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भारतीय इतिहास में 13वीं और 14वीं शताब्दी का काल भक्ति आंदोलन के उत्कर्ष का समय था। इस युग में महाराष्ट्र की पावन भूमि पर वारकरी संप्रदाय का उदय हुआ, जिसने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी ईश्वर की भक्ति का समान अधिकार दिलाया। इसी गौरवशाली परंपरा के एक अनमोल रत्न थे— संत चोखामेला। चोखामेला केवल एक संत या कवि नहीं थे, बल्कि वे मानवीय गरिमा, अटूट श्रद्धा और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध एक शांत लेकिन अत्यंत प्रभावशाली आवाज थे। उन्होंने सिद्ध किया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए ऊंचे कुल में जन्म लेना आवश्यक नहीं, बल्कि हृदय की शुद्धता और अनन्य भक्ति ही एकमात्र मार्ग है।
अभावों में जन्मा एक आध्यात्मिक महानायक: संत चोखामेला का जन्म सन 1270 के आसपास महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के मेहुणपुरे (वर्तमान में मेहुण राजा) नामक गाँव में एक महार परिवार में हुआ था। उनके जन्म की सटीक तिथि के बारे में इतिहासकारों में मतभेद हैं, परंतु माना जाता है कि वे संत नामदेव के समकालीन थे और 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में सक्रिय थे। उनका परिवार पंढरपुर के भगवान विट्ठल (विठोबा) का अनन्य भक्त था। चोखामेला का विवाह सोयराबाई से हुआ था, जो स्वयं एक विदुषी और संत स्वभाव की महिला थीं। उनका पूरा परिवार ही भक्ति में लीन रहता था; उनके पुत्र कर्ममेला, बहन निर्मला और साले बंका भी विट्ठल के प्रति समर्पित थे और उनकी रचनाओं में भी भक्ति की वही तड़प दिखाई देती है। चोखामेला का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण था। प्राचीन हिन्दू वर्ण प्रणाली में चार वर्ग थे। क्षत्रिय, वैश्य, क्षुद्र तथा ब्राह्मण मगर महार जाति के लोगों को इनमें से किसी वर्ग में न रखकर वर्ण व्यवस्था से बाहर रखा गया था। इन्हें शिक्षा का कोई अधिकार नही था। यहाँ तक कि गाँव के सार्वजनिक कुँए पर इन्हें पानी भरने की इजाजत भी नही थी। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में उन्हें अस्पृश्य माना जाता था, जिसके कारण उन्हें न तो मंदिर में प्रवेश की अनुमति थी और न ही समाज की मुख्यधारा में सम्मान की। वे पंढरपुर चले आए और भगवान विट्ठल के मंदिर के द्वार पर बैठकर ही उनके कीर्तन सुना करते थे।
गुरु-शिष्य का अनूठा संबंध
चोखामेला के आध्यात्मिक जीवन में संत नामदेव का आगमन एक युगांतरकारी घटना थी। नामदेव ने चोखामेला की आंतरिक पवित्रता को पहचाना और उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया। यह उस समय की एक क्रांतिकारी घटना थी कि एक उच्च वर्ग का संत एक तथाकथित अछूत को अपना शिष्य बना रहा था। नामदेव के सानिध्य में चोखामेला की भक्ति ने अभंगों (भक्ति काव्य) का रूप लिया। उन्होंने अपने अभंगों में अपनी पीड़ा, समाज का तिरस्कार और ईश्वर के प्रति अपनी गहरी वेदना को पिरोया।
भेदभाव मिटाने में योगदान: संत चोखामेला का योगदान केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था; वे एक महान समाज सुधारक भी थे। चोखामेला ने इस विचार को चुनौती दी कि ईश्वर केवल पुरोहितों या उच्च वर्ग की जागीर। चोखामेला को कभी विट्ठल मंदिर के भीतर जाने नहीं दिया गया। उन्हें मंदिर की सीढ़ियों के पास बैठना पड़ता था। लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनाया। उस दौर में निचली जातियों के लोगों में हीनभावना कूट-कूट कर भरी थी। चोखामेला ने अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्हें आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। उन्होंने बताया कि भक्ति के मार्ग पर सभी बराबर हैं। वारकरी संप्रदाय में उन्होंने समानता के बीज बोए, जहाँ आज भी पंढरपुर की वारी (यात्रा) में सभी जातियों के लोग एक साथ बिना किसी भेदभाव के चलते हैं। चोखामेला ने अपने काव्य में तार्किक प्रश्न पूछे। उन्होंने पूछा कि यदि मनुष्य का जन्म एक ही प्रक्रिया से होता है, तो एक पवित्र और दूसरा अपवित्र कैसे हो सकता है? उन्होंने शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता पर बल देकर जाति व्यवस्था की खोखली बुनियाद पर प्रहार किया।
मृत्यु: संत चोखामेला जी का देहावसान 14 मई सन 1338 में पंढरपुर के पास मंगलवेदा गांव में हुआ था। मजदूरी का काम करते समय उनके उपर दीवार गिर गई थी जिस हादसे में उनकी मृत्यु हुई। उनका अंतिम संस्कार विट्ठल मंदिर के सामने किया गया, जहाँ इनकी समाधि भी बनाई गई।
संत चोखामेला भारतीय समाज के उन पहले विद्रोहियों में से एक थे जिन्होंने हथियार उठाकर नहीं, बल्कि शब्द और भक्ति के माध्यम से असमानता को चुनौती दी। उन्होंने हमें सिखाया कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए घृणा की नहीं, बल्कि करुणा और तर्क की आवश्यकता होती है। आज जब हम एक आधुनिक समाज में जी रहे हैं, चोखामेला के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। उनके अभंग आज भी हमें याद दिलाते हैं कि मानवता की सेवा और अंतर्मन की शुद्धि ही वास्तविक धर्म है। वे सामाजिक न्याय के इतिहास में एक ऐसा चमकता सितारा हैं, जिसने अंधेरे युग में समानता की लौ जलाई थी।





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