




2026-09-05 14:52:14
वर्तमान समय में महंगाई की दर हर रोज बढ़ती हुई दिखाई दे रही है, जिसके कारण समाज का हर वर्ग विशेषकर बहुजन समाज परेशान है। उनका दैनिक जीवन बढ़ती महंगाई के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है, उनके बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित हो रही है, घर में खर्च होने वाली ऊर्जा (बिजली) की दर भी बढ़ रही है, उससे भी उसका सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है। यातायात पर खर्च होने वाला बजट भी बढ़ रहा है। घर के निर्माण व उसके रख-रखाव के भी खर्चे बढ़ रहे हैं, व्यक्ति की आमदनी के सापेक्ष उपरोक्त सभी खर्च वर्तमान शासन में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं जिसके कारण जनता का दैनिक जीवन महंगाई के बढ़ते बोझ के कारण परेशान है। आम जनता को इस बढ़ती महंगाई से निपटने का कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा है, वर्तमान समय में महंगाई के कुछेक प्रकाशित आंकड़े निम्न प्रकार है-जुलाई 2026 में खुदरा मुद्रा स्फीति दर बढ़कर 4.45 प्रतिशत दर्ज की गई है, यही दर जून में 4.38 प्रतिशत थी। रिजर्व बैंक ने इस बढ़ती दर को संतोषजनक दायरे के भीतर बताया, लेकिन खाद्य पदार्थों में बढ़ती महंगाई के कारण, आम जनता पर इसका असर बना हुआ है।
महंगाई मुख्य रूप से तीन स्थितियों या कारणों से बढ़ती है:
मांग-प्रेरित स्थिति: यह स्थिति तब पैदा होती है जब बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की मांग उनकी आपूर्ति से अधिक हो जाती है।
पैसा बढ़ने पर: जब लोगों की आय बढ़ती है या बैंकों से आसानी से लोन मिलता है, तो लोगों के पास खर्च करने के लिए अधिक पैसा होता है, जिसके कारण महंगाई बढ़ती है।
असर: लोग ज्यादा सामान खरीदने निकलते हैं, लेकिन बाजार में सामान सीमित होता है। जिसके परिणामस्वरूप दुकानदार और कंपनियां कीमतें बढ़ा देती हैं। इसे आम भाषा में ज्यादा पैसा, कम सामान का पीछा करना कहते हैं। वर्तमान मोदी-संघी सरकार में यही हो रहा है जिसके कारण आम जनता महंगाई का दंश झेलने को मजबूर है।
लागत-प्रेरित स्थिति: यह स्थिति तब आती है, जब कंपनियों या उत्पादकों के लिए सामान बनाने की लागत बढ़ जाती है। भले ही बाजार में मांग न बढ़ी हो, कंपनियां अपना नुकसान बचाने के लिए कीमतें बढ़ा देती है।
कच्चा माल महंगा होना: जैसे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन महंगा हो जाता है। हाल ही में सरकार द्वारा पेट्रोल, डीजल, सीएनसी आदि के रेट बढ़ने से समान के ट्रासपोर्टेशन कीमत बढ़ी जिसका भार भी जनता को ही उठाना पड़ता है।
मजदूरी और टैक्स: कर्मचारियों की सैलरी बढ़ने या सरकार द्वारा टैक्स (जैसे जीएसटी) बढ़ाए जाने से भी उत्पाद की अंतिम कीमत बढ़ जाती है।
मुद्रा की आपूर्ति में वृद्धि: जब देश का केंद्रीय बैंक (जैसे भारत में आरबीआई) बाजार में नोटों की छपाई या मुद्रा की आपूर्ति बहुत ज्यादा बढ़ा देता है।
असर: बाजार में अचानक बहुत सारा पैसा आ जाता है, जिससे मुद्रा की अपनी वैल्यू (मूल्य) गिर जाती है। जब पैसे की वैल्यू कम होगी, तो उसी सामान को खरीदने के लिए आपको ज्यादा नोट देने पड़ेंगे।
वेतन-मूल्य चक्र: जब महंगाई बढ़ती है, तो मजदूर ज्यादा सैलरी मांगते हैं। सैलरी बढ़ने से कंपनियों की लागत बढ़ती है, और वे सामान को और महंगा कर देती हैं। यह एक चक्र बन जाता है।
भारत में खाद्य सामग्री की महंगाई दर जुलाई-अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार 5.52 प्रतिशत दर्ज की गई है। सांख्यिकी मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय रसोई के बजट को प्रभावित करने वाली मुख्य खाद्य वस्तुओं और उनकी कीमतों में आई बढ़ोतरी का विवरण नीचे दिया गया है:
