




2026-10-17 15:44:48
भारतीय समाज का इतिहास बुनियादी तौर पर सामाजिक न्याय और वर्चस्ववादी व्यवस्थाओं के बीच निरंतर चले संघर्ष का इतिहास रहा है। राष्ट्रपिता जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार ई.वी. रामासामी, छत्रपति शाहू जी महाराज और बोधिसत्व डॉ. बी.आर. आंबेडकर जैसे महान समाज सुधारकों ने जिस वैचारिक आंदोलन की नींव रखी, उसका मुख्य उद्देश्य केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि उस सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्था का पूर्ण उन्मूलन था जिसे ब्राह्मणवाद कहा जाता है। डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में चेताया था कि ब्राह्मणवाद किसी व्यक्ति विशेष या जाति विशेष का नाम नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को नकारने वाली एक मानसिकता, एक वैचारिक ढांचा और जीवन दृष्टि है। आज इक्कीसवीं सदी में, संख्याबल में लगभग पचासी प्रतिशत होने के बावजूद, बहुजन समाज (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग) उसी व्यवस्था का सबसे बड़ा पोषक और संवाहक बनता दिखाई दे रहा है जिसका वह ऐतिहासिक रूप से शिकार रहा है। धार्मिक पाखंडों में अंधाधुंध भागीदारी, सांस्कृतिक अनुकरण, आंतरिक जातिगत विभाजन, राजनीतिक अवसरवादिता और आर्थिक निर्भरता के कारण बहुजन समाज अनजाने में और कभी-कभी सचेत रूप से भी ब्राह्मणवादी ढांचे की नींव को मजबूत कर रहा है। ब्राह्मणवाद की वैचारिक दृढ़ता का सबसे बड़ा आधार यह रहा है कि उसने शोषित वर्गों के मन में यह विश्वास पैदा कर दिया कि उनकी मुक्ति शोषक वर्ग की संस्कृति को अपनाने में ही है।
संस्कृतीकरण की त्रासदी: प्रख्यात समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास ने भारतीय समाज में संस्कृतीकरण की प्रक्रिया को रेखांकित किया था। इसके तहत सामाजिक पदानुक्रम में निचली मानी जाने वाली जातियां प्रतिष्ठा पाने के लिए उच्च जातियों के कर्मकांडों, भोजन संबंधी आदतों, पोशाक और धार्मिक रीति-रिवाजों का अंधानुकरण करने लगती हैं। आज बहुजन समाज का एक बड़ा हिस्सा यह भूल चुका है कि इन कर्मकांडों की नींव ही उनके दोयम दर्जे पर टिकी है। प्रतिष्ठा पाने की होड़ में बहुजन समाज उन्हीं धार्मिक संस्कारों (जैसे सत्यनारायण कथा, महंगे मृत्युभोज, गृह-प्रवेश के वैदिक अनुष्ठान और जन्म-विवाह के पाखंडपूर्ण संस्कार) को अपनाने लगा है, जिनका विरोध कभी फुले और पेरियार ने किया था। यह अनुकरण ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता को ही समाज में वैधता प्रदान करता है, क्योंकि जब शोषित स्वयं शोषक के मानकों को आदर्श मान लेता है, तो व्यवस्था को किसी अतिरिक्त बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं रह जाती।
सांस्कृतिक आधिपत्य: इतालवी विचारक एंटोनियो ग्राम्शी ने सांस्कृतिक आधिपत्य की अवधारणा दी थी, जिसके अनुसार शासक वर्ग अपने विचारों और मूल्यों को इस तरह स्थापित करता है कि पीड़ित वर्ग उन्हें ही स्वाभाविक और सार्वभौमिक सत्य मान बैठता है। बहुजन समाज आज व्यापक रूप से इस आधिपत्य का शिकार है। अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों—जो समतावादी, श्रम-आधारित और प्रकृति-सम्मत थीं—को छोड़कर, बहुजन समाज उन मिथकों, अवतारवाद और कथाओं का झंडाबरदार बन गया है, जो ऐतिहासिक रूप से उनके अपने ही पूर्वजों के दमन की पृष्ठभूमि पर गढ़े गए थे।
