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भारतीय भू-भाग बुद्ध के जीवनकाल से मानवतावादी और सभी मनुष्यों के कल्याण के लिए जाना जाता है। भगवान बुद्ध से प्रभावित होकर देवानाम प्रियदर्शी सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद घोषणा की थी कि मैं युद्ध नीति का त्याग करता हूँ लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि मैं अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा नहीं करूंगा। शासक होने के नाते ये मेरा कर्तव्य है कि मैं अपने शासन में रहने वाले सभी नागरिकों की रक्षा करूंगा। इसी प्रतिज्ञा के साथ उन्होंने दूसरी प्रतिज्ञा यह भी की थी कि मेरे राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों को समान अधिकार होंगे। मेरे राज्य में न कोई छोटा होगा और न कोई बड़ा, सभी के साथ समान व्यवहार होगा। राज्य में जैसी शिक्षा व्यवस्था मेरे बच्चों के लिए उपलब्ध होगी, वैसी ही शिक्षा व्यवस्था बिना किसी भेदभाव के राज्य के सभी नागरिकों को उपलब्ध रहेगी। उनकी तीसरी प्रतिज्ञा थी कि मेरे राज्य के सभी नागरिकों को अपनी मान्यताओं और विश्वास के अनुरूप पूजा पद्धति का स्वतंत्र अधिकार होगा। भारत में पिछले 12 वर्षों से मोदी-संघी शासन है। उनके झूठ और बड़बोलेपन को विश्व की जनता जानती और समझती है। मोदी जब विदेशी दौरों पर जाते हैं तो वे बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि मैं बुद्ध की धरती से आया हूँ, युद्ध की धरती से नहीं। आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत पिछले ही हफ्ते तीन विदेशी दौरों पर गए, उन्होंने भी वहाँ जाकर मोदी की तरह घोषणा की कि मैं ‘बुद्ध की धरती से आया हूँ और हम शांति और सहिष्णुता में विश्वास करते हैं’।
दोनों के कथनों में सच्चाई का लोप: मोदी और भागवत की आंतरिक संरचना एक ही प्रकार के तत्वों से मिलकर बनी है। दोनों ही अपने संघी गुरुओं के अनुरूप झूठ बोलने, जनता में छलावा परोसने, जनता को सच्चाई से दूर रखने और मानवता के विरुद्ध कठोर से कठोर कार्य करना उनकी मानसिकता में समाहित है। मोदी ने अपने 12 साल की शासन व्यवस्था में कोई कार्य देश के हित में नहीं किया। मोदी ने देश को बड़े-बड़े झूठ परोसे जिनमें कोई सच्चाई नहीं मिली। देश के नागरिकों में झूठ और भ्रामकता सरकारी धन के इस्तेमाल से ठोक-ठोक कर परोसी गई। मोदी की पाखंडी फौज ने देशभर में धूम-धूमकर मोदी के झूठों का प्रचार-प्रसार किया है। आज मोदी संघी शासन देश के 22 प्रदेशों में चल रहा है। मोदी के अंधभक्त इन्हें डबल इंजन की सरकारें कहकर संबोधित करते हैं। इन सभी 22 प्रदेशों में संघी मानसिकता के व्यक्ति को चुनकर मुख्यमंत्री बनाया गया है। संघी मानसिकता के होने के कारण उनमें शासन-प्रशासन संचालन की व्यवस्था संविधान के अनुरूप न होकर मनुस्मृति के सिद्धांतों पर चलती है। मोदी काल में कम से कम एक लाख स्कूल बंद हो चुके हैं। शिक्षण संस्थाओं में गीता, रामायण, मनुस्मृति आदि को पढ़ाने के लिए चोरी-छिपे आदेश जारी किए जा रहे हैं। श्रमिक व तकनीकी समाज के आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए जाते थे, जिन्हें अब बड़े पैमाने पर बंद किया जा रहा है। बदले में मनुवादी शिक्षा पद्धति के सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मंदिर, विद्या भारती स्कूल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि को स्थापित किया जा रहा है।
