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भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 29 और 30 अगस्त 1947 की तारीखें केवल प्रशासनिक घटनाक्रम नहीं हैं, बल्कि यह आधुनिक भारत के सामाजिक, राजनीतिक और वैधानिक पुनर्जन्म का प्रस्थान बिंदु हैं। 15 अगस्त 1947 को सदियों की औपनिवेशिक दासता से मुक्त होने के बाद नवस्वतंत्र भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—विविधताओं, सामाजिक विषमताओं और जटिल ऐतिहासिक संदर्भों से भरे इस विशाल भूभाग को एक सूत्र में पिरोने वाले संप्रभु संविधान का निर्माण करना। संविधान सभा ने इस ऐतिहासिक दायित्व को पूर्ण करने के लिए डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के नेतृत्व पर भरोसा जताया। 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा द्वारा प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) के गठन का संकल्प पारित किया गया और अगले ही दिन, 30 अगस्त 1947 को, समिति की पहली बैठक में डॉ. अम्बेडकर को सर्वसम्मति से इसका अध्यक्ष चुना गया। कैबिनेट मिशन योजना (1946) के तहत गठित संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी। 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ऐतिहासिक उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया, जिसने संविधान के मूल दर्शन और आदर्शों की रूपरेखा तय की।
संविधान निर्माण की प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए संविधान सभा ने कई महत्वपूर्ण समितियां गठित कीं, जैसे:
➢संघ शक्ति समिति
➢मौलिक अधिकार एवं अल्पसंख्यक समिति
➢प्रांतीय संविधान समिति
➢संघ संविधान समिति
इन सभी समितियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों और संवैधानिक सलाहकार सर बी.एन. राव द्वारा तैयार किए गए प्राथमिक मसौदे को एक व्यवस्थित, कानूनी रूप से त्रुटिहीन और समग्र संविधान में ढालने के लिए एक विशेष और सशक्त समिति की आवश्यकता थी। यहीं से प्रारूप समिति की आवश्यकता रेखांकित हुई। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक दो सप्ताह बाद, 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा के पटल पर एक युगांतरकारी प्रस्ताव रखा गया।
संकल्प का वैधानिक प्रारूप
सत्यनारायण सिन्हा द्वारा संविधान सभा में एक आधिकारिक प्रस्ताव पेश किया गया। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी समिति की नियुक्ति करना था जो संविधान सभा द्वारा स्वीकृत विभिन्न समितियों की सिफारिशों और संवैधानिक सलाहकार द्वारा तैयार किए गए मूल प्रारूप की समीक्षा कर सके तथा संपूर्ण संविधान का एक सुगठित प्रारूप तैयार कर सभा के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत कर सके।
प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु:
1. संविधान सभा एक प्रारूप समिति की नियुक्ति करती है।
2. यह समिति विभिन्न समितियों के निर्णयों और संवैधानिक सलाहकार के ड्राफ्ट को समाहित करते हुए एक संपूर्ण संवैधानिक मसौदा तैयार करेगी।
3. समिति में 7 प्रमुख विशेषज्ञों को सदस्य के रूप में सम्मिलित किया।
प्रारूप समिति के सात स्तंभ
1. डॉ. बी. आर. अम्बेडकर: प्रख्यात विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री और सामाजिक विचारक
2. एन. गोपालस्वामी अय्यंगार: अनुभवी प्रशासक और रियासतों के मामलों के विशेषज्ञ
3. अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर: मद्रास के पूर्व महाधिवक्ता और शीर्ष संवैधानिक विधि विशेषज्ञ
4. डॉ. के. एम. मुंशी: प्रख्यात साहित्यकार, वकील और राजनीतिज्ञ
5. सैयद मोहम्मद सादुल्ला: असम के पूर्व प्रधानमंत्री और अनुभवी विधिवेत्ता
6. बी. एल. मित्तर (बाद में एन. माधव राव): स्वास्थ्य कारणों से त्यागपत्र के बाद माधव राव शामिल हुए
7. डी. पी. खेतान (बाद में टी. टी. कृष्णमाचारी): 1948 में खेतान के निधन के बाद कृष्णमाचारी नियुक्त हुए
बाबा साहेब का चेयरमैन चुना जाना: 29 अगस्त को पारित प्रस्ताव के क्रियान्वयन के रूप में, अगले ही दिन 30 अगस्त 1947 को प्रारूप समिति की प्रथम आधिकारिक बैठक बुलाई गई। इस बैठक में समिति के सदस्यों ने सर्वसम्मति से डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष (चेयरमैन) चुना। यह चयन भारतीय इतिहास के सबसे दूरदर्शी निर्णयों में से एक था। डॉ. अम्बेडकर का ज्ञान, वैश्विक संवैधानिक प्रणालियों (अमेरिकी, ब्रिटिश, आयरिश, कनाडाई, आॅस्ट्रेलियाई आदि) का उनका तुलनात्मक अध्ययन, और भारतीय समाज की जमीनी सच्चाइयों की उनकी गहरी समझ उन्हें इस पद के लिए सबसे योग्य व्यक्ति बनाती थी। संविधान सभा में उद्बोधन के दौरान बाबा साहेब ने कहा कि मैं संविधान सभा में केवल अनुसूचित जातियों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से आया था। मुझे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि मुझे इतना बड़ा और उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य सौंपा जाएगा। प्रारूप समिति का कार्य केवल कानूनी भाषा लिखना नहीं था, बल्कि विरोधी विचारों, विभिन्न राजनीतिक दर्शनों और 30 करोड़ से अधिक जनता की आकांक्षाओं के बीच संतुलन साधना था।
