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भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में जब भी औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध पहले संगठित और व्यापक जन-संघर्ष की बात होती है, तो संथाल हूल (1855-56) का नाम स्वर्णाक्षरों में उभरता है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से दो वर्ष पूर्व ही झारखंड के दामिन-इ-कोह (संथाल परगना) के बीहड़ों, जंगलों और पहाड़ियों में जल, जंगल, जमीन और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए एक ऐसा जनांदोलन भड़का, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। इस महाविप्लव को इतिहास में मुख्य रूप से चार भाइयों—सिदो, कान्हू, चांद और भैरव मुर्मू के नेतृत्व के लिए जाना जाता है। किंतु इस ऐतिहासिक जनक्रांति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, ओजस्वी और प्रेरणादायी पक्ष वह है जिसे मुख्यधारा के इतिहासकारों ने लंबे समय तक उपेक्षित रखा—वह था संथाल वीरांगनाओं का अदम्य साहस, रणकौशल और सर्वोच्च बलिदान। संथाल समाज में महिलाएं केवल घरेलू दायित्वों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों की सक्रिय भागीदार थीं। जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, महाजनों, साहुकारों और जमींदारों की तिकड़ी ने आदिवासियों के पारंपरिक जीवन, उनकी स्वायत्तता और उनकी माटी पर सीधा आघात किया, तब संथाल नारियों ने घर की दहलीज लांघकर सीधे युद्ध के मैदान में कदम रखा। इस संघर्ष में फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू जैसी जुझारू बहनों के साथ-साथ हजारों अनाम संथाली महिलाओं ने जो अप्रतिम शौर्य दिखाया, उसने यह सिद्ध कर दिया कि विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध स्वतंत्रता की अलख जगाने में आदिवासी महिलाएं किसी से पीछे नहीं थीं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा लागू की गई स्थायी बंदोबस्ती के बाद पारंपरिक आदिवासी क्षेत्रों पर जमींदारों और महाजनों (जिन्हें स्थानीय भाषा में दिकू यानी बाहरी शोषक कहा जाता था) का शिकंजा कसता चला गया। ब्रिटिश हुकूमत ने राजमहल की पहाड़ियों के जंगलों को साफ करवाकर संथालों को वहां बसाया और उस पूरे क्षेत्र को दामिन-इ-कोह का नाम दिया। संथालों ने अपनी कड़ी मेहनत, खून-पसीने से बीहड़ जंगलों को उपजाऊ खेतों में बदला। किंतु जैसे ही भूमि खेती योग्य हुई, औपनिवेशिक तंत्र के संरक्षण में महाजनों और व्यापारियों ने वहां अपना जाल फैला दिया।
1. अत्यधिक ब्याज दरें: महाजन 50% से लेकर 500% तक ब्याज वसूलते थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्ज चुकाने के बाद भी मूलधन कभी खत्म नहीं होता था।
2. कमिया और हरवाही प्रथा: कर्ज न चुका पाने की स्थिति में पूरे परिवार को बंधुआ मजदूर बना दिया जाता था।
3. झूठे वजन और माप: अनाज खरीदने और बेचने के लिए पोआ और सेर के दोहरे मापदंड (केंकड़ा और पाथुर) इस्तेमाल किए जाते थे।
4. महिलाओं का दैहिक व मानसिक उत्पीड़न: दारोगा, पुलिसकर्मियों, रेलवे निर्माण कार्य में लगे अंग्रेज ठेकेदारों और महाजनों द्वारा संथाली महिलाओं के साथ अमानवीय बर्बरता और छेड़छाड़ की जाती थी।
इस बहुआयामी उत्पीड़न ने संथालों के पारंपरिक आत्मसम्मान (मानझी थान) को झकझोर कर रख दिया। जब न्याय के सभी वैधानिक रास्ते बंद हो गए, तो 30 जून 1855 को भोगनाडीह गांव में 400 से अधिक गांवों के 10,000 से ज्यादा संथाल एकत्र हुए। यहां सिदो और कान्हू ने स्वतंत्र संथाल राज्य की घोषणा की और हूल (विद्रोह) का बिगुल फूंका। इस ऐतिहासिक सभा में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि भारी संख्या में महिलाएं भी पारंपरिक परिधानों में, हाथों में तीर-कमान, कुल्हाड़ियां और हंसिया लिए उपस्थित थीं।
हूल की ज्वालामयी बहनें: संथाल विद्रोह की चर्चा फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू के बिना अधूरी है। वे सिदो, कान्हू, चांद और भैरव की सगी बहनें थीं। भोगनाडीह के इसी मुर्मू परिवार ने पूरे विद्रोह का वैचारिक और सामरिक नेतृत्व किया।
1. जन्म और वैचारिक चेतना
फूलो और झानो का जन्म 1830 के दशक के पूर्वार्ध (अनुमानत: 1832-1835 के मध्य) में हुआ था। वे बचपन से ही अपने भाइयों को महाजनों के अत्याचारों और पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ चर्चा करते देखती थीं। संथाली संस्कृति में महिलाओं को प्राप्त स्वतंत्रता और सम्मान ने उनके भीतर निर्भीकता और स्वाभिमान का बीजारोपण किया। जब उनके भाइयों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने का निर्णय लिया, तो दोनों बहनों ने पुरुषों के पीछे खड़े रहने के बजाय मोर्चे पर सबसे आगे चलने का संकल्प लिया।
2. संगठन और महिला लामबंदी
फूलो-झानो ने गांव-गांव जाकर संथाली युवतियों और महिलाओं को संगठित किया। उन्होंने समझाया कि यह लड़ाई केवल पुरुषों के सम्मान की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व और संथाली अस्मिता की रक्षा की लड़ाई है। उनके आह्वान पर हजारों महिलाएं पारंपरिक हथियारों—जैसे कांपी (कुल्हाड़ी), हंसिया, धनुष-बाण और गुलेल—के संचालन का अभ्यास करने लगीं।
3. सूचना तंत्र और गुप्तचर प्रणाली की कमान
संथाल हूल में महिलाओं द्वारा संचालित सूचना तंत्र की भूमिका निर्णायक थी। घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों में जब अंग्रेजी सेना विद्रोहियों की टोह लेने निकलती थी, तो फूलो और झानो अपने महिला दस्ते के साथ साधारण ग्रामीण लकड़हारिनों या घास काटने वालियों का रूप धरकर अंग्रेजों की गतिविधियों पर नजर रखती थीं।
●वे पता लगाती थीं कि ब्रिटिश सैनिक छावनी कहां बना रहे हैं, रसद सामग्री कहां रखी है और उनके पास कितने आधुनिक हथियार हैं।
●यह सारी गुप्त सूचनाएं वे तुरंत भोगनाडीह स्थित हूल मुख्यालय तक पहुंचाती थीं, जिससे विद्रोही सेना को गुरिल्ला हमलों की योजना बनाने में निर्णायक बढ़त मिलती थी।
