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शोध व तकनीकी संस्थानों में ‘जातिवाद’

‘Casteism’ in Research and Technical Institutions
News

2026-09-26 14:11:24

ब्राह्मणों की विशेषता है कि वे अपनी झूठी और कृत्रिम बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, और अपने ऐसे वक्तव्यों को बारंबारता के द्वारा समाज में स्थापित करते हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों, विशेष रूप से भारतीय प्रद्यौगिकी (आईआईटी), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एआईआईएमएस) और केंद्रीय विश्वविद्यालयों को ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में भारत के निर्माण का आधार माना जाता है। इन परिसरों की चमचमाती इमारतों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में मिलने वाले करोड़ों रुपए के पैकेजों की चकाचौंध के पीछे क्रूर अंधेरा और संस्थागत यथार्थ छिपा है। यह यथार्थ है-जातिगत पूर्वाग्रह, संस्थागत अलगाव और तथाकथित मैरिट के नाम पर वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों का मानसिक व अकादमिक दमन। भारत में ये कोई एक-दो घटनाएँ नहीं है, यहाँ पर ये घटनाएँ ब्राह्मणी संस्कृति के कारण अधिक है। संबंधित शोध संस्थानों व विश्वविद्यालयों ने ऐसी गंभीर घटनाओं पर विचार-विमर्श करके कोई समाधान नहीं निकाला, बल्कि कुछेक वरिष्ठ प्रोफेसरों और संस्थाओं के निदेशकों ने ऐसी घटनाओं को छोटी- मोटी घटनाएँ बताकर इनका इतिश्री कर दिया। ये सभी घटनाएँ दर्दनाक हैं, जो इस बात का साक्ष्य है कि इन संस्थानों में द्रोणाचार्यों की भर्ती जान-बूझकर अधिकता के साथ की जा रही है। इन सभी संस्थानों में दलित-शोषित, वंचित, पिछड़े समाज की भागीदारी उनकी संख्याबल के सापेक्ष नगण्य है। जो यह दिखाता है कि इन संस्थानों में वैचारिकी के आधार पर मनुवादी और ब्राह्मणवादियों का वर्चस्व है। जो किसी भी रूप से वैज्ञानिक और तथ्यात्मक नहीं लगता, योग्यता की बात करने वाले भारत में वे लोग है जिनकी खुद की योग्यता पर पहले से ही प्रश्नवाचक चिन्ह है। भारत में योग्यता मापने का पैमाना ओब्जेक्टिव नहीं सब्जेक्टिव है, इसी सब्जेक्टिव अपरोच के तहत निम्न स्तर की योग्यता वाले इन तथाकथित उच्च स्तरीय शैक्षणिक संस्थानों में जातिवादी मानसिकता के तहत लोगों को भर्ती किया जाता है। फिर उन्हीं लोगों के माध्यम से संस्थान में दुराचार और भेदभाव की घटनाओं को पोषित किया जाता है। इस तरह के तथ्यों को समझने के लिए रोहित वेमुला, पायल तड़वी और साहिल रविन्द्र वाकोड़े को सामने रखकर समझा जा सकता है।

मैरिट का रोना मनुवादी मानसिकता: भारत के सभी शिक्षण संस्थानों में हमने गहराई तक देखा है कि वैज्ञानिक और तकनीकी कोर्सों में दलित-शोषित व वंचित समाज के छात्रों को प्रैक्टिकल में जान-बूझकर मुश्किल से पासिंग मार्क्स दिये जाते हैं और इनके सापेक्ष सवर्ण जातियों के छात्रों को अधिक मार्क्स दिये जाते हैं। इस तरह का मैरिट का फॉमूर्ला ओब्जेक्टिव अपरोच पर आधारित नहीं बल्कि वह पूर्णतया मनुवादी-ब्राह्मणवादी और जातिवादी मानसिकता पर आधारित है। प्रैक्टिकल में मार्क्स देने की पूरी स्वतंत्रता शिक्षक के पास होती है, शिक्षक चाहे तो आपको कितने भी मार्क्स दे सकता है, जिसका प्रैक्टिकल में कोई गोल्डन स्कैल या पैमाना नहीं है। इसी का फायदा उठाकर मनुवादी और जातिवादी शिक्षक दलित-वंचित व पिछड़े वर्ग से आए छात्रों को मैरिट में निम्नतम स्तर पर ला देते हैं। यह ब्राह्मणवादियों का सोचा-समझा षड्यंत्रकारी खेल है और इस तरह की जातिवादी मानसिकता के शिक्षक और छात्र अपने जातिगत भेदभाव और अपराध को छिपाने के लिए मैरिट का रोना रोकर अपने द्वारा किये गए अपराध को ढकने का प्रयास करते हैं।

आईआईटी और एम्स का जातिवादी चरित्र: भारत में 23 आईआईटीज है, जिनका निर्माण इसलिए किया गया था कि ये तकनीकी संस्थान समाज में पहले से व्याप्त अवैज्ञानिकता को वैज्ञानिकता में बदलने में सहायक होंगे। देश में उभरती तकनीकी चुनौतियों का समाधान देशवासियों को देंगे। बदले में सरकार इन संस्थानों को जरूरी संसाधनों, उपकरणों, मशीनों आदि से लेस करें, ताकि ये संस्थान अपने पूरे बुद्धिबल से समाज में उभरती हुई बीमारियों का समाधान खोंजे और उसे जनता में परोसे। भारत में पहला आईआईटी संस्थान 1951 में खड़कपुर में स्थापित हुआ और उसके बाद एक के बाद एक करके आज देश में 23 आईआईटी संस्थान है।

एम्स, आईआईटी संस्थानों में बढ़ती मनुवादी मानसिकता: पिछले काफी समय से देशवासियों को देखने में मिल रहा है कि आईआईटी व अन्य उत्कृष्ट किस्म के संस्थान मनुवादी संस्कृति से पूरी तरह पोषित और लेपित हैं। जाति के आधार पर ही ये अपने यहाँ भर्ती हुए छात्रों का मूल्यांकन करते हैं और प्रैक्टिकल में दलित-वंचित व पिछड़े समाज के छात्रों को कम नंबर देकर पास करते हैं, जिससे उनकी मैरिट जरनल कैटेगिरी के सापेक्ष कम हो जाती है। इस तरह के मूल्यांकन से तैयार की गई मैरिट वास्तविक नहीं बेमानी है, मनुवादी संघी सोच के तहत बनाई गई है। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2007 में एम्स दिल्ली में एससी/एसटी छात्रों के उत्पीड़न और उन्हें कथित तौर पर फेल किए जाने का मामला सामने आया था। उस दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश पर जब वर्ष 2011 में एक स्वतंत्र परीक्षा करवाई गई थी, तो फिजियोलॉजी विषय में बार-बार फेल बताए गए 25 में से 24 अनुसूचित जाति के छात्र पास हो गए थे। इसी प्रकार वर्धमान कॉलेज, सफदरजंग अस्पताल में भी एससी/एसटी के छात्रों को फेल किया गया था। ये सभी छात्र जातिगत मानसिकता के तहत फेल किए गए, इनके अधिकतर प्रो. सवर्ण समाज के थे। ऐसी स्थिति देखकर दलित-शोषित वंचित समाज को सवर्ण समाज से सावधान रहना चाहिए।

