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भारतीय इतिहास, समाज-सुधार और मानवाधिकार आंदोलनों के फलक पर कुछ ऐसे विरले व्यक्तित्व अवतरित होते हैं, जिन्होंने अपनी किसी औपचारिक शिक्षा या राजसी शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि अपने अदम्य साहस, क्रांतिकारी दृष्टि और अटूट संगठन-शक्ति के बल पर एक पूरी की पूरी सड़ी-गली और पाषाणयुगीन सामाजिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। दक्षिण भारत के केरल राज्य में त्रावणकोर रियासत की पावन भूमि पर जन्में महात्मा अय्यंकाली ऐसे ही महान युगदृष्टा थे। उन्होंने उस कालखंड में दलितों, वंचितों और विशेषकर पुलायार समुदाय के अधिकारों के लिए आवाज उठाई, जब छुआछूत, अस्पृश्यता और जातिगत अत्याचार अपनी सबसे विकृत और क्रूरतम अवस्था में थे। अय्यंकाली ने बिना किसी हिंसा के, लेकिन प्रत्यक्ष और कड़े प्रतिरोध के जरिए, केरल में नागरिक स्वतंत्रता, शिक्षा, श्रम अधिकारों और स्त्री अस्मिता की जो नींव रखी, उसने आधुनिक केरल के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह से बदल दिया। महात्मा अय्यंकाली का जन्म त्रावणकोर रियासत की राजधानी तिरुवनंतपुरम से लगभग 13 किलोमीटर उत्तर में स्थित वेंगनूर नामक छोटे से गाँव में 28 अगस्त 1863 को हुआ था। उनके पिता का नाम अय्यन और माता का नाम माला था। वे अपने माता-पिता की आठ संतानों में सबसे ज्येष्ठ थे। बचपन में उनका नाम कालि रखा गया था, जो पिता के नाम के साथ जुड़कर अय्यन-कालि (अय्यंकाली) बन गया। वेंगनूर आने से पहले उनका परिवार पलावर थारावाड़ का निवासी था, और उनके पिता ने अपने पैतृक स्थान की इस पहचान को अपने नाम के साथ हमेशा सहेज कर रखा था। उनका परिवार दक्षिण भारत की सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर मानी जाने वाली अछूत जाति पुलायार (पुलाया) से संबंध रखता था। बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक त्रावणकोर में पुलायारों की हैसियत व्यावहारिक रूप से भू-दासों जैसी थी। सवर्ण जमींदार, विशेषकर नैय्यर समुदाय के लोग, अपनी मर्जी से किसी भी पुलायार को बेगार में जोत लेते थे। सुबह से शाम तक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद उन्हें पारिश्रमिक के रूप में बामुश्किल 600 ग्राम घटिया किस्म का धान या चावल मिलता था। उस दौर के त्रावणकोर में जातिगत शुचिता और दृष्टि-दोष (दूरी बनाकर रखने की अस्पृश्यता) के इतने अमानवीय और घृणित नियम लागू थे कि ब्रिटिश समाजशास्त्री चार्ल्स एलेन और कैथरीन मेयो (अपनी प्रसिद्ध पुस्तक मदर इंडिया में) ने इसका प्रामाणिक उल्लेख किया है। दस्तावेजों के अनुसार:
=नैय्यर, नंबूदरी ब्राह्मण से मिल सकता था परंतु उसे छू नहीं सकता था।
=ईझवा (चोवन) जाति के व्यक्ति को नंबूदरी से 36 कदम की दूरी बनाकर रखनी पड़ती थी।
=इसके विपरीत, पुलायार जिसकी स्थिति एक दास जैसी थी, को नंबूदरी से 96 कदम दूर खड़े होकर बात करनी पड़ती थी।
=नैय्यर से मिलते समय चोवन को 12 कदम दूर रहने का प्रावधान था, जबकि पुलायार को नैय्यर से 66 कदम की दूरी रखनी पड़ती थी।
