




2026-02-28 15:48:02
नि:संदेह भारत एक जाति प्रधान देश है, यहाँ पर जाति ही मनुष्य की पहचान और उसकी योग्यता है। मनुष्य का काम, उसकी योग्यता व उसका चरित्र जातिवादी मानसिकता वाले लोगों की नजर में महत्वपूर्ण नहीं होता। देश में जबसे मनुवादी संघी सरकारें हैं, तभी से जाति को अधिक प्रभावशाली बनाया जा रहा है। लोकतंत्र की व्यवस्था के बावजूद भी भारत में जाति के आधार पर ही चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारे जाते हैं। जबसे देश में मनुवादी-संघी सरकारें हैं, तभी से उनकेa माननीय मुख्य नेता मोदी-योगी देश की जनता को जोर-शोर से बता रहे हैं कि कपड़ों से पहचानों और फिर उसी पहचान के आधार पर उनसे सामाजिक व्यवहार करो, उनके वक्तव्य का संदेश साफ है कि देश में वे हिन्दू-मुसलमान के बीच नफरत के भाव को बढ़ाना चाहते हैं और उसी आधार पर ‘वोटों’ का ध्रुवीकरण करा रहे हैं। उनकी मानसिकता में गहराई तक मनुवाद और ब्राह्मणवाद है, जिसके आधार पर देश की जनता से कह रहे हैं कि मुसलमानों और हिंदुओं को उनके पहने हुए कपड़ों के आधार पर पहचानों। देश की जनता मोदी-योगी को बता देना चाहती है कि ये देश हिन्दू-मुसलमानों की धार्मिक मान्यताओं के आधार पर नहीं चलता, देश संविधान के अनुसार प्रशासित होकर चलता है। संविधान में न कपड़ों के रंगों का जिक्र है; न पहनावे का जिक्र है; यहाँ पर रहने वाले सभी धर्मों और संप्रदायों के लोग देश के नागरिक है। किसी को भी धर्म और संप्रदाय के आधार पर विशेष अधिकार नहीं है। देश की सरकार की भी कोई धार्मिक पहचान नहीं है। देश की सरकार के लिए सभी धर्म, संप्रदाय समान है, किसी भी धर्म व संप्रदाय की कोई भी पोशाक हो, उससे देश की सरकार और संविधान को कोई फर्क नहीं पड़ता। मगर फिर भी मनुवादी संघी लोग अपनी नफरत भरी अवैज्ञानिक सोच से बाज नहीं आते। वे हर समय देश की जनता के बीच जाकर जातियों और धर्म के आधार पर बटवारा करते रहते हैं, नफरत फैलाते हैं और फिर उसी आधार पर जनता का वोट लेकर सरकार में स्थापित भी होते हैं। पिछले लगभग 12 वर्षों से देश की जनता इसी ब्राह्मणवादी-मनुवादी जÞहर से जहरीली बनती जा रही है जिसके कारण देश की एकता, अखंडता और लोकतंत्र की भावना दिन-प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है।
हिन्दुत्व की वैचारिकी में मानवतावाद नहीं है, हिन्दुत्व की वैचारिकी चिरकाल से ही मानवता व देश विरोधी है। देश की जागरूक जनता को हिन्दुत्व की वैचारिकी का संज्ञान लेकर कहना चाहिए कि जो लोग कपड़ों से पहचाने की बात करते हैं उन्हें उनके जातिसूचक नामों से पहचानकर उनके साथ उन जैसा ही व्यवहार करें, और साथ में उनको कभी भी वोट न देने का दृढ़ संकल्प लें। चुनाव लड़ने वाला कोई भी प्रत्याशी अपने नाम के साथ जातिसूचक शब्द लगाता है तो देश के जागरूक मतदाता उसे अपना वोट न देकर देश की धर्म निरपेक्षता को संविधान की भावना के अनुरूप मजबूत करें और देश से जातिवाद को खत्म करने का काम भी करें।
जातिवाद का बोलबाला: देश में आज जातिवाद का बोलबाला है। मनुवादी संघी सरकारों ने इसे अपनी पूरी शक्ति लगाकर आगे बढ़ाने का काम किया है। देश का प्रत्येक जातिवादी व्यक्ति अपने नाम के साथ जातिसूचक उपनाम लगा रहा है। जाति को ब्राह्मणवादी संस्कृति ने इतना महत्वपूर्ण बना दिया है कि नाम के साथ जातिसूचक उपनाम लगाने में सभी जातिवादी मानसिकता वाले लोग गर्व महसूस करते हैं। जातिसूचक उपनाम अधिकांशतया कथित सवर्ण वर्ग की जातियों में ही अधिक दिखाई देता है। जैसे-ब्राह्मण वर्ग के लोग शर्मा, पाठक, दीक्षित, उपाध्याय, त्रिपाठी, त्रिवेदी, चतुवेर्दी, द्विवेदी, शुक्ला, मिश्रा, तिवारी, भारद्वाज, कश्यप, ओझा, पांडे, भट्ट, चौबे, दुबे, झा, मुखर्जी, बनर्जी, चटर्जी और अग्निहोत्री जैसे उपनाम लगाकर अपनी जातीय श्रेष्ठता का प्रदर्शन खुलेआम करते हैं।
