




2026-04-08 16:53:20
आज पूरा विश्व अशांति के दौर से गुजर रहा है, इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच जंग जारी है। वैश्विक समुदाय ने पारस्परिक स्तर पर शांति कायम करने के लिए प्रथम विश्व युद्ध के बाद 10 जनवरी 1920 को लीग आॅफ नेशंस की स्थापना की। जिसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा और कूटनीति के माध्यम से विश्व शांति बनाए रखना था। यह संस्था पेरिस शांति सम्मेलन की उपज थी और इसका मुख्यालय जेनेवा, स्विट्जरलैंड में बना। यह संगठन 1946 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित किया गया। लीग और नेशंस का उद्देश्य राष्ट्रों के बीच विवादों को मध्यस्थता के जरिए सुलझाना, निशस्त्रीकरण को बढ़ावा देना, और सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना था। संघ के उद्देश्य ऊपरी रूप से अच्छे थे लेकिन आंतरिक रूप से उसमें अनेक खामियां थी। सबसे बड़ी खामी जो आज सबको साफ नजर आ रही है, वह है सभी राष्ट्रों के बीच ‘समानता के सिद्धान्त’ का पालन न होना। चूंकि कुछेक सम्पन्न राष्ट्रों को अधिक अधिकार दिये गए, उन्हें वीटो पावर के साथ-साथ युद्ध का भी अधिकार दिया गया। इसी असमानता के अधिकारों के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ आज पूरी तरह विफल है। चूंकि 1945 से लेकर अभी तक जितने भी युद्ध हुए हैं, उसमें संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका कारगर साबित नहीं रही।
वैश्विक संगठनों की विफलता का कारण: वैश्विक स्तर पर बने लीग आॅफ नेशंस और संयुक्त राष्ट्र संघ के विफल होने का कारण उसकी संरचना में ही दोष नजर आता है। चूंकि उसकी संरचना में कुछ देशों को सभी अधिकार दिये गए और कुछ को कम अधिकार दिये गए। जिसमें समानता का सिद्धान्त पूरी तरह गायब रहा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका को स्थायी सदस्यता और वीटो पावर का विशेष अधिकार प्राप्त है। इस वीटो शक्ति के माध्यम से, ये सभी देश किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव या निर्णय को रोक सकते हैं, भले ही बाकी सदस्य उसके पक्ष न हों। इसी महत्वपूर्ण प्रावधान के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्त और उद्देश्य विफल होते नजर आ रहे हैं। जब से संयुक्त राष्ट्र संघ बना है तब से वैश्विक स्तर पर बहुत सारे युद्ध हो चुके हैं। परंतु संयुक्त राष्ट्र संघ इन युद्धों को रुकवाने में पूरी तरह नाकामयाब रहा है। जैसे वर्तमान में अमेरिका, इजराइल और ईरान का युद्ध चल रहा है। अमेरिका इस युद्ध में विश्व का सबसे बड़ा दादा बनने की भूमिका अदा कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ अमेरिका व इजराइल के खिलाफ कुछ भी नहीं कर पा रहा है जिससे साफ नजर आता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ अपने सिद्धान्त और उद्देश्य में पूरी तरह विफल है, तो फिर दुनिया भर के सैंकड़ों देश इस सफेद हाथी रूपी संगठन के सदस्य क्यों रहे? यह सवाल सभी देशों के मन में है जो विश्व के विकासशील व अन्य पिछड़े देश है, वे अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति कमजोर होने के कारण उचित जवाब देने में सफल नहीं हो रहे हैं। जिसके कारण वैश्विक स्तर पर राष्ट्रों के बीच दिनों-दिन संघर्ष पनपता जा रहा है और संयुक्त राष्ट्र संघ असहाय बनकर देख रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की विफलता का मूल कारण: दुनिया भर में कोई भी राष्ट्र या कोई भी समाज बिना समानता और बराबरी के अधिकार के शांतिपूर्ण ढंग से नहीं रह सकता। चूंकि मनुष्य में स्वाभाविक गुण है कि बिना समता, सम्मान और न्याय के वह शांतिपूर्वक रह ही नहीं सकता। इसलिए मानव समाज की सबसे पहली जरूरत है कि उसे समता, समानता और बराबरी का सम्मान मुहैया कराया जाये।
समानता के अधिकार में बाधाएँ: मनोवैज्ञानिक तौर पर हर मनुष्य अपने आपको दूसरे मनुष्य से श्रेष्ठ बनाने और समझने के लिए प्रयासरत रहता है। परंतु स्वयं के समाज में पारस्परिक स्तर पर बनकर वह अपने ही समाज के दूसरे व्यक्तियों को अपने से छोटा समझने लगता है। उसमें उपजे इस प्रकार के असमानता के भाव से जो संदेश समाज को जाता है, वह समाज में विघटन का कारण बनता है। बहुजन समाज के जातीय घटकों में आज हम देख रहे हैं कि समाज के जो व्यक्ति अपनी लगन और संसाधनों के बल पर समाज में कुछ महत्वपूर्ण पद प्राप्त किये हुए हैं, ऐसे व्यक्ति अपने आपको समाज से भिन्न समझने लगते है, बदले में समाज भी उनका ऐसा व्यवहार देखकर, उनके साथ अपनेपन का व्यवहार नहीं रखता, बल्कि समाज के लोग उस व्यक्ति के व्यवहार को देखकर नकारात्मक टिप्पणी करते हैं। समाज में प्रचार भी करते हैं कि वह व्यक्ति आईएस, एसडीएम, जज बन गया तो वह अपने समाज के लोगों को अपने से छोटा या निम्न स्तर का समझने लगा है। ऐसा देखकर समाज के जागरूक लोगों को लगता है कि ये मनोवैज्ञानिक कमी एक तरफ से नहीं बल्कि दोनों तरफ से हैं। चूंकि जो व्यक्ति उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ा है उसमें भी अपने समाज के प्रति हीनता का भाव पैदा हो जाता है और समाज के व्यक्तियों में भी तरक्की करने वाले अपने समाज के व्यक्तियों के प्रति एक अजीब सा व्यवहार उभरने लगता है। वह भी उन्हें मनुवादी मानसिकता के तहत ऊंच-नीच के आधार पर देखता और व्यवहार करता है।
उपरोक्त विचार-विमर्श के आधार पर कहा जा सकता है कि वैश्विक स्तर पर या समाज में कोई भी व्यक्ति समाज के दूसरे व्यक्ति को समानता और बराबरी का हक देने में हमेशा विफल ही रहता है, जिसके कारण वहाँ पर युद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है। कुछेक राजनैतिक आकांक्षा पाले हुए लोग भाषण तो लंबे-लंबे देंगे, और अपने आपको बाबा साहब और बुद्ध का अनुयायी भी बताएँगे लेकिन उनका आचरण और व्यवहार एकदम उलट होता है, जिसके कारण समाज में आंतरिक नकारात्मकता और कलह बढ़ती रहती है। समाज की आज यह आम दशा हो चली है कि समाज का कोई भी व्यक्ति अपने आपको अपने ही समाज के दूसरे व्यक्ति से श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश करता है चाहे वह बनावटी ही क्यों न हो, और उसकी बनावट का कोई ठोस आधार ही न हो, इसी प्रकार के दिखावटीपन को लेकर, समाज में इकट्ठा होने का भाव कमजोर हो रहा है। समाज में अकारण आपसी वैमनष्यता बढ़ रही है। हालात ये हो चले हैं कि समाज के सभी लोग एकता और इकट्ठा होने की बात तो करते हैं परंतु उसके लिए कोई सकारात्मक कदम या योजनाएँ नहीं बनाते।
समाज में जातीय समन्वयता की कमी: मानव समाज देश का हो, क्षेत्रिय हो या वैश्विक हो सबका मनोविज्ञान एक जैसा ही रहता है। भारत की बात करें तो यहाँ जातिवाद है जिसका फायदा सीधे ब्राह्मणवादी (असमान) मानसिकता के लोग उठा रहे है। ब्राह्मणवादी समाज मन व कर्म से यह नहीं चाहता कि बहुजन समाज के जातीय घटकों में एकता हो, और उनमें समन्वयता बनी रहे, सभी मिलकर एक साथ काम करें और ब्राह्मणवाद के सापेक्ष मजबूत बन सकें। समाज के सामने सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम सभी अम्बेडकरवाद की बात करते हैं, लेकिन आचरण में हम सभी अधिकांशतया मनुवादी है। इसलिए जबतक बहुजन समाज के सभी जातीय घटक अपने अंदर की क्रमिक ऊंच-नीच के भाव को खत्म करके एक साथ इकट्ठा नहीं होंगे तब तक उनमें न सामाजिक शक्ति पैदा हो पाएगी और न ही उनमें राजनैतिक शक्ति का उभार पैदा हो सकेगा। दूसरी विडम्बना यह है कि बहुजन समाज के अधिकांशतया जातीय घटक अपने महापुरुषों द्वारा बताएं गए रास्तों का अनुसरण नहीं करते, कहने के लिए वे सभी अम्बेडकरवादी व फुलेवादी हैं, लेकिन उन सभी का आचरण मनुवाद के सिद्धांत को आगे बढ़ाता है। भगवान बुद्ध और बहुजन समाज के महानायकों ने उन्हें उन्नतशील बनाने के लिए जो रास्ता सुझाया उसका वे अधिकांशतया अनुसरण नहीं करते। बल्कि उसके विपरीत वे मनुवादियों के बताए हुए रास्तों पर ही चलते दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों के परिवार की अधिकांशतया महिलाएं ब्राह्मणवाद (मनुवाद) का अनुसरण करती है, ऐसी महिलाएं अपने घरों में ढोलक, चिमटा बजाकर अलग-अलग नामों से कीर्तन और सत्संग करती रहती है। ऐसी मानसिकता वाले तथाकथित अम्बेडकरवादियों से समाज की जागरूक जनता विमुख हो रही है। समाज के सामने तीसरी विडम्बना यह भी है कि समुदाय के जिन लोगों ने वैध और अवैध तरीके से संपन्नता हासिल कर ली है वे अधिकांशतया मनुवादी गतिविधियों में अधिक लिप्त दिखते हैं, इतना ही नहीं दूसरे किस्म की पाखंडी गतिविधियों में भी ये अधिक लिप्त रहते हैं। समाज जितना बटेगा, उतना ही प्रताड़ित होगा।
वैश्विक स्तर पर समाज में असमानता के कारक: असमानता का पहला कारक है कि विश्व भर में सभी प्राकृतिक और अप्राकृतिक संसाधन समान रूप से सभी देशों के पास उपलब्ध नहीं है, उनमें असमानता है। कुछेक के पास खनिज पदार्थ ज्यादा हैं तो किसी के पास अन्य संसाधन अधिक है। इन कारणों को देखते हुए मानव समाज को एक सभ्य, टिकाऊ और सभी की सहमति के आधार पर एक शांति स्थापित करने का आदर्श नमूना पेश करना होगा! उसी नमूने के ऊपर सबको समान रूप से चलकर अपने देश के समाज को आगे बढ़ाना होगा। समाज में किसी भी तरह का भेदभाव अपने-पराए की भावना नहीं रखनी होगी। सभी राष्ट्रों को एक समान मानना होगा और सभी की अस्मिता का ख्याल रखना होगा। दादादीरी के भाव को त्यागना होगा। आज इजराइल, अमेरिका और ईरान के युद्ध में अमेरिका और इजराइल घुटनों पर नजर आ रहे हैं, उनमें अब आगे लड़ाई जारी रखने की क्षमता नहीं बची है। ऐसी हालात को देखकर विश्व के सभी राष्ट्रों को आपस में समन्वयता के साथ इकट्ठा होकर बैठना होगा, किसी को भी छोटा-बड़ा नहीं मानना होगा। सभी राष्ट्रों को अपने-अपने अहंकार और स्वार्थ छोड़ने होंगे। सभी राष्ट्र समानता के आधार पर एक साथ आकर अपनी-अपनी बात रख सकेंगे जिनका सभी को मिलकर वैश्विक स्तर पर हल निकालना होगा। किसी भी राष्ट्र को वीटो पावर जैसे विशेष अधिकार नहीं होंगे। राष्ट्रों के बीच पनपते विवादों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सभी का सम्मान करते हुए समाधान खोजना होगा। इजराइल, अमेरिका और ईरान युद्ध में यह साफतौर पर नजर आने लगा है कि इस युद्ध में अमेरिका और इजराइल का अहंकार बुरी तरह से ध्वस्त हुआ है। जिससे सभी विकसित, विकासशील व कम विकसित देशों को सबक लेना चाहिए कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है। युद्ध हमेशा बर्बादी की तरफ ही ले जाता है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर हर राष्ट्र को अपनी सीमाओं में रहकर अपनी जरूरत के हिसाब से वैज्ञानिकी और तकनीकी संसाधनों का विकास करना चाहिए और उससे ही विश्व को समृद्ध बनाने में अपना योगदान देना चाहिए।
उपरोक्त विचार-विमर्श से निष्कर्ष निकलता है कि वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर भी भगवान बुद्ध के बताए हुए रास्ते को आत्मसात करना चाहिए। भगवान बुद्ध का वैश्विक स्तर पर संदेश है कि ‘बैर से बैर खत्म नहीं होता, बल्कि बैर से बैर बढ़ता है।’ समाज में शांति व्यवस्था और खुशहाली कायम करने के लिए अशोक की शासन व्यवस्था को देश और विदेश के सभी राष्ट्रों को अपनाना चाहिए। तभी समाज में संपन्नता और शांति स्थापित हो सकेगी और दुनिया के सभी देश प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकेंगे।





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