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कांग्रेस की बुनियादी षड्यंत्रकारी मानसिकता

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2026-07-25 14:27:22

आजादी के शुरूआती दौर में कांग्रेस पार्टी के संगठन में उच्च जातियों विशेषकर ब्राह्मण नेताओं का नेतृत्व, वर्चस्व और प्रभाव मजबूत रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी की नीतियों और सामाजिक दृष्टिकोण ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय समाज में सवर्ण वर्चस्व को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कांग्रेस के संगठन में कृषक व अन्य तकनीकी समाज की हिस्सेदारी लगभग नगण्य रही। नामात्र के लिए दलितों के लिए आरक्षण व्यवस्था के कारण ब्राह्मणवादी मानसिकता के गुलाम दलित समुदायों से कुछेक को प्रतिकात्मक रूप में चुना और उन्हीं के नाम से समाज में जबर्दस्त तरीके से प्रचार किया कि हम दलितों, कमजोर वर्गों व अल्पसंख्यकों के हिमायती हैं और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हम सदैव तैयार हंै। विशेषकर दलित समाज के आजादी के आंदोलन में सक्रिय रहे नेता माननीय बाबू जगजीवन राम जी को कांग्रेस ने चुना, चूंकि वे मनुवादी और ब्राह्मणवादी मानसिकता से संक्रमित थे और कांग्रेस के ब्राह्मणवादी नेताओं ने उन्हें इसलिए चुना ताकि वे कांग्रेस में उच्च पदों पर बैठे ब्राह्मणवादी नेताओं की बातों को सअक्षर मानते रहे। इसी दौर में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में भी दलितों, पिछड़ों और शोषितों का संघर्ष चल रहा था उनका कहना था कि दलित और शूद्र वर्ण की अत्यंत पिछड़ी जातियों के लोग हिन्दू नहीं है, वे सभी अति विशिष्ट अल्पसंख्यक समुदायों के अंग हैं। इस बात को लेकर उनके इस दृष्टिकोण से कांग्रेस के महामानव गांधी व उसके अन्य ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग सहमत नहीं थे। चूंकि अधिकांशतया वे आरएसएस की नीतियों से प्रभावित थे और उनका छिपे ढंग से समर्थन करते थे। वर्तमान समय में कांग्रेस कुछ भी कहे, मगर आरएसएस रूपी पौधे को भारत भूमि पर रोपित करने का काम उस समय के कट्टर ब्राह्मणवादी नेताओं ने ही किया। कांग्रेस के इस पाप का समर्थन उस समय के पिछड़े वर्ग के चालाक व कम समझ जातियों के लोगों ने भी किया। जिनमें विशेष रूप से सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, आदि नेता शामिल थे। ये सभी कांग्रेसी नेता दलित व शोषित समाज के घोर विरोधी और जातिवादी थे। कांग्रेस के महामना मोहनदास करमचंद गांधी भी एक घोर जातिवादी और ब्राह्मणवादी नेता थे। ब्राह्मणवादी मानसिकता के कारण ही इन सभी नेताओं ने गांधी को ‘महात्मा’ और देश का ‘राष्ट्रपिता’ बनाया जो किसी भी तर्क से सही नहीं बैठता।

कांग्रेस के बारे में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का कथन: बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का एक बेहद प्रसिद्ध और ऐतिहासिक कथन है, ‘कांग्रेस पार्टी एक जलता हुआ महल है।’ जिसका उपयोग उन्होंने कांग्रेस की आंतरिक स्थिति और दलितों के संदर्भ में उसकी नीतियों को रेखांकित करने के लिए किया था। बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने यह बात 14 जनवरी 1951 को जालंधर (पंजाब) में एक रैली को संबोधित करते हुए कही थी, जिसका उल्लेख उनके भाषणों में मिलता है। इस कथन के पीछे बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:

1. दलितों के लिए असुरक्षित जगह: बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर का मानना था कि जो दलित नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं, वे एक ऐसे घर में प्रवेश कर रहे हैं जिसमें आग लगी हुई है। उनके अनुसार, कांग्रेस रूपी इस जलते हुए महल में दलितों का न तो कोई भविष्य सुरक्षित है और न ही उनके अधिकारों की रक्षा हो सकती है।

2. आंतरिक अंतर्विरोध और पतन: बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर कांग्रेस को एक ऐसा संगठन मानते थे जो अंदरूनी कलह, गुटबाजी और वैचारिक विरोधाभासों से घिरा हुआ था। उनका सोचना था कि यह पार्टी बाहर से जितनी मजबूत दिखती है, अंदर से उतनी ही खोखली और अपने ही विरोधाभासों के कारण नष्ट होने की कगार पर है।

