




2026-04-25 14:51:56
आतंकी उस व्यक्ति या समूह को कहा जाता है जो अपने राजनीतिक, धार्मिक या वैचारिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा, हत्या, अपहरण जैसे विनाशकारी कृत्यों को अंजाम देता है। इनका मुख्य उद्देश्य सरकार या जनता में भय पैदा करके दबाव बनाना और अपनी मांगें मनवाना होता है। पिछले 12 वर्षों के दौरान केंद्र में बैठी मोदी-संघी सरकार ने जनता के बीच भय पैदा करने के उद्देश्य से खुलेआम सरकारी और संवैधानिक एजेंसियों जैसे ईडी, इन्कम टैक्स, सीबीआई, पुलिस प्रशासन आदि का डर दिखाकर लोगों को आतंकित किया गया और जिन लोगों ने ऐसे कृत्यों का थोड़ा विरोध किया, उन्हें किसी न किसी केस में फंसाकर जेलों में बंद कराया गया। जो लोग देश में अवैध धन कमाने की प्रक्रिया में लगे हुए थे उनको जेल जाने का डर दिखाया और फिर उन्हें डर दिखाकर चुपके से भाजपा में शामिल कर लिया गया। केंद्र या राज्यों की सरकारों में ऐसे सभी कथित भ्रष्टाचारियों को मोदी-संघियों द्वारा भाजपा की वाशिंग मशीन में डालकर उन्हें पाक-साफ कर दिया गया। ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध जो मुकादमें चल रहे थे उन्हें अपराध मुक्त करके राज्य या केंद्र की सत्ता में शामिल कर लिया गया। देश के बहुत सारे बाहुबलियों और धार्मिक बाबाओं के खिलाफ जो केस चल रहे थे, उन्हें भी सत्ता बल की ताकत से भाजपा में मिलाकर अपराध मुक्त किया गया।
मोदी सत्ता में बढ़ा नफरत का सांप्रदायिक माहौल: मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने अपनी संघी मानसिकता के अनुरूप गुजरात को ‘हिन्दू प्रदेश’ बनाने का नारा दिया था। जिसको अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य से 2002 में गुजरात के अहमदाबाद में भयंकर सांप्रदायिक दंगे कराये गए, जिसमें दोनों तरफ के हजारों लोगों को जान-माल का आघात पहुंचा। गुजरात के इन दंगों में बिकलिस बानो का मामला बहुत चर्चित रहा। गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो का सामूहिक बलात्कार और हत्या के जघन्य अपराध हुए। 3 मार्च 2002 को, 5 महीने की गर्भवती बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप किया गया। उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या कर दी गई, जिसमें उनकी 3 साल की बेटी भी शामिल थी। गुजरात के दंगों से जुड़े दोषियों पर गुजरात प्रदेश के बाहर मुकदमा चलाया गया चूंकि यह मामला बहुत ही भयानक और भयावह था, गुजरात के दंगों के दौरान गुजरात पुलिस ने शुरूआती दौर में आरोपियों के खिलाफ मामला खारिज कर दिया था, जिसके बाद निष्पक्ष सुनवाई के लिए यह मामला 2004 में महाराष्ट्र में हस्तांतरित किया गया। जनवरी 2008 में आरोप तय हुए और 2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखा। मार्च 2022 में 2 भाजपा विधायकों, 1 पूर्व भाजपा पार्षद और महिला मोर्चे की 1 सदस्य ने दोषियों को सजा में मांफी देने की मांग की। उसी वर्ष 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) पर अच्छे आचरण के आधार पर सरकार के दबाव में गुजरात दंगों के 11 दोषियों को रिहाह करा दिया गया। रिहाई के बाद संघी मानसिकता के भाजपा कार्यकतार्ओं ने उनका फूल मालाओं और मिठाइयों के साथ स्वागत किया। इसे देखकर पूरा देश अचंभित था। बिलकिस बानो और उसके साथी इस केस को लेकर उच्चतम न्यायालय गए, वहाँ पर गुजरात सरकार ने बताया कि इस रिहाई के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी ली गई थी, जिसे अमित शाह के गृह मंत्रालय ने स्वीकृति दी थी। हालांकि इसके बाद हुए वैश्विक आक्रोश के कारण सुप्रीम कोर्ट ने इस रिहाई को भ्रामक तथ्यों पर आधारित बताते हुए रद्द कर दिया। इसके बावजूद भी इन 11 दोषियों को दोबारा जेल भेजने में जनवरी 2024 तक का समय लग गया।