=सार्वजनिक रास्तों पर चलते समय अछूतों को विशेष आवाज लगानी पड़ती थी ताकि सवर्ण उनकी छाया या दृष्टि से भी अपवित्र होने से बच सकें।
इस घोर अंधकार के बीच अय्यंकाली का परिवार थोड़ा भिन्न था। उनके पिता अय्यन अत्यंत परिश्रमी थे। एक उदार जमींदार ने जंगल को साफ कर जमीन खेती योग्य बनाने के उनके काम से प्रसन्न होकर उन्हें पाँच एकड़ जमीन भेंट कर दी थी। पुलायार जाति के लिए यह एक अभूतपूर्व घटना थी। उस जमीन पर स्वतंत्र खेती करने के कारण अय्यंकाली के परिवार की आर्थिक स्थिति अन्य जाति-बंधुओं की तुलना में थोड़ी बेहतर थी, और उन्हें ऊझीयम (सामंती बेगार प्रथा) की मार नहीं झेलनी पड़ी।
बचपन के अनुभव, आत्मसम्मान का बोध और किशोरावस्था का विद्रोह
मुक्त पारिवारिक परिवेश में पले-बढ़े अय्यंकाली का बचपन सामान्य पुलायार बच्चों से कुछ अलग था। बेहतर स्थिति के कारण उनके बाल-सखाओं में कुछ तथाकथित उच्च जाति के बच्चे भी शामिल थे। लेकिन जाति-व्यवस्था का क्रूरतम चेहरा जल्द ही उनके सामने आ गया। एक दिन जब वे सवर्ण बच्चों के साथ फुटबॉल खेल रहे थे, तो गेंद उछलकर एक नैय्यर के आँगन में चली गई। गृहस्वामी गेंद को देखकर आग-बबूला हो गया और उसने अय्यंकाली को ऊंची जाति के बच्चों के साथ खेलने पर कड़ी फटकार लगाई। इस अपमान ने बाल-अय्यंकाली के मन में गहरी चोट पहुँचाई और उन्होंने उसी क्षण संकल्प लिया कि वे कभी किसी सवर्ण से दोस्ती नहीं करेंगे। इसके बाद उन्होंने अपनी जाति के लड़कों को जोड़ना शुरू किया और उन्हें संगठित कर एक टीम तैयार की, जिससे उनके भीतर बचपन से ही एक स्वाभाविक नायकत्व उभरने लगा। किशोरावस्था में एक झगड़े के दौरान उन्होंने एक ऊंची जाति के लड़के की पिटाई कर दी। दास जैसी हैसियत वाले पुलायार द्वारा सवर्ण पर हाथ उठाना उस दौर में अकल्पनीय था। माता-पिता डर के मारे कांप उठे, किंतु निडर अय्यंकाली ने बेपरवाह होकर कह दिया कि वे उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उम्र बढ़ने के साथ-साथ लोकगीतों, नाटकों और रचनात्मकता में उनकी रुचि बढ़ी। वे तमिल और मलयाली मिश्रित भाषा में सामाजिक आक्रोश और स्वाधीनता के गीत रचने लगे। उनके मित्र उन्हें आदर से उरपिल्लई (प्रिय) या मूथपिल्लई (ज्येष्ठ) कहते थे। उनके शरीर-सौष्ठव और निडर स्वभाव को देखते हुए उन्होंने अपने दल को अनुशासित और मजबूत बनाने के लिए एक कलारीपयट्टू (केरल की पारंपरिक मार्शल आर्ट) प्रशिक्षक की सेवाएँ लीं और अपने साथियों को आत्मरक्षा के दांव-पेच सिखाए। 25 वर्ष की आयु में उनका विवाह चेल्लम्मा से हुआ, जिनसे उनके सात बच्चे हुए।
1893 की ऐतिहासिक विल्लुवंडी यात्रा (बैलगाड़ी विद्रोह)
सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते ही अय्यंकाली के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुलायारों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार दिलाना था। उन दिनों अछूतों के लिए मुख्य राज-मार्गों पर चलना, अच्छे कपड़े पहनना और बैलगाड़ी रखना प्रतिबंधित था। वर्ष 1893 में 30 वर्ष की आयु में अय्यंकाली ने इस सदियों पुरानी व्यवस्था को सीधी चुनौती देने का फैसला किया। उन्होंने दो हट्टे-कट्टे सफेद बैल और एक सजी-धजी बैलगाड़ी (विल्लुवंडी) खरीदी। बैलों के