




2025-12-20 14:05:40
भारत में राजनीतिक आरक्षण (विधायिका और संसद) की शुरूआत संविधान लागू होने के साथ 26 जनवरी 1950 से हुई। संविधान की अनुसूची (अनुच्छेद 330 और 332) के अनुसार लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए सीटें आरक्षित की गईं। यह आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया गया। शुरू में यह आरक्षण 10 वर्ष (1950-1960) के लिए था। लेकिन मनुवादी मानसिकता की सरकारें इसे हर 10 साल में संविधान संशोधन के जरिए बढ़ाती जा रही हैं। 2020 में 104वें संविधान संशोधन के तहत यह आरक्षण 2030 तक बढ़ा दिया गया है। वर्तमान लोकसभा में कुल 543 सीटों में से 131 सीटें (84 एससी+ 47 एसटी) आरक्षित हैं। वहीं सभी राज्यों की विधानसभाओं में कुल मिलाकर लगभग 1,200+ सीटें एससी/एसटी के लिए आरक्षित हैं।
आरक्षण का प्रावधान संसद व विधानसभाओं में एससी, एसटी वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की नीयत से किया गया था। इस आरक्षण को लागू हुए 75 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधि चुनकर संसद और विधानसभाओं में भी जा रहे हैं। परंतु देश की वर्तमान राजनीति को देखते हुए एससी/एसटी समाज में यह सवाल पैदा हो रहा है कि क्या आरक्षित सीटों से चुनकर जा रहे लोग (नेता) एससी/एसटी समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? आज संसद में 131 सांसद एससी/एसटी समुदायों से हैं, देश में हर रोज एससी/एसटी समाज के ऊपर जानलेवा आतंक सरीकी घटनाओं का तांडव चल रहा है। और ये सभी 131 सांसद लोकसभा में मौन रहकर, अपनी गर्दन झुकाकर, अपने मनुवादी आकांओं के सामने कठपुतली बनकर नाच रहे हैं। ऐसा दृश्य यह समझने के लिए पर्याप्त है कि राजनीतिक आरक्षण से आरक्षित समाज को फायदा कम और नुकसान ज्यादा है। आरक्षित सीटों से चुनकर आ रहे प्रतिनिधि आरक्षित समाज का प्रतिनिधित्व करते नहीं दिख रहे हैं, बल्कि वे मनुवादी और जातिवादियों को ही मजबूत कर रहे हैं। देश की मनुवादी सरकारें आजादी के समय से ही यह समझ चुकी थीं कि आरक्षित सीटों से एससी/एसटी समाज के हिन्दूत्ववादी मानसिकता के प्रतिनिधियों को चुनाव में उतारकर उन्हें जिताने से मनुवादियों को ही फायदा होगा। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण- बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने जब 1952 में मुंबई नार्थ सेन्ट्रल सीट से चुनाव लड़ा, तो मनुवादी मानसिकता के गांधी समर्थकों ने उनके सामने ओबीसी समाज से उनके ही पीए नारायण काजरोलकर जो सिर्फ 12वीं पास थे, उसे चुनाव में खड़ा करके बाबा साहेब को हरवाया था। यही गांधी का षड्यंत्रकारी मानसिकता का मंत्र था जिसे शुरु में कांग्रेस ने अपनाया और अब भाजपा संघी भी इसी मानसिकता को आगे बढ़ाकर राजनीति में अपना वर्चस्व बनाये हुए हैं। ऐसे हालात का देखकर आरक्षित वर्ग के लोगों को अपने मष्तिक से मनुवादी षड्यंत्र का आंकलन करना चाहिए कि क्या इस तरह के राजनीतिक आरक्षण से आरक्षित समाज का फायदा हो रहा है या नुकसान। साधारण आंकलन के अनुसार आरक्षित वर्ग का राजनीतिक आरक्षण से नुकसान ही हो रहा है चूकिं सीट आरक्षित होने पर भी मनुवादी मानसिकता के गुलाम और दलाल चुनाव में जीतकर आ रहे हैं। और जीतकर आने के बाद वे अपने समाज पर हो रहे उत्पीड़न व अत्याचार को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं और संसद या विधानसभाओं में वे अपने समाज पर हो रहे अत्याचार से संबंधित मुद्दों को नहीं उठाते। इस स्थिति को देखकर आज के जागरूक आरक्षित एससी/एसटी समाज की मांग होनी चाहिए कि आरक्षित समाज के राजनीतिक आरक्षण को तुरंत प्रभाव से समाप्त कर देना चाहिए, चूंकि राजनीतिक आरक्षण से मनुवादी मानसिकता वाले गुलाम व दलाल ही राजनीति में मजबूत हो रहे हैं। राजनीतिक आरक्षण से दिन प्रतिदिन एससी/एसटी समाज पर प्रताड़नायें और अत्याचार बढ़ रहे हैं।