धार्मिक पाखंड: धार्मिक पाखंड केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक और आर्थिक औजार है जिसका उपयोग जनमानस की सोचने-समझने की शक्ति को कुंद करने के लिए किया जाता है। बहुजन समाज अपनी सीमित कमाई का एक बड़ा हिस्सा आज उन धार्मिक अनुष्ठानों, तीर्थयात्राओं, तांत्रिकों, बाबाओं और मजार-मंदिरों के चक्करों में बर्बाद कर रहा है, जिनका कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार नहीं है। जो संसाधन बच्चों की उच्च शिक्षा, तकनीकी कौशल, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और व्यापार शुरू करने में लगने चाहिए थे, वे पंडालों, शोभायात्राओं, जागरणों और कांवड़ यात्राओं में खर्च हो रहे हैं। इन आयोजनों के अग्रिम मोर्चे पर, भारी श्रम और लाठी-गोली खाने के लिए बहुजन युवा सबसे आगे रहते हैं, जबकि इन व्यवस्थाओं से सामाजिक और आर्थिक लाभ उठाने वाला वर्ग सुरक्षित दूरी बनाए रखता है। ब्राह्मणवादी दर्शन का केंद्रीय आधार कर्म का सिद्धांत रहा है—अर्थात, आप जिस वर्ण या जाति में पैदा हुए हैं, वह आपके पिछले जन्मों के कर्मों का फल है। इस विचार को स्वीकार करने का सीधा अर्थ है कि वर्तमान जीवन में हो रहे अन्याय, गरीबी और अपमान के खिलाफ विद्रोह करने के बजाय उसे अपनी नियति मान लेना। जब एक बहुजन नागरिक यह मान लेता है कि उसकी विपन्नता का कारण सामाजिक-आर्थिक ढांचा नहीं बल्कि उसका भाग्य या पूर्वजन्म है, तो व्यवस्था से सवाल पूछने की उसकी क्षमता समाप्त हो जाती है। यह भाग्यवादिता ब्राह्मणवादी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन जाती है।
क्रमिक असमानता: बहुजन समाज की सबसे बड़ी आंतरिक विफलता उसका अखंड और एकजुट न हो पाना है। डॉ. आंबेडकर ने अपनी ऐतिहासिक कृति एनिहिलेशन आॅफ कास्ट में स्पष्ट किया था कि हिंदू जाति व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन नहीं है, बल्कि यह श्रमिकों का विभाजन है, जो क्रमिक असमानता पर आधारित है। इस व्यवस्था में कोई भी जाति केवल शोषित नहीं है; हर जाति के नीचे कोई न कोई और जाति मौजूद है जिसे वह अपने से हीन समझ सकती है, और वह अपने आपको इसी में संतुष्ट मानकर खुश हो जाते है। ओबीसी जातियां दलितों पर अपना सामाजिक प्रभुत्व जमाने की कोशिश करती हैं। दलित जातियों के भीतर भी उप-जातियों का एक कठोर पदानुक्रम बना हुआ है, जहाँ एक उप-जाति दूसरी उप-जाति को अछूत मानती है या वैवाहिक संबंधों से परहेज करती है। अनुसूचित जनजातियों को अक्सर इस पूरे विमर्श में किनारे कर दिया जाता है। इस क्रमिक व्यवस्था का मनोवैज्ञानिक परिणाम यह हुआ कि प्रत्येक जाति अपनी वास्तविक मुक्ति (पूरी सीढ़ी को तोड़ने) के बजाय केवल अपने से नीचे वाली जाति पर प्रभुत्व जमाने में संतुष्ट हो जाती है। शोषितों के इस आपसी टकराव और अविश्वास का सीधा फायदा ब्राह्मणवादी व्यवस्था को मिलता है, जिसे फूट डालो और राज करो के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता। बुनियादी तौर पर समाज में फूट डालो और राज करो, यही ब्राह्मणवाद की प्रमुख रणनीति रही है।
राजनीतिक अवसरवादिता: कांशीराम जी ने भारतीय राजनीति में बहुजन समाज को एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करने का ऐतिहासिक कार्य किया था। उन्होंने नारा दिया था—वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा। किंतु पिछले कुछ दशकों में बहुजन राजनीति अपने मूल वैचारिक मार्ग से भटककर सत्ता के संकीर्ण गणित में उलझ गई है। चुनावी लाभ और सत्ता तक पहुँचने के लिए बहुजन दलों ने उन दक्षिणपंथी और पारंपरिक शक्तियों के साथ बार-बार अवसरवादी गठबंधन किए, जिनका वैचारिक विरोध करना उनका प्राथमिक उद्देश्य था। बहुजन (85%) की अवधारणा को कमजोर करके सर्वजन की राजनीति शुरू की गई, जिसने बहुजन आंदोलन की धार को कुंद कर दिया। चुनावी जीत के लिए ब्राह्मणवादी प्रतीकों, सम्मेलनों और जातियों को तुष्ट करने की नीति अपनाई गई, जिससे आम कार्यकर्ता के भीतर वैचारिक स्पष्टता धुंधली हो गई।
