




2026-02-20 13:54:03
भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ और 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र राज्य की स्थापना हुई। 26 जनवरी से ही भारत में लोकतंत्र हैं और तभी से देश में भारतीय संविधान लागू है। लोकतंत्र का तात्पर्य होता है कि जनता का राज, जनता के लिए। लेकिन भारत में जाति-व्यवस्था की जड़े बहुत गहराई तक समाई हुई है जिसके फलस्वरूप पूरे देश का समाज 6743 जातियों में बटा हुआ है। जाति व्यवस्था के कारण हरेक जाति में क्रमिक उंच-नीच की भावना विद्यमान है। एक ही जाति के लोग क्रमिक ऊंच-नीच के कारण अपने आपको नीचा या ऊंचा मानते हैं। जिसके कारण समाज में एकता का भाव नहीं है और न ही समाज संगठनात्मक रूप से एक सूत्र में बंधा हुआ है। भारत की जनता जातिवादी मानसिकता के कारण अपनी ही जाति के व्यक्ति को वोट करने की भावना रखती है। जिसके परिणामस्वरूप भारत में अच्छी मानसिकता वाले निष्पक्ष और निर्भीक नेता न तो पैदा हो रहे हैं और न ही अच्छे नेता राजनीति में आ पा रहे हैं। पूरे देश की राजनीति का वातावरण पूर्ण रूप से विषाक्त है। वर्तमान में मनुवादी संघी सत्ता स्थापित है जो पूरे देश में जातिवाद और धर्मवाद को बढ़ावा दे रही है। देश के अल्पसंख्यक वर्तमान सरकार की नीतियों के कारण भयभीत है, उनके साथ हर किस्म का दुर्व्यवहार किया जा रहा है। हिन्दू-मुसलमान, मंदिर मस्जिद के अलावा कोई भी कार्य नहीं चल रहा है। जनता को अतार्किक और अवैज्ञानिक धार्मिक कर्मकांडों में उलझाया जा रहा है। देश के शिक्षण संस्थानों का पूरी तरह से भगवाकरण हो चुका है। देश के शिक्षण व शोध संस्थाओं में मनुवादी संघी व्यक्तियों की स्थापना हो चुकी है।
संस्थानों में भ्रष्टाचार का लेबल कांग्रेस शासन के सापेक्ष 10-15 गुना बढ़ चुका है। महंगाई और बेरोजगारी चरम पर है, देश की आम जनता त्रस्त है। स्वास्थ्य की समस्याएं प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है, देश के नागरिकों के पास न रोजगार है न पैसा है, तो ऐसी हालत में देश की गरीब जनता अपनी समस्याओं से कैसे निपटे? देश के प्रधानमंत्री को झूठ बोलने और नौटंकी करने से फुरसत नहीं है। प्रधानमंत्री अपने अंधभक्तों को झांसे के तहत यह बता रहे है कि देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना है। देश का संविधान किसी भी धर्म को मान्यता नहीं देता। प्रधानमंत्री मोदी का सबसे गंभीर अपराध यही है कि वे अपने कुछेक अंधभक्तों व गुंडों के सहारे हिन्दुत्व का राग अलापते घूम रहे हैं। सबको पता है कि यह देश हिन्दू राष्ट्र नहीं बन पाएगा, लेकिन देश के प्रधानमंत्री मोदी सामाजिक ताने-बाने को अपने आचरण और नौटंकीमय छलावे से इतना विषाक्त बना रहे हैं कि अगर वर्तमान सरकार बदल भी जाती है तो जो भी नई सरकार आएगी उसे देश के वातावरण को संविधान सम्मत चलाने के लिए कम से कम 15-20 साल का वक्त लग सकता है।
नेताओं में भष्टता की पराकाष्ठा: देश को सही दिशा में आगे ले जाने के लिए एक सक्षम नेता की आवश्यकता होती है। जो देश की परिस्थितिकी के अनुसार सभी प्रकार की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए देश और जनता के हित में संसद में विचार-विमर्श के बाद उनके समाधान हेतु योजनाओं का निर्माण करे और उन योजनाओं को समाज के सकारात्मक कल्याण के लिए क्रियान्वित भी करें। आजादी के बाद देश की बागडोर कांग्रेसी नेताओं के हाथों में आई जिसका उद्देश्य होना चाहिए था कि भारत के संविधान को उसकी मूल भावना के अनुरूप जमीन पर उतारा जाये। देश में गहराई तक जातिवाद और धर्मवाद को कमजोर किया जाये, एक ऐसे समाज का निर्माण किया जाए जो अपने आप में सक्षम, निर्भीक, समर्थ और सभी प्रकार की कुरीतियों से मुक्त हो। देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह समाज से ऐसे नेताओं को चुने जो भ्रष्टाचार और जातिवादी मानसिकता से मुक्त हो। साथ ही उनमें सामंतवादी और ब्राह्मणवादी विचारधारा न हो। विडम्बना यह है कि आज समाज में ऐसे नेताओं का मिलना नामुमकिन हो चला है, मोदी-संघी सरकार में हर रोज खबरें मिलती है कि पानी की टंकी बनने से पहले ही गिर गयी, नदी या नालों के ऊपर बन रहे पुल पूरा होने से पहले ही गिर जाते हैं, सड़के बनने से पहले ही उखड़ जाती है, नयी योजनाओं के नाम पर सिर्फ शहरों, सड़कों, व पुरानी इमारतों के नाम बदलकर अपने समय में बने हुए दिखाये जा रहे है। इस प्रकार के सभी कार्य डबल इंजन की सरकारों में अधिक हो रहे हैं। ये सभी घटनाएँ अधिक भ्रष्टाचार को दर्शाती है। मोदी संघी सरकार जब 2014 में सत्ता में आई थी तो