मोदी सरकार में अधिक हुई लिंचिंग की घटनाएँ: हरियाणा का 16 वर्षीय जुनैद खान, राजस्थान के 55 वर्षीय पहलू खान, केरल के अत्ताप्पादि का रहने वाला 30 वर्षीय आदिवासी मधु, बंगाल के 19 वर्षीय अनवर हुसैन और हाजीफुल शेख यह चंद नाम हैं, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में भीड़नुमा हत्यारों (मॉब लिंचिंग) के शिकार हुए। देश में 2010 से लेकर 2017 के बीच मॉब लिंचिंग की 63 घटनाएं हुई, जिसमें 28 लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। जानकर हैरत होती है कि ऐसी घटनाओं में से 52 फीसदी अफवाहों पर आधारित थीं। मई 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से कुल घटनाओं में से 97 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई। मॉब लिंचिंग की 63 घटनाओं में से 32 घटनाएं गायों से संबंधित थी और अधिकतर मामलों में राज्य के अंदर बीजेपी सत्ता में थी। इन दिल दहला देने वाली 63 घटनाओं में मरने वाले 28 लोगों में से 86 फीसदी यानि की 24 मुस्लिम समुदाय के लोग थे। साथ ही इन घटनाओं में कुल 124 लोग जख्मी हुए। 7 साल की छोटी सी अवधि में मॉब लिंचिंग की घटनाओं में वृद्धि सत्ता बल से लोगों की बदलती मानसिकता पर सवाल खड़े करती है।
मॉब लिंचिंग की घटनाओं और जय श्रीराम नारे के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए अलग-अलग क्षेत्रों की 49 हस्तियों ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी में अपर्णा सेन, कोंकणा सेन शर्मा, रामचंद्र गुहा, अनुराग कश्यप, शुभा मुद्गल जैसे अलग-अलग क्षेत्र के दिग्गजों के हस्ताक्षर हैं। पीएम को संबोधित करते हुए चिट्ठी में लिखा गया है कि देश भर में लोगों को जय श्रीराम नारे के आधार पर उकसाने का काम किया जा रहा है। साथ ही दलित, मुस्लिम और दूसरे कमजोर तबकों की मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की गई है।
लिंचिग की घटनाओं में वृद्धि से दुखी हैं: आम जन चिट्ठी में लिखा गया, आदरणीय प्रधानमंत्री... मुस्लिम, दलित और दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की लिंचिंग तत्काल प्रभाव से बंद होनी चाहिए। नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े देख हम हैरान हैं। एनसीआरबी के डेटा के अनुसार, दलितों के साथ 2016 में 840 हिंसक घटनाएं हुईं। इन अपराध में शामिल लोगों को दोषी करार देने के आंकड़े में भी कमी आई है। नेशनल अवॉर्ड विनर डायरेक्टर अपर्णा सेन और मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी इस पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।
जय श्री राम नारे का इस्तेमाल हुआ लिंचिंग के लिए पत्र में जय श्रीराम के नारे के दुरुपयोग पर भी चिंता जाहिर की गई है। पत्र के अनुसार, बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इन दिनों जय श्रीराम का नारा युद्ध उन्माद जैसा बनता जा रहा है। कानून और व्यवस्था तोड़ने के लिए और बहुत बार लिंचिंग के वक्त भी इसी नारे का प्रयोग किया जा रहा है। जो हैरान करने वाला है कि धर्म के नाम पर ऐसा किया जा रहा है। राम के नाम पर ऐसे अपराध को अंजाम देने की घटनाओं पर लगाम लगनी जरूरी है।
कठुआ मामले पर प्रतिक्रिया: दोषियों को राजनीतिक संरक्षण मिलना भले ही असाधारण लगे, लेकिन यौन हिंसा के दोषी अपराधियों को समर्थन मिलना कई बार देखा गया है। ऐसा ही एक मामला जम्मू-कश्मीर के कठुआ में मुस्लिम घुमंतू जनजाति की आठ वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के दोषियों की सजा के खिलाफ हुए जोरदार प्रदर्शनों में देखने को मिला। 