तथागत बुद्ध की सामाजिक व्यवस्था में जाति व्यवस्था नहीं मिलती, जबकि हिन्दुत्व की वैचारिकी और संघियों की मानसिकता के अनुरूप जाति हिन्दुत्व का अभिन्न अंग है। जाति व्यवस्था भारतीय समाज का सबसे बड़ा विभाजक तत्व है। इसलिए दुनिया का कोई भी सभ्य और जागरूक व्यक्ति हिन्दुत्व की वैचारिकी को मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा और दुश्मन मानता है। आज भारतीय समाज में 6743 जातियाँ पाई जाती है। जिसका कारण सिर्फ और सिर्फ मनुवादी जाति व्यवस्था और ब्राह्मण संस्कृति को श्रेष्ठ बताने वाले मोहन भागवत और मोदी जैसे संचालक ही है। मोदी ने अपने 12 वर्षों के दौरान भारतीय नागरिकों में जातिवाद की खाई को और अधिक गहरा किया है। उसको कमजोर करने के लिए उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया। अगर मोदी और उनके सत्ता में बैठे साथियों के मन और मस्तिष्क में देश को मजबूत करने का भाव होता, तो वे सबसे पहले कानून बनाकर जातिवादी मानसिकता को उचित अधिनियम द्वारा प्रतिबंधित करते। लेकिन उनका ऐसा न करना उनके जातिवादी चरित्र को उजागर करता है।
वैश्विक मंचों पर ‘बुद्ध’ और घरेलू राजनीति में ‘युद्ध’: अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति और घरेलू राजनीति के बीच का उनका अंतर्विरोध नया नहीं है। मोदी काल में अब यह खाई और गहरी दिखाई देने लगी है, जो पहले नहीं थी। मोदी-संघियों की इस छलावामयी भाषा में बुद्ध नीति के अनुसार शांति, करुणा सह-अस्तित्व और ‘वसुदैव कुटुंबकम’ की झूठी भावना प्रदर्शित होती है। लेकिन जैसे ही यह कूटनीतिक विमान भारत की सीमाओं के भीतर उतरता है, संघियों की भाषा अचानक 180 डिग्री घूम जाती है। घरेलू राजनीति के मैदान में बुद्ध के शांति संदेश गायब हो जाते हैं और उनकी जगह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, बहुसंख्यक तुष्टिकरण, बुलडोजर न्याय, पहचान की आक्रामक राजनीति और युद्ध जैसी सामाजिक कड़वाहट भारत के सदियों पुराने सामाजिक ताने-बाने और भाईचारे को संकट में डाल देती है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा 2019: नरेंद्र मोदी ने अपने सम्बोधन में गर्व से कहा था, हम उस देश के वासी है जिसने दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध दिये हैं, शांति का संदेश दिया है।
यूएस-यूक्रेन संघर्ष और समरकन्द शिखर सम्मेलन 2022: पुतिन के सामने मोदी ने वक्तव्य दिया था कि ‘यह युग युद्ध का नहीं है’ लेकिन अपने ही देश में वे सांप्रदायिक युद्ध छेड़े हुए हैं।
जी-20 की अध्यक्षता ‘एक पृथ्वी एक परिवार’: भारत की अध्यक्षता के दौरान हर सड़क और वैश्विक विज्ञापनों पर ‘वसुदैव कुटुंकम’ का नारा चस्पा किया गया।
संघ प्रमुख के विदेशी दौरे: मोहन भागवत जब विदेश यात्राओं पर जाते हैं, तो वे रेखांकित करते हैं कि हिन्दू दर्शन किसी से शत्रुता नहीं रखता, सब एक ही चेतना का हिस्सा है और सनातन का मूल तत्व है।
घरेलू हकीकत: लेकिन विदेशी धरती के इन बयानों के विपरीत घरेलू यथार्थ पर इन दोनों संघियों की हकीकत खोखली साबित होती है।
हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण: घरेलू राजनीति में अल्पसंख्यक समुदाय को लगातार एक ‘खतरे’ या शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
चुनावी रैलियों की भाषा: चुनावों के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द जैसे ‘श्मसान बनाम कब्रिस्तान’, कपड़ों से पहचानना, आपत्तिजनक शब्दों का खुलेतौर पर इस्तेमाल करना आम आबादी के मन में भय और असुरक्षा की भावना का काम करते हैं।
नागरिकता और पहचान का संकट: सीएए और एनआरसी के विमर्श ने समाज के एक बड़े वर्ग को असुरक्षा के गर्त में धकेला, जो देश दुनिया को दिखाने के लिए एक परिवार मानता है यह अपने ही नागरिकों के एक बड़े हिस्से को शंका की दृष्टि से देखता है।
दलित, पिछड़ा बनाम सवर्ण वर्चस्व: धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ ही नहीं, बल्कि बहुजन समाज के दलित, वंचितों के साथ भी सत्ता का दोहरापन चल रहा है।
सामाजिक न्याय पर चोट: जातीय जनगणना, आनुपातिक हिस्सेदारी की जब बात आती है, तो मनुवादी संघी इस देश को जातियों में बांटने की साजिश कहकर खारिज कर देते हैं। राम मंदिर ट्रस्ट से लेकर शीर्ष नौकरशाही, न्याय पालिका और नीति निर्माता पदों पर बहुजन समाज को केवल नामात्र के लिए कुछ चेहरे रखकर, उसकी इतिश्री कर देते हैं।