आईआईटी संस्थानों की अकादमिक विशेषता: आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों और देश के सभी प्रकार के विश्वविद्यालयों का कार्य अध्यापन, समय के अनुसार कोर्स मोड्यूस में परिवर्तन, शोध और तकनीकी कार्यों को आगे बढ़ाना और उनमें उत्तम किस्म के मापदंड अपनाकर विश्वव्यापी संस्थानों की श्रेणी में लाने का प्रयास करना है। इसके साथ ही आईआईटीज में पढ़ाने वाले शिक्षक व शोधर्थियों का मुख्य कार्य अपने तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में शोध पत्रों को तैयार करना और उन्हें जर्नलों में छपवाना है। विडम्बना यह है कि आज देश के 23 आईआईटीज अपने-अपने क्षेत्र में ब्राह्मणी संस्कृति के कारण ढिंगे तो बहुत मार रहे हैं लेकिन उनका कोई भी शोध कार्य आज तक न भारत की सामाजिक समस्याओं को सुलझा पा रहा है और न ही वैश्विक स्तर पर उन्नत किस्म के शोध कार्य कर पा रहा है। शिक्षकों का कार्य है पढ़ना, पढ़ाना और शोध कार्य करना। शोध कार्यों से निकलने वाले निष्कर्षों को जर्नलस में छपवाना और उस जानकारी को अपने समकक्ष साथियों के साथ साझा करना होता है, उनसे अपने कार्य पर उनकी राय मांगना। विडम्बना यह है कि इन सभी आईआईटीज से एक भी वैश्विक स्तर का जर्नल नहीं छप रहा है। यह अपने आपमें आईआईटीज में कार्यरत शिक्षकों की बुद्धिमत्ता की पोल खोल रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि आईआईटीज में कार्यरत शिक्षक और शोधकर्त्ता अपने व्यक्तिगत स्वार्थ में फंसकर जो वैश्विक स्तर की शोध पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही है, उनमें इन्हीं आईआईटीज के शोधकर्ता और शिक्षक उन शोध पत्रिकाओं को संपादित करके विदेशी प्रकाशकों से मोटा धन कमा रहे हैं। शोध पत्र के रिव्यू के लिए भी आईआईटीज के शिक्षक और शोधार्थी विदेशी प्रकाशकों से चोरी-छिपे मोटा धन कमा रहे हैं। उन विदेशी प्रकाशकों के द्वारा विदेश में होने वाली कोन्फ्रेंस में जाने के लिए इन्हीं प्रकाशकों द्वारा अपनी यात्राओं का प्रबंध करा रहे हैं। इससे भी अधिक शर्म की बात यह है कि इन 23 आईआईटीज से एक भी शोध पत्रिका आजतक नहीं छपी है। देश के कमसमझ और मूर्ख इन आईआईटीज पर गर्व करते हैं, परंतु उन्हें इस बात की भी समझ होनी चाहिए कि भारत सरकार आईआईटीज के इन सफेद हाथियों पर जनता का अनाप-सनाप धन क्यों खर्च कर रही है? लेकिन इनके शोध परिणामों से देश की गरीब जनता को बदले में मिल क्या रहा है? इसका भी गंभीर आंकलन होना चाहिए! भारत को अब सोचना चाहिए कि इन 23 आईआईटीज को चरणबद्ध तरीके से उनके द्वारा हासिल की गई शोध दक्षता में देश के प्रत्येक आईआईटीज को कम से कम एक मासिक शोध पत्रिका निकालनी चाहिए और इसकी जिम्मेदारी उन्हीं शिक्षकों और शोधार्थियों को देनी चाहिए। साथ ही सरकार को उनसे पूछना चाहिए कि आप अपने शोध कार्य भारतीय पत्रिकाओं में क्यों नहीं प्रकाशित कर रहे? अगर इन पत्र-पत्रिकाओं की गुणवत्ता में कुछ कमी है तो उसकी जिम्मेदारी आईआईटीज के इन्हीं लालची प्रोफेसरों को लेनी चाहिए। इन शोध पत्र-पत्रिकाओं का कोटा भी फिक्स करना चाहिए। जिसका आंकलन पारदर्शी और ओब्जेक्टिव पैमाने पर होना चाहिए। अगर ये शिक्षक और शोधार्थी अपने इस काम में विफल होते हैं तो सरकार को इनसे जवाब मांगना चाहिए और इनके विदेशी दौरों और बाहर जाने पर रोक लगनी चाहिए। तभी ये ब्राह्मणी संस्कृति के शिक्षक और शोधार्थी देश के लिए काम करने को बाध्य होंगे, अन्यथा मनुवादी-ब्राह्मणवादी मानसिकता के शिक्षक एवं शोधार्थी विदेशियों की गुलामी करके अपनी उपलब्धियों की खोखली ढिंगे मारते रहेंगे। देश की जनता के पैसे से ही आपका और आपके बच्चों का भरण-पोषण होता है, आपका प्रथम कर्तव्य बनता है कि आप देश के लिए काम करें, विदेशियों के लिए नहीं। यह सत्य है कि ब्राह्मणी संस्कृति के लोग हमेशा से ही विदेशियों की गुलामी करके सत्ता में बने रहे हैं।

