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महाराष्ट्र में जोतीराव फुले और उनके गैर-ब्राह्मण सत्यशोधक आंदोलन ने बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के उदय की राह प्रशस्त की। तमिलनाडु में इसका उल्टा हुआ। वहां एक आदि द्रविड़ (अछूत) ने पेरियार और उनके गैर-ब्राह्मण आंदोलन के उदय की राह प्रशस्त की। सी. अय्योथी थस्सा पंडिथर आधुनिक भारत के इतिहास में एक ऐसे जाति-विरोधी कार्यकर्ता, समाज सुधारक, विचारक, पत्रकार, अद्वितीय विद्वान और सिद्ध चिकित्सक थे, जिन्होंने दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय, अस्मिता और वैचारिक क्रांति की मजबूत नींव रखी। उन्हें द्रविड़ आंदोलन का अग्रदूत और तमिल पुनर्जागरण का नायक माना जाता है। जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन अपनी शुरूआती अवस्था में था और सामाजिक सुधारों के नाम पर केवल सतही प्रयास हो रहे थे, तब अय्योती थास ने समाज में अछूत या सबसे निचले पायदान पर धकेल दिये गये लोगों की गरिमा, शिक्षा, भूमि और राजनीतिक अधिकारों के लिए एक पूर्ण आंदोलन खड़ा किया। बीसवीं सदी में डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा चलाए गए बौद्ध पुनरुत्थान आंदोलन और सामाजिक न्याय की लड़ाई से दशकों पहले, अय्योती थास ने इन विचारों को धरातल पर उतार दिया था। उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया और परैयारों से भी ऐसा ही करने का आह्वान किया, यह तर्क देते हुए कि यही उनका मूल धर्म था।
प्रारंभिक जीवन: अय्योती थास का जन्म 20 मई 1845 को मद्रास प्रेसीडेंसी (वर्तमान चेन्नई) के थौसापेट्टै में हुआ था। उनके बचपन का नाम काथवरयान था। उनका परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा था, लेकिन इसके बावजूद उनके दादा, कंदसामी ने अपनी बौद्धिक चेतना को जीवित रखा था। कंदसामी मद्रास के एक नामचीन ब्रिटिश अधिकारी जॉर्ज हररिंगटन के यहाँ कार्यरत थे और तमिल ताड़पत्रों के संग्रह व संरक्षण में गहरी रुचि रखते थे। इसी पारिवारिक माहौल ने युवा काथवरयान के भीतर पढ़ने-लिखने की तीव्र ललक पैदा की।
नाम परिवर्तन: काथवरयान ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पारंपरिक तमिल विद्वानों और सिद्ध चिकित्सकों के सानिध्य में प्राप्त की। उनके जीवन पर उनके गुरु पंडित अय्योती नाथ कबीरदार का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा, जो एक सिद्ध चिकित्सक और दार्शनिक थे। काथवरयान अपने गुरु के ज्ञान और मानवतावादी दृष्टिकोण से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जीवनभर के लिए अपने गुरु के नाम को ही अपनी पहचान बना लिया और वे अय्योती थास (अय्योती के दास/शिष्य) कहलाए।
कई भाषाओं के ज्ञाता: अय्योती थास केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि वे एक असाधारण भाषाविद् और शोधकर्ता थे। उन्होंने अथक परिश्रम से कई भाषाओं पर महारत हासिल की:
तमिल: तमिल साहित्य, व्याकरण और प्राचीन काव्यों (जैसे थिरुक्कुरल, मनिमेकलै) का गहरा ज्ञान।
संस्कृत: वैदिक ग्रंथों और धार्मिक दर्शन की समीक्षा करने के लिए संस्कृत सीखी।
पालि: बौद्ध धर्म के मूल ग्रंथों (त्रिपिटक आदि) का अध्ययन करने के लिए पालि भाषा सीखी।
अंग्रेजी: समकालीन वैश्विक राजनीति, विज्ञान और औपनिवेशिक कानूनों को समझने के लिए अंग्रेजी भाषा पर पकड़ बनाई।
नीलगिरि प्रवास और सामाजिक चेतना का उदय