प्रतीकात्मक राजनीति: बहुजन राजनीति का एक बड़ा हिस्सा केवल मूर्तियों, स्मारकों, नामों के बदलने और प्रतीकों की पूजा तक सिमट कर रह गया।
निश्चित रूप से महापुरुषों का सम्मान और दृश्यता आवश्यक थी, लेकिन इसे अंतिम साध्य बना दिया गया। यह अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए। शिक्षा के बजट, भूमि सुधारों, स्वास्थ्य ढांचे, निजी क्षेत्र में आरक्षण और आर्थिक नीतियों पर ठोस वैचारिक विकल्प प्रस्तुत करने के बजाय केवल पहचान की राजनीति की गई। जब व्यवस्था का वास्तविक आर्थिक और शैक्षणिक ढांचा जस का तस बना रहा, तो सत्ता परिवर्तन के बावजूद सामाजिक सत्ता ब्राह्मणवादी ताकतों के हाथ में ही केंद्रित रही। अधिकांश बहुजन राजनीतिक दल व्यक्ति-केंद्रित और परिवार-केंद्रित संरचनाओं में बदल गए। पार्टियों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र, कैडर निर्माण और बौद्धिक विमर्श के मंच समाप्त कर दिए गए। चाटुकारिता को बढ़ावा मिला और जमीनी वैचारिक कार्यकतार्ओं को दरकिनार कर दिया गया, जिससे दूसरी पंक्ति का ऐसा कोई मजबूत नेतृत्व तैयार नहीं हो सका जो ब्राह्मणवादी नैरेटिव का मुकाबला कर सके।
संस्थागत शून्यता: सामाजिक और सांस्कृतिक वर्चस्व हवा में नहीं टिकता; उसकी नींव आर्थिक संसाधनों के नियंत्रण पर टिकी होती है। बहुजन समाज की विफलता यह भी रही कि उसने सत्ता और अधिकारों की बात तो की, लेकिन आर्थिक स्वावलंबन के संस्थागत ढांचों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। आज भी देश के अधिकांश बहुजन असंगठित क्षेत्र के मजदूर, छोटे किसान या तृतीय-चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं। देश की कुल भूमि, खनिज संपदा, बड़े उद्योग, व्यापारिक नेटवर्क और वित्तीय संस्थानों पर बहुजनों का प्रतिनिधित्व नगण्य है। आर्थिक रूप से निर्भर व्यक्ति कभी भी स्वतंत्र सामाजिक या धार्मिक विद्रोह नहीं कर सकता। गांव का भूमिहीन मजदूर आज भी सवर्ण जमींदार पर निर्भर है, इसलिए वह उन रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्थाओं का विरोध करने की स्थिति में नहीं होता जो उस पर थोपी जाती हैं।
न्यायपालिका में अनुपस्थिति: लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभों—न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया—में से मीडिया और न्यायपालिका में बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व बेहद कम है। देश का मुख्यधारा का मीडिया, जो जनता की राय और विमर्श तय करता है, पूरी तरह से कॉपोर्रेट और उच्च वर्गीय हितों से संचालित है। बहुजन समाज अपना कोई मजबूत, स्वतंत्र और स्थायी राष्ट्रीय मीडिया संस्थान खड़ा नहीं कर सका। परिणामस्वरूप, जो विमर्श समाज में परोसा जाता है, वह वही होता है जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था को अनुकूल लगे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परित्याग: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51अ(एच) में स्पष्ट लिखा है कि प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा ज्ञानार्जन एवं सुधार की भावना का विकास करे। डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध के दर्शन को इसीलिए चुना था क्योंकि वह अंधविश्वास, चमत्कार और ईश्वरवाद के बजाय प्रज्ञा (बुद्धि), शील (सदाचार) और करुणा पर आधारित था।
