Sunday, 13th September 2026
Follow us on
Sunday, 13th September 2026
Follow us on

सामाजिक न्याय के मूक नायक बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया

Babu Shivdayal Singh Chaurasia: The Silent Hero of Social Justice
News

2026-09-12 13:04:28

भारतीय सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में जब भी हाशिए पर धकेले गए तबकों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अधिकारों की बात होती है, तो कुछ ऐसे नाम सामने आते हैं जिन्होंने सत्ता और प्रचार की चकाचौंध से दूर रहकर व्यवस्था की नींव हिलाने का काम किया। ऐसे ही एक विरल व्यक्तित्व थे बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया। वे एक प्रख्यात विधिवेत्ता, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संविधान विशेषज्ञ, प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग) के प्रमुख स्तंभ और बहुजन चेतना के वैचारिक मार्गदर्शक थे। उन्होंने उस दौर में सामाजिक न्याय और संवैधानिक हक की अलख जगाई जब देश में पिछड़ा वर्ग शब्द प्रशासनिक अभिलेखों में अपनी पहचान तलाश रहा था। बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया का जन्म 13 मार्च 1903 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ के एक साधारण पारंपरिक तंबोली (चौरसिया) परिवार में हुआ था। उस दौर में समाज में जातिगत स्तरीकरण अत्यधिक कठोर था। शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा पर कुछ विशिष्ट वर्गों का एकाधिकार था, जबकि दस्तकार, शिल्पी, कृषक और सेवा प्रदाता जातियों को शैक्षणिक अवसरों से जानबूझकर दूर रखा जाता था। शिवदयाल जी के परिवार की आर्थिक स्थिति साधारण थी, लेकिन उनके भीतर ज्ञानार्जन की गहरी ललक थी। उन्होंने बचपन में ही जाति-आधारित भेदभाव, सामाजिक असमानता और पिछड़ेपन के दंश को नजदीक से देखा। इन कटु अनुभवों ने उनके भीतर हीनभावना भरने के बजाय एक विद्रोही चेतना और सुधारवादी दृष्टिकोण को जन्म दिया। उन्होंने संकल्प लिया कि वे शिक्षा को ही सामाजिक गुलामी की बेड़ियों को काटने का माध्यम बनाएंगे। प्रतिकूल सामाजिक परिस्थितियों का सामना करते हुए शिवदयाल सिंह चौरसिया ने लखनऊ से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की। उन्होंने कानून (एलएलबी) की डिग्री हासिल की और लखनऊ उच्च न्यायालय (अवध बार) में वकालत शुरू की। उस दौर में किसी पिछड़े समाज के व्यक्ति का उच्च न्यायालय में एक सफल अधिवक्ता बनना अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। कानून के अध्ययन ने उन्हें भारतीय समाज में गहराई तक पैठे संस्थागत अन्याय को समझने का एक नया दृष्टिकोण दिया। उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि सामाजिक बदलाव केवल दया या सुधारवादी भाषणों से नहीं आ सकता; इसके लिए संवैधानिक अधिकार, कानूनी सुरक्षा और राजनीतिक शक्ति का होना अनिवार्य है। वे केवल अदालत में मुकदमों की पैरवी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने कानून के अपने ज्ञान का उपयोग शोषित और वंचित वर्गों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करने में किया।

स्वतंत्रता आंदोलन: 1920 और 1930 के दशकों में जब भारत में स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर था, बाबूजी ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। हालांकि, उनका मानना था कि केवल विदेशी शासकों से आजादी पाना ही पर्याप्त नहीं है; जब तक देश के भीतर करोड़ों शूद्रों, अति-शूद्रों और दबे-कुचले वर्गों को सामाजिक और आर्थिक दासता से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। वे महात्मा ज्योतिराव फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, डॉ. भीमराव आंबेडकर और पेरियार ई. वी. रामास्वामी के विचारों से गहरे प्रभावित थे। उन्होंने महसूस किया कि उत्तर भारत में दलितों के साथ-साथ पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की स्थिति भी अत्यधिक दयनीय थी, लेकिन उनमें संगठित राजनीतिक और सामाजिक चेतना का अभाव था। इसी चेतना को जगाने के लिए उन्होंने अवध और संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के ग्रामीण और अर्ध-शहरी अंचलों में सामाजिक बैठकों का दौर शुरू किया।

अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ की स्थापना: उत्तर भारत में पिछड़ी जातियों को एक मंच पर लाने के लिए बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया ने 1920 के दशक के अंत और 1930 के दशक में अथक प्रयास किए।

