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मनुवादी सामाजिक व्यवस्था महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन

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2026-10-10 13:28:52

भारतीय इतिहास विभिन्न कालखंडों में ज्ञान, सत्ता और सामाजिक पदानुक्रम के अंतर्संबंधों का अध्ययन समाजशास्त्रियों, इतिहासकारों और सामाजिक सुधारकों के विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। विशेष रूप से, ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, डॉ. बी.आर. अंबेडकर और पेरियार जैसे विचारकों ने अपनी कृतियों में यह रेखांकित किया कि किस प्रकार मनुवादी वर्णाश्रम व्यवस्था और पुरोहितों ने शिक्षा पर एकाधिकार बनाए रखने और महिलाओं तथा बहुजनों को औपचारिक ज्ञान से वंचित रखा।

इतिहासकारों का मानना है कि ब्राह्मणवाद पितृसत्ता की अवधारणा को विकसित करता है। उनके अनुसार जाति-व्यवस्था और लैंगिक व्यवस्था अलग-अलग नहीं थीं; दोनों एक-दूसरे को मजबूत करती थीं। विशेषकर ऊँची जातियों में महिलाओं की यौनिकता और विवाह पर नियंत्रण को जाति की शुद्धता, पितृवंश और संपत्ति के संरक्षण से जोड़ा गया। ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था शिक्षा के खिलाफ नहीं थी; वह ज्ञान के सामाजिक वितरण को पदानुक्रमित करती थी। प्रश्न यह था कि किसे वेद पढ़ने का अधिकार है, किसे धार्मिक ज्ञान मिलेगा, किसे सार्वजनिक जीवन में प्रवेश मिलेगा और किसे घरेलू भूमिकाओं तक सीमित रखा जाएगा। उनका तर्क था। जिस समाज को ज्ञान से वंचित रखा जाएगा, उसे सामाजिक रूप से नियंत्रित करना आसान होगा।

वैदिक काल से उत्तर-वैदिक काल (लगभग 1500 ई.पू. 600 ई.पू.): प्रारंभिक वैदिक काल में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों के संदर्भ मिलते हैं, जिनका उल्लेख दार्शनिक बहसों में होता है। हालांकि, उत्तर-वैदिक काल तक आते-आते यज्ञीय कर्मकांडों का विस्तार हुआ, ज्ञान को ‘पवित्र’ और ‘गूढ़’ मानकर उस पर पुरोहितों का नियंत्रण दृढ़ होने लगा। ज्ञानार्जन और शिक्षा की शुरूआत का प्रतीक माने जाने वाले ‘उपनयन संस्कार’ के अधिकार से पहले शूद्रों और बाद में महिलाओं को भी बाहर कर दिया गया। शतपथ ब्राह्मण और अन्य परवर्ती ग्रंथों में महिलाओं की भूमिका को धीरे-धीरे घरेलू जिम्मेदारियों और धार्मिक अनुष्ठानों में केवल पति की ‘सहधर्मिणी’ तक सीमित किया जाने लगा।

सूत्र एवं स्मृति काल (लगभग 600 ई.पू. 300 ईस्वी): इस कालखंड को सामाजिक संहिताओं के संकलन का दौर माना जाता है, जहाँ सामाजिक पदानुक्रम को कानूनी और धार्मिक वैधता प्रदान की गई। मनुस्मृति के अनुसार, वैदिक शिक्षा और संस्कारों का अधिकार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तक सीमित रखा गया। शूद्रों और महिलाओं के लिए वेदों का श्रवण और अध्ययन पूर्णत: वर्जित कर दिया गया। महिलाओं के लिए वैवाहिक जीवन को ही उपनयन और गृहकार्य को ही गुरुकुल सेवा के समकक्ष ठहराया गया। इसी दौर में यह विचार संस्थागत हुआ कि स्त्री किसी भी आयु में स्वतंत्र होने योग्य नहीं है-बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के अधीन रहे। ज्ञान से अलगाव ने महिलाओं की आर्थिक और वैचारिक निर्भरता को अनिवार्य बना दिया। धर्मसूत्रों में वर्ण व्यवस्था का उल्लंघन कर विद्या ग्रहण करने वाले गैर-द्विज वर्गों के लिए कठोर दंडों का उल्लेख मिलता है, जिसने औपचारिक ज्ञान को पूरी तरह विशिष्ट वर्ग की संपत्ति बना दिया।

