




2026-04-25 15:59:07
प्रत्येक वर्ष 1 मई को मनाया जाने वाला श्रमिक दिवस मात्र एक अवकाश नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संघर्ष की याद है जिसने इंसान को मशीन से मानव के रूप में पहचान दिलाई। यह दिन दुनिया भर के मजदूरों और श्रमिक वर्ग के योगदान को समर्पित है। इसकी शुरूआत आठ घंटे के श्रम संघ आंदोलन से हुई थी। यह भारत, चीन, क्यूबा आदि देशों में मनाया जाता है और सार्वजनिक अवकाश होता है। अमेरिका और कनाडा में मजदूर दिवस सितंबर के पहले सोमवार को मनाया जाता है। भारत में पहला मजदूर दिवस 1923 में चेन्नई में मनाया गया था। लाल ध्वज का प्रयोग भी उसी समय भारत में पहली बार किया गया था। हिंदुस्तान की मजदूर किसान पार्टी द्वारा मनाए जाने वाले इस दिन, कम्युनिस्ट नेता मलयापुरम सिंगारवेलु चेट्टियार ने सरकार से इसे राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने का अनुरोध किया था। यह श्रमिकों और कामगारों के प्रयासों और कार्यों को सम्मान देने का प्रतीक था। भारत में इस दिन को कामगार दिवस, कामगार दिवस और अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के नाम से भी जाना जाता है।
1 मई को ही क्यों मनाया जाता है मजदूर दिवस?
दुनिया भर की समाजवादी और श्रमिक पार्टियों के संगठन द्वितीय अंतरराष्ट्रीय ने साल 1889 के पेरिस सम्मेलन में मजदूरों के हकों की आवाज बुलंद करने के लिए 1 मई का दिन चुना था। ये पश्चिम में औद्योगीकरण का दौर था और मजदूरों से सूर्योदय से सूर्यास्त तक काम करने की उम्मीद की जाती थी। अक्टूबर 1884 में अमेरिका और कनाडा की ट्रेड यूनियनों के संगठन फेडरेशन आॅफ आॅगेर्नाइज्ड ट्रेड्स एंड लेबर यूनियन ने तय किया कि मजदूर 1 मई, 1886 के बाद रोजाना 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करेंगे। जब वो दिन आया तो अमेरिका के अलग-अलग शहरों में लाखों श्रमिक हड़ताल पर चले गए। इन विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में शिकागो था। यहां दो दिन तक हड़ताल शांतिप्रिय तरीके से चली. लेकिन तीन मई की शाम को मैकॉर्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कंपनी के बाहर भड़की हिंसा में दो मजदूर पुलिस फायरिंग में मारे गए। अगले दिन फिर दोनों पक्षों के बीच झड़पें हुईं जिनमें 7 पुलिसवालों समेत 12 लोगों को जान गँवानी पड़ी. इसी वजह से द्वितीय अंतराराष्ट्रीय ने 1 मई का दिन चुना था. शुरूआत में दुनिया भर के मजदूरों से सिर्फ रोजाना 8 घंटे काम की मांग को लेकर एकजुट होने के लिए कहा गया था। इसके बाद 1889 से लेकर 1890 तक अलग अलग देशों में मजदूरों ने प्रदर्शन किए. ब्रिटेन के हाइड पार्क में 1890 की पहली मई को तीन लाख मजदूरों 8 घंटे काम की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे. जैसे-जैसे वक्त बीता ये दिन श्रमिकों के बाकी अधिकारों की तरफ ध्यान दिलाने का भी एक मौका बन गया।
श्रमिक अधिकारों में बाबा साहेब का योगदान
श्रमिकों के अधिकारों की बात हो और डॉ. बी.आर. अंबेडकर (बाबा साहेब) का जिक्र न हो, तो वह चर्चा अधूरी है। भारत में आज एक मजदूर जो भी बुनियादी हक (8 घंटे काम, बीमा, पेंशन) भोग रहा है, उसका 90% श्रेय बाबा साहेब को जाता है। जब वे 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारी परिषद में लेबर मेंबर (श्रम मंत्री) थे, तब उन्होंने भारत के श्रम कानूनों में क्रांतिकारी बदलाव किए। उनके प्रमुख योगदान-
1. 12 घंटे से घटाकर 8 घंटे काम (काम के घंटों का निर्धारण)
भारत में पहले मजदूरों को दिन में 12 से 14 घंटे काम करना पड़ता था। बाबा साहेब ने ही नवंबर 1942 में परिषद के 7वें सत्र में फैक्ट्री कानून में संशोधन करवाकर इसे 8 घंटे निर्धारित किया। उनका मानना था कि मजदूर कोई मशीन नहीं है, उसे आराम और बौद्धिक विकास के लिए भी समय चाहिए।
2. समान कार्य के लिए समान वेतन
बाबा साहेब ने उस दौर में महिला और पुरुष श्रमिकों के बीच वेतन के अंतर को देखा था। उन्होंने यह सिद्धांत लागू करवाया कि लिंग के आधार पर वेतन में भेदभाव नहीं होना चाहिए। आज हमारे संविधान का अनुच्छेद 39(डी) इसी सोच की उपज है।
3. महिला श्रमिकों के लिए विशेष प्रावधान
बाबा साहेब ने महिलाओं के लिए जो कानून बनाए, वे आज भी मिसाल हैं:
मातृत्व लाभ (मैटेरनिटी लीव): उन्होंने सुनिश्चित किया कि गर्भवती महिला श्रमिकों को सवैतनिक अवकाश (पेड लीव) मिले।
महिला कल्याण कोष: खदानों और फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अलग से फंड बनवाया।
4. लेबर यूनियंस और स्ट्राइक का अधिकार
बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने ट्रेड यूनियन अधिनियम में संशोधन किया ताकि मजदूर अपनी मांगें संगठित होकर रख सकें। उनका कहना था कि ‘हड़ताल करना मजदूरों का एक लोकतांत्रिक अधिकार है’ यदि उनकी वाजिब माँगें नहीं मानी जा रही हैं।
5. बीमा, पेंशन और भविष्य निधि
आज हम जो ईएसआई (कर्मचारी राज्य बीमा) और पीएफ (भविष्य निधि) देखते हैं, उसकी रूपरेखा बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने ही तैयार की थी। उन्होंने एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस और कोल माइंस प्रोविडेंट फंड जैसे कानून बनवाए ताकि बुढ़ापे या बीमारी में मजदूर लाचार न हो।
6. तकनीकी शिक्षा और स्किलिंग
बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने लेबर डिपार्टमेंट के तहत तकनीकी प्रशिक्षण योजनाएं शुरू कीं ताकि भारतीय मजदूर सिर्फ हाथ का मजदूर न रहे, बल्कि तकनीकी रूप से कुशल बने। उन्होंने मेधावी छात्रों को विदेश भेजने की परंपरा भी शुरू की ताकि वे आधुनिक इंजीनियरिंग सीख सकें।
7. पानी और बिजली
मजदूरों और उद्योगों के विकास के लिए उन्होंने दामोदर घाटी परियोजना और हीराकुंड बांध जैसे प्रोजेक्ट्स की नींव रखी। उनका मानना था कि जब तक सस्ती बिजली और पानी नहीं होगा, तब तक औद्योगीकरण नहीं होगा और बिना औद्योगीकरण के मजदूरों का जीवन स्तर नहीं सुधरेगा।
बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का संघर्ष सिर्फ दलितों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए था जिसका शोषण हो रहा था। आज जो युवा आस्था के जाल में फंसकर वास्तविक मुद्दों को भूल रहे हैं, बाबा साहेब उनके लिए एक चेतावनी की तरह हैं। उन्होंने हमेशा संवैधानिक नैतिकता को धार्मिक कट्टरता से ऊपर रखा। बाबा साहेब ने हमें जो कानून दिए, वे आज भी बहुत आधुनिक हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आज के श्रमिक और युवा उन कानूनों को तो जानते हैं, लेकिन उस तर्क और संघर्ष को भूल गए हैं जिसकी वजह से ये अधिकार मिले।
आज के दौर में मजदूर दिवस की जरूरत?
दुनिया में सबसे ज्यादा बंधुआ मजदूर भारत में हैं। विश्व गुलामी सूचकांक की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में भारत में 80 लाख लोग आधुनिक गुलामी में जी रहे थे। यानी औसतन एक हजार भारतीयों में से छह को अपने काम का मेहनताना नहीं मिल रहा था. हालांकि भारत सरकार ने इन आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं। गुडवीव इंटरनेशनल नाम की एक संस्था के साल 2020 के सर्वे के मुताबिक महामारी की वजह से मजदूरों के कर्ज। में फंसने का जोखिम तीन गुना बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार साल 2016 में दुनिया भर में 4 करोड़ से ज्यादा लोग बंधुआ मजदूरी का शिकार थे। अनुमानों के मुताबिक इनमें से 71 फीसदी महिलाएं थीं. इस साल जारी हुई विश्व असमानता रिपोर्ट की मानें तो भारत में श्रम से होने वाली कुल कमाई का सिर्फ 18 प्रतिशत हिस्सा ही महिलाओं के हाथ आता है। आईएलओ की साल 2021 की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में बाल मजदूरों की तादाद बढ़कर 16 करोड़ हो गई है। रिपोर्ट ये भी आगाह करती है कि कोविड-19 महामारी के असर से इस संख्या में साल 2022 के अंत तक 90 लाख तक का इजाफा हो सकता है। साल 2011 जनगणना के हवाले से संगठन का अंदाजा है कि देश में 5-14 साल की उम्र के बच्चों में से 3.9 प्रतिशत मजदूरी करते हैं। सरकार के अपने आँकड़े बताते हैं कि देश के कुल श्रमिकों में से 93 फीसदी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं. यानी उनके लिए न्यूनतम वेतन जैसी सामाजिक सुरक्षा के हक पाना और मुश्किल है। अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के संयुक्त सचिव विक्रम सिंह कहते हैं, देश में करोड़ों शहरी असंगठित मजदूर और ग्रामीण खेत मजदूर है जो किसी भी कानून के दायरे में नहीं आते. आज तक हम खेत मजदूरों के लिए एक केंद्रीय कानून नहीं बना पाए हैं। इसलिए मजदूर दिवस न केवल अधिक प्रासंगिक हो गया है बल्कि हमारी पीढ़ी की जिÞम्मेदारी बन गया है।





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