आरक्षित वर्ग के राजनीतिक नेता: आज एससी/एसटी समाज के जो लोग समाज का नेतृत्व करते दिख रहे हैं वे वास्तविकता में एससी/एसटी समाज का नेतृत्व नहीं, बल्कि वे मनुवादी ब्राह्मणी संस्कृति के नेताओं के दलाल बनकर अपने ही समाज को ठगने और लूटने का काम कर रहे हैं। साथ ही ऐसे सामाजिक ठग नेता अपने ही समाज से मनुवादियों को वोट देने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। आरक्षित समाज की वोट से मनुवादियों को जिताकर संसद में भेजा जा रहा है। इन नेताओं से जब समाज पूछता है कि आप समाज के लिए क्या कर रहे हैं? तो इन सभी दलाल नेताओं का एक ही जबाव होता है कि हमारी पार्टी का जो भी आदेश होगा हम आगे वही करेंगे। पार्टी लाईन से इधर-उधर जाकर हम काम करने के लिए अधिकृत नहीं हैं।
बाबा साहेब जब मुंबई से चुनाव हार गये थे, तो उसके बाद काजरोलकर उनसे मिलने आया था। तब बाबा साहेब ने उनसे पूछा था कि ये बताओ की तुम चुनाव तो जीत गए हो पर अब आगे क्या करोगे? तो इसपर काजरोलकर का जवाब था कि जो मेरी पार्टी का आदेश होगा मैं वही करूंगा। इस बात को आज 75 वर्ष से ज्यादा का समय बीत चुका है परंतु आरक्षित समाज की राजनीतिक गुलाम चेतना में अभी भी कोई बदलाव आता हुआ नजर नहीं आ रहा है। वह तब भी मनुवादी मानसिकता से संक्रमित था और आज भी उसी मानसिकता से संक्रमित होकर मनुवादियों की गुलामी के लिए तत्परता से लगा हुआ है।
समस्या का राजनैतिक समाधान: बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के अथक प्रयासों से एससी/एसटी समाज को दो प्रकार के आरक्षण का लाभ मिला। एक राजनैतिक आरक्षण तथा दूसरा सरकारी नौकरियों में आरक्षण। सरकारी नौकरियों में मिले आरक्षण से एससी/एसटी समाज के लोगों का कुछ हद तक विकास हुआ तथा उनमें समृद्धता आयी है। परंतु राजनैतिक आरक्षण से मनुवादियों ने कुछेक अपने दलाल एससी/एसटी समाज से छांटकर बना लिये हैं जिनके द्वारा एससी/एसटी समाज के वोटरों की बोली खुले आम लगाई जा रही है। उनकी वोट की ताकत से मनुवादी सत्ता को मजबूत किया जा रहा है। राजनीति का यह अदृश्य खेल एससी/एसटी समाज की जनता को नजर भी नहीं आता, चूंकि यह एक मनुवादी षड्यंत्र के तहत जमीन की सतह के नीचे निरंतरता के साथ चलाया जाता है। एससी/एसटी एक सीधा-साधा, भोला-भाला कम शिक्षित समाज है जिसे आजादी के 75 वर्षों के बाद भी जागरूक व प्रेरित करने की जरूरत है। इस सामाजिक अवस्था का सही राजनैतिक हल तभी हो सकता है जब एससी/एसटी समाज के सभी जातीय घटकों में एक अबाध्य एकता हो, हरेक जातीय घटक अपने आपको एससी/एसटी समाज का अभिन्न अंग माने और समाज के सभी लोग विचार-विमर्श करके अपने ही अम्बेडकरवादी प्रत्याशी को चुनाव में उतारकर अपनी वोट और ताकत से जिताने का काम करें। अगर एससी/एसटी समाज के सभी जातीय घटक हिन्दुत्व की क्रमिक ऊंच-नींच के छलावे में फंसे रहेंगे तो उनमें एकता नहीं आयेगी, हर घटक अपने को एक-दूसरे से अलग समझेगा और मनुवाद के बहकावे और छलावे में आकर मनुवादियों को ही वोट देगा। एससी/एसटी समाज की गुलामी का यही तंत्र और मंत्र समाज में निरंतरता के साथ चलता रहेगा। इसे रोकना होगा, सबको एक साथ आना होगा, समाज की भलाई और सत्ता के लिए सबको इकट्ठा होना होगा, और अपने वोट की ताकत से अपनी सत्ता स्थापित करनी होगी। अगर एससी/एसटी समाज आपस में बटेगा तो सत्ता मनुवादियों के पाले में ही जाती रहेगी। और पूरा का पूरा एससी/एसटी समाज केवल मनुवादियों की गुलामी करता रहेगा।
एससी/एसटी समाज शुरु करे व्यापारिक धंधे: संख्याबल के हिसाब से एससी/एसटी समाज अधिसंख्यक है लेकिन फिर भी वह अल्पसंख्यक ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों का पिछलग्गू है और उन्ही को सशक्त और मजबूत करने के लिए काम करता है। वर्तमान समय में एससी/एसटी समाज के युवाओं को दो काम करने की आवश्यकता है, पहला- शिक्षा में उत्कृष्ठ बनना, दूसरा अपने रोजगार/धंधे का निर्माण करना। एससी/एसटी समाज के युवा जिनकी पढ़ाई में बहुत रूचि नहीं हैं वे अपने व्यापारिक धंधे शुरु करें। इसके साथ ही एससी/एसटी समाज की जनता को भी अपने समाज के जातीय घटकों के व्यवसायिक संस्थान, दुकानों आदि से ही जरूरत के सामान खरीदने चाहिए। सहकारिता की भावना के तहत अपनी सहकारी समितियों का निर्माण करना चाहिए ताकि समाज के युवाओं को काम-धंधे करने के लिए कम ऋण दर पर आवश्यक पूंजी मुहैया कराई जा सके ताकि वे पूंजीपतियों के शोषण से बच सकें। देश में व्यापारी और पूंजीपतियों की सरकार है जिसके कारण देश के सारे बैंकों में जमा धन देश की कामगार जातियों का है। और उनके द्वारा जमा किये गये धन का लाभ सरकार के व्यापारी मित्र व कुछेक धन्ना सेठ बैंको से बड़े पैमाने पर ऋण लेकर अपने बड़े-बड़े व्यापारिक संयत्र स्थापित कर रहे हैं। ऋण न चुका पाने की अवस्था में सरकार उसे माफ भी कर रही है। हाल ही में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 6.15 लाख करोड़ रुपये के कर्ज माफ किए हैं। इसका मतलब है पूंजीवादी सरकार ने अपने धन्नासेठ मित्रों को 6.15 लाख करोड़ रुपये का फायदा पहुंचाया है। जबकि इसके सापेक्ष में एससी/एसटी समाज को देश के बजट में जो कम्पोनेंट प्लान के तहत धन आवंटित किया जाता है उसको भी यह पूंजीवादी सरकार अपने अन्य मदों में चुपचाप तरीके से खर्च करती है। जिसका एससी/एसटी समाज के जातीय घटकों को पता भी नहीं चलता चूंकि एससी/एसटी समाज के सभी जातीय घटक हिन्दुत्व की अफीम चाटकर गहरी नींद में बेहोश हैं। उन्हें अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की कोई चिंता नहीं है। चूंकि चिंता सिर्फ जागरूक लोगों के अंदर ही पैदा होती है, सोये हुए या मरे हुए व्यक्तियों के अंदर कोई संवेदना व चिंता पैदा नहीं होती। इसी वास्तविक तथ्य को ब्राह्मणी संस्कृति के कर्ताधर्ता अच्छी तरह से समझते हैं। इसलिए वे एससी/एसटी समाज की कोई फिक्र नहीं करते, चूंकि उन्हें पता है कि इनका वोट तो हिन्दुत्व की अफीम के कारण मिल ही जायेगा तो फिर हम इनकी चिंता क्यों ही करें?
लोकल स्तर पर हो सामाजिक परिषद का निर्माण: वर्तमान समय में बहुजन समाज (एससी/एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक) नेतृत्वहीन नजर आ रहा है, समाज में कोई ऐसा सक्षम नेता भी नहीं बचा है जो पूरे समाज को लामबंध करके बहुजन समाज की राजनीति को मजबूत कर सके। इस समाज की राजनीति को मजबूत करने के लिए पंचायत प्रधान, पार्षद, विधायक व संसद तक के सभी क्षेत्रों में बहुजन समाज अपने सभी जातीय घटकों को मिलाकर क्षेत्रिय परिषदों का निर्माण करे। और इन परिषदों में बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों के लोगों को शामिल किया जाये तथा समय-समय पर परस्पर विचार-विमर्श भी किया जाये और कोई भी चुनाव आने पर विचार-विमर्श से ही उम्मीदवार तय करके घोषित किये जायें। और पूरा बहुजन समाज उसी उम्मीदवार को जिताये और मनुवाद को हराये।
(लेखक सीएसआईआर से सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं)





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