




2026-04-11 16:13:25
माली भारत में पाई जाने वाली एक व्यवसायिक जाति है। यह पारंपरिक रूप से बागवानी, फूल उगाने तथा कृषि का कार्य करते हैं। माली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द माला से हुई है। फूल उगाने के अपने व्यवसाय के कारण इन्हें ‘फूलमाली’ भी कहा जाता है। माली लोग काश्तकारी यानी खेती करने में ज्यादा होशियार है क्योकिं वे हर तरह का अनाज, साग-सब्जी, फलफूल और पेड़ जो खेतों में उगाये जाते हैं, उनको लगाना और तैयार करने में दक्ष होते है। इसी सबब से इनका दूसरा नाम बागवान है। बागवानी का काम मालियों या मुसलमान बागवानों के सिवाय देश में और कोई नहीं जानता।
माली जाति भारतीय समाज की किस कैटेगरी में हैं?
देश के अधिकांश राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में माली जाति को पिछड़ा वर्ग के में वगीर्कृत किया गया है।
माली जाति कहां पायी जाती हैं?
माली मुख्य रूप से पूरे उत्तर भारत, पूर्वी भारत, महाराष्ट्र के साथ-साथ नेपाल के तराई क्षेत्र में पाए जाते हैं। राजस्थान में माली समाज की आबादी 10% है। फूल माली समाज सबसे ज्यादा क्रमश: राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं। महाराष्ट्र में माली मुख्य रूप से पश्चिमी महाराष्ट्र के 5 जिलों तथा विदर्भ क्षेत्र के 1 जिला में पाए जाते हैं। ये परंपरागत रूप से फल, फूल और सब्जियां उगा कर अपना जीवन यापन करते हैं। खेती के आधार पर इनकी अलग-अलग उपजातियां हैं। जैसे फूलों को उड़ाने वाले को ‘फूल माली’, जीरेकी खेती करने वाले को ‘जीरा माली’, तथा हल्दी की खेती करने वालों को ‘हल्दी माली’ कहा जाता है। महुर माली जोधपुर में बहुत ही कम गिनती के है। वे कभी किसी समय में पूरब की तरफ से आये थे। बाकी सब उन लोगों की औलाद है जो राजपूतों से माली बने बताये जाते हैं इनकी 12 जातियॉ है जिनके नाम कच्छवाहा, पड़ियार, सोलंकी, पंवार, गहलोत, सांखला, तंवर, चौहान, भाटी, राठौड़, देवडा़ और दहिया है।
माली समाज की उपजातियां
माली समाज में कुल 12 उपजातियां हैं-फूल माली, हल्दी माली, काछी माली, जीरे माली, मेवाड़ा माली, कजोरिया माली, वन माली, रामी माली, सैनी माली, ढीमर माली और भादरिया माली।
कहां किस नाम से जाना जाता है
महाराष्ट्र : माली, सैनी, गोला, पाटिल, फुले, क्षत्रिय माली, वनमाली। बिहार: माली, क्षत्रिय माली, सैनी, कुशवाला, मेहता, शक। मध्य प्रदेश: माली, क्षत्रिय माली, सैनी, सैनिक क्षत्रिय। मद्रास : रेड्डी, माली सैनी, सैनी क्षत्रिय। उड़ीसा: माली, क्षत्रिय माली, सैनी क्षत्रिय, उमराव, हल्दवा। यूपी: माली, गोले, पुष्पाध, ब्राह्मण, कम्बोज, बरोलिया, भगत, भंडारी, सैनी,सरायवाल गोत्र। आंध्र प्रदेश: माली, रेड्डी, क्षत्रिय माली, सैनिक क्षत्रिय, सैनी। कर्नाटक: मैसूर माली, रेड्डी, क्षत्रिय माली, सैनिक क्षत्रिय, सैनी। राजस्थान: माली, बागवान, फुले माली, भोई, पंजाब: सैनी, माली। हरियाणा: सैनी, माली, सैनिक क्षत्रिय। सौराष्ट्र: सैनी, माली, रामी, शंकरवंशी, काची।
माली समाज के प्रमुख व्यक्ति
ज्योतिराव फूले: उन्नीसवीं सदी के महान समाज सुधारक, सामाजिक कार्यकर्ता, जाति प्रथा विरोधी, विचारक, और लेखक ज्योतिराव गोविंदराव फुले माली समुदाय से थे. फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था. उन्होंने छुआछूत और जाति व्यवस्था के उन्मूलन तथा महिला मुक्ति और महिला सशक्तिकरण सहित कई क्षेत्रों में सराहनीय कार्य किया. ज्योति राव फूले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भारत में महिलाओं, छोटी कहे जाने वाली जातियों और दलितों के लिए शिक्षा के अग्रदूत थे। फुले दंपति ने भारत में लड़कियों के लिए विद्यालय खोलने वाले पहले भारतीयों में से थे। समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखकर फूले व्याकुल हो जाते थे। उन्होंने बाल विवाह का विरोध और विधवा विवाह का समर्थन किया था। उन्होंने गर्भवती हिंदू ब्राह्मण विधवाओं के लिए एक घर की भी स्थापना की और जिन महिलाओं को उनके परिवार वालों ने घर से निकाल दिया था। ज्योतिराव फुले ने उन्हें अपने बनाये गये घर में रखा था। 1873 में निचली जाति के लोगों को समान अधिकार दिलाने और उत्पीड़ित वर्गों के उत्थान के लिए सत्यशोधक समाज का गठन और उसकी स्थापना की थी।
सावित्रीबाई फुले: सावित्रीबाई फुले एक महान समाज सुधारक, शिक्षाविद और कवित्री थीं। सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है। इनका जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। अपने पति ज्योति राव फूले के साथ मिलकर उन्होंने भारत में महिलाओं के अधिकारों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सावित्रीबाई फुले को भारतीय नारीवाद की जननी कहा जाता है। उन्होंने जाति और लिंग के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव और अनुचित व्यवहार के उन्मूलन के लिए काम किया।
नारायण लोखंडे: नारायण मेघाजी लोखंडे जोतिराव फुले के प्रमुख सहयोगी थे। उनका जन्म पुणे जिले के एक माली परिवार में हुआ था। लोखंडे भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के जनक थे। उन्हें 19वीं शताब्दी में कपड़ा मिल में काम करने वाले मजदूरों की परिस्थितियों में सुधार लाने के लिए याद किया जाता है। ब्रिटिश राज में कपड़ा और कई तरह के मिलों में भारतीय मजदूर भारी संख्या में काम करते थे। उन्हें हफ्ते के सातों दिन काम करना पड़ता था और उनके लिए छुट्टी की कोई व्यवस्था नहीं थी। मिल मजदूरों को एक दिन की छुट्टी के लिए मजदूर नेता नारायण लोखंडे ने आंदोलन शुरू किया। लोखंडे के 7 साल के लंबे संघर्ष के बाद अंग्रेज शासन में 10 जून 1890 को भारतीयों के लिए रविवार के दिन को साप्ताहिक अवकाश के रूप में मान्यता दे दी गयी थी।





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