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मुण्डा जनजाति का मुख्य स्थान झारखण्ड है। लेकिन खैरवार जनजाति की तरह मुण्डा जनजाति के लोग भी छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों जैसे:- कोरबा, बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, कांकेर, नारायणपुर, राजनंदगाँव, बीजापुर, कोंडागाँव आदि जिलों में निवास करते है। 2011 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या लगभग 1049767 है।
मुण्डा जनजाति का इतिहास एवं उत्पत्ति कोलारीयन समूह से हुआ है। तथा इनके पूर्वज बिरसा मुण्डा को माना जाता है जो 19वी शताब्दी के भारतीय सेनानी थे। इन्होने अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया जिसे आज ‘बिरसा मुण्डा आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। बिरसा मुण्डा आंदोलन, जबरजस्ती धर्मांतर एवं अंग्रेजो के अत्याचार के खिलाफ था। इस आंदोलन के बाद बिरसा मुण्डा को मुण्डा जनजाति एवं आदिवासी के लोग भगवान मनाने लगे।
मुण्डा जनजाति मूल रूप से उत्तरी-पश्चमी भारत के निवासी थे, जो मौर्य साम्राज्य के आगमन के समय आजमगढ़ (उत्तरप्रदेश मे स्थित) मे प्रवेश किए। इनकी कुछ समूह छत्तीसगढ़ के सरगुजा एवं जशपुर, झारखंड के राँची (छोटानागपुर) एवं बिहार मे प्रवेश किये। आज इनकी जंजातियों का समूह भारत के बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तरप्रदेश राज्यों के मूल निवासी है। ये अन्य जंजातियाँ जैसे-कंवर, उरांव एवं नागेसिया जनजाति के बस्तियों मे वास करते हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य एक भारतीय राज्य है जिसमें मुण्डा जनजाति का महत्वपूर्ण इतिहास है। मुण्डा लोग एक आदिवासी समुदाय हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप के क्षेत्रीय आदिवासियों में से एक हैं। छत्तीसगढ़ के क्षेत्रफल के एक बड़े हिस्से में मुण्डा लोग रहते हैं, जो प्राचीन इतिहास से जुड़े हुए हैं और अपनी संस्कृति, भाषा और लोक कला के लिए प्रसिद्ध हैं। मुण्डा जनजाति का इतिहास छत्तीसगढ़ के प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। इनका प्रारंभिक इतिहास वैदिक काल तक जाता है, जब उनकी जनसंख्या और क्षेत्रफल काफी बड़ा था। मुण्डा लोग कभी-कभी पहाड़ी क्षेत्रों में बस्तियां बनाते थे और खेती करके अपना जीवन व्यतीत करते थे।
ब्रिटिश शासन के समय, मुण्डा लोग छत्तीसगढ़ के अलग-अलग क्षेत्रों में रहते थे। उनका जीवन परंपरागत रूप से बित रहा था, जिसमें वनस्पतिक औषधियों का उपयोग, पेड़-पौधों की पूजा, और अपनी लोक कलाओं का अभ्यास था। ब्रिटिश शासन के दौरान, मुण्डा लोगों का जीवन व्यवस्था में परिवर्तन हुआ, और उन्हें अलग-अलग खेती करने के लिए मजबूर किया गया। इस समय तक मुण्डा लोग धीरे-धीरे खेती करना शुरू कर दिये थे। आजादी के बाद, छत्तीसगढ़ को 1 नवंबर, 2000 को एक अलग राज्य घोषित किया गया, तब से मुण्डा लोग छत्तीसगढ़ के आदिम आदिवासियों में एक मुख्य स्थान प्राप्त कर चुके हैं। उनका जीवन व्यवस्था और आर्थिक स्थिति अभी भी बहुत कठिन है। सरकारी योजनाओं और एनजीओं के माध्यम से, मुण्डा लोगों के जीवन को सुधारने की कोशिश की जा रही है।
मुण्डा लोग अपनी परंपराओं को जिंदा रखने में जुटे हुए हैं। उनकी लोक कला, नृत्य, गीत, और कथाओं में उनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धंधा है। मुण्डा समुदाय के लोग भगवान, प्रकृति और अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं। उनका महत्वपूर्ण त्योहार सरहुल है, जिसमें प्राकृतिक देवी-देवताओं की पूजा होती है और समुदाय के साथियों के साथ साथ भोजन का आनंद लिया जाता है। इस प्रकार, छत्तीसगढ़ में मुण्डा जनजाति का पूरा इतिहास उनकी परंपराओं से जुड़ा हुआ है, जो उनकी संस्कृति और लोक संस्कृति की मूलभूत बुनियाद है। उनका जीवन, उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने में अहम है और उन्हें अपना सम्मान और अधिकार प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है।
मुण्डा जनजाति की भाषा एवं बोली
मुण्डा जनजाति की कोई विशेष भाषा व बोली नहीं है। इनकी भाषा स्थान विशेष होता है, जैसे की छतीसगढ़ के मुण्डा जंजातियों का विशेष बोली छत्तीसगढ़ी, कुड़ुख (उरांव) एवं सादरी, झारखंड के मुण्डा जनजाति झारखंडी एवं बिहार मे बिहारी भाषा बोली जाती हैं। शिक्षा के प्रसार से हिन्दी एवं अँग्रेजी भाषाओं का आगमन हुआ, जिन्हे इन जंजातियों के द्वारा अपनाया गया।
मुण्डा जनजाति की भाषा और बोली के बारे में बात करें तो, मुण्डा जनजाति की प्रमुख भाषा है ‘मुण्डारी भाषा’ जो मुण्डा भाषा परिवार का एक भाषा समूह है। मुण्डारी भाषा भारत के झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बंगाल और बिहार राज्यों में बोली जाती है।
मुण्डारी भाषा एक ड्राविड़ी भाषा है और मुण्डा जनजाति के लोग इसे अपनी भाषा के रूप में बोलते हैं। यह उनकी संस्कृति और भाषा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और उन्हें अपने अपने संबंधों में संवाद करने का माध्यम प्रदान करती है। मुण्डारी भाषा में विभिन्न भाषा-विशेषताएँ होती हैं, जो उसको अनूठा बनाती हैं। इसमें कई वर्णमालाएं, संधियाँ और वाक्य रचनाएँ होती हैं। यह एक समृद्ध भाषा है जिसमें साहित्यिक गद्य, गीत, और कविताएँ भी होती हैं जो मुण्डा जनजाति की संस्कृति और विरासत को अभिव्यक्त करती हैं।
मुण्डा जनजातियो की कृषि
मुण्डा जनजाति छत्तीसगढ़ में जैसे अन्य आदिवासी समुदायों के लोग भी प्राकृतिक रूप से जीवन व्यतीत करते हैं और खासकर कृषि और उससे संबंधित गतिविधियों पर निर्भर करते हैं। छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है जिसमें खेती और गैर-कृषि संबंधी गतिविधियों का महत्वाकांक्षी अंश रहता है। मुण्डा जनजाति के लोग मुख्य रूप से शिकारी, वन्यजीवी और खेतीकारी होते हैं। वे पारंपरिक तरीके से कृषि का अभ्यास करते हैं और प्राकृतिक रूप से उगाई जाने वाली फसलें जैसे धान, जव, मक्का, रागी, मटर, और अनाज का उत्पादन करते हैं। इन्हें वन्यजीवियों और समुदाय के प्राकृतिक संसाधनों के साथ एक साथ काम करने का अनुभव होता है।
जीवन के इस तरीके से, मुण्डा जनजाति के लोग अपने परंपरागत जीवनशैली को जारी रखते हैं और खेती और अन्य गतिविधियों में अपने जीवन को बिताते हैं। वे अपनी जमीन, वन्य फसलें, और जलवायु के साथ जुड़े हुए हैं जो उन्हें उत्पादक और स्वावलंबी बनाता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों, जिनमें मुण्डा भी शामिल है, के जीवनशैली और खेती विधि में स्थानीय परंपराओं का ध्यान रखते हुए विकास कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं ताकि उन्हें आर्थिक रूप से समृद्धि मिल सके और उनकी संस्कृति, परंपरा और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा हो सके।
मुण्डा जनजाति की वस्त्र एवं आभूषण
मुण्डा जनजाति के लोग अपनी परंपरागत संस्कृति को अपने वस्त्र और आभूषणों के माध्यम से संवारते हैं। उनके पहनावे और आभूषण उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा हैं और उनकी विशेषता को प्रकट करते हैं। निम्नलिखित हैं, मुण्डा जनजाति के वस्त्र और आभूषणों की कुछ प्रमुख विशेषताएँ:
परंपरागत पोशाक: मुण्डा जनजाति के लोग अपने परंपरागत पोशाक में बहुत आकर्षक दिखते हैं। पुरुष वस्त्र में धोती और ऊपरी वस्त्र जैसे एकल वस्त्र और अंगूठे की रसी या पट्टी शामिल होती हैं। स्त्रियों के वस्त्र में साड़ी और ब्लाउज शामिल होते हैं।
जेवर: जेवर मुण्डा जनजाति के लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। पुरुष लोग हाथ, गर्दन और कान के लिए सोने या लोहे के अंगूठे, बाजूबंद, गोल्डन आर्मलेट, और कड़ी पहनते हैं। स्त्रीयों के जेवर में मांग टीका, कान की बाली, हाथ में बाजूबंद और पांची आदि शामिल होते हैं।
हाथ कृति: मुण्डा जनजाति के लोग अपनी खास हाथ कृति वस्त्रों को भी उत्साह से पहनते हैं। उनके वस्त्रों पर विशेषता से बनाए गए नक्काशी और नरमी का प्रयोग किया जाता हैं, जो उन्हें इस्तीला देते हैं।
गले के हार: मुण्डा जनजाति के लोगों के लिए गले के हार भी आकर्षक अक्सेसरीज होते हैं। इनमें सोने, चांदी, धातु या मोती के गहने शामिल होते हैं और ये उनकी परंपरागत संस्कृति को प्रतिष्ठित करते हैं।
मुण्डा जनजाति के वस्त्र और आभूषण उनकी समृद्धि, सांस्कृतिक धरोहर, और भौगोलिक स्थान के अनुसार भिन्नता दिखाते हैं। ये उनके संस्कृति को अभिव्यक्ति का साधन होते हैं और उन्हें उनके जीवनशैली और विशेषता का प्रतीक बनाते हैं।





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