




2026-11-02 16:04:32
भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नया और गहरा दार्शनिक संकट खड़ा हो गया है। संकट किसी नीति, महंगाई या बेरोजगारी का नहीं, बल्कि सीधे-सीधे ‘पिता’ यानी ‘बाप’ की सत्ता और पहचान का है। सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता बेहद आहत हैं और राष्ट्रव्यापी रोष प्रकट करने के मूड में हैं। आहत होने का तात्कालिक कारण कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का वह ललकारता हुआ बयान है, जिसमें उन्होंने हमारे ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ प्रधानमंत्री के बायोलॉजिकल पिता का उल्लेख कर दिया। राहुल गांधी ने बहुत पहले नारा दिया था—स्मैश द पेट्रियार्की (पितृसत्ता को ध्वस्त करो)। वैसे तो यह नारा देश की बेटियों के सशक्तीकरण के लिए था, लेकिन चुनावी भाषण के जोश में खड़गे जी ने इसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया और सीधे महामानव की पितृ-परंपरा पर प्रहार कर बैठे। बिहार के एक कार्यक्रम में जब भीड़ से किसी उत्साही समर्थक ने नारा लगाया, ‘मोदी नहीं जाएंगे!’ तो खड़गे जी ने तपाक से कहा, ‘जाना तो मोदी के बाप को भी होगा।’ बस, इसी एक वाक्य पर राजनीति का पारा सातवें आसमान पर है। नेता आहत हैं, कार्यकर्ता आक्रोशित और अंधभक्त तो पगला गये हैं। हालांकि, गहराई से सोचें तो खड़गे जी के बयान में एक बुनियादी चूक है—वे उस शख्स को विदा करने पर आमादा हैं, जिनकी आमद का जिक्र खुद इस दौर की मुख्यधारा की राजनीति में कभी हुआ ही नहीं। खड़गे उस व्यक्ति को वापस भेजने की बात कर रहे हैं, जो मंचों पर कभी बुलाया ही नहीं गया।
मोदी जी जब देश के प्रधानमंत्री बने, उसके बाद उनकी आदरणीय माता जी अनगिनत कहानियों, संस्मरणों, भावुक प्रसंगों और नोटबंदी के दौरान बैंक की कतारों तक में नजर आईं। सार्वजनिक सभाओं में मां के संघर्षों, उनके त्याग और बर्तनों की खनक का जिक्र करते हुए अक्सर प्रधानमंत्री का गला रुंध जाता है। यह मातृभक्ति प्रशंसनीय है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अपने पिता का नाम उन्होंने शायद ही कभी किसी सार्वजनिक मंच पर भावुकता के साथ लिया हो। यह उपेक्षा तब भी जारी रही जब विपक्ष ने उन्हें ‘पठान का बच्चा’ कहकर घेरा था, या जब आईटी सेल के हमलों के बीच पहचान की सियासत खेली जा रही थी। तब भी किसी ने उठकर यह स्पष्ट नहीं किया कि जब वे श्रीयुत दामोदरदास जी के सुपुत्र हैं, तो उन पर ऐसी बातें क्यों चिपकाई जा रही हैं?
सच पूछा जाए तो दामोदरदास जी भारतीय राजनीति के सबसे बड़े ‘अनसंग हीरो’ (अनाम नायक) हैं। जरा निष्पक्ष होकर सोचिए: अगर मां ने संघर्षों से पाला-पोसा, बच्चे को नदी में मगरमच्छ पकड़ने की आध्यात्मिक छूट दी, तो पिता ने ही तो रेलवे स्टेशन की कैंटीन में ‘चायवाला’ बनने का बुनियादी ढांचा तैयार किया था। यदि वह चाय की दुकान न होती, तो क्या आज की यह ऐतिहासिक गाथा संभव थी? अगर भाइयों के पुराने संस्मरणों को सच मानें, तो बचपन में घर छोड़कर जाने से पहले जो संसाधन मौजूद थे, उसमें भी तो उसी पिता का पसीना लगा था। फिर क्या कारण है कि मोदी जी अपने पिता का नाम लेने से कतराते हैं? क्या वे राहुल गांधी के कहने से पहले ही खुद को देश का सबसे बड़ा ‘फेमिनिस्ट’ साबित कर चुके थे, जिन्होंने पितृसत्ता को अपने व्यक्तिगत विमर्श से पहले ही खारिज कर दिया था? या फिर जैसा कि संबित पात्रा ने टीवी पर दावा किया था कि ‘मोदी जी इस देश के बाप हैं’, तो उस तर्क से क्या वे अपने पिता के भी पिता मान लिए गए?
लेकिन पिता की इस दार्शनिक खोज में एक और अंतरराष्ट्रीय पेंच है। विदेश नीति और राजनयिक भाषणों के पन्ने पलटिए तो मामला और पेचीदा हो जाता है। जब प्रधानमंत्री इजराइल के दौरे पर गए थे, तो तेल अवीव के मंच पर भारतीय समुदाय और इजराइली नेताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करते हुए एक अनोखा शब्द इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा था कि भारत यदि मातृभूमि (मदरलैंड) है, तो कई मायनों में यहूदी परंपरा के लिए इजराइल ‘फादरलैंड’ (पितृभूमि) है। अब कूटनीतिक रूप से यह बात चाहे जितनी गहरी हो, लेकिन घरेलू राजनीति के देशी व्याकरण में इसका मतलब बड़ा गजब निकलता है। अगर भारत मां है और इजराइल फादरलैंड है, तो क्या अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नया ‘पिता’ चिन्हित कर लिया गया था? क्या हमारे बायोलॉजिकल पिता का स्थान अब ग्लोबल स्तर पर तेल अवीव ने ले लिया है?
जब स्वयं नेताजी अपने उद्बोधनों में एक तरफ खुद को ईश्वरीय विधान यानी ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ बताते हैं, और दूसरी तरफ विदेश में ‘फादरलैंड’ की अवधारणा पर रीझते हैं, तो ऐसे में देश के आम मतदाता के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है कि आखिर वडनगर के स्वर्गीय दामोदरदास जी का क्या कसूर था? इतिहास गवाह है कि हमारे देश में ‘पिता बिरादरी’ हमेशा से विमर्श में उपेक्षित रही है। मां पर फिल्में बनती हैं, मां पर आंसू बहाए जाते हैं, और मां के नाम पर चुनाव के ठीक पहले भावुक रीलें तैयार की जाती हैं। गालियों की दुनिया भी मर्दवादी नजरिए से ही गढ़ी गई है, जहां निशाना हमेशा मां-बहन को ही बनाया गया।
अब जब खड़गे जी ने अनजाने में ही सही, भाषा के इस पितृसत्तात्मक ढांचे को तोड़कर पिता को विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है, तो भाजपा कार्यकतार्ओं का आहत होना स्वाभाविक है। लेकिन विरोध-प्रदर्शन के साथ-साथ पार्टी के पास यह एक स्वर्णिम अवसर भी है। जब देश भर के पाठ्यक्रमों में इतने ऐतिहासिक संशोधन हो रहे हैं, बीस से ज्यादा राज्यों में डबल इंजन की सरकारें चल रही हैं, तो क्या स्कूली किताबों में एक अध्याय ‘अनसंग हीरो: दामोदरदास जी’ पर नहीं जोड़ा जाना चाहिए? ताकि नई पीढ़ी को पता चल सके कि ‘नॉन-बायोलॉजिकल अवतार’ के पीछे किस बायोलॉजिकल पिता का मूक योगदान था। भारतीय राजनीति अब तक पूरी तरह ‘बाप-निरपेक्ष’ बनी हुई थी। खड़गे के इस एक बयान ने कम से कम पिता को चुनावी विमर्श का मुख्य मुद्दा तो बना ही दिया है। अब देखना यह है कि जब मैदान में बीजेपी कार्यकर्ता पिता के सम्मान की लड़ाई लड़ेंगे, तो क्या प्रधानमंत्री भी अपने उस बायोलॉजिकल पिता के लिए भावुक होंगे, जिन्हें वे अक्सर भाषणों के कैमरे से दूर ही रखते आए हैं!





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