




2025-12-20 14:21:12
महाराष्ट्र के नासिक जिले में महाड़ में चावदार तालाब है। ब्राह्मणी सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत इस तालाब से सवर्ण जाति के हिन्दुओं, मुसलमानों, पशुओं तथा पक्षियों को पानी पीने का अधिकार था किन्तु अछूत जातियों के लोगों को इस तालाब से पानी पीने का अधिकार नहीं था। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर लंदन में अपनी पढ़ाई पूरी करके सन् 1923 में भारत लौटने के बाद महाराजा बड़ौदा के यहां नौकरी करने के लिए बड़ौदा चले गये थे। लेकिन अछूत होने के कारण उच्च शिक्षित डॉ. अम्बेडकर एम.ए, एम.एस-सी, पी.एच-डी, डी.एस-सी, बार एट-ला को कार्यालय में दुर्व्यवहार तथा बड़ौदा में निवास के लिये कोई मकान न मिलने के कारण महाराजा की नौकरी से त्याग पत्र देने के लिये मजबूर होना पड़ा। इस दुर्घटना से डॉ. अम्बेडकर बहुत दुखी हुये बहुत रोये। उन्होंने बड़ौदा में ही एक पार्क में बैठे हुए यह संकल्प लिया,‘‘ मैं जब तक अपने अछूत भाइयों की गुलामी की बेड़ियां नहीं काट दूंगा तब तक चैन से नहीं बैठूंगा’’। अपनी मुहिम के लिये बाबासाहेब ने 24 जुलाई 1924 को ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ और मार्च 1927 में ‘आॅल इंडिया समता सैनिक दल’ जैसी संस्थाओं की स्थापना कर दी। वे अब बम्बई विधान परिषद के मनोनीत सदस्य भी बन गये थे। उन्होंने अपने ऐतिहासिक तथा सबसे बड़े राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत महाड़ से ही की। बहिष्कृत हितकारिणी सभा के अंतर्गत डॉ. अम्बेडकर ने महाड़ में एक विशाल सभा का आयोजन किया 20 मार्च 1927 को जिसमें चावदार तालाब से पानी लेने का सत्याग्रह किया। वे एक विशाल समूह के साथ तालाब पर गये और तालाब से पानी पीकर अछूतों पर सदियों से पानी पीने के लिये लगी पाबंदी को समाप्त करने का संकेत दिया। इस सत्याग्रह से सवर्ण जाति के लोगों में बहुत रोष व्याप्त हुआ और वे आग बबूला हो उठे। इनके अनेक लोग पंडाल में घुस गये। भोजन कर रहे अछूतों पर हमला कर दिया, सारा भोजन खराब कर दिया तथा उसे बर्तनों सहित बाहर फेंक दिया। गलियों में जा रहे लोगों को मारा पीटा। अपने गाँवों को लौट रहे अछूत लोगों के ऊपर भी हमला किया गया। पिटते हुये अछूत भी उत्तेजित हो उठे और सवर्णों से भिड़ने के लिय तत्पर हो गये। डॉ. अम्बेडकर ने समय की नाजुकता को समझा। अम्बेडकर व उनके साथियों ने इन उत्तेजित अछूतों को समझाया तथा उनके क्रोध को शांत किया। इस प्रकार डॉ. अम्बेडकर ने लोगों के खून खराबे को टाल दिया अन्यथा दोनों ओर से न जाने कितने लागों की जान चली जाती और कितने ही घायल हो जाते।
डॉ. अम्बेडकर सहित अछूतों द्वारा चावदार तालाब से पानी पीने की घटना का सवर्ण जाति के लोगों ने पूरे क्षेत्र में दुष्प्रचार किया। यह प्रचारित कर दिया कि तालाब का पानी अछूतों ने अशुद्ध कर दिया है। मनुवादियों ने तालाब के पानी को शुद्ध करने की ठानी। पानी को शुद्ध करने के लिये ब्राह्मणों को बुलाया गया। ब्राह्मणों ने पानी में गाय का गोबर डाला, सैंकड़ो घडेÞ दूध डाला तथा मन्त्रोचारण किया। इस प्रकार हास्यास्पद तरीके से पानी को शुद्ध करने के नाम पर गोबर व दूध डालकर उसे गंदा ही कर दिया। पानी के इस