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उत्तराखण्ड के पर्वतीय अंचल में कुमाऊँ की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में 26 अगस्त 1887 को श्रावण पूर्णिमा के दिन हरीप्रसाद टम्टा का जन्म हुआ था। उनके पिता गोविन्द प्रसाद टम्टा तांबे के बर्तनों व शिल्प के एक प्रतिष्ठित एवं संपन्न व्यापारी थे तथा माता का नाम गोविन्दी देवी था। परिवार में दो भाई—हरीप्रसाद व लालता प्रसाद, तथा एक बहन कोकिला देवी थीं। बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण हरीप्रसाद और उनके भाई-बहन का लालन-पालन उनके मामा कृष्ण टम्टा के संरक्षण में हुआ। मामा कृष्ण टम्टा अल्मोड़ा के एक अग्रणी व्यवसायी और समाज-सचेत व्यक्ति थे, जिनकी छत्रछाया में बालक हरीप्रसाद के भीतर सामाजिक चेतना के अंकुर फूटे। 14 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह पहल गाँव की सुसंस्कृत कन्या पन्ना देवी (पार्वती देवी) के साथ संपन्न हुआ। उस दौर में पर्वतीय समाज में दलित-शिल्पकार जातियों के लिए शिक्षा के द्वार लगभग बंद थे। इसके बावजूद उन्होंने डिग्गी बंगला स्कूल और मिशन स्कूल से अपनी प्रारंभिक व मिडिल शिक्षा पूरी की। कुशाग्र बुद्धि के धनी हरीप्रसाद ने स्वाध्याय और लगन के बल पर हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और कुमाऊँनी जैसी पाँच भाषाओं पर असाधारण अधिकार प्राप्त किया। बहुभाषाविद् और दस्तावेजी लेखन में निपुण होने के कारण ही समाज में उन्हें मुंशी की उपाधि से आदरपूर्वक पुकारा जाने लगा।
सामाजिक पृष्ठभूमि और तिरस्कार की चिंगारी
उत्तराखण्ड के पर्वतीय समाज में शिल्पकारों (लोहार, टम्टा, औजी, बादी, कोली आदि) की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें सामाजिक रूप से अछूत मानकर डोम या कोली जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता था। सवर्णों के गाँवों और रास्तों से गुजरते समय उन्हें कई तरह के बंधनों का पालन करना पड़ता था; मंदिरों में प्रवेश, जनेऊ धारण करने और यहाँ तक कि शादी-ब्याह में डोली-पालकी का उपयोग करने पर भी कठोर पाबंदी थी। इसके साथ ही कुली-बेगार और बेगारी की सबसे अमानवीय मार भी इन्हीं वर्गों पर पड़ती थी। आर्थिक रूप से संपन्न होने के बावजूद मुंशी हरीप्रसाद टम्टा को भी इस जातीय दंभ का कड़वा घूँट पीना पड़ा। 1911 में जॉर्ज पंचम के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में अल्मोड़ा में एक भव्य राजकीय दरबार सजाया गया था। उस आयोजन के पंडाल और मंच की साज-सज्जा के लिए कपड़े हरीप्रसाद टम्टा के परिवार ने ही उपलब्ध कराए थे। जब हरीप्रसाद अपने मामा कृष्ण टम्टा के साथ मंच के पास पहुँचे और कुर्सियों पर बैठने लगे, तभी दो सवर्ण व्यक्तियों ने आकर उन्हें अपमानित करते हुए कुर्सी से उठा दिया। इस घटना ने उनके मानस पर गहरा आघात किया। वर्षों बाद 6 मई 1935 को अपने पत्र समता के संपादकीय में इस घटना को याद करते हुए उन्होंने लिखा था:
‘‘25 वर्ष का लंबा अरसा गुजर जाने के बाद भी मैं सन 1911 के उस वाक्ये को नहीं भूल पाया हूँ। उस अपमान ने मुझे अहसास कराया कि धन और प्रतिष्ठा भी जातीय संकीर्णता के आगे बेबस हैं, जब तक कि पूरा समाज संगठित होकर अपने आत्मसम्मान की लड़ाई न लड़े।’’
संस्थागत संगठन: टम्टा सुधारक सभा से कुमाऊँ शिल्पकार सभा तक
अपमान की उस आग को उन्होंने संगठित आंदोलन में बदलने की ठानी। उन्होंने समझ लिया था कि बिखरे हुए दलित समाज को जब तक एक साझा मंच और पहचान नहीं मिलेगी, तब तक सामाजिक न्याय असंभव है।
टम्टा सुधारक सभा (1905): मुंशी जी ने सबसे पहले 1905 में टम्टा सुधारक सभा का गठन किया, जिसका उद्देश्य युवाओं में शिक्षा का प्रसार, कुटीर उद्योगों की स्थापना, स्वास्थ्य जागरूकता और नैतिक चेतना का विकास करना था।
कुमाऊँ शिल्पकार सभा (1914): आंदोलन के दायरे को व्यापक बनाते हुए 1914 में इसका नाम बदलकर कुमाऊँ शिल्पकार सभा कर दिया गया। मुंशी हरीप्रसाद टम्टा इसके आजीवन अध्यक्ष रहे।
शिल्पकार शब्द की ऐतिहासिक मान्यता: पर्वतीय अंचल के दलितों के लिए प्रयोग किए जाने वाले अपमानजनक शब्दों को खारिज करते हुए मुंशी जी ने उनकी कला, श्रम और निर्माण-कौशल को रेखांकित करते हुए शिल्पकार शब्द को वैधानिक मान्यता दिलाने का अभियान छेड़ा। 1913 में जब लाला लाजपत राय अल्मोड़ा आए, तो उनके सामने भी यह विषय रखा गया। मुंशी जी के अनवरत ज्ञापनों और कानूनी संघर्षों के फलस्वरूप 1926 में ब्रिटिश सरकार ने सरकारी गजट और अभिलेखों में पर्वतीय दलित जातियों के लिए शिल्पकार शब्द के प्रयोग को आधिकारिक व कानूनी मान्यता प्रदान की। यह उत्तर भारत के सामाजिक इतिहास में पहचान और अस्मिता की एक युगांतरकारी जीत थी।
शिक्षा का प्रसार, सामाजिक अधिकार और विरोध
मुंशी जी का मानना था कि शिक्षा ही दास्तान की बेड़ियों को काटने का सबसे अचूक अस्त्र है।
=उन्होंने अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों में शिल्पकार बच्चों के लिए पाठशालाएं खुलवाईं।
=उन्होंने सरकार से अनिवार्य व नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा, शिल्पकारों के लिए अलग छात्रावास और पंजाब प्रांत की तर्ज पर भूमिहीन शिल्पकारों को कृषि भूमि आवंटित करने की पुरजोर माँग की।
=सामाजिक स्तर पर उन्होंने जनेऊ आंदोलन का समर्थन कर सवर्णों के धार्मिक एकाधिकार को चुनौती दी, यद्यपि उनका निजी दृष्टिकोण रूढ़ियों से परे तार्किक मानववाद पर आधारित था।
=कुमाऊँ में प्रचलित क्रूर कुली-बेगार प्रथा के वे प्रबल विरोधी थे, क्योंकि इस प्रथा का सबसे अमानवीय बोझ शिल्पकार मजदूरों को ही ढोना पड़ता था।
आर्थिक आत्मनिर्भरता: कुमाऊँ की पहली मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी
मुंशी हरीप्रसाद टम्टा केवल कागजी प्रस्तावों के नेता नहीं थे; वे आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रणेता थे।
=जब पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात का एकमात्र साधन पैदल चलना या खच्चर थे, तब उन्होंने कुमाऊँ मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी की स्थापना की। अल्मोड़ा से नैनीताल और काठगोदाम-हल्द्वानी के बीच मोटर गाड़ियाँ चलाने वाले वे कुमाऊँ के अग्रणी व्यक्तियों में से एक थे।
=उन्होंने हल्द्वानी में मोटर ड्राइविंग ट्रेनिंग सेंटर खोला, जहाँ सैकड़ों शिल्पकार युवाओं को वाहन चालक और मैकेनिक का प्रशिक्षण देकर सीधे रोजगार से जोड़ा गया।
=प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध और 1907-1935 के अकाल व महामारियों (इन्फ्लुएंजा) के समय उन्होंने सस्ता गल्ला डिपो खुलवाए और स्वयंसेवकों की टोली बनाकर गाँव-गाँव दवाइयाँ व राहत सामग्री पहुँचाई।
डॉ. अम्बेडकर और टम्टाजी
1932 में इंग्लैंड के प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड ने भारत की समस्याओं को जानने हेतु भारत के कुछ नेताओं को जाति के आधार पर लंदन में आमंत्रित किया। इस सभा में डॉ.अंबेडकर के आने पर गांधीजी एण्ड पार्टी को आपत्ति हुई। गांधीजी ने प्रधानमंत्री जी से पूछा आपने डॉ.अंबेडकर को क्यों आमंत्रित किया? प्रधानमंत्री जी ने उत्तर दिया क्योंकि डॉ. अंबेडकर अछूतों के सबसे बड़े नेता हैं। पटेल आदि नेताओं ने कहा हिंदुओं के नेता गांधीजी है न कि डॉ. अंबेडकर। यह सूचना सारे भारत में आग की तरह फैल गई। स्वामी अछूतानंद एवं टम्टाजी ने सेंकड़ों टेलीग्राम प्रधानमंत्री जी के पास भिजवाए जिसमें लिखा था कि अछूतों के एकमात्र नेता डॉ. अंबेडकर है न कि गांधीजी। पूना पैक्ट में भी टम्टाजी ने डॉ. अंबेडकर का साथ दिया। तब से दोनों एक दूसरे के मित्र बन गए।
कम्युनल अवॉर्ड और यरवदा जेल का अनशन: अगस्त 1932 में जब ब्रिटिश सरकार ने कम्युनल अवॉर्ड (सांप्रदायिक पंचाट) के तहत अछूतों को दोहरा मताधिकार और पृथक निर्वाचक मंडलप्रदान किया, तो इसके विरोध में महात्मा गांधी यरवदा जेल (पुणे) में आमरण अनशन पर बैठ गए। उस अत्यंत तनावपूर्ण और संवेदनशील दौर में जब डॉ. अम्बेडकर पर चौतरफा राजनीतिक दबाव था, मुंशी हरीप्रसाद टम्टा चट्टान की तरह डॉ. अम्बेडकर के संवैधानिक रुख के साथ खड़े रहे। उन्होंने पर्वतीय शिल्पकारों की ओर से डॉ. अम्बेडकर के अधिकारों की लड़ाई को पूर्ण समर्थन दिया। गांधीजी के प्राणों की रक्षा और सामाजिक सद्भाव के लिए जब डॉ. अम्बेडकर ने पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन और आरक्षित सीटों पर समझौता किया, तब टम्टाजी ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे दलितों की राजनीतिक पहचान की ऐतिहासिक मान्यता माना। इस घटनाक्रम के बाद डॉ. अम्बेडकर और मुंशी हरीप्रसाद टम्टा के बीच आजीवन वैचारिक संवाद और घनिष्ठ मित्रता स्थापित हो गई।
‘समता’ साप्ताहिक पत्र: डॉ. अम्बेडकर के आंदोलनों (विशेषकर उनके पत्र मूकनायक, बहिष्कृत भारत और जनता) से प्रेरित होकर मुंशी हरीप्रसाद टम्टा ने अनुभव किया कि जब तक समाज के पास अपनी पीड़ा और विचारों को व्यक्त करने के लिए अपना स्वतंत्र प्रेस नहीं होगा, तब तक बौद्धिक और वैचारिक मुक्ति संभव नहीं है।
स्थापना और उद्देश्य: शिल्पकार समाज में सदियों से जमी गुलामी की मानसिकता को तोड़ने, सामाजिक-राजनीतिक आत्मगौरव जगाने और शैक्षणिक चेतना का प्रसार करने के उद्देश्य से टम्टाजी ने 1935 में अल्मोड़ा से साप्ताहिक समाचार पत्र समता का संपादन और प्रकाशन आरंभ किया।
पत्र का प्रभाव और संदेश
हीनभावना का उन्मूलन: समता ने शिल्पकारों को यह अहसास कराया कि वे हीन या अछूत नहीं, बल्कि श्रम और निर्माण के सच्चे शिल्पी हैं।
अधिकारों की मुखर आवाज: पत्र के माध्यम से कुली-बेगार, छुआछूत, भूमिहीनता, डोली-पालकी प्रतिबंध और शिक्षा से वंचना जैसे ज्वलंत मुद्दों पर शासन और सवर्ण समाज को सीधे कटघरे में खड़ा किया गया।
संवैधानिक व राजनीतिक चेतना: समता ने संयुक्त प्रांत की विधानसभा से लेकर लंदन तक चल रही राजनीतिक गतिविधियों और डॉ. अम्बेडकर के विचारों को पर्वतीय अंचल के दूर-दराज गाँवों तक पहुँचाया।
अछूतों की दुर्दशा के कारण
जब टम्टाजी 16 वर्ष के ही थे। तभी उन्हें भली-भांति अनुभव हो गया था कि अछूतों की दुर्दशा का मुख्य कारण अशिक्षा, संगठन का अभाव और आर्थिक अभाव (धन, धरती, खेत आदि) है। सबसे पहले उन्होंने शिक्षा पर बल दिया। उन्होंने कहा कोई भी व्यक्ति व समाज बिना शिक्षा के उन्नति व सम्मान प्राप्त कर ही नहीं सकता। विभिन्न विषयों का ज्ञान शिक्षा के द्वारा ही संभव है। ब्रिटिश सरकार से अछूतों के बच्चों की पढ़ाई के लिए अधिक से अधिक विद्यालय खोलने एवं कुछ विद्यालयों में अछूत अध्यापक रखने की मांग की गई। जब टम्टाजी 1946-1952 में नगरपालिका अल्मोड़ा के अध्यक्ष बने। उन्होंने शिल्पकार (अछूत) बच्चों की पढ़ाई का विशेष ध्यान रखते हुए अपने क्षेत्र में 150 प्राथमिक विद्यालय एवं रात्रि विद्यालय भी खुलवाए। उनके लिए छात्रवृत्ति का भी प्रबंध करवाया गया। अछूतों की आर्थिक स्थिति बहुत चिंताजनक थी, अपनी कोई जमीन, संपत्ति न होने के कारण उच्चवर्ण लोग अपमानित करते थे। इस महत्वपूर्ण कमी को दूर करने के लिए टम्टाजी ने ब्रिटिश सरकार से 30000 एकड़ जमीन डिस्फॉरेस्ट कराकर शिल्पकार समाज में वितरित करा दी गयी। समाज की उन्नति एवं सरकार से अपनी मांग मनवाने के लिए एक मजबूत संगठन की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति हेतु टम्टाजी ने बिखरी हुई 51 अछूत जातियों को एक सूत्र में पिरोकर शिल्पकार शब्द (जाति) में समावेश करा दिया। यह टम्टाजी की बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
अकाल व महामारी: टम्टाजी जहाँ एक कुशल प्रशासक, राजनीतिज्ञ व समाज सेवी थे, वहीं उनके ह्रदय में बीमार व असहायो के प्रति करूणा व उदारता की भावना भी थी। सन 1960 तो 1945 में उत्तराखंड में भयंकर अकाल पड़ा। टम्टाजी ने कुमाऊं क्षेत्र के गाँव में सरकारी सस्ते अनाज की दुकानें खुलवाई। इससे लोग भुखमरी से बच गए। इसी तरह सन 1944 में इंफ्लुएंजा नामक संक्रामक रोग फैला। इस बीमारी से बचने हेतु टम्टाजी ने शीघ्र ही 1500 स्काउटों की नियुक्ति की और उनको दवा देकर ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों की सेवा के लिए भेजा। ग्रामीण जनता उनके इस पुनीत कार्य से लाभान्वित हुई। क्षेत्र के लोग टम्टाजी की उदारता से बहुत प्रभावित हुए।
महिला शिक्षा पर टम्टा जी के विचार
उत्तराखंड देश के अन्य भागों से अधिक पिछड़ा, अंधविश्वासी और परंपरावादी है। इसके कारण उत्तराखंडवासी प्राय: कहा करते थे, लड़कियां पराया धन होती है। लेकिन टम्टाजी प्रगतिशील विचारों के होने के कारण स्त्री शिक्षा के पक्के हिमायती थे। उनका मानना था लड़की शिक्षित होने से परिवार, आदर्श परिवार बन जाता है। आदर्श परिवार ही एक आदर्श नागरिक का निर्माण कर सकता है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए टम्टा जी ने अपने क्षेत्र में सरकार के द्वारा लड़कियों के लिए स्कूल खुलवाए। उनके प्रयास से 1930 में उनकी भांजी ने हाईस्कूल, 1934 में स्नातक (उत्तराखंड में प्रथम महिला स्नातक) और 1935 में मनोविज्ञान से एम. ए. किया।
महिला सशक्तिकरण: शिल्पकार समाज में अशिक्षा के कारण बाल विवाह, बेमेल विवाह होते रहते थे। विधवा स्त्री को देखना पाप समझा जाता था। टम्टाजी इन प्रथाओं के विरोधी थे। वे चाहते थे समाज में विधवाओं का अपमान न हो, विधवा समाज पर भार न बने, आत्मनिर्भर बने, उनकी अपनी नियमित आय हो, इस विचार को पूरा करने के लिए टम्टाजी ने रोजगार गृह खुलवाएं। सिलाई, बुनाई, कटाई के लिए ट्रेनिंग सेंटर खुलवाए ताकि उनकी नियमित आय हो सके। जो व्यक्ति अपने समाज में प्रतिष्ठित, शांतिप्रिय और न्यायप्रिय हो और साथ ही साथ अंग्रेज सरकार के कार्यों में सहयोग करता रहा हो। ऐसे व्यक्ति को ब्रिटिश सरकार सम्मानित करती थी। सरकार की दृष्टि से टम्टाजी ऐसे ही व्यक्ति थे। इसलिए उन्हें 1935 में स्पेशल मजिस्ट्रेट नियुक्त किया। रायबहादुर उपाधि से सम्मानित किया। अपने समाज के प्रतिष्ठित और लोकप्रिय नेता होने के कारण टम्टाजी को 1947 में गोंडा जिला, उत्तर प्रदेश से विधान सभा का सदस्य निर्विरोध निर्वाचित किया गया।
महादानी: टम्टाजी ने 1903 से ही समाज सेवा का कार्य प्रारंभ कर दिया था। इसके लिए अनेक कार्यक्रमों का आयोजन करना पड़ता था। अधिकांश कार्यक्रमों में होने वाले व्यय को वह स्वयं ही वहन करते थे। अकाल के समय अनाज आदि का प्रबंध करके लोगों को जीवन दान दिया। महामारी के दौरान बीमारी के लिए दवा आदि का प्रबंध करवाया। 1930 में अल्मोड़ा में हाईस्कूल नहीं था। हाई स्कूल खोलने के संबंध में एक प्रबंध समिति का गठन किया गया। समिति को कहीं जगह नहीं मिली। निराश होकर वे टम्टाजी के पास गए उनसे अनुरोध किया। टम्टाजी के पास मुख्य बाजार में जमीन पड़ी थी उस पर पांच कमरे बना भी चुके थे। समिति के अनुरोध पर उन्होंने जगह देना स्वीकार कर लिया और छात्रों के खेलने के लिए कि स्टेडियम भी बनवा कर दिया। शिल्पकार समाज के जीवन से संबंधित ऐसा कोई भी पहलू शेष नहीं रहा जिस पर टम्टाजी का ध्यान न गया हो। उत्तराखंड विशेषकर कुमाऊं क्षेत्र में जो परिवर्तन आया है उसका श्रेय मुंशी रायबहादुर हरिप्रसाद टम्टा जी को ही जाता है उनकी उपलब्धियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि वह शिल्पकार समाज के एक कर्मठ, समाजसेवी, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी, दानवीर एवं लोकप्रिय नेता थे।
निधन: जीवन के अंतिम पड़ाव तक वे समाज के अंतिम व्यक्ति के अधिकारों के लिए कलम, अदालत और सड़क के माध्यम से संघर्ष करते रहे। 23 फरवरी 1960 को तीर्थराज प्रयाग (इलाहाबाद) में इस महान समाज-क्रांतिकारी का निधन हुआ। मुंशी रायबहादुर हरीप्रसाद टम्टा ने उस दौर में हिमालयी समाज में सामाजिक चेतना, शिक्षा और समानता की मशाल जलाई, जब छूआछूत का अंधकार सबसे गहरा था। उन्होंने पर्वतीय दलितों को हीनभावना के गर्त से निकालकर शिल्पकार नाम की गरिमा, संगठन की शक्ति और स्वाभिमान से जीने का हौसला दिया। यही कारण है कि इतिहास उन्हें उत्तराखण्ड के नवजागरण का अग्रदूत और उत्तराखण्ड का सामाजिक मुक्तिदाता मानकर श्रद्धा से स्मरण करता है।
यदि आज के समाजसेवी और नेता उनसे प्रेरणा लेकर काम करें तो बहुत हद तक देश की समस्या का समाधान हो सकता है। ऐसे कर्मयोगी, दानवीर रायबहादुर हरिप्रसाद टम्टा जी को 38वीं जयंती पर शत-शत नमन!





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