उसका जोर-शोर से नारा था मोदी-संघी सरकार देश को भ्रष्टाचार मुक्त करेगी, परंतु अब देश की जनता देख रही है कि जहां-जहां पर भाजपा संघियों की डबल इंजन की सरकारें हैं वहाँ-वहाँ पर भ्रष्टाचार की घटनाएँ 10-15 प्रतिशत अधिक बढ़ चुकी है। लेकिन देश का प्रधानमंत्री और संघ परिवार इन मुद्दों पर न बात करता है और न अपनी सरकारों की जवाबदेही तय करता है। संघी मानसिकता के लोग अपनी आंतरिक संरचना के मुताबिक वर्तमान की बात न करके अतीत या भविष्य की बात करके जनता को झांसे में रखते हैं। मोदी संघी सरकारों ने अपने भ्रष्टाचारों को ढकने के लिए अंधभक्तों की अतार्किक फौज खड़ी करके 24७7 विभिन्न प्रचार माध्यमों से भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालने का काम करती है।
शूद्र वर्ण के लिए दासत्व का संकेत: 2014 से सरकार चला रहे संघी केवल मुसलमानों और ईसाइयों का ही दमन नहीं चाहते, बल्कि वे शूद्र वर्ण की सभी जातियों, दलित, आदिवासी समुदायों को भी गुलाम बनाना चाहते हैं। दुखद और ऐतिहासिक सत्य यह है कि महात्मा फुले के बाद देश में ऐसा कोई शूद्र चिंतक नहीं उभरा जो ब्राह्मणवाद (आरएसएस) के रथ को रोक सके। कई शूद्र विशेषकर कृषक समाज की जातियाँ आरएसएस के जाल में फंस गई, आरएसएस ने दिखावे के लिए सरदार बल्लभभाई पटेल जो शूद्र समाज के ही व्यक्ति थे, उन्हें अपनाया और शूद्रों को यह विश्वास दिलाया कि उनके हिन्दुत्व में उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल होगा जबकि सत्यता इसके विपरीत थी। संघी परिवार सावरकर को अपना ‘आईकन’ मानता है और उन्हीं के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को आगे बढ़ाता है। आज का संघ परिवार सावरकर को गांधी के स्थान पर स्थापित करना चाहता है उनमें यह भी विचार चल रहा है कि भारतीय करंसी पर गांधी की तस्वीर हटाकर सावरकर की लगायी जाये। अंदर से पूरा संघ परिवार देश की जनता को धोखे में रखकर इसी कार्य को अंजाम देने के लिए अदृश्य रूप से लगा हुआ है। संघ परिवार में ब्राह्मण-बनियों की बौद्धिकता बाबा साहेब डॉ.अम्बेडकर के हिन्दूवादी विचारों को लंबे समय तक पचा नहीं पाएगा।
अम्बेडकरवाद की जमीन भी अब उपजाऊ होती जा रही है, मगर इसको खतरा भी है। संघ परिवार के रहस्यमयी षड्यंत्रकारी रणनीतिकार अम्बेडकरवादी नेताओं को विभिन्न तरीकों से अपने संघी मानसिकता के जाल में फँसाने की अदृश्य कोशिशों में लगे हुए हैं। दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के नेता अपने लिए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को आदर्श मानते हैं, उन्हें आरएसएस के जाल में फँसाने का कार्यक्रम अदृश्य रूप से चलाया जा रहा है और शायद कथित अम्बेडकरवादी नेता उनके इस जाल में फंस ही जाएँगे! उसके बाद समाज के ये सभी कथित अम्बेडकरवादी दासता के मुहाने पर खड़े नजर आएंगे। संघ परिवार का यह दृढ़ मत है कि देश में लोकतंत्र स्थापित करने के लिए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर, जवाहरलाल नेहरू व उनके जैसे विचारों वाले कई अन्य नेता जिम्मेदार है। इसीलिए आए दिन देश में नेहरू के विरुद्ध संघ परिवार द्वारा हमला बोला जाता है और देशभर में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमाएं तोड़ने के पीछे भी उनकी यही षड्यंत्रकारी मानसिकता है। इस्लाम और ईसाई धर्म की तरह संघ परिवार के ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ से जुड़े लोग आने वाले समय में बौद्ध धर्म के अनुयायियों पर भी हमला बोलेंगे चूंकि सावरकर द्वारा 1923 में लिखी अपनी पुस्तक में बौद्ध धर्म को भी हिन्दू धर्म का दुश्मन बताया है। सावरकर की रणनीति के मुताबिक मोदी संघी सरकार का सबसे ज्यादा फोकस 2019-2024 के कार्यकाल में मुस्लिम विरोधी एजेंडा रहा। अयोध्या में राम मंदिर बनवाया, अनुच्छेद 370 समाप्त करके जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाया। जिससे देश की कमसमझ व अज्ञान जनता में यह संदेश गया कि मोदी-भाजपा मुस्लिम विरोधी है लेकिन अगर हिन्दू मानसिकता के अतार्किक अंधभक्त मुसलमानों के साथ अति करेंगे तो यह तय है कि इस्लामिक दुनिया एक होकर संघ परिवार के खिलाफ खड़ी हो जाएगी। वर्तमान में इसी तरह के संकेत मिल रहे हैं, जैसे- इस्लामिक नाटो (तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब सैन्य गठबंधन) का संभावित गठन इसका एक अच्छा उदाहरण है। संघ परिवार जानता है कि अगर भारत में मुस्लिमों के साथ अत्याचार बढ़े तो दुनिया के 56 से 60 इस्लामिक देश एक साथ मिलकर हिन्दू राष्ट्र के विरोध में झण्डा उठा सकते हैं!