अतीत के वैज्ञानिकों और शोधार्थियों का कार्य: भारत में सभी मनुवादी संस्कृति के शोधार्थी और वैज्ञानिक विरासत में मिली गुलाम प्रवृति के रहे हैं, उनमें से कुछेक स्वाभिमानी और देश के लिए काम करने वाले भी रहे हैं। एग्रीकल्चर के क्षेत्र में सबसे बड़े वैज्ञानिक डॉ. एम.एस.स्वामीनाथन, जिन्होंने देश में हरित क्रांति को लेकर जबरदस्त काम किया। उनके 76 प्रतिशत शोध पत्र भारतीय पत्रिकाओं में ही प्रकाशित हुए। इसके अलावा एस. रामानुजन के शोध पत्र 81 प्रतिशत भारत के पत्र-पत्रिकाओं में ही प्रकाशित हुए। ऐसे और भी कई उदाहरण है जिनके शोध पत्र भारत में ही प्रकाशित हुए और देश को वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे बढ़ाने में मदद भी मिली है।

शोध प्रकाशकों का पाखंडी प्रचार: आज देशभर के कई शोधार्थी और शिक्षक विदेशी प्रकाशकों के लालच में फँसकर अपने संस्था के शोधार्थियों में झूठ फैलाकर यह आश्वस्त करते रहते हैं कि आप अपना शोध पत्र विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में छापों, देश में छपने वाली शोध पत्रिकाएँ उत्कृष्ट किस्म के नहीं है, इसलिए आप सभी भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में अपना शोध कार्य मत छापो। देश की सरकार को ऐसी गतिविधियों का संज्ञान लेना चाहिए और इस प्रकार झूठा प्रचार करने वाले शिक्षक और शोधार्थियों को दंडित भी करना चाहिए। इस प्रकार की गतिविधि चलाकर वे अपना ही नहीं बल्कि देश का नाम-बदनाम कर रहे हैं। अगर किसी पत्र और पत्रिका की गुणवत्ता कमजोर है तो इन आईआईटीज में बैठे महारथियों को ही उनकी क्वालटी सुधारने का जिम्मा देना चाहिए।

मोदी-संघी काल में अधिक बढ़ी यह प्रवृति: मोदी शासन को केंद्र की सत्ता में करीब 12 साल हो चुके हैं, उनके कार्यकाल में मनुवादी मानसिकता के अनुरूप देश को उन्नत बनाने के लिए जरूरी शोध कार्यक्रमों पर नहीं बल्कि वे देश को भ्रमजाल में फंसाकर गाय-गोबर पर शोध कार्यक्रम चला रहे हैं जिसमें देश की जनता का धन बर्बाद हो रहा है। आज देश के सभी तकनीकी और वैज्ञानिक संस्थान अपने-अपने क्षेत्र में वैज्ञानिक उत्पादकता अच्छी तरह से प्रदर्शित नहीं कर पा रहे हैं, चूंकि उन्हें 247 देश में जातिवाद को बढ़ाने का कार्य सौंपा हुआ है। समाज के कुछेक जातीय घटक ब्राह्मणवादी संस्कृति को फैलाने के लिए 247 उनके लठैत बनकर घूम रहे हैं, आतंक फैला रहे है और देश की शांति को भंग कर रहे हैं, ऐसे लोगों से समाज के बुद्धिजीवियों को सावधान और सजग रहना चाहिए।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05