प्रकार शुद्धिकरण की खबर जब डॉ. अम्बेडकर के पास पहुंची तो वे बहुत दुखी हुये तथा क्रोधित हुये। सवर्ण हिन्दू, मुसलमान, हिन्दूओं से बने मुसलमान तथा पशु जब तालाब से पानी पीते हैं तब पानी अशुद्ध नहीं होता, लेकिन जब महार-चमार पानी पी लेते हैं तो पानी अशुद्ध हो जाता है। हिन्दू धर्म डूब जाता है। पानी का ऐसा शुद्धिकरण धर्म रक्षण नहीं बल्कि धर्म द्रोह है। यह जातिगत भेदभाव है। डॉ. अम्बेडकर ने कहा,‘‘ छुआछात का यह कलंक हिन्दू धर्म पर है, यह कह कर यह काम उन पर छोड़ दिया जाता है। लेकिन यह कलंक हम पर भी है इसलिये इसे धोने का पवित्र कार्य हम स्वीकारते हैं’’। इस पर बाबासाहेब ने तालाब के पानी पर अस्पृश्यों का अधिकार प्राप्त करने की ठानी तथा महाड में सत्याग्रह करने का निर्णय जाहिर कर दिया। इस निर्णय की गूंज सारे महाराष्ट्र में फैल गई।
डॉ. अम्बेडकर के इस निर्णय की कई सवर्ण लोग आलोचना कर रहे थे। वे कह रहे थे कि यह बहुत ही उतावला तथा लम्बी छलांग लगाने वाला कदम है। इसके भयानक परिणाम हो सकते हैं। डॉ. अम्बेडकर ने कहा,‘‘हम सवर्णों के रहमों करम पर नहीं बैठे रहेंगे, हम आपकी किसी बात का विश्वास नहीं करते। शस्त्र प्रयोग के बिना युक्तिवाद या ज्ञान की मरहम पट्टियों से यह रोग दूर नहीं हो सकता। अनुभव से यह बात सिद्ध हुई है कि शस्त्र प्रयोग करने में मन की निष्ठुरता न दिखाना सच्ची कार्यक्षमता नहीं बल्कि दुर्बलता ही है। रोग प्राणघाती है, तो इस पर जालिम औषधि उपचार की ही जरूरत होती है’’। सत्याग्रह के लिये लोगों से अनुरोध किया गया कि स्वाभिमानी लोग स्वयं मन से सत्याग्रह में भाग लेने के लिये ‘बहिष्कृ त हितकारिणी सभा’ के कार्यालय में अपना नाम रजिस्टर्ड कराये। यह झगड़ा तत्व के लिये है, किसी एक व्यक्ति या जाति के साथ नहीं। हम उनके आभारी रहेंगे जो हमारे पवित्र कार्य में सहायता करने के लिए आगे बढ़ेगे। वे चाहे किसी भी जाति या धर्म से हो। आगे अछूत समाज के सत्याग्रह के औचित्य के बारे में डॉ. अम्बेडकर ने कहा,‘‘ हमारे सामने मुद्दा यह है कि धर्म मनुष्य के लिये है न कि मनुष्य धर्म के लिये। जो धर्म हमें मान-सम्मान देगा, हमारा चिंतन करेगा, उस पर हम अपने प्राण न्यौछावर करेंगे। जो धर्म हमारे भले की परवाह नहीं करता हम भी उसकी परवाह क्यों करें? हमें धर्म के प्रश्न पर एक बार फैसला करना है कि हिन्दू धर्म हमारा है या नहीं’’।
अगस्त 1927 में महाड़ नगरपालिका ने एक प्रस्ताव के द्वारा चावदार तालाब से अछूतों द्वारा पानी लेने का अपना पूर्व का प्रस्ताव वापिस ले लिया। इस पर डॉ. अम्बेडकर ने स्पर्ष्य हिन्दुओं का यह आवाहन खुलकर स्वीकार किया तथा सत्याग्रह के फैसले को आगे बढाने के लिये अछूतों का आवाहन किया। तुरन्त ही बाबासाहेब ने एक सभा बुलाई। सभा ने महाड़ में 25 व 26 दिसंबर 1927 दो दिन के सत्याग्रह का निर्णय लिया। सत्याग्रह का सैद्धान्तिक पक्ष अपने अनुयायियों को मालूम हो और सत्याग्रह की सफलता या विफलता के बारे में भी अनुयायियों को पूरी जानकारी हो, इसलिये अम्बेडकर ने अपना मत अनुयायियों के सामने रखा। डॉ. अम्बेडकर ने कहा,‘‘ किसी भी कार्य की सफलता या विफलता उस कार्य की साधन सामग्री पर निर्भर करती है। अगर कार्य के मूल में सत्यहीत होगा तो उसमें सफलता मिलने के लिये चिंता करने की विशेष जरूरत नहीं होती क्योंकि सत्याग्रहियों में आत्म बल की आवश्यकता होती है।’’