➢जातिगत संकीर्णता से मुक्ति: उन्होंने विभिन्न पिछड़ी जातियों—जैसे यादव, कुर्मी, चौरसिया, मौर्य, निषाद, लोधी, पाल, प्रजापति, बढ़ई, लोहार आदि—के बीच के अलगाव को समाप्त करने की दिशा में काम किया। उनका तर्क था कि सामाजिक दृष्टि से ये सभी जातियां एक ही पायदान पर खड़ी हैं, इसलिए उनका संघर्ष भी साझा होना चाहिए।

➢संगठन का निर्माण: उन्होंने आॅल इंडिया बैकवर्ड क्लासेस फेडरेशन (अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ) की स्थापना और उसे मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हिंदू कोड बिल का समर्थन: जब डॉ. आंबेडकर ने महिलाओं और वंचितों के कानूनी अधिकारों के लिए हिंदू कोड बिल पेश किया, तो चौरसिया जी ने पारंपरिक रूढ़िवादियों के खिलाफ खड़े होकर इस प्रगतिशील कानून का पुरजोर समर्थन किया।

काका कालेलकर आयोग, 1953 में ऐतिहासिक भूमिका

स्वतंत्र भारत के इतिहास में बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया का सबसे महत्वपूर्ण और मील का पत्थर साबित होने वाला योगदान प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य के रूप में रहा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत 29 जनवरी 1953 को राष्ट्रपति के आदेश से काका कालेलकर की अध्यक्षता में देश का पहला पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया गया। बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया को इस आयोग का प्रमुख सदस्य नियुक्त किया गया। आयोग के सदस्य के रूप में बाबूजी ने पूरे भारत का सघन दौरा किया। उन्होंने हजारों किलोमीटर की यात्राएं कीं, गांवों, बस्तियों और कार्यस्थलों पर जाकर लाखों लोगों से संवाद किया। उन्होंने देखा कि आजादी के बाद भी देश की प्रशासनिक सेवाओं, न्यायपालिका, शिक्षा और आर्थिक संसाधनों में पिछड़ी जातियों की भागीदारी नगण्य थी। आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। हालांकि, आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर ने रिपोर्ट सौंपते समय अपने कवरिंग लेटर में आरक्षण के सिद्धांत पर ही संदेह व्यक्त कर दिया और जाति के बजाय आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने का अप्रत्यक्ष संकेत दिया। इस मोड़ पर बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया ने अदम्य साहस और वैचारिक स्पष्टता का परिचय दिया। उन्होंने आयोग की रिपोर्ट के साथ एक विस्तृत और ऐतिहासिक विमति पत्र (असहमति नोट) संलग्न किया। इस विमति पत्र में उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित थे कि भारत में आर्थिक पिछड़ापन सामाजिक और जातिगत पिछड़ेपन का परिणाम है, उसका कारण नहीं। सदियों से जिन जातियों को ज्ञान, सम्मान और संपत्ति से वंचित रखा गया, वे केवल आर्थिक सहायता से आगे नहीं बढ़ सकतीं। संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) की मूल भावना को रेखांकित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछड़ापन तय करने का प्राथमिक पैमाना जातिगत स्थिति ही होनी चाहिए। न्होंने तर्क दिया कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम या दान नहीं है, बल्कि शासन-प्रशासन में हिस्सेदारी का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की पुरजोर वकालत की। बाबूजी का यह विमति पत्र आगे चलकर भारतीय विधि और समाजशास्त्र में एक ऐतिहासिक दस्तावेज बना। बाद के वर्षों में जब 1979 में बी. पी. मंडल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) का गठन हुआ, तो मंडल आयोग ने चौरसिया जी के तर्कों और काका कालेलकर आयोग के उनके विश्लेषण को अपने अध्ययन का एक बड़ा आधार बनाया।

मान्यवर कांशीराम के राजनीतिक व वैचारिक गुरु

बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरक पहलू बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम के साथ उनका संबंध था। 1970 के दशक में जब मान्यवर कांशीराम पुणे से दिल्ली आए और बामसेफ तथा दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) की नींव रख रहे थे, तब वे उत्तर भारत में सामाजिक न्याय के वैचारिक धरातल की तलाश कर रहे थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात दिल्ली में बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया से हुई। कांशीराम बाबूजी को सामाजिक न्याय के इतिहास का जीवंत विश्वकोश मानते थे। बाबूजी ने कांशीराम को उत्तर भारत के सामाजिक ताने-बाने, जातियों के समीकरण, संविधान सभा के भीतर की बहसों और काका कालेलकर आयोग की पूरी अंतर्कथा विस्तार से समझाई। बाबूजी ने कांशीराम को समझाया कि दलितों (एसएसी/एसटी) का आंदोलन तब तक सत्ता परिवर्तन नहीं ला सकता, जब तक कि वह देश की 52 प्रतिशत से अधिक आबादी वाले अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को अपने साथ नहीं जोड़ता। एससी, एसटी और ओबीसी के संयुक्त गठजोड़ (बहुजन अवधारणा) को व्यावहारिक राजनीतिक जमीन पर उतारने की प्रेरणा कांशीराम को बाबूजी के विमर्श से ही मिली। कांशीराम अक्सर बाबूजी के निवास पर घंटों बैठकर रणनीति बनाते थे। कांशीराम ने सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार किया कि बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया उनके राजनीतिक और वैचारिक मार्गदर्शक थे।

व्यक्तित्व, जीवन-दर्शन और मूल्य

बाबूजी का निजी जीवन सादगी, ईमानदारी और बौद्धिक निष्ठा का प्रतीक था। उच्च न्यायालय के एक वरिष्ठ और सफल अधिवक्ता होने के बावजूद उनके जीवन में किसी प्रकार का आडंबर नहीं था।

निस्वार्थ जनसेवा: उन्होंने कभी अपने सामाजिक कार्यों को व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ, चुनावी टिकट या किसी पद की प्राप्ति का साधन नहीं बनाया। वे सत्ता के गलियारों में प्रभाव रखने के बावजूद जीवन भर एक फकीर और शिक्षक की भांति जिए।

संवैधानिक दृष्टिकोण: उनका विश्वास कभी भी अराजकता या उग्रता में नहीं रहा। वे बाबासाहेब आंबेडकर की तरह संवैधानिक तरीकों, कानूनी प्रावधानों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से अधिकार छीनने के पक्षधर थे। उनका कहना था कि शिक्षा संगठन को जन्म देती है, संगठन संघर्ष को, और संघर्ष न्याय की स्थापना करता है।

निधन: पने जीवन के अंतिम दिनों तक बाबूजी सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के सशक्तिकरण के प्रति समर्पित रहे। जब 1990 में वी. पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की, तो बाबूजी के जीवन का सबसे बड़ा सपना साकार हुआ। यद्यपि उस समय वे काफी वृद्ध हो चुके थे, लेकिन उन्होंने इस फैसले का खुले दिल से स्वागत किया और इसे सदियों से शोषित समाज के आत्मसम्मान की जीत बताया। 18 सितंबर 1996 को 93 वर्ष की सुदीर्घ आयु में इस महान विधिवेत्ता, चिंतक और सामाजिक योद्धा का निधन हो गया। उनके निधन से भारतीय सामाजिक न्याय आंदोलन ने अपना एक सबसे प्रबुद्ध और निस्वार्थ मार्गदर्शक खो दिया। बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया का मूल्यांकन केवल एक जाति विशेष के नेता के रूप में करना उनके विराट व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वे आधुनिक भारत में समग्र सामाजिक लोकतंत्र के निमार्ता थे।

उनकी विरासत के प्रमुख आयाम

संवैधानिक समझ: अनुच्छेद 340 के व्यावहारिक क्रियान्वयन और पिछड़ेपन की पहचान के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार करना।

कालेलकर आयोग में भूमिका: प्रसिद्ध विमति पत्र के माध्यम से जातिगत वंचना को आरक्षण का मूल आधार सिद्ध करना, जिसने मंडल आयोग की नींव रखी।

बहुजन आंदोलन की धुरी: उत्तर भारत में दलित और पिछड़े वर्गों के बीच वैचारिक समन्वय स्थापित कर मान्यवर कांशीराम जैसे युगप्रवर्तक को दिशा देना।

जाति चेतना का परिष्कार: पिछड़ी जातियों को अपनी हीनभावना त्यागकर लोकतांत्रिक सत्ता में बराबरी का हिस्सेदार बनने का संकल्प देना।

बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया ने जिस समय सामाजिक चेतना की लौ जलाई थी, उस समय राह बेहद कठिन और एकाकी थी। आज भारतीय राजनीति और समाज में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) जिस निर्णायक स्थिति में खड़ा है, उसके पीछे बाबूजी की दशकों की खामोश तपस्या, कानूनी दक्षता और अडिग वैचारिक निष्ठा है। वे भारतीय सामाजिक न्याय के आकाश के वे ध्रुवतारे हैं, जिनका प्रकाश आने वाली पीढ़ियों को हमेशा समतामूलक समाज के निर्माण का रास्ता दिखाता रहेगा।

Post Your Comment here.
Characters allowed :


01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05