मध्यकाल (लगभग 600 ईस्वी 18वीं सदी): मध्यकाल में सामाजिक नियमों की जड़ता और अधिक गहरी हुई, जिससे शिक्षा और स्त्री अधिकारों की स्थिति अधिक संकुचित हुई। औपचारिक शिक्षा मुख्यत: पाठशालाओं, टोलों और अग्रहारों तक सीमित थी, जहाँ केवल उच्च वर्णीय पुरुषों को व्याकरण, तर्कशास्त्र, ज्योतिष और धर्मशास्त्र पढ़ाए जाते थे। जनसाधारण, दस्तकार, कृषक और महिलाएं औपचारिक साक्षरता से बाहर रहे। ज्ञान और सार्वजनिक जीवन से महिलाओं के निष्कासन के साथ-साथ बाल विवाह, पर्दा प्रथा, और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं को धार्मिक व सामाजिक सम्मतियां दी गईं। अल्पायु में विवाह के कारण बालिकाओं के लिए साक्षरता का कोई अवसर शेष नहीं रहा। मध्यकाल में कबीर, रविदास, तुकाराम, मीराबाई, जनाबाई जैसे संत-कवियों ने इस पुरोहिती एकाधिकार और लैंगिक असमानता को लोकभाषा के माध्यम से चुनौती दी। उन्होंने संस्कृत के आधिपत्य के सामने जनभाषा को ज्ञान और अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।

औपनिवेशिक काल और समाज सुधार (19वीं सदी से 20वीं सदी के प्रारंभ तक): ब्रिटिश शासन के आगमन, आधुनिक शिक्षा की शुरूआत और ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों ने मनुवादी व्यवस्था में पहली बार दरारें पैदा कीं। इस दौर में पुरातनपंथी तबकों की ओर से आधुनिक व समावेशी शिक्षा का कड़ा विरोध देखने को मिला। 19वीं सदी के आरंभ तक यह सामाजिक रूढ़ि स्थापित कर दी गई थी कि यदि कोई कन्या पढ़ना-लिखना सीखेगी तो वह विधवा हो जाएगी या कुल पर विपत्ति आएगी। 1848 में महात्मा ज्योतिराव फुले और क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ने पुणे के भिड़ेवाड़ा में शूद्र, अति-शूद्र और बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय खोला। जब सावित्रीबाई फुले पढ़ाने जाती थीं, तो रूढ़िवादी मानसिकता के लोग उनपर कीचड़, गोबर और पत्थर फेंकते थे, क्योंकि मनुवादियों के अनुसार शूद्रों और स्त्रियों को पढ़ाना धर्म के विरुद्ध था।

20वीं सदी में शिक्षा और समानता का संघर्ष राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई में बदल गया। डॉ. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘द रिडल आॅफ द वुमन’ और ‘जाति का विनाश’ में तर्क दिया कि जाति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अंतर्विवाह आवश्यक था, और अंतर्विवाह को लागू करने के लिए महिलाओं की कामुकता, स्वतंत्रता और शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण जरूरी था। उनके अनुसार, सामाजिक पदानुक्रम को बनाए रखने के लिए अज्ञानता को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। आजादी के बाद जब कानून मंत्री के रूप में डॉ. अंबेडकर ने ‘हिंदू कोड बिल’ पेश किया-जिसमें हिंदू महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, तलाक का अधिकार और बहुविवाह पर रोक का प्रावधान था-तब संसद के भीतर और बाहर रूढ़िवादी व पुरोहिती संगठनों ने इसका तीव्र विरोध किया। इस विरोध के कारण बिल को तत्कालीन प्रभाव से रोक दिया गया, जिसके विरोधस्वरूप डॉ. अंबेडकर ने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उधर, दक्षिण भारत में पेरियार ई.वी. रामासामी ने आत्मसम्मान आंदोलन चलाकर यह बताया कि जब तक पुरोहिती सत्ता और धार्मिक संहिताओं के वर्चस्व को नकारा नहीं जाएगा, तब तक महिलाओं को न तो शिक्षा मिल सकती है और न ही स्वतंत्रता। उन्होंने विवाहों में पुरोहित की अनुपस्थिति और महिलाओं के गर्भनिरोधक अधिकारों तक की वकालत की।

ऐतिहासिक कालक्रम दर्शाता है कि सामाजिक व्यवस्था के तहत शिक्षा पर एकाधिकार बनाए रखना केवल एक शैक्षिक प्रश्न नहीं था, बल्कि यह सामाजिक सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण का माध्यम था। महिलाओं और बहुजन वर्गों को ज्ञान से वंचित रखना उस व्यवस्था को बनाए रखने की पूर्व-शर्त थी। आधुनिक भारत का संविधान, जिसने अनुच्छेद 14, 15 और 21अ के माध्यम से सभी नागरिकों को बिना किसी लिंग या जातिगत भेदभाव के समानता और शिक्षा का अधिकार दिया, एक ऐतिहासिक कदम था।