क्षत्रिय वर्ण के लोग भी वर्णव्यवस्था के आधार पर सामाजिक व्यवस्था में दूसरे पायेदान पर है जिनके उपनाम है- सिंह, राजपूत, ठाकुर, राठौड़, चौहान, परमार, जड़ेजा, सिसोदिया, कछवाहा, मराठा आदि उपनामों से जाने जाते हैं और ये सभी लोग अपने नाम के साथ जाति सूचक उपनाम लगाकर समाज को अपनी जाति से प्रभावित करते हैं, साथ में जनता से वोट लेने के लिए अपने सभी उपनामों का प्रयोग भी करते हैं।
इसी प्रकार वैश्य वर्ग के जातिय समूह- गुप्ता, सिंघल, गोयल, अग्रवाल, बंसल, कंसल, सिंघल, जिंदल, गर्ग, मित्तल, मंगल आदि भी अपने जातीय उपनाम लगाकर मनुष्यों की सामाजिक एकता में विभाजन का काम करते हैं। इस वर्ग के सभी लोग अपने नाम के साथ जाति सूचक उपनाम लगाकर समाज के बाकी व्यक्तियों को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे वैश्य समाज के लोग हैं और इसी के कारण हम निचले पायदान पर आने वाली सभी क्रमिक जातियों से श्रेष्ठ हैं।
ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के अनुसार चौथे पायेदान पर शूद्र वर्ग आता है। इस वर्ग की जातियों में भी उपनामों की भरमार है, यह वर्ग मुख्यता दो बड़े समुदायों में विभाजित किया जा सकता है। आमतौर पर इस वर्ग के लोग कामगार और तकनीकी समुदाय से जुड़े लोग होते हैं। शूद्र वर्गीय लोग संख्याबल के आधार पर अधिसंख्यक है जिसे मुख्यतया दो भागों में बांटकर देखा जा सकता है। पहला कृषक समाज और उसकी उपजातियाँ, दूसरा कृषि से जुड़े तकनीकी ज्ञान वाले समुदाय जो आमतौर पर कृषि से संबंधित उपकरणों का निर्माण करके, अपनी जीविका का निर्वाह करते हैं। अधिकांशतया ये सभी उपजातियाँ कृषि योग्य भूमि की मालिक नहीं होती। लेकिन कृषि से जुड़े सभी उपकरण और औजार बनाने का काम करके अपने जीवन का निर्वाह करते हैं। वास्तविकता के आधार पर यही तकनीकी समाज देश का असली वैज्ञानिक समाज है जिसने अपने तकनीकी ज्ञान से देश को प्रगति पथ पर अग्रसर करके मनुष्य की सभ्यता को आगे बढ़ाया है। इस समुदाय में दो तरह की वैचारिकी के लोग हैं, पहला, सामंतवादी वैचारिकी के लोग और दूसरा है तकनीकी ज्ञान में उत्कृष्ट लोग। सामंतवादी विचारधारा के लोग अधिकांशतया अपने काम से जुड़े लोगों का शोषण, उत्पीड़न करने में गर्व महसूस करते हैं और इस सामंतवादी विचारधारा के लोगों में चौधरियत वाले वर्ग जाट, गुर्जर, अहीर (यादव) आदि शामिल है। हालांकि ये सभी जातीय घटक ब्राह्मणी संस्कृति के वर्गीकरण के अनुसार शूद्र वर्ग में ही वर्गीकृत है और शूद्र वर्ग में होने के कारण ये सभी उपरोक्त तीनों वर्णों में सामाजिक व्यवस्था में निम्न समझते जाते हैं।
शूद्र वर्ग के जातीय घटकों में एकता का भाव नहीं: ब्राह्मणी वर्गीकरण के अनुसार शूद्र वर्ग में आने वाले जातीय घटक संख्याबल के हिसाब से भारत में अधिसंख्यक है। देश में संवैधानिक सत्ता और प्रजातांत्रिक व्यवस्था है। प्रजातंत्र का अर्थ है कि जिन समुदायों का संख्याबल अधिक होगा उस समुदाय की ही देश में सत्ता होगी। देश को आजाद हुए 78 वर्ष हो चुके हैं और संविधान को लागू हुए 75 वर्ष का समय हो चुका है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार देश में हर पाँच साल बाद चुनाव होने का प्रावधान है। मगर देश में देखा यह जा रहा है कि चुनाव दर चुनाव देश में मनुवादी-ब्राह्मणवादी सरकारें ही स्थापित होती आ रही है, जिसके कारण देश में बहुजन समाज (एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक) के साथ उत्पीड़न और शोषण की घटनाएँ भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यह सोचने का विषय है कि जब देश में बहुजन समाज की संख्या ऊपर के तीनों वर्णों से अधिक है तो फिर उनके विरुद्ध उत्पीड़न और शोषण की घटनाएँ क्यों बढ़ रही है? दूसरा सवाल यह भी बनता है कि जब देश में बहुजन समाज की संख्या अधिक है तो वे अपनी सरकार बनाने में विफल क्यों हो रहे हैं?
