




2026-08-22 15:01:28
भारतीय इतिहास, समाज-सुधार और बौद्धिक चेतना के फलक पर कुछ ऐसे विरले व्यक्तित्व अवतरित होते हैं, जो केवल अपने समाज के भीतर ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की वैचारिक और सांस्कृतिक धारा को एक नया मोड़ दे देते हैं। झारखंड की उपजाऊ और संघर्षशील माटी में जन्में डॉ. रामदयाल मुंडा एक ऐसे ही युगदृष्टा, शिक्षाविद्, भाषाविद्, संगीतकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रखर राजनीतिक चिंतक थे। उन्होंने आधुनिकता और पाश्चात्य शिक्षा के शिखर पर पहुँचने के बावजूद अपनी पैतृक जड़ों, लोक-संस्कृति और आदिवासी अस्मिता को कभी नहीं छोड़ा। बल्कि उन्होंने अपनी अकादमिक और वैश्विक प्रतिष्ठा का उपयोग भारत के शोषित, उपेक्षित और हाशिए पर खड़े जनजातीय समाज को उनका खोया हुआ गौरव, भाषाई अधिकार और सांस्कृतिक स्वाभिमान दिलाने के लिए किया। डॉ. रामदयाल मुंडा का संपूर्ण जीवन इस बात का जीवंत दस्तावेज है कि कैसे बौद्धिक संघर्ष और लोक-कला की ताकत से समाज की मुख्यधारा में एक महान पुनर्जागरण लाया जा सकता है। डॉ. रामदयाल मुंडा का जन्म 23 अगस्त 1939 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के बिहार (अब झारखंड) के रांची जिले के तमाड़ प्रखंड के अंतर्गत आने वाले दिउड़ी नामक एक छोटे और शांत गाँव में हुआ था। उनका परिवार एक साधारण, कृषि-कर्म में संलग्न और पारंपरिक मुंडा आदिवासी परिवार था। उनके घर का परिवेश भले ही आर्थिक रूप से संपन्न नहीं था, परंतु वहाँ श्रम की महत्ता, प्रकृति के प्रति प्रेम, संगीत की लय और सामुदायिक समरसता कूट-कूट कर भरी थी। बचपन से ही रामदयाल मुंडा के भीतर सीखने की अदम्य जिज्ञासा और कुशाग्र बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही स्थानीय विद्यालय से प्राप्त की और आगे की माध्यमिक शिक्षा खूंटी के स्कूलों में पूरी की। उस दौर में झारखंड के आदिवासी अंचलों में उच्च शिक्षा के साधन न के बराबर थे, और एक आदिवासी छात्र के लिए कॉलेज या विश्वविद्यालय तक पहुँचना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं था। परंतु अपनी जिजीविषा और मेधा के बल पर उन्होंने रांची के संत जेवियर कॉलेज और तत्पश्चात रांची विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने न केवल पारंपरिक विषयों में महारत हासिल की, बल्कि भाषा विज्ञान के क्षेत्र में अपनी गहरी रुचि के चलते शिक्षा के नए शिखरों को छूना शुरू किया। उनकी बौद्धिक प्रतिभा और भाषा विज्ञान के प्रति उनके समर्पण ने उन्हें भारत की सीमाओं से बहुत आगे निकल जाने का अवसर दिया। वे उच्च अध्ययन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिष्ठित शिकागो विश्वविद्यालय पहुँचे। 1960 और 1970 के दशक के उस दौर में किसी आदिवासी युवक का अमेरिका के सर्वोच्च विश्वविद्यालयों में जाकर भाषा विज्ञान में उच्च शोध करना और अपनी योग्यता का लोहा मनवाना एक ऐतिहासिक और दुर्लभ उपलब्धि थी। शिकागो विश्वविद्यालय से उन्होंने भाषा विज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। अमेरिका में उन्हें अकादमिक उत्कृष्टता के कारण बड़े-बड़े प्रतिष्ठित पदों और सुख-सुविधाओं वाले जीवन का आमंत्रण मिला, वे वहाँ प्रोफेसर के रूप में अपने भविष्य को अत्यंत सुरक्षित कर सकते थे, परंतु उनकी आत्मा हमेशा अपनी झारखंड की माटी, यहाँ के जंगलों, ढोल-मांदर की थाप और अपने उत्पीड़ित समाज के बीच ही बसती थी।
अमेरिका से स्वदेश वापसी: विदेश के बौद्धिक वातावरण और अकादमिक सुखों को छोड़कर डॉ. रामदयाल मुंडा ने स्वदेश लौटने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। वे भली-भांति जानते थे कि उनके समाज को डिग्रियों से ज्यादा उस वैचारिक और शैक्षणिक संस्थागत ताकत की जरूरत है, जो उनकी अपनी पहचान को बचा सके। भारत लौटने के बाद उन्होंने रांची विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू किया और भारतीय उच्च शिक्षा के इतिहास में एक अत्यंत क्रांतिकारी और दूरगामी निर्णय को मूर्त रूप दिया। डॉ. मुंडा की पहल और अकादमिक संघर्ष के परिणामस्वरूप रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग (टीआरएल) की स्थापना की गई। यह भारतीय शिक्षा प्रणाली के इतिहास में एक अभूतपूर्व मील का पत्थर था। इससे पहले भारत के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी, संस्कृत, हिंदी या अन्य सवर्ण-प्रधान भाषाओं को ही अकादमिक मान्यता और पठन-पाठन का अधिकार था। मुंडारी, संथाली, हो, खड़िया, कुड़ुख, नागपुरी और कुरमाली जैसी समृद्ध जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को बोली कहकर उपेक्षित किया जाता था और उन्हें विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम से बाहर रखा जाता था। डॉ. रामदयाल मुंडा ने टीआरएल की स्थापना करके इन उपेक्षित भाषाओं को विश्वविद्यालय स्तर पर स्नातकोत्तर और शोध का दर्जा दिलाया। उन्होंने इन भाषाओं के व्याकरण, लिपि, लोक-साहित्य और इतिहास को वैज्ञानिक तरीके से संकलित करवाया, जिससे हजारों आदिवासी विद्यार्थियों के लिए अपनी मातृभाषा में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दरवाजे खुल गए। उनकी इस अकादमिक प्रतिष्ठा और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए 1985 में रांची विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। तत्कालीन बिहार और संपूर्ण उत्तर भारत के शैक्षणिक इतिहास में यह पहला अवसर था जब एक आदिवासी बुद्धिजीवी और प्रखर विद्वान किसी विश्वविद्यालय के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर आसीन हुआ था। कुलपति के रूप में उनके कार्यकाल ने यह साबित कर दिया कि एक वंचित समाज का व्यक्ति जब सत्ता और शिक्षा के शीर्ष पर पहुँचता है, तो वह व्यवस्था को समावेशी, जन-केंद्रित और न्यायसंगत बनाने का कार्य करता है।
जे नाची से बांची: आदिवासी संस्कृति और अखड़ा का पुनर्जागरण
डॉ. रामदयाल मुंडा का यह अकादमिक और बौद्धिक पक्ष जितना मजबूत था, उनका सांस्कृतिक पक्ष उतना ही जीवंत, मोहक और क्रांतिकारी था। वे सिर्फ कागजी विद्वान नहीं थे, बल्कि वे जमीन की खुशबू से जुड़े हुए एक सच्चे लोक-नायक थे। उन्होंने आदिवासी समाज के भीतर यह गहरी चेतना फैलाई कि किसी भी जाति या समुदाय की सबसे बड़ी पूंजी उसकी संस्कृति, उसकी भाषा और उसकी कला होती है। यदि कोई समाज अपनी संस्कृति को भूल जाता है, तो वह वैचारिक रूप से मृत हो जाता है। इसी वैचारिक दर्शन से उनका वह ऐतिहासिक और अमर नारा निकला—‘जे नाची से बांची’ (जो नाचेगा, वही बचेगा)। इस साधारण से लगने वाले नारे के भीतर एक अत्यंत गहरा दार्शनिक और राजनीतिक संदेश छिपा था। डॉ. मुंडा का मानना था कि आदिवासियों का नृत्य, संगीत, लोक-गीत और कलाएं केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे उनके जीने का तरीका, प्रकृति के साथ उनका संवाद और उनके सामूहिक प्रतिरोध की भाषा हैं। जब आदिवासी नाचता है, तो वह प्रकृति के चक्र के साथ लयबद्ध होता है, वह अपनी समुदाय की एकता को मजबूत करता है और अपनी दमनकारी परिस्थितियों के खिलाफ अपनी जिजीविषा का प्रदर्शन करता है। इसलिए, जो समाज अपनी कला और नृत्य से जुड़ा रहेगा, वह अपनी अस्मिता को भी बचा पाएगा (जो नाचेगा, वही बचेगा)। उन्होंने गाँवों में विलुप्त हो रही अखड़ा (सामूहिक सांस्कृतिक मिलन स्थल और नृत्य-संगीत का केंद्र) की संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए गाँव-गाँव अभियान चलाया। जब भी डॉ. मुंडा किसी सभा या सम्मेलन में जाते थे, वे अपनी पारंपरिक पोशाक पहनते, सिर पर पगड़ी बांधते, गले में मांदर (ढोल) लटकाते और हाथ में बांसुरी या निशान लेकर खुद थिरकने लगते थे। उनके इस सहज और लोक-समर्पित रूप ने युवाओं के भीतर अपनी संस्कृति के प्रति हीनभावना को पूरी तरह धो डाला और उन्हें गर्व महसूस कराया कि वे एक महान और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के वारिस हैं। उनकी इस सांस्कृतिक धमक केवल झारखंड तक सीमित नहीं रही। उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के काल में आयोजित होने वाले बहुप्रसिद्ध भारत महोत्सव के सांस्कृतिक अभियानों में अपनी मंडली का नेतृत्व किया। उन्होंने रूस (सोवियत संघ), अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और यूरोप के कई अन्य देशों में अपनी आदिवासी सांस्कृतिक टीमों को लेकर यात्राएं कीं और दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर छऊ नृत्य, पइंका और पारंपरिक मुंडा लोक-गीतों की गूंज पैदा कर दी। दुनिया ने पहली बार देखा कि भारत की असली सांस्कृतिक विविधता महानगरों के महलों में नहीं, बल्कि झारखंड के वनांचल के इन अखड़ों और लोक-नृत्यों में बसती है।
झारखंड आंदोलन का वैचारिक और बौद्धिक नेतृत्व: डॉ. रामदयाल मुंडा केवल संस्कृति और भाषा तक सीमित नहीं रहे; वे अपने लोगों के राजनीतिक अधिकारों और उनके राज्य के अस्तित्व की लड़ाई के सबसे बड़े वैचारिक रणनीतिकार भी थे। 1970 और 1980 के दशक में जब झारखंड अलग राज्य की मांग अपने सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक दौर से गुजर रही थी, तब यह आंदोलन विभिन्न छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों, छात्र संगठनों और वैचारिक गुटों में बंटा हुआ था। आपसी फूट और वैचारिक मतभेदों के कारण आंदोलन को बार-बार झटके लग रहे थे। ऐसे नाजुक और बिखराव भरे दौर में डॉ. रामदयाल मुंडा ने एक सेतु की भूमिका निभाई। उन्होंने झारखंड समन्वय समिति (जेसीसी) के गठन में केंद्रीय और निर्णायक भूमिका निभाई। इस समिति के माध्यम से उन्होंने दर्जनों बंटे हुए आदिवासी और क्षेत्रीय संगठनों, बुद्धिजीवियों, ट्रेड यूनियन नेताओं और सामाजिक कार्यकतार्ओं को एक मंच पर लाने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने झारखंड आंदोलन को केवल एक क्षेत्रीय या भाषाई दंगे के रूप में देखने वाले मुख्यधारा के राजनीतिक दलों और केंद्र सरकार के सामने एक मजबूत, वैज्ञानिक और तार्किक बौद्धिक दस्तावेज पेश किया। उन्होंने अकादमिक मंचों से यह सिद्ध किया कि झारखंड की मांग केवल कुछ जिलों को अलग करने की नहीं है, बल्कि यह इस देश के मूल निवासियों (आदिवासियों) के जल, जंगल, जमीन, खनिज संपदा और उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता की रक्षा का एक संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्होंने मुख्यधारा के राजनेताओं और विचारकों को अपने तर्कों से यह स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया कि भारत के संघीय ढांचे में झारखंड का अलग राज्य बनना ऐतिहासिक न्याय की अनिवार्यता है। हालांकि उनके जीवनकाल में 2000 में अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ, और उस ऐतिहासिक संघर्ष की बौद्धिक जमीन तैयार करने में डॉ. मुंडा का योगदान सर्वोपरि माना जाता है।
संसदीय राजनीति, राष्ट्रीय सम्मान और मानवाधिकारों की मुखर आवाज
अपनी संपूर्ण जीवन-यात्रा में जन-सरोकारों से जुड़े रहने वाले डॉ. रामदयाल मुंडा को उनकी सेवाओं और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान के लिए देश के सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया।
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2007): जनजातीय संगीत, लोक-कला और संस्कृति के संरक्षण में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें देश के इस प्रतिष्ठित कला सम्मान से अलंकृत किया गया।
पद्म श्री (2010): भारत सरकार ने उनके शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान का सम्मान करते हुए उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया।
राज्यसभा की सदस्यता: उनकी विद्वता, बौद्धिक ईमानदारी और जनजातीय समाज के प्रति उनकी निष्ठा को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें संसद के उच्च सदन राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। संसद के गलियारों और राज्यसभा के पटल पर जब डॉ. रामदयाल मुंडा ने बोलना शुरू किया, तो वह केवल एक सांसद का भाषण नहीं होता था, बल्कि वह सदियों से शोषित, विस्थापित और उपेक्षित रहे भारत के करोड़ों आदिवासियों की सीधी चीख और उनकी मांग होती थी। उन्होंने संसद में विस्थापन, वनों के अंधाधुंध दोहन, भूमि अधिग्रहण कानूनों की खामियों, आदिवासियों की संस्कृति के हो रहे क्षरण और उनकी मातृभाषाओं में प्राथमिक शिक्षा न मिलने जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। वे कभी भी दलीय राजनीति के बंधक नहीं बने; उनके लिए पार्टी से ऊपर हमेशा उनका समाज और उनके लोग रहे।
निधन: जीवन के अंतिम वर्षों में डॉ. रामदयाल मुंडा गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें कैंसर जैसी असाध्य बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था, परंतु बीमारी की यह पीड़ा भी उनके वैचारिक उत्साह और लोक-कल्याण के संकल्प को डिगा नहीं सकी। जब तक उनके शरीर में सांसें थीं, वे विश्वविद्यालयों के सेमिनारों, सांस्कृतिक आयोजनों और अपने लोगों के बीच जाते रहे। 30 सितंबर 2011 को झारखंड की राजधानी रांची में इस महान शिक्षाविद्, भाषाविद्, लोक-नायक और सांस्कृतिक महानायक ने इस नश्वर संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। उनके निधन से पूरा झारखंड और देश का जनजातीय समाज शोक के अगाध सागर में डूब गया। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले लाखों लोगों की आंखें नम थीं, क्योंकि उन्होंने केवल एक व्यक्ति को नहीं खोया था, बल्कि उन्होंने अपने उस मार्गदर्शक को खो दिया था जिसने उन्हें दुनिया के सामने सिर उठाकर जीने का हौसला दिया था।
डॉ. रामदयाल मुंडा का जीवन इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि आधुनिक शिक्षा और पश्चिमी अकादमिक जगत की ऊँचाइयों को छूने के बाद भी अपनी माटी, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति से जुड़ा रहना ही मनुष्य की सबसे बड़ी सार्थकता है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि आदिवासी समाज कोई पिछड़ा या हीन समाज नहीं है, बल्कि उनकी संस्कृति में इस आधुनिक दुनिया को बचाने का एक स्थायी और प्रकृति-अनुकूल दर्शन छिपा हुआ है। आज जब हम वैश्वीकरण के इस दौर में अपनी स्थानीय भाषाओं, संस्कृतियों और जल-जंगल-जमीन के संकटों से जूझ रहे हैं, तब डॉ. रामदयाल मुंडा के विचार, उनका जे नाची से बांची का मंत्र और उनका अकादमिक व सामाजिक संघर्ष हमारे लिए एक प्रकाश-स्तंभ की तरह मार्गदर्शन कर रहा है। वे इतिहास के पन्नों में केवल एक पद्म श्री प्राप्त व्यक्ति या पूर्व कुलपति के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय जनजातीय पुनर्जागरण के अमर युगदृष्टा के रूप में सदैव जीवित रहेंगे।





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |