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सन 1940 से पहले स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों का (धर्म के नाम वाले कालम) में उनका धर्म ‘ब्राह्मण’ या ‘गैर-ब्राह्मण’ लिखा जाता था। जिसका दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद है।
क्या है ब्राह्मण धर्म? खुद को ऊंचा बाकी सबको नीचा समझना ही ब्राह्मण धर्म है। खुद को सर्वाधिकार संपन्न बाकी सबको अधिकार विहीन बनाए रखना ही ब्राह्मण धर्म है। खुद को सम्मानित बाकी सबको अपमानित बनाए रखना ब्राह्मण धर्म है। खुद को काल्पनिक भगवानों देवी देवताओं से ऊपर समझना और बाकी सबको पूजा पाठ, कर्मकांड, अंधविश्वास में उलझाकर धन ऐंठना ही ब्राह्मण धर्म है। ब्राह्मणों द्वारा नीच बनाए गए लोगों से उनको नीच अधिकार विहीन बताने वाली गप्प कथाओं वाले ग्रंथों को धर्म बताकर थोपना ब्राह्मण धर्म है। खुद को ज्ञानी बाकी सबको अज्ञानी समझना ब्राह्मण धर्म है। खुद को पवित्र बाकी सबको अपवित्र समझना ब्राह्मण धर्म है। सर्व श्रेष्ठता के दंभ में चूर रहना ब्राह्मण धर्म है। नीच बनाए गए लोगों को क्रमिक ऊंच-नीच के आधार पर जातियों में बांटना ब्राह्मण धर्म है। ब्राह्मणों द्वारा नीच बनाए गए लोगों के हक अधिकार हड़पना ब्राह्मण धर्म है। सबको अपना मानसिक गुलाम बनाना और उन्हें गुलामी का एहसास न होने देना ब्राह्मण धर्म है। पूरे देश को समता स्वतंत्रता बंधुत्व, न्याय, मानवता,नैतिकता, वैज्ञानिकता के बजाय विषमता, परतंत्रता, विद्वेष, अन्याय, अमानवीयता, अनैतिकता, अवैज्ञानिकता के गर्त में ढकेल ना ब्राह्मण धर्म है। ब्राह्मणों द्वारा अपने से नीच बनाए गए लोगों से चरणस्पर्श की अपेक्षा करना ब्राह्मण धर्म है। ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए काल्पनिक आदर्शों राम कृष्ण शंकर हनुमान आदि का रात दिन प्रचार करना और देशवासियों को वास्तविक आदर्शों- बुद्ध, कबीर, फुले, साहू, अंबेडकर, पेरियार के महान मानवतावादी विचारों को न जानने देना ब्राह्मण धर्म है। दूसरों को कर्म आधारित वर्णव्यवस्था का पाठ पढ़ाना और खुद को जन्म आधारित वर्णव्यवस्था की परंपरा पर चलना ब्राह्मण धर्म है। कथित ग्रंथों में ब्राह्मणों के लिए सिर्फ संस्कृत पढ़ने का नियम बनाना, उसे न मानते हुए अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा देना ब्राह्मण धर्म है। ग्रंथों में विदेश यात्रा को वर्जित लिखना और विदेश यात्रा के लिए सदैव तत्पर रहना ब्राह्मण धर्म है। ग्रंथों में मूर्ति पूजा का कोई प्रावधान न होते हुए भी मूर्ति स्थापित करके अपने से नीच बनाए गए लोगों से धन ऐंठना ब्राह्मण धर्म है। मठ मंदिर से लेकर देश की विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका एवं मीडिया पर कब्जा करना ब्राह्मण धर्म है। जो किसी भी कोण से धर्म नहीं बल्कि ब्राह्मण वर्चस्ववादी सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें ब्राह्मण को तो सबकुछ मिलता है लेकिन उसके द्वारा नीच बनाए गए लोगों का सबकुछ छिन जाता है।
इसीलिए ब्राह्मण इसे कभी वैदिक धर्म कहता है कभी वर्ण धर्म, कभी सनातन धर्म कभी हिन्दू धर्म, उसे पता है यह धर्म है ही नहीं सिर्फ ब्राह्मण वर्चस्व स्थापित करने की एक व्यवस्था है जिसे धर्म के आवरण में छिपा कर ही लागू किया जा सकता है इसीलिए जरूरत और परिस्थितियों के हिसाब से उसका नाम बदलते रहता है। उसकी इस व्यवस्था में उसके द्वारा नीच बनाए गए लोगों के लिए कभी पूरे न होने वाले मायावी आश्वासनों के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं इसलिए वह बारंबार मुस्लिम कट्टरवाद का हौआ खड़ा करके उन्हें हिन्दू बनाए रखने का प्रयास करता है। लेकिन अब इस ब्राह्मणी षड्यंत्र का भांडा पूरी तरह फूट चुका है। अब उसके द्वारा नीच बनाए गए लोगों का आत्मसम्मान जाग चुका है वे अपने पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को जान चुके हैं दोस्त और दुश्मन को पहचान चुके हैं अब अपने भारत को ब्राह्मण शाही से मुक्त कराकर, भारत की सत्ता अपने हाथ में लेकर, संविधान में दिए समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय जैसे मानवीय मूल्यों और सच्चे लोकतंत्र की स्थापना तथा अपने महापुरुषों के सपनों का समृद्ध एवं प्रबुद्ध भारत बनाने के लिए कमर कस चुके हैं। भारत में ब्राह्मण शाही बस अब और नहीं! धर्म में वर्ण, वर्ण में जाति, जाति में ऊंच-नीच और ब्राह्मण के आगे सारे नीच तो गर्व से कैसे कहें, हम हिन्दू हैं?





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