उपरोक्त दोनों सवालों का जवाब है कि बहुजन समाज में गुलामी की मानसिकता गहराई तक समाहित है और बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों में एकता का भाव नहीं है। उन सभी में क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था के कारण बहुजन समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको अपने ही वर्ग के दूसरे जातीय घटक के मनुष्य से या ऊंचा मानता है या नीचा मानता है। क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था ही बहुजन समाज के जातीय घटकों को न तो एक प्लेटफॉर्म पर इकट्ठा होने देती है और न ही उनमें एकता की भावना को मजबूत होने देती है। बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों में मनुवादी संघी मानसिकता इतनी मजबूती से समाहित हो चुकी है कि बहुजन समाज के सभी जातीय घटक एक-दूसरे के साथ उठना-बैठना व सामाजिक व्यवहार करना भी उचित नहीं मानते हैं। जिसके कारण बहुजन समाज के सभी जातीय घटक मनुवादी-ब्राह्मणवादी मानसिकता के व्यक्तियों को ही अपना अमूल्य वोट देकर सत्ता में स्थापित करते आ रहे हैं। विडम्बना यह है कि ऐसा करने के बाद भी उनको यह एहसास नहीं हो रहा है कि हम किसको फायदा और किसको नुकसान पहुंचा रहे हैं? ऐसा करके वे अपनी अज्ञानता का ही प्रदर्शन करते हैं जिससे उनकी अज्ञानता उन्हें हमेशा सत्ता से दूर गरखती है।
ब्राह्मण वर्ग के सामने सभी नीच: अतीत से ही देश में जातिवाद और धर्मवाद पूरी तरह छाया हुआ है। इसका सबसे प्रमुख कारण वर्तमान ब्राह्मणवादी शासन सत्ता है। जो अपने विभिन्न माध्यमों से देश की पूरी सामाजिक व्यवस्था को मनुवादी संघी प्रावधानों से प्रदूषित करती हैं और यही प्रदूषित मानसिकता का समाज यह समझने में असफल है कि हम देश को मजबूत बना रहे हैं या देश को कमजोर कर रहे हैं? निष्पक्षता और न्यायिक दृष्टिकोण से ऐसी प्रदूषित मानसिकता के सभी लोग देश विरोधी है और इसी मानसिकता के कारण देश में जातिवाद और धर्मवाद बढ़ रहा है। देश के सभी लोग ब्राह्मणवादी वैचारिकी के कारण ऊंच-नीच की व्यवस्था में घुस रहे हैं। जातिवादी व्यवस्था एक ऐसी अंधी सुरंग है जिसमें मनुष्य जन्म के साथ ही घुस जाता है और जीवनभर न तो इससे छुटकारा पाता है और न मरने के बाद भी इस जातिवादी व्यवस्था से मुक्ति मिलती है। ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था ने ऐसी व्यवस्था का निर्माण कर दिया है कि ब्राह्मण वर्ण/जाति के लोगों के सामने देश के सभी नागरिक उनसे नीच समझते जाते हैं। 26 जनवरी 1950 से देश में संवैधानिक व्यवस्था है तभी से हर पाँच साल में देश की केंद्रीय और राज्य सरकारों का चुनाव होता आ रहा है। तभी से केंद्र और राज्य सरकारों में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का वर्चस्व है, ब्राह्मणवादी सरकारों के कारण ही देश में जातिवादी मानसिकता कमजोर न होकर और अधिक मजबूत होती दिखाई दे रही है। अगर देश में संवैधानिक व्यवस्था लागू होने के बाद उचित कानून बनाकर जाति-व्यवस्था को समाप्त करने का प्रावधान किया जाता तो देश अधिक वैज्ञानिक और तकनीकी सोच के साथ विश्व के अन्य देशों के मुकाबले में प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति के रूप में स्थापित होने में सक्षम हो सकता था। परंतु ब्राह्मणवादी-मनुवादी सरकार में बैठे लोगों ने ऐसा नहीं होने दिया इससे देश को अपूर्णीय क्षति हुई। आज पूरे देश में जातिवाद घटने के बजाए और अधिक बढ़ता हुआ दिख रहा है।
देश के वर्तमान हालात को देखते हुए देश की जागरूक व समझदार जनता से अपील है कि देश का कोई भी चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति अगर अपने नाम के साथ जातिसूचक उपनाम का प्रयोग करता है तो देश की जनता ऐसे व्यक्ति को जातिवादी समझे और उसे अपना अमूल्य वोट न देने का संकल्प करें। देश में लोकतांत्रिक सत्ता रखनी है तो देश की जनता को उसकी निरंतरता के साथ रक्षा भी करनी होगी।





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