8 वर्षीय बच्ची को अगवा किया गया, नशीला पदार्थ खिलाया गया और कई दिनों तक उसके साथ बलात्कार किया गया और अंतत: कठुआ के एक मंदिर में उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। बलात्कार के आरोपियों के समर्थन में भाजपा समर्थकों और नेताओं ने तिरंगा लेकर रैली निकाली, जबकि भाजपा महिला मोर्चा ने अभियोजन पक्ष के वकील के खिलाफ नारे लगाते हुए प्रदर्शन किया था। मामले में कुल सात आरोपी थे, जिनमें मंदिर के पुजारी का एक नाबालिग बेटा भी शामिल था। आरोपियों की गिरफ्तारी के विरोध में आयोजित ‘हिंदू एकता’ रैली को संबोधित करने वाले दो भाजपा राज्य मंत्रियों को जनाक्रोश के बाद इस्तीफा देना पड़ा था। आखिरकार, तीन साल बाद विशेष अदालत ने आठ वर्षीय बच्ची के बलात्कार और हत्या के मामले में तीन लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई। तीन पुलिस अधिकारियों को सबूत नष्ट करने का दोषी पाया गया और उन्हें पांच साल की सजा दी गई। नाबालिग आरोपी को अदालत ने बरी कर दिया।
उन्नाव के पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर एक नाबालिग लड़की के अपहरण, बलात्कार और अवैध बंधक बनाने के आरोपी है। पीड़िता द्वारा नामजद किए जाने के बावजूद सेंगर का उत्पीड़न जारी रहा। शुरूआत में लड़की ने महीनों तक स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की। बाद में सेंगर के गुंडों और पुलिस के दबाव तथा धमकियों से तंग आकर उसने भाजपा के मुख्यमंत्री के आवास के सामने यह कहते हुए आत्मदाह का प्रयास किया कि पुलिस उसकी शिकायत दर्ज नहीं कर रही। इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन हरकत में आया और राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान इस मामले पर गया। इसी दौरान, लड़की के पिता को ही पुलिस ने आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया। पीड़िता द्वारा आत्मदाह के प्रयास के अगले ही दिन, पुलिस हिरासत में चोटों के कारण लड़की के पिता की मौत हो गई और उन्हें मृत अवस्था में अस्पताल लाया गया। इसके बाद पुलिस ने सेंगर के खिलाफ मामला दर्ज किया और कहा कि पहले लड़की के बयान में ‘विसंगतियों’ के कारण मामला दर्ज नहीं किया गया था। मगर हकीकत यह नहीं थी मामले को दबाने के लिए सत्ता का साथ होना था। भाजपा सरकारों में ये सब आम बात हो चली है।
लड़की ने हिम्मत नहीं हारी और केस को आगे बढ़ाया, लेकिन इस दौरान एक और हादसा हुआ. जब वह अपनी दो रिश्तेदार महिलाओं और वकील के साथ स्थानीय अदालत में बयान देने जा रही थी, तभी उनकी कार को संदिग्ध परिस्थितियों में एक ट्रक ने टक्कर मार दी। इस हादसे में दोनों महिला रिश्तेदारों की मौत हो गई, जबकि लड़की और उसका वकील गंभीर रूप से घायल हो गए। मामला दो साल से अधिक समय तक चलता रहा। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई के लिए केस को दिल्ली स्थानांतरित किया। सीबीआई ने सेंगर के खिलाफ बलात्कार का आरोपपत्र दाखिल किया और साथ ही उसके भाई व अन्य सहयोगियों के खिलाफ पीड़िता के पिता को फंसाने और हिरासत में उनकी मौत के लिए अलग आरोपपत्र दायर किया। अपराध के तीन साल बाद सेंगर को बलात्कार के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई। एक साल बाद, पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में भी सेंगर और अन्य आरोपियों को 10 साल की सजा दी गई। वर्तमान में सेंगर जेल में बंद हैं, और उनकी सजा पर रोक लगाने की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। देश में भाजपा-संघी सरकार है, आगे क्या होगा, देखना अभी बाकी है। देश की न्यायपालिका भी समझौता मार्ग पर चलने का फैसला कर चुकी है।
मोदी-संघी सरकार के सभी कृत्य उन्हें ‘आतंकी’ घोषित करने के लिए पर्याप्त हैं। मोदी-संघी सरकार की मानसिकता मानवता विरोधी, देश विरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी, दलित विरोधी विज्ञान और संविधान विरोधी है। जनता को देश हित में सकारात्मक फैसला लेकर जल्द से जल्द देश की सत्ता से हटाना होगा।





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