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‘अखंड’ का शाब्दिक अर्थ होता है जो खंडित न हो और जिसे किसी व्यक्ति विशेष या धार्मिक व राजनीतिक आधार पर खंडित करने की परिकल्पना न की जा रही हो। भारत पाकिस्तान का विभाजन यह दिखाता है कि भारत के संघियों की मानसिकता में विशेष रूप से सावरकर व उसके संघी साथियों की मानसिकता में द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त पहले से ही विराजमान था। संघी मानसिकता के लोग चाहे आज जो भी कहे, लेकिन उनकी मानसिकता हमेशा से ही विभाजनकारी रही है। जिसके परिणामस्वरूप भारत का विभाजन दो राष्ट्रों (भारत और पाकिस्तान) के रूप में हुआ। संघी मानसिकता के लोग जमीन के ऊपर दिखाई न देकर जमीन की सतह के नीचे रहकर षड्यंत्रकारी नीतियों की रचना करते रहते हैं। भारत का विभाजन संघियों की उसी परिनीति का हिस्सा है। संघी मानसिकता के लोग जो सामने से बोलते हैं वे हमेशा उसका उल्टा ही करते हैं। वे अपने आपको राष्ट्रवादी कहते है लेकिन उनके कृत्य हमेशा राष्ट्र विरोधी ही होकर जनता के सामने आते हैं। अखंड भारत की परिकल्पना मूल रूप से एक वृहद और एकीकृत भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक संकल्पना है। प्राचीन ग्रंथों और आधुनिक भू-राजनीतिक विमर्शों में इस विचार को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा गया है। जब भारतीय लोगों ने अखंड भारत का सपना देखा था तो उनका मन्तव्य सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप से था। इस परिकल्पना के मुख्य पहलुओं को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है।
भौगोलिक विस्तार: अखंड भारत के वैचारिक मानचित्र में केवल वर्तमान भारत ही नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप और उसके आस-पास के कई आधुनिक देश भी शामिल है। इसके अंतर्गत मुख्य रूप से भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, म्यांमार (बर्मा), नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और तिब्बत को एक ही सभ्यतागत राष्ट्र का हिस्सा माना जाता है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग को जंबूद्वीप और भारतवर्ष के नाम से पुकारा गया है, जो उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में हिंद महासागर तक फैला हुआ था। अखंड भारत की अवधारणा को लेकर समाज और विचारकों में दो प्रमुख दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। कई इतिहासकारों और विचारकों का मानना है कि अखंड भारत कोई राजनीतिक संघ या क्षेत्रीय विस्तार की महत्वाकांक्षा नहीं है। यह एक सांस्कृतिक और भावनात्मक निरंतरता है। प्राचीन काल में तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान) और नालंदा (बिहार, भारत) जैसे शिक्षा के केंद्र पूरे उपमहाद्वीप को एक धागे में पिरोते थे। यह साझा विरासत, इतिहास और जीवन-पद्धति की एकता का प्रतीक है। वहीं भारत एक महत्वपूर्ण वैचारिक लक्ष्य रहा है। इस विचार के समर्थक 1947 के भारत-विभाजन को अप्राकृतिक मानते हैं। उनका तर्क है कि जैसे पूर्व और पश्चिम जर्मनी या उत्तर और दक्षिण वियतनाम का पुर्नमिलन हो सकता है, वैसे ही भविष्य में भारतीय उपमहाद्वीप के देशों का भी किसी न किसी रूप में उसका एकीकरण संभव है।
ऐतिहासिक संदर्भ: आधुनिक संदर्भ में, स्वतंत्रता के समय देश के तात्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा 500 से अधिक रियासतों का भारत संघ में विलय कराना भी ‘अखंड भारत’ के निर्माण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है। वैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण से करोड़ों साल पहले यह पूरी धरती एक ही विशाल भूभाग का हिस्सा थी जिसे ‘मूलनिवासी भूमि’ कहा जाता था। टेक्टॉनिक प्लेट्स की हलचल के कारण यह बाद में अलग-अलग महाद्वीपों में विभाजित हो गया। कुल मिलाकर, अखंड भारत की परिकल्पना एक ओर जहां प्राचीन गौरव, साझा सांस्कृतिक जड़ों और दक्षिण एशिया में शांति व समरसता की बात करती है, वहीं दूसरी ओर समकालीन भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के कारण इसे एक जटिल और संवेदनशील विषय भी माना जाता है।
सम्राट अशोक का साम्राज्य ‘अखंड भारत’ की परिकल्पना को धरातल पर उतारने वाला सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली उदाहरण माना जाता है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी (लगभग 268 ई.पू. से 232 ई.पू.) में मौर्य राजवंश के तीसरे सम्राट अशोक महान ने भारतीय उपमहाद्वीप के एक बहुत बड़े हिस्से को एक राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक छत्र के नीचे ला खड़ा किया था। सम्राट अशोक का साम्राज्य अपने समय का सबसे विस्तृत साम्राज्य था, जिसकी सीमाएं आधुनिक भारत की भौगोलिक सीमाओं से कहीं आगे लगभग तीन गुना भूभाग तक फैली हुई थीं। आधुनिक अफगानिस्तान (हिंदुकुश पर्वतमाला तक), पाकिस्तान और बलूचिस्तान का पूरा क्षेत्र मौर्य साम्राज्य का हिस्सा था। कश्मीर, नेपाल की तराई और आज का बांग्लादेश पूरी तरह उनके अधीन था। पूर्व में असम की सीमाओं तक उनका प्रभाव था। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश तक अशोक का सीधा नियंत्रण था। केवल सुदूर दक्षिण के कुछ तमिल राज्य (चोल, पांड्य, केरलपुत्र और सत्यपुत्र) उनके प्रत्यक्ष शासन से बाहर थे, लेकिन वे भी मौर्य साम्राज्य के मित्र राज्य थे।
अशोक के अखंड भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने इसे केवल सैन्य शक्ति के बल पर ही नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक एकता के माध्यम से संजोया। 261 ई.पू. में हुए कलिंग (ओडिशा) युद्ध के भीषण नरसंहार को देखकर अशोक ने ‘भेरीघोष’ (युद्ध की नीति) को छोड़कर ‘धम्मघोष’ (शांति और नैतिकता की नीति) को अपनाया। अशोक ने एक ऐसे सार्वजनिक नैतिक आचार-संहिता (धम्म) का प्रचार किया जो किसी एक धर्म (जैसे बौद्ध, हिंदू या जैन) तक सीमित न होकर सार्वभौमिक थी। इसमें माता-पिता की सेवा, जीवों पर दया, सत्य बोलना और सभी संप्रदायों का सम्मान करना शामिल था। इसी वैचारिक एकता ने पूरे उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बांधा।
भाषाई एकीकरण: एक विशाल भूभाग को अखंड बनाए रखने के लिए सम्राट अशोक ने अद्वितीय प्रशासनिक और संचार व्यवस्था लागू की। अशोक ने अपने आदेशों और विचारों को साम्राज्य के कोने-कोने में चट्टानों और विशाल पत्थरों के स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाया। पूरे उपमहाद्वीप में जनता तक पहुंचने के लिए मुख्य रूप से प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया। उत्तर-पश्चिम (अफगानिस्तान-पाकिस्तान) के क्षेत्रों में वहां की स्थानीय जनता के लिए खरोष्ठी, अरामी और ग्रीक (यूनानी) भाषाओं का भी इस्तेमाल हुआ। यह इस बात का प्रमाण है कि अखंड भारत में विविधता का पूरा सम्मान था। व्यापार और सेना के आवागमन के लिए साम्राज्य में सड़कों का निर्माण कराया गया, जिसमें तक्षशिला (पाकिस्तान) से पाटलिपुत्र (पटना, बिहार) तक जाने वाला मार्ग मुख्य था (जिसे बाद में ग्रांड ट्रंक रोड के नाम से जाना गया)।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उससे जुड़े संगठनों (जिन्हें आम बोलचाल में संघ परिवार या संघी विचारधारा से जाना जाता है) के वैचारिक दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस विचारधारा के अनुसार, अखंड भारत का दृष्टिकोण केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और भू-राजनीतिक परिकल्पना है। संघी विचारधारा के तहत अखंड भारत के विचार को निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. सांस्कृतिक और सभ्यतागत राष्ट्रवाद: इस विचारधारा का मानना है कि भारत की पहचान किसी राजनीतिक समझौते या संविधान से बहुत पहले, एक सभ्यता और संस्कृति के रूप में स्थापित हो चुकी थी।
2. 1947 के विभाजन को अप्राकृतिक मानना: इस मानसिकता में 1947 में हुए भारत-विभाजन को एक ऐतिहासिक भूल और अप्राकृतिक विभाजन के रूप में देखा जाता है। उनका तर्क है कि मजहब या धर्म के आधार पर खींची गई रेखाएं इस उपमहाद्वीप की साझा विरासत को अलग नहीं कर सकतीं। जबकि इस प्रकार की मानसिकता संघी विचारकों की थी और इसके विरोधी भी वही थे विभाजन में सावरकर की द्वि-राष्ट्र की परिकल्पना अहम थी। संघ के नेता अक्सर जर्मनी (पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी) और वियतनाम के पुर्नमिलन का उदाहरण देते हैं। उनका मानना है कि जैसे बर्लिन की दीवार गिर सकती है, वैसे ही भविष्य में परिस्थितियां बदलने पर इस उपमहाद्वीप के देश भी पुन: एक हो सकते हैं।