खाद्य पदार्थों में महंगाई के मुख्य आंकड़े
चीनी: वर्तमान समय में चीनी की कीमतों में सबसे तेज उछाल आया है। उपभोक्ता मामलों के विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त में चीनी के दामों में लगभग 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। जहां पिछले महीने इसकी कीमत करीब 48.18 प्रति किलो थी, वहीं अब यह बढ़कर 55.70 प्रति किलो के आसपास पहुंच गई है।
खाद्य तेल: वैश्विक कारणों और जैव ईंधन की बढ़ती मांग के चलते खाद्य तेलों (सरसों तेल, रिफाइंड, सूरजमुखी तेल) की महंगाई दर मार्च में 2.82 प्रतिशत से बढ़कर 7.84 प्रतिशत पर पहुंच गई है।
प्याज और मसाले: सब्जियों में प्याज की कीमतें सबसे ज्यादा बढ़ी हैं। इसके साथ ही दैनिक उपयोग के मसाले जैसे जीरा और हल्दी भी काफी महंगे हुए हैं।
अनाज और दालें : अगस्त में चावल की कीमतों में 2.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गेहूं के दाम में 0.6 प्रतिशत की बढ़त देखी गई है। अरहर, चना और मूंग जैसी आवश्यक दालों की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है।
प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ: हालिया सरकारी आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, दूध, अंडा, मांस और प्रोसेस्ड फूड (पैकेट बंद खाना) जैसी प्रोटीन-समृद्ध चीजों में भी लगातार मूल्य वृद्धि देखी जा रही है। राहत देने वाली वस्तुएं (जिनके दाम नहीं बढ़े हैं) सभी खाद्य सामग्रियां महंगी नहीं हुई हैं। कुछ प्रमुख मौसमी सब्जियों के दामों में गिरावट से आम जनता को राहत भी मिली है; वास्तविक स्थिति में कीमतें बढ़ी है।
आलू, टमाटर, भिंडी और मटर जैसी बुनियादी सब्जियों की कीमतों में तेजी हुई है, जिससे थाली का संतुलन कुछ हद तक खराब हुआ है।
स्थानीय दुकानदारों की भूमिका: महंगाई बढ़े या कम हो उसका असर वैश्य समाज के दुकानदारों पर कुछ नहीं पड़ता, चूंकि अगर उनके पास माल का पहला भंडारण है तो उसे वे अधिक कीमत पर बेचते हैं। यदि माल वर्तमान समय में खरीदा जा रहा है तो उस पर भी वे मन माफिक अधिक दर लगाकर उसे बेचते हैं। इस व्यवस्था के कारण स्थानीय दुकानदार हो या थोक विक्रेता, वे कभी भी घाटे में नहीं रहते। घाटे में हमेशा ही बहुजन समाज रहता है जो बनियों से खाद्य सामग्री खरीदता है। माल का उपभोक्ता बहुजन समाज का ही व्यक्ति अधिक संख्या में होता है और वे ही महंगाई की दोहरी मार को झेलने के लिए मजबूर रहता है।
थोक व्यापारियों की भूमिका: भारत में थोक व्यापारी अधिकतर वैश्य समाज के ही है, वे अपने पास खाद्य सामग्री के सभी सामानों को बड़ी मात्र में सस्ते दर पर खरीदकर भंडारण कर लेते हैं। कम कीमत पर खरीदे गए इसी समान को जब फसल का मौसम बीत चुका होता है, तब ये ही व्यापारी (बनिया) उसी समान को अपने अधिक मुनाफे के साथ ऊंची दर पर बेचते हैं। जिसके कारण खाद्य सामग्री पैदा करने वाला किसान और तकनीकी समाज पर महंगाई की दोहरी मार पड़ती है चूंकि जब वह अपने खेतों से पैदा हुआ समान वैश्य समाज के व्यापारी को बेचता है तो उसकी कीमत कम होती है और जब यही समान बहुजन समाज के व्यक्ति अपनी जरूरत के हिसाब से दुकानों से खरीदते हैं तो उसकी कीमत 20 प्रतिशत से 45 प्रतिशत तक बढ़ चुकी होती है। व्यापारियों (बनिया) की यह व्यवस्था बहुजन समाज के लोगों का दोहरा शोषण करती है। इस व्यवस्था को बहुजन समाज के सभी लोगों को समझना चाहिए चूंकि यह व्यवस्था वैश्य समाज के समुदायों को ही अधिक माला-माल करती है।
