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भारतीय सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में पासी समुदाय एक ऐसा नाम है, जिसका उल्लेख वीरता, राजसी ठाठ और अटूट स्वाभिमान के बिना अधूरा है। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के बड़े भू-भाग पर फैले इस समुदाय का इतिहास केवल श्रम और सेवा का नहीं, बल्कि किलों, रियासतों और युद्धों का रहा है। पासी शब्द की व्युत्पत्ति और उनके ऐतिहासिक साक्ष्यों को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि वे इस देश के मूल निवासी और रक्षक रहे हैं।
पासी शब्द की उत्पत्ति, पासी कौन हैं?
पासी शब्द की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों और नृवंशविज्ञानियों के अलग-अलग मत हैं, लेकिन सबसे प्रबल मत असि (तलवार) से जुड़ा है।
असि-पाणि: संस्कृत में असि का अर्थ तलवार और पाणि का अर्थ हाथ होता है। अर्थात, जिसके हाथ में तलवार हो। समय के साथ यह शब्द अपभ्रंश होकर पासी बन गया। यह उनके योद्धा होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
पाश: कुछ विद्वान इसे पाश (जाल या फंदा) से जोड़ते हैं। प्राचीन काल में पासी योद्धा युद्ध के मैदान में अपने दुश्मनों को फंदे से पकड़ने में माहिर थे।
प्रमुख पासी शासक और रियासतें:
इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि मध्यकाल (10वीं से 12वीं शताब्दी) में अवध (वर्तमान मध्य उत्तर प्रदेश) के एक बड़े हिस्से पर पासी राजाओं का शासन था।
पासी शिरोमणि महाराजा बिजली पासी
जग प्रसिद्ध विद्वान सर एच.एम.इलियट द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ अवध’ भाग 1 के पृष्ठ 33 से 53 के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजा बिजली पासी कन्नौज के राजा जयचन्द के समकालीन थे। इस तथ्य की पुष्टि लगभग सभी इतिहासकार करते हैं। कन्नौज के राजा जयचन्द का शासन काल सन 1170-94 ई. तक था। इस प्रकार राजा बिजली पासी का शासन काल भी ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में था।
सीतापुर के निमार्ता महाराजा छीता पासी
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित सीतापुर गजेटियर वाल्यूम 1 के पेज 214 पर अंकित है कि सीतापुर जिले का प्राचीन नाम छितियापुर था। छितियापुर नाम महाराजा छीता पासी के नाम पर पड़ा है जिन्होंने छितियापुर को बसाया था। महाराजा छीता पासी कन्नौज के राजा जयचन्द्र के समकालीन थे। महाराजा छीता पासी के किले का भग्नावशेष आज के सीतापुर जिले के पूर्वी छोर पर सीतापुर, लखनऊ राजमार्ग पर प्लाई उड फैक्ट्री के पास आज भी उनकी शौर्य गाथा का जीता-जागता प्रमाण है।
राजा डालचन्द एवं राजा बालचन्द
डलमऊ जनपद रायबरेली का एक प्रसिद्ध कस्बा है। इस क्षेत्र में पचासों हजार पासी रहते हैं। लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। कुछ लोग सरकारी सेवा में भी हैं।डलमऊ का नाम पासी राजा डाल के नाम पर पड़ा है। राजा डालचन्द एवं बालचन्द दो भाई थे। इनकी वीरता की ख्याति दूर-दूर तक थी। इनकी सेनाओं के प्रमुख योद्धा एवं सेनानी ताल वीर और करवा वीर ने नसीरूद्दीन को एक युद्ध के दौरान मौत के घाट उतार दिया था।
राजा खैरा पासी
महाराजा छीता पासी के वर्तमान किले का क्षेत्रफल सीतापुर जिले के खैराबाद परगने में आता है। यह निर्विवाद सत्य है कि खैराबाद को राजा खैरा पासी ने बसाया था। प्राचीन काल में पराक्रमी राजा विक्रमाजीत के समय से खैराबाद को मासी चैत या मासी चित्र के नाम से जाना जाता था।
लखनऊ को बसाने वाले वीर शिरोमणि लाखन पासी