1870 के दशक में, अय्योती थास मद्रास से नीलगिरि (ऊटी) की पहाड़ियों में चले गए। वहाँ उन्होंने एक सिद्ध चिकित्सक के रूप में काम करना शुरू किया। उनकी दवाइयों और इलाज की अनूठी शैली ने उन्हें स्थानीय लोगों, विशेषकर चाय बागानों में काम करने वाले गरीब और शोषित मजदूरों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया। चिकित्सा के दौरान उन्होंने देखा कि जाति व्यवस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं और कैसे यह व्यवस्था इंसानों को बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित करती है। नीलगिरि के जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों (जैसे टोडा, बडागा) और तमिल मजदूरों की दयनीय स्थिति ने उन्हें केवल शारीरिक बीमारियों का इलाज करने के बजाय सामाजिक बीमारी (जातिवाद) का इलाज करने के लिए प्रेरित किया।
स्वदेशी और स्वराज आंदोलनों की आचोलना
अयोती थास स्वदेशी और स्वराज आंदोलनों के आलोचक थे, क्योंकि इन आंदोलनों की मांगें और उनके उद्देश्य दोनों ब्राह्मणवादी थे। ये आंदोलन राजनीतिक सुधार की मांग करते थे, न कि सामाजिक सुधारों की। क्योंकि इसका मतलब होता ब्राह्मण और आदि-द्रविड़ बच्चों का एक साथ एक स्कूल में पढ़ना, आदि द्रविड़ कृषि श्रमिकों को बेहतर मजदूरी देना और उनके काम के हालातों में सुधार लाना और उन्हें भू-अधिकार देना। आर्थिक सुधारों की मांग करने वाली संस्थाओं में गैर-ब्राह्मणों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। अयोती दास ने लिखा कि यदि किसी ब्राह्मण को किसी सरकारी दफ्तर में नौकरी मिल जाती है तो बहुत जल्दी सभी पदों पर ब्राह्मणों को बिठाकर उस दफ्तर को ब्राह्मण किला बना देता है। वे ‘वंदे मातरम’ गाते हैं, मगर ब्राह्मणवादी देवों के उनके जुलूस आदि द्रविड़ों के मोहल्लों से कन्नी काट कर निकलते हैं। स्वदेशी आंदोलन के प्रचारकों को अंग्रेजों को ‘श्वेत परया’ कहने में कोई संकोच नहीं होता। वे अपनी सभाओं में लोगों से कहते हैं वे ‘श्वेत परया’ द्वारा बनाये गए मोटे कपड़े का इस्तेमाल अपने मृतकों को ढंकने के लिए न करें। दास का मानना था कि स्वदेशी और स्वराज विचारधाराओं की गैर-प्रातिनिधिक प्रकृति और विषयवस्तु का कारण है अनुत्पादक और निष्क्रियता को बढ़ावा देने वाली ब्राह्मणवादी शिक्षाएं। ये शिक्षाएं आलस्य को प्रोत्साहित करती हैं और ज्ञान को सतही बनाती हैं। पहले फुले और उसके बाद दास ने ब्रिटिश सरकार का बचाव किया और उसका उनके लिए एक दूसरा ही अर्थ था। अंग्रेजों के राज में कानून थे, अदालतें थीं और कम-से-कम सैद्धांतिक तौर पर न्यायाधीश वर्णाश्रम धर्म से ऊपर थे। अंग्रेजों के राज में अछूत भी व्यापार कर सकते थे, संपत्ति के मालिक बन सकते थे और सेना में भर्ती हो सकते थे। फुले की तरह दास भी मानते हैं कि अंग्रेजों के आने से सदियों से चले आ रहे कुशासन और निरंकुशता का अंत हुआ। मगर जहां फुले बलिराजा के यशस्वी राज की याद करते हैं, वहीं दास बौद्ध काल की बात करते हैं। ब्राह्मण आक्रांताओं ने बौद्ध शासकों को पदच्युत कर दिया और जाति-वर्ण पर आधारित राज की स्थापना की। नतीजे में बौद्ध शासकों और बौद्ध प्रजा दोनों का हाशियाकरण हुआ। उन्हें समाज से बाहर धकेल दिया गया और निम्न, अस्वच्छ व अछूत माना जाने लगा।
द्रविड़ महाजन सभा का गठन
1891 में, अय्योती थास ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए द्रविड़ महाजन सभा का गठन किया। यह संगठन दक्षिण भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, क्योंकि द्रविड़ शब्द का प्रयोग पहली बार राजनीतिक और सामाजिक अस्मिता के रूप में इतनी प्रखरता से किया गया था। द्रविड़ महाजन सभा का पहला सम्मेलन नीलगिरि में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में एक व्यापक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे ब्रिटिश सरकार को भेजा गया।
प्रमुख मांगें: इस घोषणापत्र में मुख्य रूप से शोषितों के लिए अलग स्कूल खोलने, उन्हें मुफ्त शिक्षा देने, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने, तालाबों और कुओं जैसे सार्वजनिक जल स्रोतों तक पहुंच सुनिश्चित करने और उन्हें भूमि का मालिकाना हक देने की मांगें शामिल थीं।
महत्वपूर्ण तथ्य: द्रविड़ महाजन सभा के माध्यम से अय्योती थास ने उस द्रविड़ अस्मिता और राजनीति के बीज बोए, जिसे आगे चलकर 1920 और 1930 के दशकों में पेरियार ई.वी. रामासामी ने आत्म-सम्मान आंदोलन और द्रविड़ कड़गम के रूप में एक विशाल वटवृक्ष बना दिया।
पत्रकारिता के माध्यम से वैचारिक क्रांति
पंडित अय्योती थास यह अच्छी तरह जानते थे कि औपनिवेशिक भारत में मुख्यधारा का मीडिया (अखबार और पत्रिकाएं) उच्च जातियों के नियंत्रण में था, जहाँ शोषितों की समस्याओं, उनके दमन और उनकी मांगों को कोई जगह नहीं मिलती थी। इस शून्य को भरने के लिए उन्होंने पत्रकारिता का मार्ग चुना। 19 जून 1907 को अय्योती थास ने रॉयपेटा, मद्रास से ओरु पैशा तमिलन ( एक पैसा तमिल) नाम से एक साप्ताहिक अखबार शुरू किया। इस अखबार की कीमत मात्र एक पैसा थी, ताकि समाज का सबसे गरीब व्यक्ति भी इसे खरीद सके और पढ़ सकें। एक वर्ष के बाद, अपने पाठकों के सुझाव पर, उन्होंने इसका नाम बदलकर केवल तमिलन कर दिया। यह अखबार केवल समाचारों का संकलन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक न्याय, दर्शन, इतिहास, विज्ञान और जाति-विरोधी विचारों का एक जीवंत मंच था।
अखबार की मुख्य विशेषताएं और योगदान:
तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण: अखबार के माध्यम से उन्होंने अंधविश्वासों, रूढ़िवादी धार्मिक अनुष्ठानों और पौराणिक कथाओं पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने लोगों को हर बात को तर्क की कसौटी पर कसने के लिए प्रेरित किया।
वैश्विक पहुंच: तमिलन अखबार का प्रसार केवल मद्रास प्रेसीडेंसी तक सीमित नहीं था। जहाँ-जहाँ भी तमिल मजदूर बंधुआ या प्रवासी श्रमिक के रूप में गए थे—जैसे श्रीलंका, म्यांमार (बर्मा), मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, फिजी और मॉरीशस—वहाँ इस अखबार की प्रतियां नियमित रूप से भेजी जाती थीं। इसने वैश्विक स्तर पर तमिल प्रवासियों में एक राजनीतिक और सामाजिक चेतना का निर्माण किया।
वैकल्पिक इतिहास लेखन: इस अखबार के स्तंभों में, अय्योती थास ने भारत के इतिहास को एक नए नजरिए से लिखा। उन्होंने स्थापित इतिहास को चुनौती दी और बताया कि किस तरह इतिहासकारों ने मूल निवासियों के इतिहास को दबा दिया है।
यह अखबार पंडित अय्योती थास के जीवन के अंत (1914) तक लगातार प्रकाशित होता रहा और इसने दक्षिण भारत के बौद्धिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया।
साक्य बौद्ध सोसायटी की स्थापना
पंडित अय्योती थास के जीवन का सबसे क्रांतिकारी और दूरगामी प्रभाव वाला कार्य था—दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान। उनका यह कदम डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा 1956 में नागपुर में ऐतिहासिक बौद्ध धम्म दीक्षा लेने से लगभग 60 वर्ष पहले का था। गहन अध्ययन और शोध के बाद अय्योती थास इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि तमिल नाडु के जो समुदाय आज अछूत और शोषित हैं, वे वास्तव में प्राचीन काल में बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने तर्क दिया कि जब ब्राह्मणवाद का उदय हुआ, तो जिन बौद्धों ने उनकी वर्ण व्यवस्था और सर्वोच्चता को स्वीकार करने से मना कर दिया, उन्हें समाज से बाहर कर दिया गया और अछूत बना दिया गया। अपने इस सिद्धांत को व्यावहारिक रूप देने और बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करने के लिए, वे 1898 में श्रीलंका (तब सीलोन) गए। उनके साथ प्रसिद्ध थियोसोफिस्ट कर्नल हेनरी स्टील आॅलकॉट भी थे। कोलंबो में, उन्होंने प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु वेैनेरेबल सुमांगला नायक थेरो से दीक्षा ली और औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म में वापसी की। भारत लौटने के बाद, उन्होंने मद्रास में साक्य बौद्ध सोसायटी की स्थापना की, जिसे बाद में इंडियन बुद्धिस्ट एसोसिएशन के नाम से भी जाना गया।