संघ परिवार देश में जो भिन्न-भिन्न प्रकार से ईसाइयों को प्रताड़ित कर रहा है, दुनिया के ईसाई देश उसे समझ रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप की भारत विरोधी नीतियाँ और निर्णय, ईसाइयों की प्रताड़ना की प्रतिक्रिया का ही हिस्सा है। वर्तमान समय में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के कृषक समुदायों की उपज पर जो टैरिफ नीति अपनाई है वह नीति भी देशभर में संघ परिवार द्वारा ईसाइयों पर किये जा रहे हमलों का ही परिणाम है। मगर इसके जो दुष्परिणाम होंगे उसे देश की सम्पूर्ण जनता को भुगतना होगा। जिसकी संघ परिवार को न पहले चिंता थी, न आज है और न कल होगी।
संघ परिवार कुछेक कृषक, अति पिछड़ी जातियों के लठैतपन पर जिंदा: देशभर में दलितों-आदिवासियों व अत्यंत पिछड़ी जातियों पर जो अत्याचार-शोषण की घटना हो रही है, वे सभी शूद्र समाज की सामंतवादी विचारधारा वाली जातियों के लोगों के द्वारा ही उन्हें अंजाम दिया जा रहा है। ऐसी घटनाओं के पीछे रणनीतिक सोच संघ परिवार की होती है और घटनाओं को अंजाम देने वाले संघ परिवार के लठैत (जाट, गुर्जर, अहीर, कुर्मी, पटेल व अन्य समकक्ष जातियाँ) होती हैं। वर्तमान समय में देखने को मिल रहा है कि संघ परिवार की छिपी रणनीति के कारण शिक्षण संस्थानों, सरकारी संस्थाओं व न्यायिक क्षेत्र में जो असमानता पहले से स्थापित है उसे समतामूलक बनाने के उद्देश्य से यूजीसी द्वारा जो नए नियमों की घोषणा की, उसके कारण पूरे देश में संघ परिवार की मानसिकता से संक्रमित लोगों में उबाल दिखा, उसे देखकर अब इन पिछड़ी जातियों के लठैतों की आंखे खुल जानी चाहिए और अब उनके लठ की दिशा दलित-आदिवासी व अल्पसंख्यकों पर न होकर संघ परिवार की मानसिकता से संक्रमित लोगों की तरफ होनी चाहिए। अगर पिछड़े समाज (शूद्र) की ये सभी जातियाँ जैसे-जाट, गुर्जर, अहीर, कुर्मी, पटेल व अन्य समकक्ष जातियाँ अपने लठ और एकता की ताकत को संघियों के विरुद्ध खड़ा करके दिखाये तो देश में दलित-आदिवासियों व पिछड़े समुदायों के ऊपर किसी भी किस्म के अत्याचार नहीं होंगे और संघ परिवार की मानसिकता से संक्रमित लोग देश में भी नजर नहीं आएंगे और न संघी मानसिकता की सरकारों का निर्माण हो सकेगा! देश का लोकतंत्र व संविधान भी सुरक्षित बच सकेगा; देश में भ्रष्टाचार के ऊपर लगाम लग सकेगी; देश में ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ समाप्त हो सकेगा; देश में एकता और सामाजिक भाईचारे का भाव भी पैदा हो सकेगा; वैज्ञानिक सोच और आविष्कारों की शुरूआत हो सकेगी; देश की जनता समृद्ध और शक्तिशाली बन पाएगी; देश की समग्र जनता शांति और समृद्धि के पथ पर अग्रसर हो सकेगी।
(लेखक सीएसआईआर से सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं)





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