स्थानीय साहूकारों की भूमिका: समाज में जब खाद्य सामग्री की कीमत बढ़ती है तो बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों पर इसका बोझ अधिक पड़ता है। उसके पास महंगी हुई चीजों को अपनी जरूरत के हिसाब से खरीदेने के लिए धन नहीं होता है। इसलिए बहुजन समाज का व्यक्ति अपने आसपास के स्थानीय साहूकारों से ऊंची ब्याज दर पर ऋण लेने को मजबूर होता है। ये स्थानीय साहूकार अधिकतर वैश्य समाज के ही होते हैं, जो व्यक्ति की मजबूरी और जरूरत को न देखकर, उसका आर्थिक शोषण करते हैं। इस शोषण की व्यवस्था से बहुजन समाज को मुक्ति पाने के लिए सामाजिक स्तर पर छोटी-छोटी सहकारी समितियों का निर्माण करना चाहिए। खाद्य सामग्री की अपनी सहकारी दुकान व गोदाम बनाने चाहिए और इन सभी में बहुजन समाज के कर्मचारियों को ही नियुक्त करना चाहिए, बनियों को नहीं। बहुजन समाज को आर्थिक रूप से सशक्त करने का यही उचित माध्यम होगा।
बहुजन समाज जरूरत का समान, अपने ही लोगों की दुकान से खरीदे: देश में जनसंख्या के हिसाब से बहुजन समाज अधिसंख्यक है, मगर अपनी अधिक संख्या का फायदा उठाने व उसका लाभ लेने में बहुजन समाज असफल हो रहा है। चूंकि बहुजन समाज के सभी व्यक्ति बनियों के व्यवसायिक केन्द्रों (दुकानों) से ही रोजमर्रा की जरूरत का समान खरीदते हैं। जिसका फायदा वैश्य समाज के व्यापारियों को ही हो रहा है। बहुजन समाज के पिछड़े व वंचित समाज के समुदायों को नहीं। इतना ही नहीं है, इस प्रकार की व्यवस्था के कारण वैश्य समाज के व्यक्तियों का मनोबल और सामाजिक सम्मान भी दलित-पिछड़ों व वंचितों के सापेक्ष अधिक बढ़ रहा है।
बहुजन समाज के युवकों में गरीबी का कारण: आज बड़े पैमाने पर देखा जा रहा है कि बहुजन समाज के युवक-युवतियाँ उपयुक्त काम न होने की वजह से हताश है और उनका मनोबल और आत्मबल भी घटा हुआ दिख रहा है। बहुजन समाज के अधिकांश युवक उभरती हुई नई-नई तकनीकों को सीखने-समझने और उनके अनुसार अपने आपको सक्षम बनाने में असफल दिखाई दे रहे हैं, चूंकि उभरती हुई तकनीकी चुनौतियों का मुकाबला तभी किया जा सकता है जब उससे जुड़ा हुआ ज्ञान को अर्जित किया गया हो। बहुजन समाज के युवक-युवतियों में मेहनत और संघर्ष करने की भावना भी घटती हुई दिख रही है चूंकि बहुजन समाज के अधिकांश पुरुष और महिलाएं पाखंडी सरकार से मुफ्त की रेवड़िया पाकर अपने स्वाभिमान को बेच रहे हैं। दुनिया में जो भी व्यक्ति अपने सम्मान और स्वाभिमान को ब्राह्मणवादी-मनुवादी नीतियों के तहत कथित सवर्ण समाज के पैरों में गिरवी रख देगा वह व्यक्ति सम्मान और स्वाभिमान नहीं पा सकता।
भारत में बहुजन समाज बहुसंख्यक है मगर वह अपने श्रम, तकनीकी परिश्रम और ज्ञान के बल पर आगे बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा। जिसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बहुजन समाज के अति पिछड़े जातीय घटक और करीब-करीब सभी जातीय घटकों की महिलाएं हिन्दू-धर्म से संक्रमित होकर अपने स्वाभिमान और सम्मान को खो चुके हैं। इसलिए सबसे पहले बहुजन समाज के पुरुष और महिलाओं को अपने समाज के महापुरुषों के ज्ञान का अध्ययन करना होगा और उनके बताए गए रास्ते पर चलकर ही अपना सम्मान और स्वाभिमान हासिल करना होगा। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा बताये गये शिक्षा के महत्व को आत्मसात करना होगा और उसी के अनुसार आचरण को अपने जीवन में समाहित करना होगा। भगवान बुद्ध के उपदेश ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ को आत्मसात करके, अपनी बुद्धि का विकास करके संसार में दीपक की तरह रोशनी फैलानी होगी और उसी रोशनी से समाज को तथ्यपरक बनाना होगा।





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |