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बाबा साहेब और गोलमेज सम्मेलन

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2026-09-05 14:55:54

1930 के दशक की शुरूआत भारतीय संवैधानिक और राजनीतिक इतिहास में एक युगांतकारी दौर थी। साइमन कमीशन की रिपोर्ट के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत के भावी संविधान और राजनीतिक सुधारों पर चर्चा करने के लिए लंदन में गोलमेज सम्मेलनों की श्रृंखला आयोजित की। इस मंच पर डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर की उपस्थिति ने सदियों से उपेक्षित और वंचित रहे अछूत समुदाय को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन: 1930 में जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने लंदन में गोलमेज सम्मेलन बुलाने का निर्णय लिया, तो भारत के विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक वर्गों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया। ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन के माध्यम से डॉ. बी. आर. आम्बेडकर और राव बहादुर आर. श्रीनिवासन को भारत के दबे-कुचले वर्गों के आधिकारिक और अधिकृत प्रतिनिधियों के रूप में लंदन आने का औपचारिक निमंत्रण पत्र भेजा गया। 12 नवंबर 1930 से 19 जनवरी 1931 तक चले इस सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग नहीं लिया (क्योंकि वह सविनय अवज्ञा आंदोलन चला रही थी)।

20 नवंबर 1930: डॉ. आम्बेडकर ने ब्रिटिश हुकूमत और भारतीय सामंतवाद दोनों पर एक साथ कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि हम ब्रिटिश सरकार के प्रति कोई निष्ठा नहीं रखते, क्योंकि डेढ़ सौ साल के शासन के बाद भी भारत के पांच करोड़ अछूतों की स्थिति वैसी ही अमानवीय बनी हुई है... लेकिन हम एक स्वतंत्र भारत चाहते हैं जहाँ हमें एक नागरिक के रूप में समान अधिकार और राजनीतिक सुरक्षा की गारंटी मिले। प्रथम सम्मेलन में डॉ. आम्बेडकर ने वंचितों के लिए वयस्क मताधिकार, अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भेदभाव के विरुद्ध संवैधानिक सुरक्षा उपायों की विस्तृत रूपरेखा रखी।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन: 7 सितंबर 1931 से 1 दिसंबर 1931 तक लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन की सबसे खास बात यह थी कि गांधी-इरविन समझौते के तहत कांग्रेस की ओर से महात्मा गांधी एकमात्र प्रतिनिधि बनकर इसमें शामिल हुए। सम्मेलन के दौरान नए संविधान में विभिन्न समुदायों (मुसलमान, सिख, एंग्लो-इंडियन, ईसाई और डिप्रेस्ड क्लासेस) के राजनीतिक अधिकारों और सीटों के बंटवारे पर विचार करने के लिए इस समिति का गठन हुआ। महात्मा गांधी का तर्क था कि कांग्रेस पूरे भारत और सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है। वे मुसलमानों और सिखों के लिए विशेष राजनीतिक प्रावधानों पर तो विचार करने को तैयार थे, लेकिन अछूतों (जिन्हें वे हरिजन कहते थे) को हिंदू समाज का अभिन्न अंग मानते थे। उनका मानना था कि अछूतों के लिए अलग राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र बनाने से हिंदू समाज हमेशा के लिए खंडित हो जाएगा।

वहीं बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर ने तथ्यों और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर पुरजोर तर्क दिया कि अस्पृश्य समुदाय केवल धार्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी हिंदुओं से पूरी तरह पृथक और उत्पीड़ित है। उन्होंने कहा कि यदि अछूतों के पास अपनी अलग राजनीतिक शक्ति नहीं होगी, तो सवर्ण हिंदू बहुसंख्यक सीटों पर जीतकर उनके अधिकारों का कभी प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे। द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में जब आम सहमति नहीं बन पाई, तो डॉ. आम्बेडकर के नेतृत्व में दबे-कुचले वर्गों, आगा खां (मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल), भारतीय ईसाइयों और एंग्लो-इंडियनों ने मिलकर माइनॉरिटीज पैक्ट पर हस्ताक्षर किए और ब्रिटिश सरकार से अपने-अपने समुदायों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचक मंडल की संयुक्त मांग की।

यद्यपि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन किसी सर्वसम्मत नतीजे पर पहुंचे बिना समाप्त हो गया, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम सामने आए। गोलमेज सम्मेलनों के तर्कों के आधार पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने डिप्रेस्ड क्लासेस को 20 वर्षों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल और दोहरे वोट का अधिकार प्रदान किया। कम्युनल अवार्ड के विरोध में गांधीजी यरवदा जेल में आमरण अनशन पर बैठ गए। अंतत: समाज की एकता की रक्षा और गांधीजी के प्राण बचाने के लिए डॉ. आम्बेडकर ने समझौता किया। इसके तहत पृथक निर्वाचक मंडल को त्यागकर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली स्वीकार की गई, लेकिन आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गई।

गोलमेज सम्मेलनों में डॉ. आम्बेडकर की भागीदारी ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक कि देश के करोड़ों शोषितों को सामाजिक और राजनीतिक समानता नहीं मिल जाती। यही वैचारिक और संवैधानिक मंथन आगे चलकर 1950 में स्वतंत्र भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों, अस्पृश्यता उन्मूलन (अनुच्छेद 17) और आरक्षण के प्रावधानों की मजबूत नींव बना।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05