3. ‘अखंड भारत दिवस’ का आयोजन: संघ से जुड़े संगठन हर साल 14 अगस्त को (पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस और भारत के विभाजन की पूर्व संध्या पर) ‘अखंड भारत संकल्प दिवस’ के रूप में मनाते हैं। इस दिन देश भर में गोष्ठियां, व्याख्यान और प्रदर्शनियां आयोजित की जाती हैं, जिनमें अखंड भारत का मानचित्र दिखाया जाता है और अखंडता का संकल्प लिया जाता है।
आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण: संघ की इस परिकल्पना को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आपत्तियां और आलोचनाएं भी की जाती हैं। आलोचकों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि आज पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार स्वतंत्र, संप्रभु और संयुक्त राष्ट्र (यूएन) द्वारा मान्यता प्राप्त देश हैं। ऐसे में उनके क्षेत्रों को मिलाकर एक देश बनाने की बात करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों के खिलाफ है। यदि इन सभी पड़ोसी देशों को मिलाकर एक देश बना भी दिया जाए, तो भारत की जनसंख्या में करोड़ों की संख्या में अल्पसंख्यक आबादी (विशेषकर मुस्लिम आबादी) जुड़ जाएगी। आलोचकों का तर्क है कि जो विचारधारा वर्तमान भारत के भीतर ही धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की राजनीति करती है, वह इतने बड़े मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को अपने भीतर कैसे समाहित करेगी?
अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना: आलोचकों का यह भी मानना है कि दक्षिण एशियाई देशों में इस परिकल्पना को भारतीय विस्तारवाद या हिंदू राष्ट्र के थोपे जाने के डर के रूप में देखा जाता है, जिससे पड़ोसी देशों के साथ राजनयिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं। हाल के वर्षों में, संघ के शीर्ष नेताओं (जैसे मोहन भागवत) के बयानों में थोड़ा बदलाव देखा गया है। वे अब बलपूर्वक या युद्ध के जरिए जमीन हड़पने की जगह ‘सांस्कृतिक एकीकरण’ और ‘अखंडता की भावना’ पर अधिक जोर देते हैं। उनका कहना है कि यदि पड़ोसी देश भारत के साथ एक महासंघ के रूप में जुड़ते हैं या यूरोपीय संघ (ईयू) की तरह सीमाओं को लचीला बनाकर व्यापार और संस्कृति के स्तर पर एक होते हैं, तो वह भी अखंड भारत की दिशा में एक कदम होगा।
सम्राट अशोक का ‘अखंड भारत’ केवल सीमाओं के विस्तार का नाम नहीं था, बल्कि वह राजनीतिक स्थिरता, धार्मिक सहिष्णुता, लोक कल्याण और सांस्कृतिक समन्वय का एक स्वर्णिम काल था। इतिहास में पहली बार इतने बड़े भूभाग पर एक ही राजा का शासन, एक ही प्रकार के कानून और एक ही तरह की कल्याणकारी नीतियां लागू थीं। जिसका प्रतिफल यह रहा था कि करीब 40 वर्ष से अधिक समय खुद सम्राट अशोक का शासन रहा, और उसके पश्चात करीब 50 वर्ष से अधिक उसके वंशजों का शासन रहा। करीब इस 100 वर्ष के शासन काल में न कोई आंतरिक विद्रोह हुआ और न कोई बाह्य आक्रमण हुए। सम्राट अशोक ने अपने शासन में सभी समुदायों के लिए समान व्यवस्थाओं का प्रावधान किया था। उनके साम्राज्य में न कोई ऊंचा था और न कोई नीचा था, सभी के साथ समानता का व्यवहार था। लेकिन आज अपने आपको राष्ट्रवादी व अखंड भारत का सपना देखने वाले संघियों के कार्यों और नीतियों में अलगाववाद और विभाजनकारी नीतियाँ अधिक सक्रिय हैं। संघियों द्वारा हिन्दू-मुस्लिम, हिंदुस्तान-पाकिस्तान, खालिस्तान, सांप्रदायिक दंगे, ऊंच की भावना, जातिवादी मानसिकता, दलितों-शोषितों व वंचितों के ऊपर अमानवीय अत्याचार, संस्थागत तरीकों से जारी है, जिसके कारण अखंड भारत का सपना देखना बेमानी है। बहुजन समाज संघियों की इन षड्यंत्रकारी नीतियों से सावधान रहे और कभी भी इनकी नीतियों का समर्थन न करें।





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