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आंबेडकरवादी अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि वे यहां के मूलनिवासी हैं। वे मानते रहे हैं कि वे यहां के शासक थे और अब फिर उन्हें शासक बनना है। वे मानते हैं कि उनकी हर समस्या का समाधान शासक बनने पर ही होगा। वे यह भी मानते हैं कि छुआछूत, भेदभाव, ऊंच-नीच, असमानता, मनुवादी संस्कृति, गरीबी और अशिक्षा उनकी समस्याएं रही हैं और उन्हें लगता है कि यह समस्या शासक बनने पर ही खत्म होगी। इसीलिए हर एक आंबेडकरवादी शासक बनना चाहता है। लेकिन उसके लिए इन समस्याओं का महत्व नहीं है। सभी केवल विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं। मूल बात यह है कि आज के दौर में ऐसा कोई संगठन नहीं है जो सभी आंबेडकरवादियों को एकजुट रख सके। हालांकि देखा जाए तो आंबेडकरवादी राजनीति में संगठनों का एक दौर रहा। जब 30 सितंबर, 1956 को डॉ. आंबेडकर ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन को भंग करके नई राजनीतिक पार्टी ‘रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया’ की घोषणा की थी, जिसका उनके परिनिर्वाण के बाद पंजीकृत हुआ। लेकिन फिर यह साबित हुआ कि अपने आपको आंबेडकरवादी कहने वाले और पूरे देश को बौद्धमय बनाने की बात करने वाले आपस में ही मिलजुल कर नहीं रह पाये।
50 से अधिक टुकड़ों में बंटा आरपीआई: आरपीआई के नेताओं ने ही आरपीआई को 50 से अधिक टुकड़ों में बांट दिया जो अब निष्क्रिय और नगण्यता के शिखर पर है। इनमें एक है आरपीआई (आठवले गुट), जिसका नेतृत्व रामदास आठवले करते हैं और वर्तमान में भाजपानीत केंद्र सरकार में मंत्री हैं। एक गुट भारिपा बहुजन महासंघ है। इसका नेतृत्व प्रकाश आंबेडकर करते हैं। यह गुट वंचित बहुजन अघाड़ी के रूप में चुनाव लड़ता है। जबकि तीसरा संगठन है आरपीआई (गवई गुट)। इस गुट का नेतृत्व राजेंद्र गवई करते हैं। वहीं, आरपीआई (यूनाईटेड) 2009 में कई गुटों के एकीकरण से बना। इसका नेतृत्व जोगेंद्र कवाडे करते हैं। इसी तरह से एक पीपुल्स रिपब्लिकन पार्टी है। यह पार्टी आंबेडकरवादी विचारधारा पर चलने का दावा करती है। आरपीआई के अलावा अन्य सक्रिय गुटों में आरपीआई (कांबले), राष्ट्रीय रिपब्लिकन पार्टी, आरपीआई (एस), आरपीआई (आंबेडकर), भारतीय रिपब्लिकन पक्ष आदि शामिल हैं।
भारतीय बौद्ध महासभा का हाल: आंबेडकरवादी संगठनों में भारतीय बौद्ध महासभा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। डॉ. आंबेडकर ने 4 मई, 1955 को इसका गठन किया था। इस संगठन का मकसद था कि बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया जाए और नवबौद्धों को एक सूत्र में बांधा जाए। लेकिन यह संगठन भी कई टुकड़ों में बट गया और जातिगत संगठन बनकर रह गया। बौद्ध महासभा राज्य इकाई और जिला इकाई के बाद बौद्ध विहार की इकाई में बटा हुआ है। लेकिन आप किसी भी बौद्ध विहार के सदस्यों की लिस्ट तथा उनके पदाधिकारी की लिस्ट देखेंगे तो आपको पता चलेगा यह बौद्ध विहार नहीं बल्कि किसी खास जाति का मठ है, जिसमें दूसरी जातियों के बुद्धिस्टों का प्रवेश नहीं होता है। बौद्ध महासभा के केंद्रीय स्तर पर भी कई गुट हैं। इनमें से मुख्य तीन हैं। पहला है राजरत्न आंबेडकर गुट। राजरत्न आंबेडकर इसके ट्रस्टी-चेयरमैन एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। यह डॉ. आंबेडकर के परिवार से सीधे तौर पर जुड़ा है। इसका मुख्यालय मुंबई में है। यह गुट सबसे अधिक सक्रिय है और अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संगठनों से जुड़ा है। यह धम्म दीक्षा कार्यक्रम चलाता है। दूसरा गुट है चंद्रबोधि पाटिल गुट। चंद्रबोधि पाटिल इसके ट्रस्टी चेयरमैन हैं। इसका केंद्र मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में है। एक और गुट है भीमराव यशवंत आंबेडकर (मीराताई गुट)। यह गुट भी डॉ. आंबेडकर के परिवार से जुड़ा है, जिसका नेतृत्व भीमराव यशवंत आंबेडकर करते हैं। मीराताई यशवंत आंबेडकर मुख्य संरक्षक थी।
गुटों में बंट गया कांशीराम और डी.के. खापर्डे का बामसेफ: यही हाल मान्यवर कांशीराम के द्वारा बनाए गए संगठन बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी का है। कांशीराम ने आंबेडकर और फुले की विचारधारा को अन्य वंचित समाज के लिए सुलभ बनाने में बड़ा योगदान दिया और लोगों को मिशन से जोड़ा। कांशीराम और डी.के. खापर्डे द्वारा 1978 में गठित बामसेफ खास तौर पर दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के सरकारी कर्मचारियों का संगठन था। लेकिन अब यह कई गुटों में बंटा हुआ है। 1986 में बामसेफ में बड़ा विभाजन हुआ। इसका कारण बना कांशीराम द्वारा बसपा के गठन के बाद बसपा को अधिक तरजीह देना। इसका एक हिस्सा बसपा से जुड़ा और शूडो बामसेफ कहलाया। दूसरा गैर-राजनीतिक खापर्डे के नेतृत्व में बामसेफ के नाम से पंजीकृत हुआ। वर्तमान में इसके कई गुट और धड़े सक्रिय हैं। सटीक संख्या तय नहीं है, क्योंकि कई गैर-पंजीकृत हैं। लेकिन व्यावहारिक रूप से 5-6 प्रमुख हैं और माना जाता है कि बीस से अधिक छोटे-बड़े गुट हैं। प्रमुख गुटों में वामन मेश्राम गुट है। यह राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ और भारत मुक्ति मोर्चा आदि सहयोगी संगठनों के साथ सबसे अधिक सक्रिय है। राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ का गठन वामन मेश्राम गुट द्वारा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग को एकजुट करने के लिए किया गया। जबकि भारत मुक्ति मोर्चा वामन मेश्राम का संगठन है जिसका उद्देश्य धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक समुदायों व दलित-बहुजनों को एक साथ गोलबंद करना है। यह संगठन चुनावी गतिविधियों में भी भाग लेता है।
दूसरा है बी.डी. बोरकर गुट (डी.के. खापर्डे मेमोरियल ट्रस्ट)। यह गुट गैर-राजनीतिक परंपरा पर जोर देता है। तीसरा गुट है एस.एस. धम्मी गुट। कुछ और छोटे गुट हैं। इनमें सुरेश माने, झल्ली और काले आदि से जुड़े हैं। इसके अलावा कुछ राजनीतिक पार्टियां भी बन चुकी हैं। इनमें पीपीआईडी, बीएमपी आदि प्रमुख हैं।
शासक बनना चाहते है तो क्या करें? यदि शासक बनना है तो सबसे पहले काम यह करना होगा कि बहुजन जातियों में एकता लानी होगी, कम-से-कम बहुजन नेता आपस में एकजुट हों। सर्वसम्मति से किसी एक व्यक्ति को चुनाव में खड़ा किया जाए और सब उसके लिए मेहनत करें। यह तभी मुमकिन होगा जब बहुजन समाज की हर जाति को लेकर चलें, छोटी से छोटी वंचित जातियों के लोगों को प्रतिनिधित्व मिले, उनकी समस्याओं को सुना जाए, ताकि किसी एक जाति का नेता या संगठन होने का ठप्पा ना लगे। व्यक्ति केंद्रित संगठन न हो। इसके नियमित चुनाव हो और अध्यक्ष बदले जाएं, संगठन चलाने के लिए प्रबंध कमेटी हो। जो यह ध्यान रखें कि संगठन में डेमोक्रेसी का पालन किया जा रहा है या नहीं। जब किसी बहुजनवादी संगठन में अध्यक्ष नहीं बदलता है तो टूट की स्थिति आ जाती है। इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को सर्वोपरि रखा जाए। प्रचारकों की एक शृंखला तैयार की जाए जो लोगों को आंबेडकरवादी विचारधारा से जोड़े। जन मुद्दों को लेकर लगातार संघर्ष करें। लोगों को यह नहीं लगना चाहिए कि आप सिर्फ चुनाव के समय सक्रिय हो जाते हैं और बाकी समय सोते रहते हैं।
बहुजन समाज में एकता की कमी: बहुजन समाज बहुत सारे जातीय घटकों से मिलकर बना है। जिन समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति लगभग एक जैसी है, वे सभी बहुजन समाज की श्रेणी में आते हैं। इनमें कुछेक कृषक जातियाँ भी है जिनकी गिनती पिछड़े वर्ग में होती है। जो जातियाँ कामगार श्रेणी में आती है वे सभी जातियाँ इस देश की कामगार श्रमिक वर्ग से संबंधित है और वास्तविकता के आधार पर यही जातियाँ बहुजन समाज का मूल आधार है। कामगार दृष्टि से अगर देखा जाये तो बहुजन समाज की ये सभी जातियाँ आधुनिक समाज के वैज्ञानिक और तकनीसियन है। इस तकनीकी समाज में बिखराव का कारण यह है कि देश में जातिवाद और ब्राह्मणवाद चरम पर है, कोई भी जातीय वर्ग अपने आपको किसी से कम नहीं समझता और प्रत्येक जातीय घटक का व्यक्ति अपने आपको दूसरे जातीय घटक के व्यक्ति से श्रेष्ठ और ऊंचा समझता है। इस प्रकार की क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था ब्राह्मणवाद की देन है जिसकी वजह से कोई भी जातीय घटक एक-दूसरे जातीय घटक के साथ मिलकर नहीं रहता। बल्कि वह ब्राह्मणवादी संघियों की तरफ झुकाव रखता है। प्रत्येक तकनीकी ज्ञान वाला व्यक्ति अपने तकनीकी ज्ञान को दूसरे व्यक्ति के तकनीकी ज्ञान से श्रेष्ठ मानता है। यही असली मुद्दा है, जो तकनीकी समाज को एक साथ खड़े होने से रोकता है। यह मनोवैज्ञानिक रोग है इस प्रकार की सोच के पीछे ब्राह्मणवाद और मनुवाद है। जिसमें वास्तविकता कुछ भी नहीं है। वास्तविकता के आधार पर सभी मनुष्य समान है उन सभी का तकनीकी ज्ञान एक-दूसरे से भिन्न ही होगा। मनुष्य का निर्माण प्रकृति से हुआ है, कोई भी मनुष्य मशीन से नहीं बना है। जो चीजें मशीन से बनती है वे सभी एक जैसा व्यवहार करती है। प्रकृति से बनी हुई चीजों में भिन्नता आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसलिए बहुजन समाज के तकनीकी ज्ञान वाले व्यक्तियों से अनुरोध है कि वे अपने साथ के दूसरे तकनीकी ज्ञान वाले व्यक्ति से दूरी न बनाकर रखे, आप सब एक ही है अगर आप सब एक बनकर सगठित रहोगे, तो आपको परास्त करने वाले आपके सामने टिक नहीं सकते। अगर आप अनावश्यक बातों के कारण विघटित रहोगे तो आप कमजोर ही बने रहोगे। शक्ति संगठन में ही निहित होती है, विघटन में नहीं।
उप-जातियों के आधार पर सामाजिक विघटन: देश में 6743 जातियाँ हैं और हर एक जाति में दर्जनों उपजातियाँ है। इन सभी जातियों और उप-जातियों में क्रमिक ऊंच-नीच की भावना है। जिसके कारण समाज में स्वत: विघटन चलता है और समाज निरंतरता के साथ विघटित होकर कमजोर होता रहता है। उदाहरण के तौर पर देखे तो चमार जाति सबसे बड़ी जाति है। जिसमें कई दर्जन उप जातियाँ है। वे सभी अपनी-अपनी उपजातीयता को श्रेष्ठ समझकर आचरण करते हैं और एक साथ कभी भी मिलकर विचार-विमर्श नहीं करते जिसका सीधा फायदा ब्राह्मणवादी और मनुवादी ताकतों को मिलता है। यही एक प्रबल कारण है कि मनुवादी संघी लोग आज सत्ता में स्थापित है और बहुजन समाज अधिसंख्यक होकर भी सत्ता से बाहर है। इस वर्ग की कुछेक जातियाँ ब्राह्मणवादियों की मानसिक गुलाम है और मानसिक गुलामी करके ही वे अपने आपको श्रेष्ठ समझते हैं।
त्याग और समर्पण की कमी: बहुजन समाज के जातीय घटक कई हजार वर्ष की गुलामी के कारण हीन भावना के शिकार हो चुके हैं। वे हीन भावना के कारण ही अपने आपको कमजोर और छोटा, मन से मानने लगे हैं। इस अहम वजह से उनमें त्याग, समर्पण और एकता का भाव कमजोर हुआ है। जब तक यह कारण इनकी आंतरिक संरचना और मानसिक स्तर पर स्थापित रहेगा तब तक इस समुदाय में श्रेष्ठता का भाव उत्पन्न नहीं हो पायेगा। इसलिए बहुजन समाज के जातीय घटकों से विशेष अनुरोध है कि वे अपने अंदर दान, क्षमा, समर्पण और त्याग की भावना पैदा करें, आप किसी से कमजोर नहीं है। इसलिए अगर आपके ऊपर कोई अत्याचार व उत्पीड़न की घटना होती है, और पुलिस व राज्य प्रशासन आपके साथ कानून सम्मत कार्यवाही नहीं करता, तो आप भी ऐसे अत्याचारियों का चाहे वे कितने भी शक्तिशाली हो एकता के साथ इकट्टा होकर ईंट का जवाब पत्थर से दें। अत्याचार का इलाज विरोध करने से घटता है और सहन करने से बढ़ता है। इसलिए आज देश में बहुजनों के साथ अत्याचार की घटनाएँ बढ़ रही है क्योंकि हम उन्हें सहन करते जा रहे हैं।





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