कैम्प पर धावा और अदम्य पराक्रम: संथाल लोकगाथाओं, बिसरते इतिहास और स्थानीय हूल गीतों में दर्ज एक घटना फूलो और झानो के अदम्य पराक्रम का सबसे बड़ा प्रमाण है। कहा जाता है कि विद्रोह के दौरान जब अंग्रेजी सेना की एक टुकड़ी ने संथाली गांवों को जलाना और लूटपाट करना शुरू किया, तब दोनों बहनों ने रात के अंधेरे का लाभ उठाकर एक साहसिक योजना बनाई। वे दोनों संथाली महिलाओं के एक छोटे दल के साथ चुपके से ब्रिटिश सैन्य शिविर (कैंप) में प्रवेश कर गईं। इससे पहले कि पहरेदार कुछ समझ पाते, फूलो और झानो ने अपनी कुल्हाड़ियों से हमला बोल दिया। लोकस्मृति में यह तथ्य गर्व से दर्ज है कि इस अचानक हुए गुरिल्ला प्रहार में दोनों बहनों ने अकेले ही 21 ब्रिटिश सैनिकों और उनके सहयोगियों को मौत के घाट उतार दिया था। इस दुस्साहसिक हमले ने ब्रिटिश सेना के भीतर खौफ पैदा कर दिया कि संथाली महिलाएं भी साक्षात चंडी बनकर प्रहार कर सकती हैं। फूलो-झानो केवल दो नाम नहीं थे, बल्कि वे उस व्यापक चेतना का प्रतिनिधित्व करती थीं जिसने संथाल परगना की हर महिला को योद्धा बना दिया था। इस विद्रोह में महिलाओं की भूमिका को निम्नलिखित आयामों में देखा जा सकता है।
1. रसद और आपूर्ति श्रृंखला का संचालन
गुरिल्ला युद्ध में सबसे कठिन कार्य रसद की निरंतर आपूर्ति बनाए रखना होता है। जब पुरुष योद्धा जंगलों में अंग्रेजों की नियमित सेना से लोहा ले रहे थे, तब गांवों की महिलाएं उनके लिए भोजन तैयार करती थीं। वे रात के अंधेरे में मीलों पैदल चलकर जंगलों के भीतर क्रांतिकारियों तक सत्तू, भुने चने, महुआ और पानी पहुंचाती थीं। गांव जला दिए जाने के बाद भी महिलाओं ने कंदमूल और जंगली फल इकट्ठा करके क्रांतिकारियों को कभी भूखा नहीं रहने दिया।
2. पारंपरिक हथियारों का निर्माण
संथालों के पास अंग्रेजों की तरह आधुनिक मस्केट बंदूकें या तोपें नहीं थीं। उनके पास केवल पारंपरिक तीर-धनुष, भाले और कुल्हाड़ियां थीं। महिलाएं जंगलों से विशेष प्रकार की लकड़ियां काटकर तीर और कमान बनाने में सहयोग करती थीं। वे तीरों के फलकों पर जहरीली वनस्पतियों का अर्क (विष) लगाने का अत्यंत संवेदनशील और जोखिम भरा काम भी करती थीं, जिससे एक ही तीर के वार से दुश्मन सैनिक पस्त हो जाता था।
3. घायल योद्धाओं की चिकित्सा
औपनिवेशिक सेना से मुठभेड़ के दौरान घायल हुए संथाली विद्रोहियों का इलाज महिलाएं ही करती थीं। वे जंगलों में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों, पेड़ों की छाल और प्राकृतिक औषधियों का प्रयोग करके घायल वीरों के घावों को भरती थीं। यह एक प्रकार की प्राथमिक मोबाइल फील्ड-हॉस्पिटल सेवा थी जिसे पूरी तरह संथाली महिलाओं द्वारा संचालित किया जाता था।
4. प्रत्यक्ष मोर्चे पर तीरंदाजी और आत्मरक्षा
जब ब्रिटिश सेना ने गांवों को घेरना शुरू किया, तो संथाली महिलाओं ने भागने के बजाय मुकाबला करना चुना। महेशपुर, पाकुड़ और संग्रामपुर के युद्धों में महिलाओं ने घरों की छतों, पेड़ों और टीलों की आड़ लेकर अंग्रेजी सैनिकों पर तीरों की बौछार कर दी। कई अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने अपनी डायरियों में विस्मय के साथ दर्ज किया है कि संथाल महिलाएं अपने बच्चों को पीठ पर कपड़े से बांधकर भी दोनों हाथों से धनुष से तीर छोड़ रही थीं।
ब्रिटिश दमन चक्र, बर्बरता और वीरांगनाओं का बलिदान