विषम परिस्थितियां और अकेला नेतृत्व: प्रारूप समिति के एक सदस्य टी. टी. कृष्णमाचारी ने संविधान सभा में 5 नवंबर 1948 को अपने भाषण में डॉ. अम्बेडकर के अथक परिश्रम की गवाही देते हुए कहा था: ‘‘संविधान सभा को शायद इस बात की जानकारी है कि प्रारूप समिति के लिए चुने गए 7 सदस्यों में से एक ने इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह दूसरे सदस्य आए। एक सदस्य की मृत्यु हो गई और उनकी जगह कोई नया सदस्य तुरंत नहीं आ सका। एक सदस्य अमेरिका में थे, एक अन्य सदस्य दिल्ली से दूर राज्य के कार्यों में व्यस्त थे और एक-दो सदस्य अस्वस्थता के कारण नियमित रूप से उपस्थित नहीं हो सके। परिणामत: संविधान के प्रारूपण का पूरा भार अकेले डॉ. अम्बेडकर के कंधों पर आ पड़ा। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि हम सभी को उनका आभारी होना चाहिए कि उन्होंने इस भारी उत्तरदायित्व को इतने शानदार ढंग से निभाया।’’ प्रारूप समिति ने अपने प्रारंभिक कार्य के दौरान लगातार 141 दिनों तक सघन विचार-विमर्श किया। विश्व के 60 से अधिक देशों के संविधानों का गहन अध्ययन किया गया ताकि भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप सर्वोत्तम प्रावधानों को समाहित किया जा सके। अथक प्रयासों के बाद समिति ने 21 फरवरी 1948 को भारत के संविधान का पहला प्रारूप संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सौंपा। इस प्रारूप को जनता, न्यायविदों, पत्रकारों और प्रांतीय सरकारों के सुझावों के लिए 8 महीने तक सार्वजनिक मंच पर रखा गया।
डॉ. अम्बेडकर द्वारा रचित मूल संवैधानिक स्तंभ: डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में प्रारूप समिति ने यह सुनिश्चित किया कि भारत का संविधान केवल शासन व्यवस्था चलाने की नियमावली न बनकर सामाजिक क्रांति का माध्यम बने। डॉ. अम्बेडकर मानते थे कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है जब तक उसका आधार सामाजिक लोकतंत्र न हो।
अनुच्छेद 14-18 (समानता का अधिकार): कानून के समक्ष समानता, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत): सदियों से चली आ रही सामाजिक बुराई को कानूनी रूप से दंडनीय अपराध घोषित किया गया।
(अनुच्छेद 32) : डॉ. अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद बताते हुए इसे संविधान का हृदय और उसकी आत्माकहा। उनका मानना था कि यदि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होने पर उन्हें न्यायालय की शरण लेने का अधिकार न हो, तो मौलिक अधिकार अर्थहीन हो जाएंगे।
प्रारूप समिति ने भारत को राज्यों का संघ के रूप में परिभाषित किया। डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट किया कि भारत का संघ राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है, बल्कि प्रशासनिक सुविधा और राष्ट्रीय अखंडता के लिए बना एक अविभाज्य संघ है।
स्वतंत्र संस्थाओं की स्थापना
➢स्वतंत्र न्यायपालिका
➢भारत निर्वाचन आयोग
➢नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक
➢संघ लोक सेवा आयोग
निष्कर्ष: 29 और 30 अगस्त 1947 की घटनाएं भारतीय राष्ट्र-राज्य के निर्माण में मील का पत्थर हैं। 29 अगस्त को जहां भारतीय लोकतंत्र ने अपनी कानूनी इमारत का ढांचा तय किया, वहीं 30 अगस्त को उस ढांचे को गढ़ने की जिम्मेदारी उस महामानव को सौंपी गई जिसने विषमताओं के विरुद्ध संघर्ष कर ज्ञान के सर्वोच्च शिखर को छुआ था। डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति ने केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं तैयार किया, बल्कि एक ऐसा जीवंत सामाजिक अनुबंध रचा जिसने सदियों से उपेक्षित, शोषित और वंचित वर्गों को गरिमा, समानता और स्वाभिमान के साथ जीने का अधिकार दिया। आज जब भारत विश्व के सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र के रूप में गर्व से खड़ा है, तो उसकी मजबूत नींव में 29-30 अगस्त 1947 को लिया गया वह ऐतिहासिक निर्णय और बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अद्वितीय मेधा, दृष्टि और त्याग स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।





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