दलित उत्पीड़न और प्रशासनिक उदासीनता: हाथरस से लेकर मध्य प्रदेश के पेशाब कांड़ तक जब भी कमजोरों पर अत्याचार होता है, तो प्रशासनिक मशीनरी पीड़ितों के साथ खड़े न होकर सवर्ण वर्चस्व व राजनीतिक रसूकदारों के साथ खड़ी दिखाई देती है।
राज्य स्तर के पोस्टर बॉयज: केंद्र की ध्रुवीकरण की राजनीति में कुछ खास वैचारिकी के मुख्यमंत्रियों और नेताओं को स्थापित किया गया है:
1. योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने संवैधानिक, प्रशासनिक प्रक्रिया को ताक पर रखकर, बुलजोड़र न्याय को एक प्रशासनिक मॉडल बना दिया है। बुलजोड़र न्याय की कार्यवाही सिर्फ अल्पसंख्यकों और असहमति जताने वालों पर लक्षित रहती है। चुनावी अभियानों में योगी खुलेआम 80 बनाम 20 का चुनाव, बटेगे तो कटेंगे समाज को दो विरोधी गुटों में बांटने और बहुसंख्यक गोलबंदी के जरिये चुनाव जीतने का स्पष्ट प्रयास है। योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से पहले एक अपराधी प्रवृति के व्यक्ति थे, परंतु मोदी संघियों ने जानबूझकर योगी को उनकी मानसिकता के अनुरूप उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। वे अपने आपको योगी कहते हैं, लेकिन वे आचरण में दुष्ट और वैचारिक रूप में जहरीले व्यक्ति है।
2. हेमंत बिस्वा सरमा पूर्वोत्तर की बहुसांस्कृतिक और संवेदनशील भूमि को सांप्रदायिक बयानबाजी का केंद्र बना दिया है। वे खुलेआम मियां मुसलमानों के बहिष्कार की बात करते हैं। मदरसों को बंद करने को अपनी उपलब्धि बताते हैं। उनका सार्वजनिक विमर्श संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक आक्रामक संघी प्रचारक का लगता है।
3. सुवेन्दु्र अधिकारी भाजपा में आने से पहले कांग्रेस में थे, जो वहाँ पर सबसे भ्रष्ट प्रवृति के व्यक्ति जाने जाते थे। मोदी की भाजपा उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी लेकिन जैसे ही उन्होंने मोदी सत्ता के साथ आने का फैसला किया तो वे अपने सभी भ्रष्टाचारों से मुक्त कर दिये गए।
समानतर न्याय व्यवस्था: गौ-रक्षा, लव-जिहाद, धर्मांतरण के नाम पर भीड़ द्वारा हत्या, लिंचिंग की घटनाएँ आम की गई। ऐसे असामाजिक तत्वों को मोदी संघी सरकार ने राजनीतिक संरक्षण और सार्वजनिक मालाएँ पहनाकर सम्मानित किया।
मुख्यधारा के मीडिया का पतन: देश का मुख्य मीडिया आज गोदी मीडिया कहा जाता है आज पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में जनता के असली मुद्दे- महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर सरकार से सवाल करने के बजाय 24 घंटे हिन्दू-मुस्लिम डिबेट और नफरती प्रचार किया जाता है।
संस्थाओं की चुप्पी: चुनाव आयोग, न्याय पालिका और मानव अधिकार आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं नेताओं के घृणास्पद भाषणों और विभाजनकारी नीतियों पर मूकदर्शक बनी रहती है। जिसके कारण इन प्रवृतियों को बढ़ावा मिल रहा है।
वैश्विक सूचकांकों में गिरावट: विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक, वैश्विक लोकतंत्र सूचकांक और धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग की रिपोर्टों में भारत की रैंकिंग लगातार गिरि है।
बुद्ध का दर्शन केवल भाषणों के लिए ही नहीं होता; वह आचरण, करुणा, प्रज्ञा और समता की मांग करता है। उसके बिना बुद्ध की धरती की संघी घोषणा एक खोखला पाखंड ही कहलाएगा, भारत को दुनिया में सच्चा सम्मान केवल चमकदार विदेशी दौरों से नहीं मिलेगा, बल्कि इस बात से मिलेगा कि वह अपने सबसे कमजोर, वंचित, अल्पसंख्यक और दलित नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अगर वर्तमान सत्ता भारत को विश्व गुरु बनाना चाहती है तो उसे घरेलू स्तर पर चल रहे आंतरिक युद्ध को समाप्त करके बुद्ध, कबीर, फुले और डॉ. अम्बेडकर के समतामूलक बंधुत्व पूर्ण विचारों को शासन सत्ता के केंद्र में स्थापित करना होगा।





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