शाखाओं का विस्तार: बहुत कम समय में इस सोसायटी की शाखाएं पूरे दक्षिण भारत में फैल गईं। मद्रास के अलावा, कोलार स्वर्ण क्षेत्र कर्नाटक), बैंगलोर, हुबली और यहाँ तक कि रंगून (म्यांमार) और दक्षिण अफ्रीका में भी इसकी शाखाएं खोली गईं।
कोलार स्वर्ण क्षेत्र का केंद्र: कोलार के सोने के कारखानों में काम करने वाले हजारों तमिल दलित मजदूरों ने अय्योती थास के विचारों से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म अपनाया। केजीएफ इस आंदोलन का एक बहुत बड़ा वैचारिक और सांस्कृतिक केंद्र बन गया।
बौद्ध विहारों का निमार्ण: इन केंद्रों पर बौद्ध विहारों की स्थापना की गई, जहाँ न केवल धार्मिक प्रार्थनाएं होती थीं, बल्कि वे शिक्षा, रात्रि पाठशालाओं और सामाजिक विमर्श के केंद्र भी थे।
तमिल बौद्ध पहचान
अय्योती थास ने अपने अनुयायियों को यथार्थ तमिलन (असली तमिल) या बौद्ध तमिलन कहा। उन्होंने शादियों और अंतिम संस्कार जैसे सामाजिक संस्कारों को बिना किसी ब्राह्मणवादी अनुष्ठान और पुरोहित के, सादगी से बौद्ध तौर-तरीकों से कराने की परंपरा शुरू की। इससे शोषित समाज का आर्थिक शोषण भी रुका और उनके भीतर एक नया स्वाभिमान जागा।
सिद्ध चिकित्सा पद्धति में योगदान
एक समाज सुधारक और संपादक होने के साथ-साथ, पंडित अय्योती थास एक उच्च कोटि के सिद्ध वैद्य थे। दक्षिण भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति सिद्ध में उनकी विशेषज्ञता अद्भुत थी।
औषधालय की स्थापना: उन्होंने मद्रास और नीलगिरि में अपने औषधालय चलाए, जहाँ वे गरीबों का मुफ्त या बहुत कम खर्च में इलाज करते थे। उनके लिए चिकित्सा केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि मानवता की सेवा और शोषितों से जुड़ने का एक माध्यम थी।
ताड़पत्रों का संपादन: उन्होंने सिद्ध चिकित्सा से संबंधित कई प्राचीन तमिल ताड़पत्रों और पांडुलिपियों को नष्ट होने से बचाया। उन्होंने उनका संपादन किया और उन्हें आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस के माध्यम से प्रकाशित करवाया ताकि यह पारंपरिक ज्ञान आम जनता तक पहुंच सके।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: वे चिकित्सा में अंधविश्वास के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने जड़ी-बूटियों के वैज्ञानिक गुणों के आधार पर इलाज को बढ़ावा दिया और अपने अखबार तमिलन में स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण पर नियमित रूप से लेख लिखे।
महापरिनिर्वाण और विरासत
अथक परिश्रम, निरंतर लेखन और देश-विदेश में सामाजिक आंदोलनों का नेतृत्व करने के बाद, 5 मई 1914 को 68 वर्ष की आयु में पंडित अय्योती थास का निधन (महापरिनिर्वाण) हो गया। उनके निधन से तमिलन अखबार का प्रकाशन रुक गया और दक्षिण भारत ने अपना एक महानतम विचारक खो दिया। पंडित अय्योती थास को इतिहास के पन्नों में वह स्थान बहुत देर से मिला, जिसके वे हकदार थे। दशकों तक मुख्यधारा के इतिहासकारों ने उनके योगदान की उपेक्षा की, लेकिन हालिया शोधों और दलित-बहुजन विमर्श के उभार ने उन्हें आधुनिक भारत के निर्माताओं की अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया है।





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