गले में पीतल की बड़ी घंटियाँ बाँधीं। स्वयं उन्होंने सवर्णों के विशेषाधिकार वाले परिधान—सफेद धोती, कुर्ता, पगड़ी और चादर—धारण किए। इसके बाद वे वेंगनूर से तिरुवनंतपुरम के मुख्य राज-मार्ग पर बैलगाड़ी दौड़ाते हुए निकल पड़े। घंटियों की खनक सुनते ही सवर्णों में खलबली मच गई। बलरामपुरम के पास जब हथियारबंद सवर्णों ने उनका मार्ग रोककर पूछा कि उन्हें चादर ओढ़ने और गाड़ी पर बैठने की इजाजत किसने दी, तो अय्यंकाली ने एक पल की भी देर किए बिना अपनी दरांती (कृषि हथियार) तान ली और तमतमाए चेहरे के साथ गरजकर कहा- ‘अगर किसी ने भी मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की, तो मेरा यह हथियार उसे मजा चखाएगा।’ दासों की तरह गर्दन झुकाकर जीने वाले समाज का यह खुला और सशस्त्र प्रतिरोध देखकर विरोधी सहमकर पीछे हट गए। इस विल्लुवंडी यात्रा ने दलितों के मन से सदियों का डर हमेशा के लिए मिटा दिया। यह डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के महाड़ सत्याग्रह से कई दशक पूर्व का भारत का पहला और सबसे प्रखर नागरिक अधिकार आंदोलन था। इसके बाद त्रिवेंद्रम से पुत्तन बाजार तक निकाले गए जुलूसों और संघर्षों के जरिए सवर्णों के एकाधिकार को पूरी तरह तोड़ दिया गया।
शिक्षा की क्रांति और साधु जन परिपालन संगम अय्यंकाली भली-भांति जानते थे कि बिना शिक्षा के किसी भी समाज की मुक्ति असंभव है। यद्यपि वे स्वयं औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थे, किंतु वे नहीं चाहते थे कि उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भी अंधेरे में रहें।
पहला स्कूल और विरोध: वर्ष 1904 में उन्होंने वेंगनूर में दलित बच्चों के लिए पहला निजी स्कूल खोला। परंतु सवर्णों से यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने उस स्कूल को जलाकर तहस-नहस कर दिया।
साधु जन परिपालन संगम: इस संघर्ष को सांस्थानिक और मजबूत रूप देने के लिए उन्होंने 1907 में साधु जन परिपालन संगम नामक संस्था की स्थापना की। इसके माध्यम से शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुधार का अभियान चलाया गया। संस्था के संचालन की जिम्मेदारी उनके रिश्तेदार और शिक्षक थॉमस वाडियार को दी गई। संगठन के खर्च के लिए दलित महिलाओं ने पिडियारी (मुट्ठी भर चावल रोज बचाकर जमा करना) की अनूठी प्रथा शुरू की।
उरूट्टमबलम स्कूल प्रवेश और पुलायार विद्रोह (1910-1914): औपनिवेशिक शिक्षा निदेशक मिशेल के प्रयासों से 1910 में दलितों के स्कूल प्रवेश का आदेश जारी हुआ, किंतु स्थानीय जमींदारों ने इसे रोक दिया। अंतत: 1 मार्च 1910 को अय्यंकाली पुजारी अय्यन की पाँच वर्षीय पुत्री पंचमी और अन्य बच्चों को लेकर बलरामपुरम के उरूट्टमबलम स्कूल पहुँचे। वहाँ भयंकर हिंसा भड़की, दलितों की बस्तियाँ जलाई गईं और सात दिनों तक धुआँ उठता रहा। इस ऐतिहासिक घटना को पुलायार विद्रोह कहा जाता है।
पत्रकारिता और वैचारिक विरोध: उस दौर के तथाकथित प्रबुद्ध और प्रगतिशील माने जाने वाले लोग भी इसके विरोध में थे। स्वदेशाभिमानी के संपादक के. रामकृष्ण पिल्लई ने अपने पत्र में लिखा कि दलित बच्चों को सवर्ण बच्चों के साथ पढ़ाना ‘घोड़े और भैंस को एक ही गाड़ी में जोतने जैसा है।’ परंतु अय्यंकाली के अडिग संघर्ष और शिक्षक परमेश्वरन पिल्लई जैसे प्रगतिशील लोगों के साहस के बल पर आखिरकार दलित विद्यार्थियों के प्रवेश का रास्ता साफ हुआ। 1913-16 के दौरान पुलायार विद्यार्थियों की संख्या में सीधे 600 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
भारत की पहली संगठित कृषि मजदूर हड़ताल
अय्यंकाली केवल शिक्षा के पैरोकार नहीं थे, बल्कि वे मजदूरों के भी मसीहा थे। जब सवर्ण जमींदारों ने दलित बच्चों को स्कूल भेजने के कारण मजदूरों को सताना और बेगार थोपना बंद नहीं किया, तब अय्यंकाली ने एक ऐसा आर्थिक हथियार उठाया जो रूस की बोल्शेविक क्रांति से भी एक दशक पहले का भारत का पहला संगठित श्रमिक आंदोलन था। वर्ष 1907 में पुलायार खेतिहर मजदूरों ने घोषणा कर दी कि जब तक उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश और उनके मानवाधिकार नहीं मिलते, वे जमींदारों के खेतों में एक दिन भी काम नहीं करेंगे। धान की रोपाई का समय था, खेत वीरान होने लगे और जमींदार परेशान हो गए। जब हफ्तों लंबी हड़ताल के कारण दलितों के घरों में भुखमरी की नौबत आई, तो अय्यंकाली ने विझिंजोम के मुक्कवर (मछुआरा) समुदाय से संपर्क किया। मछुआरों ने पुलायार मजदूरों को अपनी नावों पर काम और भोजन में हिस्सा दिया। बौखलाए जमींदारों ने जब बस्तियों पर हमले किए, तो अय्यंकाली की प्रशिक्षित टुकड़ियों ने भी कड़ा जवाब दिया। अंतत: जमींदारों और त्रावणकोर सरकार को झुकना पड़ा मजदूरी में वृद्धि, निश्चित कार्य-अवधि, झूठे मुकदमों की समाप्ति और बच्चों के स्कूल प्रवेश की सभी मांगें मान ली गईं। केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ई. एम. एस. नंबूदरीपाद ने भी बाद में स्वीकार किया था कि 1907 की इस श्रमिक हड़ताल के जरिए अय्यंकाली ने असंगठित मजदूरों को जो ताकत दी, वह आधुनिक केरल के निर्माण का आधार बनी।
कल्लुमाला आंदोलन और स्त्री अस्मिता की मुक्ति: त्रावणकोर की सामाजिक व्यवस्था में दलित महिलाओं के साथ होने वाली अमानवीयता चरम पर थी। उन्हें शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने की मनाही थी, और अपनी पहचान व गुलामी के प्रतीक के रूप में उन्हें काले ग्रेनाइट पत्थरों की भारी मालाएँ (कल्लुमाला) तथा कानों में लोहे की बालियाँ (कुनुक्कु) पहननी पड़ती थीं। अय्यंकाली ने महिलाओं की सर्वांग मुक्ति के लिए इस अपमानजनक प्रथा के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। दक्षिणी त्रावणकोर के नियत्तिंकर और पेरिनाड में उन्होंने महिलाओं को प्रेरित किया कि वे इन दासता के प्रतीकों को तोड़कर फेंक दें और सामान्य ब्लाउज धारण करें। सवर्णों ने इसके खिलाफ भयंकर दंगे किए, घर जलाए, किंतु महिलाएं पीछे नहीं हटीं। दिसंबर 1915 में कोल्लम (क्वीलोन) के ऐतिहासिक पीरंगी मैदान में अय्यंकाली ने हजारों महिलाओं की एक विशाल सभा बुलाई। मंच से उन्होंने आह्वान किया कि ‘कल्लुमाला हमारी गुलामी की बेड़ी है, इसे तोड़कर फेंक दो।’ नैय्यर सुधारक चेंगन्नाचेरी परमेश्वरन पिल्लई की उपस्थिति में हजारों महिलाओं ने एक साथ अपनी कल्लुमालाएँ उतारकर मैदान में ढेर लगा दीं। इस जन-आंदोलन के आगे झुककर सरकार और जमींदारों को महिलाओं के वस्त्र पहनने और सम्मान से जीने के अधिकार को कानूनी मान्यता देनी पड़ी।
समानांतर न्याय प्रणाली और प्रशासनिक योगदान
अहूतों को औपचारिक अदालतों में न्याय मिलना असंभव था, क्योंकि वहाँ जज और वकील सब सवर्ण होते थे। इस समस्या का समाधान करने के लिए अय्यंकाली ने वेंगनूर में समुदाय कोदाथी (सामुदायिक न्यायालय) की स्थापना की। इस वैकल्पिक न्यायतंत्र में बाकायदा जज, वकील, मुंशी और बैलिफ होते थे, और शाखा अदालतों के फैसलों के खिलाफ केंद्रीय कार्यालय में स्वयं अय्यंकाली मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपील सुनते और निष्पक्ष न्याय करते थे। इसके अलावा सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना के लिए समाजं की स्थापना की गई। उनकी जनप्रियता को देखते हुए त्रावणकोर के महाराजा श्री मूलम थिरुनाल रामवर्मा ने 1911 में उन्हें श्री मूलम प्रजा सभा (राज्य विधान परिषद) का सदस्य मनोनीत किया, और वे मृत्युपर्यंत 25 वर्षों तक इस पद पर रहे। औपनिवेशिक भारत की किसी भी राज्य विधायिका में पहुँचने वाले वे पहले दलित प्रतिनिधि थे। 4 मार्च 1912 को विधान परिषद में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने दलितों के लिए संपत्ति के अधिकार, नि:शुल्क शिक्षा, मुस्लिम छात्रों की तर्ज पर फीस में छूट, और स्वास्थ्य व तकनीकी विभागों में सरकारी नौकरियों की पुरजोर माँग उठाई। उनके निरंतर संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि सरकार ने वेंगनूर के पास विलाप्पिल्सला में 300 एकड़ और नेदुमंगाड के उझमलक्कल में 200 एकड़—कुल 500 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि 500 पुलायार परिवारों को पट्टे पर आवंटित की, जिससे वे भू-दास से अपनी जमीन के स्वतंत्र मालिक बन गए। वर्ष 1937 में जब महात्मा गांधी केरल के दौरे पर वेंगनूर आए, तो उन्होंने अय्यंकाली के महान सामाजिक कार्यों, उनके संघर्षों और उनके संगठन की ताकत को बहुत नजदीक से देखा। अय्यंकाली के कृतित्व से अभिभूत होकर गांधीजी ने उन्हें पुलायाराजा (पुलायाओं का राजा) कहकर सम्मानित किया।
महापरिनिर्वाण: 1904 से ही दमा (श्वास रोग) जैसी गंभीर बीमारी से जूझने के बावजूद अय्यंकाली ने जीवन के अंतिम क्षण तक समाज सेवा और न्याय की लड़ाई नहीं छोड़ी। 24 मई 1941 को वे पूरी तरह बिस्तर पर आ गए, और 18 जून 1941 को इस महान न्याय-योद्धा ने 77 वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा कह दिया। आयु में वे महात्मा ज्योतिराव फुले से 45 वर्ष छोटे और पेरियार ई.वी. रामासामी से 16 वर्ष बड़े थे। केरल की धरती पर उन्होंने वही क्रांतिकारी और युगान्तकारी कार्य किया, जो महाराष्ट्र में फुले और तमिलनाडु में पेरियार ने किया था। आज आधुनिक केरल में साक्षरता, महिलाओं की जागरूकता और सामाजिक समानता का जो उच्च स्तर दिखाई देता है, उसकी नींव में महात्मा अय्यंकाली का वह खून, पसीना और संघर्ष शामिल है जिसने सदियों के अंधकार को चीरकर एक नए और समतावादी केरल का सूर्योदय किया था।





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