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डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने 9 मई 1916 को कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) में मानव विज्ञान के एक सेमिनार में अपना प्रसिद्ध शोध पत्र ‘कास्ट्स इन इंडिया: देयर मैकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट’ (भारत में जातियाँ: उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास) प्रस्तुत किया था। एक भाषण नहीं, बल्कि जाति व्यवस्था का पहला वैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय विश्लेषण था। बाबासाहेब ने अपने भाषण की शुरूआत तत्कालीन विद्वानों (जैसे रिस्ले, नेसफील्ड और केतकर) द्वारा दी गई जाति की परिभाषाओं की समीक्षा से की। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि, जाति कोई अलग इकाई नहीं है, बल्कि यह ...संवेष्टित वर्ग... है। भारत में मूल रूप से वर्ग थे, लेकिन जब एक वर्ग ने अपने आप को पूरी तरह बंद कर लिया और बाहरी संपर्क (विवाह और खान-पान) खत्म कर दिया, तो वह ...जाति... बन गया। डॉ. अम्बेडकर ने तर्क दिया कि जाति व्यवस्था को जीवित रखने वाला एकमात्र तंत्र ...अंतर्विवाह... (अपनी ही जाति में विवाह) है। हिंदू समाज में ...सजातीय विवाह... यानी अपने गोत्र से बाहर शादी करने का नियम पहले से था। जाति बनाने के लिए इस नियम के ऊपर ...अंतर्विवाह... को थोपा गया। यानी, अपने गोत्र से बाहर लेकिन अपनी ही ...जाति... के भीतर शादी करना अनिवार्य कर दिया गया। जाति के घेरे को बंद रखने के लिए समूह के भीतर स्त्री और पुरुष की संख्या का बराबर होना जरूरी था। यदि किसी पुरुष की पत्नी मर जाए या स्त्री का पति, तो वे ...अधिशेष... हो जाते थे। यदि वे जाति से बाहर शादी करते, तो जाति का घेरा टूट जाता। इसे रोकने के लिए समाज ने तीन कुप्रथाएं विकसित कीं:
सती प्रथा: विधवा स्त्री को पति के साथ जला देना ताकि वह ...अधिशेष... न रहे।
अनिवार्य वैधव्य: यदि जलाया न जा सके, तो उसे आजीवन विधवा बनाकर कुरूप कर देना ताकि वह पुनर्विवाह न कर सके।
बाल विवाह: ...अधिशेष पुरुष... (विधुर) के लिए छोटी बच्ची से शादी का नियम बनाना ताकि वह जाति से बाहर न जाए।
डॉ. अम्बेडकर ने ...प्रजाति सिद्धांत... को खारिज किया। उन्होंने कहा कि भारतीय लोग रक्त और प्रजाति के रूप में मिश्रित हैं। जाति की उत्पत्ति का कारण ...ब्राह्मणों... का स्वयं को एक बंद घेरे में सुरक्षित कर लेना था। उन्होंने तर्क दिया कि ब्राह्मणों ने सबसे पहले खुद को ...बंद... किया और अंतर्विवाह अपनाकर ...जाति... बने। चूंकि उस समय ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था, इसलिए अन्य गैर-ब्राह्मण वर्गों ने उनका ...अनुकरण... करना शुरू कर दिया। यह अनुकरण धीरे-धीरे पूरे समाज में फैल गया, जिससे हजारों जातियाँ बन गईं।
बाबासाहेब ने स्पष्ट किया कि कोई भी नया वर्ग जो जाति बनना चाहता था, वह अपनी सदस्यता बंद कर देता था। इस प्रक्रिया में जो लोग बाहर रह गए, वे नई जाति बन गए। उन्होंने इसे एक ...मैकेनिकल... प्रक्रिया बताया जहाँ हर समूह ने अपने दरवाजे बंद करना अपनी शान समझा।
अपने भाषण के अंत में उन्होंने कुछ क्रांतिकारी बातें कहीं:
जाति कोई दैवीय रचना नहीं है: यह मनुष्यों द्वारा बनाया गया एक सामाजिक ढांचा है।
महिलाओं का दमन: जाति व्यवस्था पूरी तरह से महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके शरीर पर नियंत्रण (विवाह के माध्यम से) पर आधारित है।
अखंडता में बाधा: जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट दिया है, जिससे एक राष्ट्र के रूप में एकता संभव नहीं हो पाती।
यह भाषण इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि इसमें पहली बार किसी ने धर्मग्रंथों की दुहाई देने के बजाय ...तर्क और समाजशास्त्र... के आधार पर जाति की धज्जियाँ उड़ाई थीं। उन्होंन अंत में कहा कि मैं यही कहूँगा कि जाति व्यवस्था कोई दैवीय या प्राकृतिक रचना नहीं है। यह एक कृत्रिम सामाजिक व्यवस्था है जिसे ...नकल... और ...सामाजिक दबाव... के माध्यम से जीवित रखा गया है। जब तक अंतर्विवाह की यह प्रथा जीवित है, जाति का यह संजाल भारतीय समाज को खंडित करता रहेगा।





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