वीर शिरोमणि लाखन पासी ने लखनऊ की स्थापना की थी आज जिस टिल्ले पर किंग जार्ज मेडीकल कॉलेज की भव्य ईमारत खड़ी हुई हैं उसी टिल्ले पर राजा लाखन पासी का किला हुआ करता था लाखन पासी का राज्य 10-11वीं शताब्दी में था उनका किला डेढ़ किलो मीटर लम्बा और डेढ़ किलो मीटर चौड़ा था और धरा तल से 20 मीटर ऊँचे पर था लाखन पासी के पत्नी का नाम लखनावती था संभवता इस लिए लखनऊ का नाम लखनावती चलता था राजा लाखन पासी ने लखनावती वाटिका का निर्माण कराया था।
राजा माहे पासी
चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, जब दिल्ली पर सुल्तान फिरोजशाह तुगलक का शासन काल था, उस समय रायबरेली जनपद के ऊंचाहार नगर पालिका से थोड़ी दूर पर गोड़वा रोहनियाँ नामक स्थान पर एक छोटा सा गणराज्य था जिसके शासक थे माहे पासी। माहे पासी एक पराक्रमी योद्धा थे। उनमें अपार संगठन शक्ति थी। उन्होंने अपने बल पर एक बलशाली सेना इकट्ठा की और गोड़वा रोहनियाँ में अपना स्वतंत्र राज्य खड़ा किया। उन्होंने नेवारी के राजा को युद्ध में परास्त किया था। इस जीत से उनको नेवारी राज्य का एक बहुत बड़ा भू-भाग मिला था।
उन्नाव एवं हरदोई के पराक्रमी वीर महाराजा सातन पासी
सातन कोट, जनपद उन्नाव, तहसील के बांगरमऊ क्षेत्र में, उन्नाव से उत्तर, लगभग 51 कि.मी. की दूरी पर, सन्डीला रोड पर सई नदी के किनारे स्थित है। सन्डीला, जो जनपद हरदोई की तहसील है, से होकर सातन कोट जाने पर इसकी दूरी लगभग 20 कि.मी. पड़ती है। सई नदी के तीर होने के कारण इस क्षेत्र में पानी की उपलब्धता सदैव बनी रहती है। सई नदी जनपद उन्नाव और जनपद हरदोई की सीमा-रेखा है। इस इलाके के चारों ओर पासी जाति के लोगों का बाहुल्य है।
महापराक्रमी महाराजा सुहेलदेव पासी की वीरगाथा
सूर्य एवं चन्द्रवंशी राजाओं की भांति पासी जाति के राजाओं का इतिहास भी उनकी यशोगाथा से भरा पड़ा है। इसी जाति में महाराजा सुहेलदेव पासी हुये। जिनके पिता का नाम मंगलध्वज था। राजा सुहेलदेव पासी का जन्म सन 996 में हुआ था। सैयद सालार मसऊद गाजी, जो ईरान के बादशाह का भान्जा था (शर्की मान्यूमेन्ट के पृष्ठ 12.3 पर अंकित है कि सैयद सलार मसऊद गाजी महमूद गजनवी का भांजा था), ने भारतवर्ष पर हमला कर दिया। सैयद सालार मसऊद गाजी युद्ध कौशल में माहिर एक पराक्रमी योद्धा था। उसने भारतवर्ष में दिल्ली के शासक को हराया। वहां से वह खुर्जा, अलीगढ़, सीतापुर के रास्ते होता हुआ बहराइच पहुंचा। बहराइच तक के रास्ते में पड़ने वाले समस्त राजाओं को उसने परास्त कर दिया। बहराइच में तत्समय राजा सुहेलदेव पासी का राज्य था।
आजादी की अमर शहीद वीरांगना ऊदादेवी पासी
वीरांगना ऊदादेवी पासी स्व0 बाबू राम सहाय चौधरी पूर्व एम0 एल0 सी0 की परदादी अर्थात ग्रेट ग्रैन्ड मदर थी। उनके वंशज आज भी हुसैनगंज चौराहा, लखनऊ के पास निवास करते हैं। बात भारतवर्ष में अंग्रेजी शासन के विरूद्ध आजादी की लड़ाई के समय की है। तत्समय अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सेना में पासी पल्टन नाम की फौज हुआ करती थी। नवाब वाजिद अली शाह के लखनऊ से जाने के पश्चात् सिकन्दरबाग का इलाका पासी रक्षक महिलाओं की देख-रेख में था। सर कालिन कैम्पवेल इस क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए अपना जाल बिछा रहा था। 16 नवम्बर 1857 को अंग्रेजी सेनाओं नें सिकन्दर बाग को चारों ओर से घेर लिया था, फलस्वरूप अंग्रेजी सेना और क्रान्तिकारियों की सेना के बीच घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया।
पासी समुदाय का मूल पेशा और कौशल
सैन्य सेवा और सुरक्षा: पासी राजाओं की सेना में पासी सैनिक अपनी वफादारी और निशानेबाजी के लिए प्रसिद्ध थे। वे धनुष-बाण चलाने और तलवारबाजी में निपुण थे। मुगल काल और बाद में अवध के नवाबों के समय भी पासियों को किलेदार और चौकीदार (रक्षक) की महत्वपूर्ण भूमिकाएँ दी गईं।
कृषि और पशुपालन: सत्ता के विकेंद्रीकरण के बाद, इस समुदाय का एक बड़ा हिस्सा कृषि और पशुपालन से जुड़ा। वे भूमि के मालिक (भूमिधर) भी रहे हैं।