हूल की व्यापकता से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने मेजर जनरल लॉयड के नेतृत्व में सेना की कई रेजीमेंटें बुलाईं और पूरे क्षेत्र में मार्शल लॉ घोषित कर दिया। अंग्रेजों ने विद्रोह को कुचलने के लिए स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी अपनाई, जिसके तहत गांवों के गांव फूंक दिए गए, मवेशियों को मार डाला गया और फसलों को नष्ट कर दिया गया।
इस अमानवीय दमन का सबसे क्रूर शिकार महिलाएं बनीं:
●ब्रिटिश सैनिकों और उनके भाड़े के सिपाहियों ने संथाली महिलाओं को सामूहिक रूप से प्रताड़ित किया।
●गांव की वृद्ध, गर्भवती और धात्री महिलाओं को बंदी बनाकर अमानवीय यातनाएं दी गईं ताकि वे अपने पतियों और भाइयों का पता बता सकें, किंतु किसी भी संथाली महिला ने क्रांतिकारियों के गुप्त ठिकानों का भेद नहीं खोला।
●फूलो और झानो मुर्मू भी इस बर्बर दमन के दौरान मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं। यद्यपि उनके अंतिम क्षणों का कोई लिखित औपनिवेशिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, परंतु संथाली परंपरा के अनुसार वे लड़ते-लड़ते ही शहीद हुईं और उन्होंने आत्मसमर्पण करने के बजाय मृत्यु का वरण किया।
1856 के अंत तक लगभग 20,000 से अधिक संथालों को मौत के घाट उतारकर अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया। सिदो, कान्हू, चांद और भैरव शहीद हो चुके थे, और उनके साथ ही फूलो-झानो तथा सैकड़ों वीरांगनाओं का रक्त भी संथाली माटी में विलीन हो गया।
औपनिवेशिक इतिहासलेखन का पूर्वाग्रह और उपेक्षा
सवाल उठता है कि भारतीय इतिहास की मुख्यधारा की पाठ्यपुस्तकों में फूलो-झानो और संथाली वीरांगनाओं को वह स्थान क्यों नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं? इसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
1. औपनिवेशिक और अभिजात्यवादी नजरिया: अंग्रेजों ने हूल को एक सभ्य सरकार के खिलाफ बर्बर कबीलाई उपद्रव के रूप में चित्रित किया। उन्होंने इसे एक राजनीतिक और स्वतंत्रता संग्राम मानने से इनकार कर दिया। वहीं, स्वतंत्रता के बाद भी प्रारंभिक इतिहासकारों का ध्यान मुख्य रूप से शहरी, उच्च-वर्गीय और 1857 के बाद के आंदोलनों पर ही केंद्रित रहा।
2. लिखित इतिहास बनाम मौखिक परंपरा: संथाली समाज की भाषा संथाली थी, जिसकी अपनी लिपि (ओल चिकी) का विकास काफी बाद में हुआ। उनका इतिहास गीतों, गाथाओं और लोककथों में सुरक्षित था। अकादमिक इतिहासकारों ने इन मौखिक स्रोतों को प्रमाणिक दस्तावेज मानने में लंबा समय लगाया।
3. पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण: इतिहासलेखन में प्राय: पुरुषों के सैन्य नेतृत्व को ही प्रमुखता दी गई, जिसके कारण महिलाओं की संगठनात्मक, सामरिक और सहायक भूमिकाओं को हाशिए पर धकेल दिया गया।
लोकस्मृति और सांस्कृतिक विरासत में वीरांगनाओं की अमरता
यद्यपि अभिलेखागारों के दस्तावेजों में फूलो और झानो का उल्लेख बहुत संक्षिप्त हो सकता है, किंतु लोकस्मृति किसी सरकारी सनद की मोहताज नहीं होती। संथाली लोकगीतों में आज भी फूलो-झानो की गाथाएं गूंजती हैं:
सिदो-कान्हू दादो रे, चांद-भैरव दादो रे...
फूलो-झानो बोहिन रे, हूल रेको लाड़हाए लेन...
(अर्थात: भाई सिदो-कान्हू और चांद-भैरव के साथ बहना फूलो और झानो भी हूल के महासंग्राम में लड़ी थीं...)
