसार ये स्वत: ही पैदा होते रहते हैं। ऐसे ही हाशिये पर पड़े लोगों को भारत में सरकारों द्वारा लगातार की गई उनकी उपेक्षा ने और उनके हक अधिकारों के दमन ने देश में नक्सलवाद के आंदोलन को जन्म दिया।
नक्सलवाद की शुरूआत: कब और कैसे? नक्सलवाद की औपचारिक शुरूआत 25 मई 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गाँव से हुई थी। इसी गाँव के नाम पर इस आंदोलन को ‘नक्सलवाद’ कहा गया। इस आंदोलन का प्रमुख नेतृत्व चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल ने किया था। इस आंदोलन के तात्कालिक कारण थे कि 1967 में एक किसान ने अपनी जमीन के टुकड़े पर कब्जा पाने के लिए कानूनी आदेश प्राप्त किया था, लेकिन स्थानीय जमींदारों के गुंडों ने उस पर हमला कर दिया। इसके विरोध में किसानों ने विद्रोह कर दिया और उन्होंने जमींदारों से अनाज और जमीन छीनना शुरू कर दिया। इस आंदोलन की विचारधारा माओत्से तुंग (चीनी कम्युनिस्ट नेता) की विचारधारा से प्रेरित थी, जिसका मानना था कि ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।’ इनका मुख्य उद्देश्य जमींदारों और शोषक वर्ग के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह करके सत्ता हासिल करना था।
सरकारों ने इसे पनपने में कैसे मदद की? सीधे तौर पर कोई भी सरकार विद्रोह नहीं चाहती, लेकिन कई दशकों की प्रशासनिक विफलताओं ने जाने-अनजाने में नक्सलवाद के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की।
भूमि सुधारों की विफलता: आजादी के बाद कागजों पर तो जमींदारी प्रथा खत्म कर दी गई, लेकिन असलियत में जमीन का बड़ा हिस्सा कुछ ही प्रभावशाली लोगों के पास रहा। गरीब और आदिवासी किसान अपनी ही जमीन पर बंधुआ मजदूर बनकर रह गए। सरकारों ने भूमि वितरण के कानूनों को कड़ाई से लागू नहीं किया, जिससे असंतोष बढ़ा।
आदिवासियों का विस्थापन और जल-जंगल-जमीन: भारत के खनिज संसाधन उन्हीं इलाकों में हैं जहाँ अधिकांशतया आदिवासी रहते हैं। खनन परियोजनाओं और बांधों के नाम पर सरकारों ने आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया। उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास। इस खालीपन को नक्सलवादियों ने हक की लड़ाई का नारा देकर भर दिया।
प्रशासनिक शून्यता: नक्सल प्रभावित इलाकों (जैसे छत्तीसगढ़ का बस्तर, झारखंड के कुछ हिस्से) में दशकों तक बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर-सड़क, बिजली, स्कूल और अस्पताल-नहीं पहुँचे। जब जनता को लगा कि सरकार उनके लिए मौजूद नहीं है, तो उन्होंने नक्सलियों की जनता सरकार को स्वीकार करना शुरू कर दिया।
पुलिस और सुरक्षा बलों का व्यवहार: शुरूआती दौर में सरकारों ने इसे केवल कानून व्यवस्था की समस्या माना। सुरक्षा बलों द्वारा की गई कथित ज्यादतियों और निर्दोष आदिवासियों की गिरफ्तारी ने स्थानीय लोगों को नक्सलियों के और करीब धकेल दिया।
राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी: कई बार स्थानीय स्तर पर राजनेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए या चुनाव जीतने के लिए इन समूहों का परोक्ष रूप से इस्तेमाल किया, जिससे इन्हें संगठित होने का समय और स्पेस मिल गया।
वर्तमान संघी सरकार का दावा: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को लोकसभा में यह बयान दिया कि ‘नक्सलवाद अब लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है’ बस्तर में अब स्कूल बन रहे हैं, राशन की दुकानें खुल रही हैं, बच्चे स्कूल जा रहे हैं, चारों ओर शांति का माहौल है। मगर इस सच्चाई के दावे को हमें वास्तविक धरातल पर जाकर जाँचना और परखना होगा?
31 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने गृह मंत्री अमित शाह के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा, कि लोकसभा में अपने बयान में अमित शाह ने दावा किया है कि हमारी सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ प्रयासों का समर्थन नहीं किया। यह पूरी तरह गलत है। मैं उन्हें किसी भी समय और स्थान पर इस पर बहस की चुनौती देता हूं। राज्य और देश के लोगों को गुमराह नहीं किया जाना चाहिए। भूपेश बघेल के बयान से पहले लोकसभा में ‘वामपंथी उग्रवाद से देश को मुक्त करने के प्रयास पर चर्चा’ के दौरान तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सरकार के नक्सलवाद के खात्मे के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘अगर नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो गया है और सामान्य स्थिति लौट आई है, तो फिर बस्तर में भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती क्यों है?’
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह साफ है कि वास्तविक आधार पर नक्सलवाद खत्म नहीं हुआ। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की घोषणा बेमानी है, बस्तर की जमीन पर आज भी नक्सलवाद मौजूद है। उसके समाधान के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती और सुरक्षा बलों को आधुनिक तकनीक के हथियार दे देना नक्सलवाद का खात्मा नहीं है। बल्कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपनी संघी मानसिकता के अनुरूप अपनी विफलता को छिपाकर देश को गलत जानकारी दे रहे हैं। प्रभावी क्षेत्र के जागरूक और बुद्धिजीवियों से समन्वयता ही नक्सलवाद को खत्म करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है। जो संघी सरकारों ने नहीं किया।
सामंतवाद, दमन व स्थानीय लोगों को अधिकार विहीन करना, समस्या का हल नहीं: देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था व संविधान सत्ता है। जिसके तहत सरकार में बैठे मंत्रियों को देश की समस्याओं को जनता के सामने सीधे तौर पर रखना चाहिए। नक्सलवाद वास्तव में कोई बड़ी समस्या नहीं थी मगर सरकारों की उदासीनता और असंवेदनशीलता ने नक्सलवाद को बढ़ाने में मदद की। स्थानीय लोगों (मूलनिवासियों) को उनके हक अधिकारों, जल-जंगल-जमीन से विस्थापित किया गया और न उन्हें उसका सही मुआवजा दिया गया और न ही उन्हें पुनर्वासित किया गया। नक्सलवाद की चिंगारी को बढ़ाने में सरकार में बैठे सामंतवादी व मनुवादी विचारधारा के लोग है जिन्होंने इस आंदोलन की आग में घी डालने का काम किया। सरकार चाहे वर्तमान भाजपा हो या पूर्व की कांग्रेसी सरकार, सभी ने उनके हक अधिकारों के दमन के लिए शक्ति का प्रयोग किया। उनकी खनिज पदार्थो से भरी हुई जमीन पर कब्जा करने की मंशा से मुफ्त के बराबर मुआवजा देकर जमीनों को अधिकृत किया गया। मूलनिवासी कथित नक्सलवादी लोग इस देश के ही मूलनिवासी हैं, उनके साथ विदेशियों जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था। उनकी जमीनों का अधिकरण करके अपने व्यापारी मित्रों को उस जमीन का मालिक नहीं बनाना चाहिए था, जबकि सरकारों ने ऐसा नहीं किया। सरकारों की ऐसी नीति को देखकर, साफतौर पर कहा जा सकता है कि नक्सलवादियों की समस्या की जड़ में सरकारी नीतियों का अधिक दोष है, जनता का नहीं। जब तक सरकार अपनी नीतियों को नक्सलवादी क्षेत्र के मूलनिवासियों की इच्छा के अनुसार नहीं बनाएगी तब तक नक्सलवाद का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसलिए सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करने की अधिक आवश्यकता है।
इस तरह की समस्या धीरे-धीरे सिर्फ बस्तर तक ही सीमित नहीं है, अब इसी तरह की समस्या धीरे धीरे उत्तर प्रदेश के पूर्वोतर क्षेत्रों में भी देखने को मिल रही है। जहां पर जमीदारी प्रथा कागजों पर तो खत्म हो गई, मगर आज भी जमीन उन्हीं जमीदारों के वंशजों के कब्जें में है। जमीन के जो वास्तविक हकदार है उन्हें आजतक भी भाजपा की डबल इंजन की सरकार ने कब्जा नहीं दिलाया है। बहन मायावती की सरकार ने जब इस समस्या को समझकर असली भू-मालिकों को कब्जा दिलाने की पहल की तो समाज और सरकार में बैठे सामंतवादी और ब्राह्मणवादी विचारधारा के लोगों ने उसका बड़े स्तर पर विरोध किया था और चुनाव आने पर 2012 में उन्हें प्रदेश की सत्ता से बेदखल कर दिया था। यह समस्या प्रदेश में व्याप्त सामंतवाद और ब्राह्मणवाद के कारण जन्म ले रही है।
उत्तर प्रदेश में ‘विशिष्ट भूमि सुधार कानून’ लागू है फिर भी वहाँ पर योगी सरकार के चलते एक-एक प्रभावशाली व्यक्ति के पास जो अधिकतर सवर्ण समुदाय से हैं, उनके कब्जें में हजारों-हजारों एकड़ जमीन है। उत्तर प्रदेश की डबल इंजन की भाजपा सरकार इसका समाधान करने में पूरी तरह से विफल है। बहुजन समाज इस समस्या का वास्तविक हल जल्द से जल्द देखना चाहता है और जमीन के असली हकदारों को उनकी जामीन का हक दिलाना चाहता है। ताकि उत्तर प्रदेश के पूर्वोतर क्षेत्रों में नया नक्सलवाद जड़ें न जमा पाये।





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