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भारत के सामाजिक न्याय के इतिहास और आधुनिक भारतीय राजनीति की दिशा को हमेशा के लिए बदल देने वाले युगदृष्टा बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (बी. पी. मंडल) का इतिहास एक ऐसे व्यक्ति की गाथा है, जिसने एक संपन्न जमींदार परिवार में जन्म लेकर भी देश के सबसे शोषित और पिछड़े वर्गों की सत्ता में हिस्सेदारी का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज तैयार किया। उनका जन्म 25 अगस्त 1918 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी (बनारस) में हुआ था, यद्यपि उनका मूल पैतृक गांव बिहार के सहरसा (अब मधेपुरा) जिले का मुरहो था। वे एक अत्यंत संपन्न और प्रभावशाली यादव (यदुवंशी) जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता रासबिहारी लाल मंडल अपने समय के एक बड़े जमींदार होने के साथ-साथ एक प्रखर समाज सुधारक, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता और गोप जातीय महासभा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। अपने पिता के प्रगतिशील विचारों और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ाव का बालक बिंदेश्वरी के मानस पर गहरा प्रभाव पड़ा। एक समृद्ध जमींदार के बेटे होने के बावजूद, उन्होंने बचपन से ही अपने आस-पास के बहुजन समाज की घोर गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक तिरस्कार को बहुत करीब से देखा था, जिसने उनके भीतर एक गहरी सामाजिक चेतना को जन्म दिया।
बी. पी. मंडल की प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव के ही परिवेश में हुई, जिसके बाद उन्होंने दरभंगा के राज हाई स्कूल से आगे की पढ़ाई की और फिर उच्च शिक्षा के लिए प्रतिष्ठित पटना कॉलेज में दाखिला लिया। शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने 1945 से 1951 तक आॅनरेरी मजिस्ट्रेट (वैतनिक दंडाधिकारी) के रूप में कार्य किया। इस प्रशासनिक अनुभव ने उन्हें जमीनी हकीकत से रूबरू कराया, लेकिन न्याय व्यवस्था और प्रशासन में वंचित वर्गों के प्रति जो संवेदनहीनता उन्होंने देखी, उससे उनका मोहभंग हो गया। उन्हें अहसास हुआ कि जब तक सत्ता और प्रशासन में पिछड़े वर्गों की सीधी भागीदारी नहीं होगी, तब तक न्याय संभव नहीं है। इसी विचार के साथ उन्होंने मजिस्ट्रेट के पद से इस्तीफा दे दिया और 1952 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर बिहार विधानसभा के सदस्य (विधायक) चुने गए।
कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने महसूस किया कि पार्टी का नेतृत्व और नीतियां पूरी तरह से सवर्ण जातियों के वर्चस्व में हैं और वहां पिछड़ों व दलितों के वास्तविक उत्थान के लिए कोई ठोस जगह नहीं है। इसी वैचारिक मतभेद के कारण 1965 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और डॉ. राममनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) में शामिल हो गए। लोहिया के सोशलिस्ट विचारों और ‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ के नारे ने मंडल को बेहद प्रभावित किया। 1967 के आम चुनावों में वे मधेपुरा से लोकसभा के सांसद चुने गए। यह वह दौर था जब बिहार में कांग्रेस का एकाधिकार टूट रहा था। 1967 में ही बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, जिसमें बी. पी. मंडल स्वास्थ्य मंत्री बने। लेकिन सवर्ण वर्चस्व वाली उस सरकार से भी उनका जल्द ही मोहभंग हो गया। पिछड़ों की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के उद्देश्य से उन्होंने शोषित दल नामक एक नई पार्टी का गठन किया।
1968 की शुरूआत में बिहार की राजनीति में एक अभूतपूर्व घटना घटी। बी. पी. मंडल के नेतृत्व में शोषित दल ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश किया। चूंकि मंडल उस समय लोकसभा के सदस्य थे और बिहार विधानमंडल के सदस्य नहीं थे, इसलिए संवैधानिक अड़चनों को दूर करने के लिए एक रणनीतिक कदम उठाया गया। उनके सहयोगी सतीश प्रसाद सिंह को 28 जनवरी 1968 को केवल कुछ दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनाया गया, जिन्होंने मंडल को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत करवाया। इसके बाद 1 फरवरी 1968 को बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल बिहार के मुख्यमंत्री बने। यद्यपि उनका यह कार्यकाल मात्र 30 से 47 दिनों (22 मार्च 1968 तक) का ही रहा, लेकिन बिहार के इतिहास में यह एक राजनीतिक भूचाल था। यह पहली बार था जब एक पिछड़े वर्ग का नेता पूरी राजनीतिक धमक के साथ सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठा था, जिसने शोषित वर्गों के भीतर एक नया आत्मविश्वास भर दिया।
राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखने के बाद 1977 में वे जनता पार्टी के टिकट पर पुन: मधेपुरा से सांसद चुने गए। यही वह समय था जब उनके जीवन का सबसे ऐतिहासिक अध्याय शुरू हुआ। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहला पिछड़ा वर्ग आयोग बना था, लेकिन उसकी सिफारिशों को कभी लागू नहीं किया गया। 20 दिसंबर 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की और 1 जनवरी 1979 को बी. पी. मंडल को इस आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यही आयोग इतिहास में मंडल आयोग के नाम से अमर हुआ।
एक अध्यक्ष के रूप में बी. पी. मंडल ने वातानुकूलित कमरों में बैठकर रिपोर्ट बनाने के बजाय पूरे देश का सघन दौरा किया। उन्होंने भारत के सुदूर गांवों, बस्तियों और ढाणियों में जाकर लोगों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन किया। उन्होंने पिछड़ेपन को मापने के लिए 11 सूचकांक (सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक) तैयार किए। इस महाभियान के दौरान देश में सरकारें बदल गईं, जनता पार्टी की सरकार गिर गई और इंदिरा गांधी पुन: सत्ता में आ गईं, लेकिन मंडल अपने काम में बिना रुके डटे रहे। 31 दिसंबर 1980 को बी. पी. मंडल ने तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट सौंप दी।
इस रिपोर्ट ने भारतीय समाज की वास्तविकता का जो कच्चा चिट्ठा खोला, वह चौंकाने वाला था। मंडल आयोग ने पूरे देश में 3,743 ऐसी जातियों की पहचान की, जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई थीं और जिन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीस) का नाम दिया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि देश की कुल आबादी में इन पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी 52 प्रतिशत है, लेकिन सरकारी नौकरियों और प्रशासन में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 4 से 5 प्रतिशत है। इस घोर असमानता को दूर करने के लिए बी. पी. मंडल ने ऐतिहासिक सिफारिश की कि केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए, ताकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50 प्रतिशत आरक्षण की अधिकतम सीमा का भी उल्लंघन न हो। इसके अलावा उन्होंने पिछड़ों के लिए भूमि सुधार और आर्थिक सहायता के भी कई क्रांतिकारी सुझाव दिए।
रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद तत्कालीन सरकारों ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। बी. पी. मंडल अपनी इस रिपोर्ट के लागू होने का सपना आंखों में लिए 13 अप्रैल 1982 को पटना में इस दुनिया से विदा हो गए। वे यह नहीं देख पाए कि उनकी कलम से निकली वह रिपोर्ट एक दिन भारत की राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल देगी। उनकी मृत्यु के लगभग आठ साल बाद, 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी. पी. सिंह) ने संसद में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की ऐतिहासिक घोषणा की। इस घोषणा ने पूरे देश में एक भूचाल ला दिया। मंडल बनाम कमंडल की राजनीति शुरू हुई, देश भर में सवर्ण छात्रों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किए, लेकिन सामाजिक न्याय का जो पहिया बी. पी. मंडल ने घुमाया था, वह अब रुकने वाला नहीं था। मंडल आयोग के लागू होने से उत्तर भारत, विशेषकर हिंदी पट्टी में राजनीतिक सत्ता सवर्णों के हाथ से निकलकर पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के हाथ में आ गई, जिससे लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार और मायावती जैसे नेताओं का उदय हुआ। बी. पी. मंडल केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे सामाजिक इंजीनियर थे, जिनकी दूरदृष्टि और वैज्ञानिक अध्ययन ने भारत के बहुजन समाज को उनका संवैधानिक और लोकतांत्रिक हक दिलाकर भारतीय लोकतंत्र को सही मायनों में समावेशी बनाया।





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