यह गीत केवल अतीत का स्मरण नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की नई पीढ़ियों के लिए स्वाभिमान और प्रतिरोध का जीवंत मंत्र है। हर वर्ष 30 जून को हूल दिवस के अवसर पर जब संपूर्ण देश और विशेषकर झारखंड भोगनाडीह के शहीदों को नमन करता है, तब फूलो-झानो की प्रतिमाओं पर भी श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते हैं।
आधुनिक मान्यता और सम्मान
हाल के दशकों में सबाल्टर्न (निम्नवर्गीय) इतिहासलेखन और जनजातीय अस्मिता के पुनरुत्थान के साथ इन वीरांगनाओं को उनका उचित स्थान मिलना प्रारंभ हुआ है:
●झारखंड सरकार द्वारा दुमका (हंसडीहा) में स्थापित प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षण संस्थान का नाम फूलो झानो कॉलेज आॅफ डेयरी टेक्नोलॉजी रखा गया है।
●ग्रामीण एवं वंचित महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका, स्वरोजगार और सशक्तिकरण से जोड़ने के लिए झारखंड सरकार द्वारा फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान संचालित किया गया, जिसने हड़िया-दारू के निर्माण व बिक्री से जुड़ी महिलाओं को सम्मानजनक व्यवसायों की ओर मोड़ा।
●विभिन्न आदिवासी और सामाजिक संगठनों द्वारा दुमका, साहिबगंज और रांची सहित विभिन्न शहरों में फूलो-झानो की प्रतिमाएं स्थापित कर उनकी स्मृति को सहेजा जा रहा है।
आज जब 21वीं सदी में संपूर्ण विश्व महिला सशक्तीकरण, लैंगिक समानता और पर्यावरण संरक्षण की बात कर रहा है, तब 1855 की संथाली वीरांगनाओं का संघर्ष और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
1. साहस और आत्मनिर्भरता: फूलो-झानो ने उस कालखंड में पितृसत्ता और साम्राज्यवादी सत्ता दोनों को चुनौती दी जब समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता अत्यंत सीमित थी। उन्होंने यह साबित किया कि संकट के समय स्त्री केवल रक्षा की गुहार लगाने वाली नहीं, बल्कि समाज की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने वाली शक्ति है।
2. जल, जंगल, जमीन से आत्मीय जुड़ाव: संथाल महिलाओं का संघर्ष केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं था; वह उनकी प्राकृतिक संपदा, संस्कृति और जीवन-शैली को बचाने का संघर्ष था। आज के पर्यावरण आंदोलनों में जो आदिवासी महिलाएं अग्रिम पंक्ति में खड़ी दिखाई देती हैं, उनकी प्रेरणा के मूल में फूलो-झानो जैसी ही अमर वीरांगनाएं हैं।
3. सामूहिकता की भावना: हूल किसी एक नायक का चमत्कार नहीं था, बल्कि वह पूरे समाज का सामूहिक प्रतिरोध था जिसमें नारियों ने रीढ़ की हड्डी की तरह कार्य किया।
निष्कर्ष: संथाल विद्रोह की अमर वीरांगनाएं—विशेषकर फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू—भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उस जाज्वल्यमान नक्षत्र की भांति हैं, जिनका प्रकाश समय के साथ और अधिक प्रखर होता जा रहा है। उन्होंने विदेशी दासता, सामंती शोषण और अन्याय के सम्मुख घुटने टेकने के बजाय अपने प्राणों की आहुति देकर यह अमर संदेश दिया कि स्वतंत्रता की वेदी पर स्त्री और पुरुष का त्याग समान होता है। उनका बलिदान केवल संथाल परगना या झारखंड की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है; वह संपूर्ण राष्ट्र की साझी विरासत है। जब तक शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध की आवाज उठती रहेगी और जब तक मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष होते रहेंगे, तब तक 1855 के महाहूल की ये अमर आदिवासी वीरांगनाएं हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा, शौर्य और त्याग की उच्चतम प्रतीक बनी रहेंगी।





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