महाड़ सत्याग्रह के बारे में अम्बेडकर ने कहा,‘‘ यदि इस सत्याग्रह में शांति भंग की संभावना होगी तो सरकार इसमें दखल देगी क्योकि शांति स्थापित करना सरकार का दायित्व है। सरकार यदि न्यायपूर्ण आचरण करती है तो यह समस्या आसानी से हल हो जायेगी। यदि सरकार पलटी खायेगी और निरोधादेश जारी करेगी तो देखने में यह सत्याग्रह स्पृष्यों के विरूद्ध होकर भी अतत: सरकार के विरूद्ध होगा। अपना आग्रह पूरा करने के लिये बहिष्कृत लोगों के पास सरकारी आदेश तोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं। फिर सरकार उन्हें कारागार में डाले बिना नहीं रहेगी। यह बात ध्यान में रखकर ही बहिष्कृत सत्याग्रह के लिये कमर कसे। सच कहा जाये तो अस्पृष्यता इतनी बड़ी भयंकर बात है कि इसके निवारण के लिये कुछ लोगों के प्राण न्यौछावर हो जाये तो भी कोई हर्ज नही है। जीना ही विश्व में कोई पुरूषार्थ नहीं। जीने के लिये तो कौआ भी बहुत वर्ष जीता है लेकिन उनके जीवन में कोई पुरूषार्थ नहीं होता। मनुष्य को जीना है तो मान सम्मान से जीना ही पुरूषार्थ है। इस तरह का उपदेश हर एक अस्पृष्य माता अपने बेटे को दे। इस तरह का समय नजदीक आ गया है। तलवार की जरूरत नहीं केवल जेल में जाने की तैयारी रखो।’’
आखिर डॉ. अम्बेडकर ने इस सत्याग्रह के बारे में सरकार के सामने अपना पक्ष रखा। सरकार कितने लोगों को जेल में डालेगी? कितने दिन जेल में रखेगी? सरकार को जनलज्जा तो है ही। शांति भंग होती है इसलिये सरकार हमारे न्याय अधिकार कार्यान्वित करने के रास्ते में रूकावट डालेगी तो हमें लीग आॅफ नेशन्स के न्यायालय राष्ट्रसंघ के पास अपनी फरियाद लगाकर सरकार की अन्यायपूर्ण वृत्ति का पर्दाफाश करना होगा। यदि स्पृष्यों ने हमारा सत्याग्रह विफल किया तो उनकी ही हानि होगी। अस्पृष्यों का विश्वास पक्का हो जायेगा कि हिन्दू धर्म पत्थरों का धर्म है, उसके सामने माथा फोड़ने से कोई उपयोग नही होगा। ‘स्पृष्यों यह लो तुम्हारा धर्म’ कहकर अस्पृष्य अपने आप परधर्म में जाने के लिये तैयार हो जायेंगे। इस नियोजित सत्याग्रह के निर्णय पर स्पृष्य हिन्दुओं की संस्थाओं और कार्यकर्ताओं ने अम्बेडकर पर आलोचना की झड़ी लगा दी। उन पर स्वार्थ लोलुपता के आरोप लगाये।
अम्बेडकर ने इन आलोचनाओं के उत्तर में कहा,‘‘ अस्पृष्यता का निवारण यथाशीघ्र नहीं होगा तो धर्मान्तरण करना उचित होगा। अस्पृष्यता को सहन करने की कोई सीमा तो होगी, वह समाप्त हो गई है। हम तुम्हारे लतखोर बने रहें लेकिन तुम्हारे ही धर्म में बने रहे क्यों? यदि हमारा तुम्हारा धर्म एक है तो अधिकार भी समान होने चाहिये। जो धर्म मानव -मानव में भेदभाव करता है, उनका कुछ भी अपराध न होते हुऐ भी उन करोड़ो लोगों के साथ गुनहगारों से भी बदत्तर बर्ताव करता है। खास वर्ग के लोगों को इस दुनिया में नर्क यातनायें भोगने के लिये विवश करता है, मनुष्य होकर भी उन्हें जानवरों जैसी सुविधाएें न मिलने दे, ऐसा धर्म किस काम का। ऐसे धर्म को धर्म कैसे कह सकते हैं? इस अस्पृष्यता के कारण इनके उन्नति के सारे रास्ते अवरूद्ध हैं। ये स्वच्छन्द जीवन यापन नहीं कर सकते, गंदी बस्ती