वर्तमान में भारत में संविधान सत्ता है, जिसमें सरकार और सरकार के संवैधानिक अंगों को उसी के अनुरूप कार्य करना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। वर्तमान में सामाजिक स्थिति यह है कि जिन जातीय घटकों को अपने अधिकारों के लिए जागरूक होकर संघर्ष करना चाहिए वे अब मनुवादी व्यवस्था में अधिक घिरे हुए हैं। पिछड़े वर्ग की अत्यंत पिछड़ी जातीय घटक जैसे मल्लाह, बिंद, बेलदार, केवट, कानू, धानुक, कहार, कुम्हार, नाई, तमोली, भड़भुजा, तेली, हलवाई, सुनार, ठठेरा, दर्जी, रंगरेज, जुलाहा, मनिहार, कश्यप, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिया, मांझी, मछुआ, बढ़ई, गड़रिया, लौहार, आदि समुदाय के लोगों में मनुवाद को अधिक ढ़ोने की ललक पाई जा रही है। इनकी तार्किक सोच को कमजोर करके ब्राह्मणवादी/मनुवादी लेप को चढ़ाया जा रहा है, जिसके कारण ये सब अपने आपको हिन्दू धर्म के रक्षक मानते हैं। हिन्दूत्व की वैचारिकी से पैदा हुए लाभ को पुरोहित वर्ग खाकर मजबूत हो रहा है। लेकिन ये सभी अत्यंत पिछड़े जातीय घटक पुरोहितों की सेवा में नतमस्तक है। इन्हें अपने संवैधानिक अधिकारों की न चिंता है और न समझ है। इतना ही नहीं संख्याबल के आधार पर जब इस समुदाय के लिए संवैधानिक अधिकारों व हिस्सेदारी की बात होती है तो यह समुदाय मनुवाद के पाले में ही खड़ा दिखता है और उन्हीं का समर्थन करता है। हाल में चले पिछड़ो के आरक्षण विरोधी खेमे में भी इसी समुदाय के लोग अधिक दिखाई दे रहे थे। इन अत्यंत पिछड़ी जातीय घटकों ने कभी भी संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर का साथ नहीं दिया। बल्कि जो ब्राह्मणवादी समुदाय बाबा साहेब का विरोध कर रहा था ये सभी उनके पाले में ही खड़े दिखाई दिये। इस समुदाय के लोग जिस डाल पर बैठकर, हवा-पानी व भोजन की आस रखते हैं, उसी डाली को काटने का काम करते हैं। चूंकि पुरोहित वर्ग ने इन्हें बताया कि बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर तुम्हारे नेता नहीं है और न ही वे तुम्हारे लिए काम कर रहे हैं। वे तो सिर्फ अछूत वर्ग के लिए काम कर रहे हैं और वे उन्हीं के नेता है। ये पूरा का पूरा समुदाय उसी को सही और सच मानकर आजतक उसी के पीछे चल रहा है।

अत्यंत पिछड़े जातीय घटकों की मुक्ति के लिए केवल एक ही रास्ता है और वह है अंबेडकरवाद। अंबेडकरवाद सिर्फ दलितों के लिए नहीं बल्कि वह सम्पूर्ण बहुजन समाज के लिए मुक्ति का मार्ग है। जिसका मुख्य आधार है समता, समानता, न्याय, बंधुता। सभी अत्यंत पिछड़ी जातीय घटकों को इसी को आत्मसात करके उसका अनुशरण करना चाहिए और अपने हक अधिकारों की लड़ाई लड़नी चाहिए। अंबेडकरवादी समाज के लोग आपके दुश्मन नहीं बल्कि वे आपके हक अधिकारों की लड़ाई में निर्बाध रूप से आपके साथ खड़े है। ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था ने ज्ञान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना, लेकिन उसके वितरण को जाति और सामाजिक पदानुक्रम से जोड़ा। इसी तरह उसने महिलाओं को पूरी तरह अज्ञानी रखने की कोई एक समान नीति हर काल में नहीं अपनाई, लेकिन पितृसत्तात्मक नियमों के माध्यम से महिलाओं की यौनिकता, विवाह, संपत्ति, गतिशीलता और सामाजिक भूमिका पर नियंत्रण स्थापित किया। इस व्यवस्था को सबसे बड़ी चुनौती उन आंदोलनों से मिली जिन्होंने कहा कि ज्ञान जन्म से नहीं, मनुष्य होने के अधिकार से मिलना चाहिए।

बुद्ध की परंपरा, भक्ति आंदोलन, आधुनिक सामाजिक सुधार आंदोलन, ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले, सत्यशोधक आंदोलन, नारायण गुरु, पेरियार और डॉ. अंबेडकर, इन सभी की अलग-अलग धारायें थी लेकिन एक साझा बिंदु था: जन्म आधारित सामाजिक पदानुक्रम को चुनौती।

इसलिए आलोचना ब्राह्मण लोगों की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सामाजिक संरचना, विचारधारा और संस्थागत व्यवस्था की होनी चाहिए जिसने जन्म, जाति और लिंग के आधार पर ज्ञान तथा अधिकारों को असमान रूप से बांटा।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05