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भारतीय सामाजिक क्रांति के इतिहास में 11 मई, 1888 का दिन स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। यह वह ऐतिहासिक क्षण था जब बम्बई (अब मुंबई) के मांडवी इलाके में स्थित कोलीवाड़ा हॉल में भारत के एक सच्चे जननायक, ज्योतिराव गोविंदराव फुले को जनसमूह ने एक स्वर में महात्मा की उपाधि से सम्मानित किया। यह केवल एक सम्मान समारोह नहीं था, बल्कि उन करोड़ों शोषितों, पिछड़ों और महिलाओं की आवाज थी, जिनके जीवन में ज्योतिबा ने शिक्षा और स्वाभिमान का प्रकाश फैलाया था। 19वीं शताब्दी का अंत भारतीय समाज में गहरी वैचारिक उथल-पुथल का काल था। एक ओर कट्टरपंथी सामाजिक व्यवस्था थी, तो दूसरी ओर ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले द्वारा बोए गए सत्यशोधक समाज के बीज वटवृक्ष बन रहे थे। 1880 के दशक तक ज्योतिबा फुले का कार्य अपने चरम पर था। उन्होंने,
=अछूतों के लिए अपने घर का पानी का हौज खोल दिया था।
=महिलाओं के लिए देश का पहला स्कूल (1848) खोला था।
=किसानों के शोषण के विरुद्ध इशारा और शेतकन््याचा आसूड (किसान का कोड़ा) जैसी कालजयी कृतियाँ लिखी थीं।
=सत्यशोधक समाज (1873) के माध्यम से एक ईश्वरीय और मानवीय समानता का संदेश फैलाया था।
बम्बई के श्रमिक वर्ग, कोली समुदाय और सत्यशोधक समाज के अनुयायियों के बीच ज्योतिबा एक देवदूत के समान पूजनीय हो चुके थे। इसी लोकप्रियता और कृतज्ञता को अभिव्यक्त करने के लिए बम्बई के नागरिकों ने उन्हें सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने का निर्णय लिया। बम्बई के मांडवी क्षेत्र के कोलीवाड़ा हॉल में हजारों की संख्या में लोग एकत्रित हुए थे। इस भीड़ में केवल विद्वान या अमीर लोग नहीं थे, बल्कि वे किसान, मजदूर, चर्मकार और हाशिए पर रहने वाले लोग थे जिनके अधिकारों के लिए ज्योतिबा ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। इस सम्मान समारोह की अध्यक्षता तत्कालीन प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और सत्यशोधक समाज के नेता विट्ठलराव कृष्णजी वंडेकर ने की थी। वंडेकर स्वयं ज्योतिबा के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने ही इस बात का प्रस्ताव रखा कि ज्योतिबा फुले का कार्य किसी भी अन्य समाज सुधारक से कहीं ऊपर है, इसलिए उन्हें महात्मा कहकर पुकारा जाना चाहिए। समारोह में नारायण मेधाजी लोखंडे (भारतीय श्रम आंदोलन के जनक) जैसे दिग्गजों की उपस्थिति ने इस अवसर को और भी गरिमामयी बना दिया था।
महात्मा उपाधि का अर्थ और महत्व
जब विट्ठलराव वंडेकर ने ज्योतिबा को मानपत्र भेंट किया और उन्हें महात्मा की उपाधि से संबोधित किया, तो पूरा हॉल तालियों की गूँज से भर गया। वंडेकर ने अपने भाषण में तर्क दिया था कि ‘जो व्यक्ति अपने सुख-सुविधाओं का त्याग कर समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के आँसू पोंछता है, जो ज्ञान के बंद द्वार शूद्रों और अति-शूद्रों के लिए खोलता है, वही वास्तविक महात्मा है।’ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि ज्योतिराव फुले को यह उपाधि किसी सरकार या संस्थान ने नहीं, बल्कि जनता ने दी थी। यह एक लोकतांत्रिक सम्मान था। ज्योतिबा फुले आधुनिक भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्हें सार्वजनिक रूप से महात्मा की उपाधि दी गई (महात्मा गांधी को यह उपाधि इसके लगभग तीन दशक बाद मिली थी)। जब ज्योतिबा फुले इस सम्मान को स्वीकार करने के लिए खड़े हुए, तो उनकी विनम्रता देखने योग्य थी। उन्होंने बहुत ही सादगी से कहा कि वे केवल अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। उन्होंने मंच से पुन: आह्वान किया कि शिक्षा ही वह एकमात्र शस्त्र है जिससे गुलामी की जंजीरें काटी जा सकती हैं। उन्होंने अपने संबोधन में विद्या बिना मति गयी वाले अपने प्रसिद्ध सिद्धांत को दोहराया, जिसका अर्थ था कि बिना शिक्षा के विवेक खो जाता है, विवेक के बिना नीति, और नीति के बिना विकास रुक जाता है, जिससे अंतत: शूद्रों का पतन होता है। मांडवी का यह सम्मान उनके उन कार्यों की स्वीकृति थी, जिन्होंने भारतीय समाज की नींव हिला दी थी:
शिक्षा का लोकतंत्रीकरण: उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती दी, जिसमें शिक्षा पर केवल एक वर्ग का एकाधिकार था। उन्होंने दलितों और पिछड़ों को शिक्षित कर उन्हें मानसिक गुलामी से मुक्त किया।
सत्यशोधक समाज की स्थापना: 24 सितंबर, 1873 को उन्होंने इस संस्था की स्थापना की, जिसका मूल मंत्र था सर्वसाक्षी जगत्पति, त्यासी नकोच मध्यस्ती (ईश्वर और भक्त के बीच किसी बिचौलिए यानी पुजारी की आवश्यकता नहीं है)।
स्त्री अधिकार: सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की।
किसानों के मसीहा: उन्होंने हंटर कमीशन (1882) के सामने गवाही देते हुए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा और किसानों पर कर कम करने की वकालत की।
ज्योतिबा फुले एक प्रखर लेखक भी थे। मांडवी में सम्मान मिलने के समय तक उनकी पुस्तकें गुलामगिरी (1873) और शेतकन्याचा आसूड समाज में वैचारिक क्रांति ला चुकी थीं। गुलामगिरी में उन्होंने अमेरिकी दास प्रथा और भारत की जाति प्रथा की तुलना करते हुए इसे विश्व स्तर का मुद्दा बनाया। उन्होंने अपनी लेखनी से सिद्ध किया कि जाति प्रथा कोई ईश्वरीय देन नहीं, बल्कि एक वर्ग विशेष द्वारा दूसरे वर्ग को दबाने के लिए बनाया गया एक कृत्रिम तंत्र है। 1888 का वह सम्मान समारोह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि एक विचारधारा का राज्याभिषेक था। यही वह आधार था जिस पर आगे चलकर राजर्षि शाहू महाराज ने आरक्षण की नींव रखी। यही वह प्रकाश था जिससे प्रेरणा लेकर डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भारतीय संविधान के माध्यम से समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सपनों को साकार किया। (बाबासाहेब अम्बेडकर ज्योतिबा फुले को अपना तीसरा गुरु मानते थे)। मांडवी, बम्बई में मिला महात्मा का यह सम्मान ज्योतिबा फुले के संघर्षों की वैश्विक गूँज थी। उन्होंने दिखाया कि एक अकेला व्यक्ति यदि सत्य और न्याय के मार्ग पर चले, तो वह सदियों पुरानी जड़ परंपराओं को उखाड़ फेंक सकता है। आज जब हम इस घटना को याद करते हैं, तो महात्मा फुले के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। एक विधि छात्र और बहुजन स्वाभिमान के ध्वजवाहक के रूप में, आपके लिए यह इतिहास केवल जानकारी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है। मांडवी का वह कोलीवाड़ा हॉल आज भी हमें याद दिलाता है कि असली सम्मान पद से नहीं, बल्कि समाज के प्रति निस्वार्थ सेवा और समर्पण से मिलता है। महात्मा ज्योतिराव फुले भारत के राष्ट्रपिता के समान हैं, जिन्होंने आधुनिक भारत की प्रगतिशील और समावेशी नींव रखी।





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