3. स्वार्थ और अवसरवाद का केंद्र: बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने 14 जनवरी 1951 को जालंधर की एक रैली को संबोधित करते हुए अपने भाषण में चेतावनी दी थी कि कांग्रेस के भीतर समाज सुधार की भावना खत्म हो चुकी है और यह केवल सत्ता, पूंजीपतियों और जमींदारों के हितों को साधने का जरिया बन चुकी है। उन्होंने दलित समाज से अपील की थी कि वे इस ‘जलते हुए महल’ का हिस्सा बनकर खुद को तबाह न करें, बल्कि अपने स्वतंत्र राजनीतिक दलों को मजबूत करें।

वर्तमान में दलित-वंचित नेताओं की मानसिक स्थिति: वर्तमान समय में दलित-वंचित समाज के नेताओं में स्वार्थ की पराकाष्ठा है और वे अपने व्यक्तिगत लालच में बिना किसी संघर्ष और बलिदान के कांग्रेस में जाकर दलितों का नेता बनने का ख्वाब देख रहे हैं। कांग्रेस भी इन नेताओं को इसलिए भाव दे रही है कि आसनी से ये लोग अपनी गुलाम मानसिकता के कारण कांग्रेस में शामिल होकर दलित-वंचित समाज का वोट कांग्रेस के पाले में लाने में सहायक होंगे और कांग्रेस मजबूत हो सकेगी। हम यहाँ पर यह भी बता देना चाहते हैं कि अब दलित वंचित समाज के पढे लिखे लोग कांग्रेसी मनुवाद को अच्छी तरह समझने लगे हैं। समाज के हितों के लिए संघर्ष करने वाले अम्बेडकरवादी कांग्रेस में जाकर उनके गुलाम बनकर नहीं रह पाएंगे बल्कि अब दलित-वंचित समाज के जागरूक लोगों को देश की हर सम्पदा और संस्थानों में उनकी आबादी के हिसाब से पूरी हिस्सेदारी चाहिए। वे अब किसी ब्राह्मणवादी संघी छलावे में फँसने वाले नहीं हैं।

कांग्रेस में शामिल होने वाले नेताओं में कुछेक प्रमुख नाम इस प्रकार है जैसे- राजेन्द्र पाल गौतम, प्रो. रतन लाल, डॉ. उदित राज, चरण सिंह चन्नी, जगन्नाथ पहाड़िया, डॉ रविकांत इत्यादि दलित-शोषित समाज के लोग कांग्रेस में जाकर अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रहे हैं। वैसे तो ये सभी कथित नेता अपने आपको गर्व से कठोर अम्बेडकरवादी कहते हैं, परंतु देश की शोषित-वंचित समाज की जनता इन सभी से जानना चाहती है कि अगर आप सच्चे अम्बेडकरवादी हैं तो कांग्रेस के पाले में नतमस्तक होकर जाना क्या सच्चे अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद के अनुरूप है? देश के बहुजन शोषित समाज को आपका यह कृत्य साफतौर पर नजर आ रहा है कि आप केवल और केवल अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए कांग्रेस में जा रहे हैं। देश के सच्चे अम्बेडकरवादी इस बात को भी जानते हैं कि इन जैसे स्वार्थी नेताओं ने ही ‘रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया’ जो बाबा साहेब ने बनाई थी उसको भी ऐसे ही स्वार्थी राजनीतिक नेताओं ने दर्जनों टुकड़ों में विभाजित करके बाबा साहेब के मिशन को ध्वस्त किया है। जनता यह सब देखकर ऐसे नेताओं का आंकलन भी कर रही है और उन्हें दलित-शोषित और वंचितों का नेता भी मानने को तैयार नहीं है।

कांग्रेस को सुधारनी होंगी अतीत की गलतियां: शुरूआती दौर में कांग्रेस ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बढ़ावा देकर उसे भारतीय राजनीति में स्थापित करने की जो गलती की थी अभी भी कांग्रेस उसी गलती को अपने पूर्ण समर्थन के साथ दोहरा रही है। दलित-शोषित व वंचित समाज की जनता अब इस तरह की राजनीति को अच्छी तरह से समझने लगी है और अब वह इस तरह के मनुवादी जाल में फँसने से बचने की कोशिश करेगी। दलित-शोषित व वंचित समाज के जागरूक लोग आज कांग्रेस से इसलिए दूरी बना रहे हैं कि 78 साल की आजादी के बाद भी कांग्रेस ने पूर्व में की गई अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं लिया है। वह आज भी दलित-शोषित व वंचित समाज के लोगों को प्रयोगात्मक वस्तु ही समझती है। परंतु कांग्रेस को हम आगाह करना चाहते हैं कि आपके अतीत को देखकर वंचित-शोषित समाज का हर व्यक्ति आपको वोट देने से परहेज करेगा। कांग्रेस अपनी इसी नीति के कारण आज सत्ता से बाहर है और आगे भी सत्ता से बाहर ही रहेगी जबतक कि वह अपनी आंतरिक रणनीति और कार्यशैली में सुधार नहीं करेगी।