तार्किकता से पलायन: आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बहुजन समाज का एक बड़ा वर्ग—जिसमें सरकारी अधिकारी, शिक्षक, प्रोफेसर और राजनेता शामिल हैं—अपने घरों में घोर अंधविश्वासों और अवैज्ञानिक पाखंडों का पालन करता है। तथाकथित पढ़े-लिखे बहुजन वर्ग ने आरक्षण के जरिए आर्थिक सुरक्षा तो हासिल कर ली, लेकिन मानसिक रूप से वह उसी व्यवस्था का दास बना रहा। डॉ. आंबेडकर ने जिस शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो का नारा दिया था, उसमें शिक्षित बनो का अर्थ केवल डिग्री लेना या नौकरी पाना नहीं था, बल्कि विवेकशील और तार्किक बनना था। आज बहुजन समाज का शिक्षित मध्यवर्ग समाज को वापस लौटाने के बजाय खुद को संकीर्ण धार्मिक उत्सवों और अपनी निजी जातिगत पहचान में समेट चुका है।
आगे का रास्ता: यदि बहुजन समाज को वास्तव में ब्राह्मणवादी व्यवस्था की जकड़न से मुक्त होना है और एक समतामूलक, मानवीय समाज का निर्माण करना है, तो उसे अपनी नीतियों और रणनीतियों में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा: बहुजन समाज को उधार ली गई सांस्कृतिक पहचान और पाखंडों को त्यागकर अपनी श्रमण, बौद्ध और समतावादी परंपराओं को अपनाना होगा। ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज और पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है, जहाँ विवाह और सामाजिक संस्कार बिना किसी मध्यस्थ पुरोहित और बिना पाखंड के संपन्न हों।
जाति-विरोधी साझा मंच का निर्माण: दलित, पिछड़े और आदिवासियों को अपने आंतरिक संकीर्ण जातिगत दायरों से बाहर निकलना होगा। जब तक उप-जातियों का अहंकार और आपसी भेदभाव समाप्त नहीं होगा, तब तक बहुजन की संकल्पना केवल एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगी, सामाजिक क्रांति नहीं बन सकेगी। शिक्षा को केवल आजीविका का साधन न मानकर विवेक का हथियार बनाना होगा। घरों और सार्वजनिक जीवन से अंधविश्वास, फलित ज्योतिष, झाड़-फूंक और अवैज्ञानिक रिवाजों का बहिष्कार करना होगा।
संस्थागत और आर्थिक सशक्तिकरण: केवल सरकारी नौकरियों के भरोसे रहने के बजाय व्यापार, तकनीक, उच्च शोध और स्वतंत्र मीडिया संस्थानों की स्थापना में निवेश करना होगा। आर्थिक आत्मनिर्भरता ही सामाजिक प्रतिरोध को टिकाऊ बना सकती है।
वैचारिक राजनीति की पुनर्स्थापना: बहुजन राजनीति को अवसरवादी गठबंधनों और केवल सत्ता-लोलुपता से बाहर निकलकर भूमि सुधार, समान शिक्षा प्रणाली, सार्वजनिक स्वास्थ्य और निजी क्षेत्र में सामाजिक न्याय जैसे बुनियादी संरचनात्मक मुद्दों पर केंद्रित होना होगा। ब्राह्मणवाद की वास्तविक शक्ति उसकी अपनी संख्या या श्रेष्ठता में नहीं है; उसकी असली शक्ति बहुजन समाज की अज्ञानता, उसके आंतरिक बिखराव और उसकी मानसिक गुलामी में निहित है। जिस दिन बहुजन समाज उन धार्मिक पाखंडों और सांस्कृतिक जंजीरों को उतार फेंकेगा जिन्हें उसने आभूषण समझकर पहन रखा है, उसी दिन इस देश में उस वास्तविक सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना होगी जिसका सपना जोतीराव फुले और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने देखा था। जब तक शोषित स्वयं शोषक की भाषा बोलेगा और उसकी संस्कृति की जय-जयकार करेगा, तब तक व्यवस्था का अंत असंभव है। मुक्ति का मार्ग बाहर नहीं, बल्कि बहुजन समाज के अपने भीतर चल रहे आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार से होकर गुजरता है।





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