ताड़ी का व्यवसाय: कुछ क्षेत्रों में पासी समुदाय ताड़ के पेड़ों से ताड़ी निकालने के व्यवसाय से जुड़ा। हालांकि, यह उनके कौशल का केवल एक हिस्सा था, लेकिन कालांतर में औपनिवेशिक काल के दौरान इसे ही उनकी मुख्य पहचान बना दिया गया ताकि उनके गौरवशाली राजनीतिक इतिहास को धूमिल किया जा सके।
ब्रिटिश उत्पीड़न: चूंकि यह समुदाय लड़ाकू और विद्रोही स्वभाव का था, इसलिए अंग्रेजों ने इन्हें दबाने के लिए 1871 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू किया। इसके तहत पासी जाति को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया। उन्हें थानों में हाजिरी देनी पड़ती थी और उनके आवागमन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इससे उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई और समाज में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाने लगा।
सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न का स्वरूप
भारत की जाति व्यवस्था के कठोर होने के साथ, पासी समुदाय को शूद्र और बाद में अति-शूद्र की श्रेणी में धकेल दिया गया। उनके साथ हुए भेदभाव के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
सत्ता से बेदखली: जब पासी राजाओं के किले ढह गए और मुस्लिम व ब्रिटिश शासकों का वर्चस्व बढ़ा, तो इस योद्धा जाति को भूमिहीन करने का प्रयास किया गया।
छुआछूत का दंश: सामाजिक सोपान में उन्हें नीचे रखा गया। उनके द्वारा ताड़ी निकालने के कार्य को अपवित्र घोषित कर दिया गया, जबकि वही समाज उनके द्वारा दी गई सुरक्षा पर निर्भर रहता था।
शिक्षा से वंचना: सवर्णवादी मानसिकता के कारण इस समुदाय को लंबे समय तक शिक्षा और ज्ञान के केंद्रों से दूर रखा गया, ताकि वे अपने गौरवशाली इतिहास को भूल सकें।
जमींदारी उत्पीड़न: आजादी से पहले जमींदारों और सामंतों ने पासी किसानों का भारी शोषण किया। बेगारी (बिना मजदूरी के काम कराना) कराना इस समुदाय के साथ होने वाला एक सामान्य उत्पीड़न था।
पासी समाज की उप-जातियाँ
पासी समुदाय कई उप-जातियों में विभाजित है, जो उनकी विविधता को दशार्ता है:
राजपासी: जो खुद को राजाओं का वंशज मानते हैं।
कैथवास पासी: जो अक्सर लेखन और हिसाब-किताब के कार्यों से जुड़े रहे।
गूजर पासी, पीस्वान पासी, और अन्य: ये क्षेत्रीय विविधताओं के आधार पर विभाजित हैं।
आधुनिक युग में पुनर्जागरण और गौरव की वापसी
आजादी के बाद, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के संवैधानिक सुधारों और आरक्षण की व्यवस्था ने पासी समुदाय को पुन: उठने का अवसर दिया।
राजनीतिक चेतना: आज पासी समुदाय उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाता है। कई विधायक, सांसद और मंत्री इस समाज से निकलकर नेतृत्व कर रहे हैं।
बहुजन आंदोलन का प्रभाव: मान्यवर कांशीराम और अन्य बहुजन नेताओं ने महाराजा बिजली पासी और ऊदा देवी पासी जैसे नायकों को इतिहास के अंधेरों से निकालकर मुख्यधारा में स्थापित किया। आज 11 नवंबर (ऊदा देवी शहादत दिवस) को एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
शिक्षा और प्रशासनिक सेवा: समाज के युवा अब शिक्षा की ओर अग्रसर हैं और आईएएस, आईपीएस जैसे उच्च पदों पर आसीन होकर समाज की सेवा कर रहे हैं।
पासी जाति का इतिहास तलवार की धार और स्वाभिमान की ढाल से लिखा गया है। यह वह समाज है जिसने कभी झुकना नहीं सीखा—चाहे वो विदेशी आक्रांता हों, ब्रिटिश हुकूमत हो या सामंती व्यवस्था। भले ही सदियों के सामाजिक भेदभाव ने उनकी कमर तोड़ने की कोशिश की, लेकिन अपनी जड़ों और महापुरुषों की प्रेरणा से यह समाज आज फिर से बहुजन स्वाभिमान का परचम लहरा रहा है। पासी वो नहीं जो केवल इतिहास पढ़ते हैं, पासी वो हैं जो वक्त आने पर इतिहास रचते हैं।





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