कांग्रेस को करने होंगे संगठनात्मक सुधार: कांग्रेस ने भारत में करीब 70 वर्षों तक देश का शासन चलाया, मगर अपने शासन में उसने दलित व वंचित समाज के लोगों को उनकी संख्या बल के आधार पर न कोई हिस्सेदारी दी और न ही इस देश की सम्पदा और शैक्षणिक संस्थानों में कोई हिस्सेदारी दी। आज दलित वंचित व शोषित समाज के लोगों में एक सवाल प्रमुखता से उभर रहा है कि भारत के इतने बड़े समुदाय को कांग्रेस को लगातार सत्ता में बनाए रखने से उन्हें विरासत में मिला क्या? आज देश का हर शोषित-वंचित समाज का नागरिक इस देश की सम्पदा और शैक्षणिक संस्थानों में अपनी आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी चाहता है तो क्या कांग्रेस उसे सुनिश्चित करने का काम करेगी? आज देश के कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारें है, क्या वहाँ पर कांग्रेस की सरकार हिस्सेदारी की ऐसी रणनीति अपना रही है? अगर नहीं तो फिर दलित-वंचित और शोषित समाज उसे वोट देकर सत्ता में क्यों लाये? इसके साथ ही दलित-वंचित और शोषित समाज कांग्रेस से पूछना चाहता है कि जिन नेताओं को आप कांग्रेस में शामिल करके सत्ता में आने का सपना देख रहे हैं, उन्हें दलित-शोषित और वंचित समाज अपना नेता नहीं मानता।

नेतृत्व का वर्चस्व: शुरूआती कांग्रेस पार्टी में उच्च जातियों के नेताओं की प्रधानता थी, जिससे कई सामाजिक और सांस्कृतिक नीतियां पारंपरिक हिन्दू मान्यताओं से प्रभावित रहीं।

दबी हुई सामाजिक सुधार प्रक्रिया: आलोचकों का मानना है कि शुरूआती सरकारों ने जाति व्यवस्था और असमानता को दूर करने के लिए जितने कड़े कदम उठाने चाहिए थे, वे नहीं उठाए।

आरएसएस पर नरमी: महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन सरदार पटेल द्वारा कुछ शर्तों के साथ इसे 1949 में हटा भी लिया गया, जिससे संगठन को फिर से संगठित होने का मौका मिला।

वैचारिक विकल्प की कमी: कांग्रेस के भीतर समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष नारे होने के बावजूद, जमीनी स्तर पर रूढ़िवादी ताकतों को रोकने के लिए कोई आक्रामक वैचारिक संघर्ष नहीं किया गया, जिससे हिंदू राष्ट्रवाद की जमीन धीरे-धीरे मजबूत होती गई। आरएसएस का जन्म भी कांग्रेस में रहे नेता शिवराम मुंजे के द्वारा इटली के तानाशाह मुसोलिनी से प्रेरित होकर बलिराम हेडगवार ने किया था और तभी से देश की शासन सत्ता में रही कांग्रेस ने उसे सभी संरक्षण देकर देश में मजबूत किया और देश के दलित, शोषित और वंचित समाज की हमेशा अनदेखी की।

कांग्रेस अगर देश में लौटना चाहती है तो उसे निम्नलिखित कार्य करने होंगे-

1. दलित, शोषित व वंचित समाज से आ रहे बने बनाए राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लोगों से दूरी बनानी होगी।

2. दलित, शोषित व वंचित समाज के जागरूक व शिक्षित सच्चे अम्बेडकरवादियों का एक गठन करना होगा और उसी के द्वारा इस समाज से सुझाए गए नामों को राजनीति में अलग साझेदारी की जगह देकर सुदृढ़ करना होगा।

3. राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले दलित, शोषित व वंचित समाज के लोगों का चुनाव में जाने का फैसला भी इन्हीं नामित सदस्यों के द्वारा नामित करना होगा।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05