में रहना पड़ता है। ये शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते , प्रतिष्ठित धंधे नहीं कर सकते। धूर्त शास्त्रकारों ने अपने शास्त्रों में लिखा हैं कि तीन वर्गों की सेवा करने से ही शूद्रों और अतिशूद्रों को सदगति मिलेगी। अस्पृष्यता एक तरह से स्थायी गुलामी है, गुलामी और धर्म एक साथ रह ही नहीं सकते। अस्पृष्यता से केवल अस्पृष्यों की ही हानि नहीं हुई बल्कि उनके साथ ही स्पृष्यों तथा देश की भी हानि हुई है। हमने जो आंदोलन शुरु किया है वह स्वयं के उद्वार तक ही सीमित न होकर हिन्दू धर्म के उद्वार के लिये है, यह राष्ट्रकार्य है।
इसी समय 14 दिसंबर 1927 को चावदार तालाब से पानी लेने संबंधित दायर मुकदमे में न्यायाधीश ने आदेश जारी किया कि न्यायालय का दूसरा आदेश आने तक सभी अस्पृष्य लोग चावदार तालाब पर न जाओ और उसका पानी न भरो। अम्बेडकर को दो मोर्चों पर लड़ने के लिय विवश होना पडा, एक तरफ सरकार से लगाई बंदी-आज्ञा तथा दूसरी तरफ सनातनी ब्राह्मणों से। परिषद के मंडप के लिए कोई स्पृष्य जगह देने को तैयार नही हुआ इसलिये फन्नेखान मुसलमान ने अपनी जगह दी। स्थानीय व्यापारियों ने परिषद के कार्यकर्ताओं को कोई सामान देने से मना कर दिया। प्रतिनिधियों के लिये अनाज, भोजन, पानी तथा अन्य सुविधा और अनुशासन की जिम्मेदारी अनंतराव चित्रे तथा सूबेदार घाटगे ने संभाली। 19 दिसंबर को सरकारी अधिकारी और सनातनियों ने महाड़ में डेरा डाल दिया। परिषद के सैंकड़ों प्रतिनिधियों और उनके उस समर प्रसंग को प्रत्यक्ष देखने के लिये सैंकड़ों प्रेक्षक महाड़ पहुंच गये, स्वयं जिलाधिकारी भी सत्याग्रह स्थल पर पहुंच गये। डॉ. अम्बेडकर अपने प्रमुख सहयोगियों बी.के. गायकवाड, पी.एन. राजभोज, सत्याग्रह समिति के कार्यवाहक शिवतारकर, सोशल सर्विस लीग के जी.एन. सहस्त्रबुद्धे आदि के साथ 24 दिसंबर 1927 को पदमावती जहाज से बम्बई से महाड़ के लिये निकले। परिषद के लिये निकलने से पहले अम्बेडकर ने यह अपील की, ‘सत्याग्रह में सम्मिलित होकर अपने ऊपर का अस्पृश्यता का कलंक धो डालिये। जिनसे जो संभव हो, वे धन और अनाज दान करें’।
अगले दिन 25 दिसंबर 1927 को यह सेना दोपहर 12:30 बजे जहाज से दासगाँव उतरी। वहां उपस्थित लगभग तीन हजार सत्याग्रहियों ने गगनभेदी गर्जनाओं से अपने नेताओं और सत्याग्रहियों का स्वागत किया। पुलिस दल के प्रमुख मि. फैरंट ने डॉ. अम्बेडकर को जिलाधिकारी मि. हूड साहब का पत्र दिया जिसमें कहा गया कि सत्याग्रही पांच-पांच की कतार में चले। अम्बेडकर पुलिस की जीप से चलकर जिलाधिकारी से मिले। जिलाधिकारी ने सौम्य शब्दों में बंदी आज्ञा न तोड़ने के लिये अम्बेडकर का मन बदलने का प्रयास किया। अम्बेडकर ने जिलाधिकारी से निवेदन किया ,‘‘सत्याग्रह जरूर करो, यह सलाह में एकत्रित लोगों को दूंगा। लेकिन उन पर अपने मन का दबाव नहीं डालूंगा। तथापि यदि बहुमत से सत्याग्रह करना तय होगा तो जिलाधिकारी को परिषद में बोलने का मौका देंगे’’। यहां से अम्बेडकर परिषद के मंडप की ओर गये। तालाब के परिसर में धारा 144 लागू कर दी गई थी।
सांय काल 4.30 बजे परिषद की कार्यवाही आरम्भ हुई। शुभ संदेश पढ़ा गया। बाद में तालियों की गड़गड़ाहट, घोषणाओं और जयघोष की गर्जनाओं के बीच डॉ. अम्बेडकर अपना अध्यक्षीय भाषण करने के लिये खड़े हुये। आठ-दस हजार श्रोताओं में बहुत लोगों की पीठ नंगी थी, उनकी दाड़ी बहुत बढ़ी हुई थी। गरीब लेकिन होशियार दिखाई देने वाली महिलाआें का समूह अपने नेता अम्बेडकर की ओर उत्सुकता से देख रहा था। डॉ. अम्बेडकर ने अपना गंभीर भाषण करते हुये कहा,‘‘ महाड़ का चावदार तालाब सार्वजनिक है। महाड़ के स्पृष्य इतने समझदार हैं कि वे मुसलमान और विधर्मी लोगों को इसका पानी लेने की इजाजत देते हैं। मानव योनि से भी निम्न माने जाने वाले पशु-पक्षी भी तालाब का पानी पीते हैं लेकिन अस्पृष्य वर्ग के लोगों को इसका पानी लेने की इजाजत नहीं है। इससे तालाब का पानी अशुद्ध हो जाता है। इस सबका कारण है उनके शास्त्र ने असमान जातियां निर्धारित की है और इसी आधार पर हमारे लोगों के साथ अस्पृष्यता का बर्ताव किया जाता है। हमें यह साबित करना है कि हम भी सभी लोगों के समान मनुष्य है, इसलिये हम तालाब पर अवश्य ही जायेंगे’’।
इस सभा में शिवतारकर, बी.के. गायकवाड़, एन.टी जाधव और गंगुबाई सावंत आदि ने जोशीले भाषण दिये। अस्पृष्य वर्ग के हित में सभा ने कई प्रस्ताव पास किये। एक प्रस्ताव यह भी पास हुआ ‘शूद्र जाति का अपमान करने वाली, उनकी प्रगति में बाधा डालने वाली, उनका आत्मबल नष्ट करने वाली, उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक गुलामी कायम रखने वाली मनुस्मृति का दहन करके विषमता, निर्दयता तथा अन्याय के प्रतिरोध का संकेत दिया जाये’। इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने वाले सहस्त्रबुद्धे और उसका समर्थन करने वाले राजभोज रहे, इस प्रकार यह प्रस्ताव पारित हुआ। इस प्रस्ताव के दौरान वक्ताआें ने मुहंतोड़ भाषण किये। 25 दिसंबर 1927 को रात नौ बजे परिषद के सामने एक गड्ढेÞ में अस्पृष्य बैरागी के हाथों मनुस्मृति को जला दिया गया।
इस प्रकार 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति दहन का दिवस डॉ. अम्बेडकर के आंदोलन तथा अछूतों की आजादी का ऐतिहासिक दिन बन गया।
सन 1927 के बाद मनुस्मृति का दहन कई बार हो चुका है। इस मानवीयता विरोधी ग्रन्थ की असलीयत सामने आ चुकी है। सन 1927 में तो केवल बाबा साहेब जैसे चन्द लोगों को ही मनुस्मृति का ज्ञान था लेकिन आज अनेकोंनेक लोग इसे पढ़ चुके हैं, ब्राह्मणवादी व्यवस्था की पोषक, बहुजन विरोधी नीतियों को जान व समझ चुके हैं। अनेक विद्वान समय-समय पर मनुस्मृति की तीव्र आलोचना करते हैं लेकिन ब्राह्मणवादियों के कान पर आज तक जूं नहीं रेंगी। वे आज आधुनिक वैज्ञानिक तथा ग्लोबल युग में भी मनुस्मृति को लागू करने पर तुले हुए हैं, इसके लिए पूरी शक्ति लगा रहे हैं, सरकार को भी इस दुष्ट कार्य में झोंक रहे हैं। बड़े शर्म की बात है कि बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, समता, स्वतंत्रता, बंधुता तथा सबको न्याय पर आधारित भारतीय संविधान को बदलने/विकृत करने की मुहिम ब्राह्मणवादी लोग बराबर चलाते आ रहे हैं लेकिन अमानवीय मनुस्मृति में कोई संशोधन नहीं करना चाहते। क्या यह देश और समाज हित में है?
(लेखक आकाशवाणी से सेवानिर्वत पूर्व अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)





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