




2026-03-07 14:38:07
केजरीवाल (kejriwal) की सरकार दिल्ली में करीब 10 वर्षों से अधिक रही। केजरीवाल जन्म से ही एक संघी मानसिकता के व्यक्ति है। ऐसा वक्तव्य उन्होंने स्वयं ही दिया था कि ‘मैं और मेरा परिवार संघ की शाखाओं में जाया करते थे, संघ (RSS) की नीतियों में मेरा और मेरे परिवार का पूरा विश्वास है।’ केजरीवाल शुरू से ही एक पाखंडवादी प्रवृत्ति के व्यक्ति है, वे अपने आपको हनुमान का भक्त बताते हैं और पब्लिक को दिखाने के लिए प्राय: मंगलवार को खुद व कभी-कभी अपनी पत्नी के साथ हनुमान मंदिर जाकर अपनी मनुवादी आस्था का प्रदर्शन भी करते हैं। अभी हाल ही में केजरीवाल को कोर्ट से मिली राहत पर वे और मनीष सिसोदिया जनता को अपना पाखंडवाद प्रदर्शित करने के लिए हनुमान मंदिर गए और वहाँ पर पूजा अर्चना भी की। मंदिर में किए गए दिखावे का फोटो उन्होंने सोशल मीडिया पर भी डालकर उसका बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार किया। यह सब केजरीवाल ने बहुजन समाज (Bahujan samaj) की कम समझ और पाखंडवाद में फंसी जनता को दिखाने की नियत से किया। केजरीवाल जी शातिर दिमाग के व्यक्ति है और वे यह जानते हैं कि बहुजन समाज की अत्यंत पिछड़ी व कम समझ (वाल्मीकि) समाज की जनता को संघी-झांसे व छलावे में कैसे फंसाया जाये? केजरीवाल जी एक षड्यंत्रकारी मानसिकता के व्यक्ति हैं, राजनीति में आने से पहले वे अपना एक एनजीओ भी चला रहे थे जिसके बैनर तले वह बहुजन समाज की दलित व अत्यंत पिछड़ी (OBC) जातियों विशेषकर खटीक, कोली व वाल्मीकियों के विरुद्ध आरक्षण का विरोध कर रहे थे।
केजरीवाल को राजनीति षड्यंत्रकारी नीतियों के तहत लाया गया: संघियों को कांग्रेस सरकार को बदनाम करने के लिए एक शातिर संघी व्यक्ति की तलाश थी, जो उन्हें केजरीवाल के रूप में मिला। उसके साथ ही उन्होंने दूसरे संघी मानसिकता के पाखंडी प्रदर्शनकारी अन्ना हजारे को पकड़ा और मनुवादी संसाधनों के बल पर दिल्ली के राम लीला मैदान में 16 अगस्त 2011 को ‘लोकपाल विधेयक’ को लेकर आंदोलन की शुरूआत की जो लगभग 12 दिनों तक चला। जिसमें केजरीवाल ने देश में बढ़ते कांग्रेसी शासन के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जोर-शोर से मोर्चा खोला था।
केजरीवाल जैसा दिखता है, वैसा है नहीं: केजरीवाल ने अपनी बनिया-संघी नीति के तहत गांधी की तर्ज पर अपने आंदोलन की पैठ दलित बस्तियों से शुरू की, दिखावे के रूप में अपने आंदोलन की शुरूआत नन्द नगरी की दलित झोपड़-पट्टी से की, अपना चुनाव चिन्ह भी झाड़ू चुना। ऐसा देखकर दलितों के अति-पिछड़े समुदाय विशेषकर वाल्मीकियों में संदेश गया कि केजरीवाल शायद वाल्मीकि समाज के ही व्यक्ति हंै, जिसके आंदोलन का उद्देश्य वाल्मीकि समाज का उत्थान करना है। इसी भ्रम में वाल्मीकि समुदाय व दलित घटकों के अन्य समुदाय ने भी केजरीवाल को भरपूर समर्थन दिया, जिसके बल पर वे राजनेता बनने में सफल हुए। संघियों की षड्यंत्रकारी नीति कांग्रेस को सत्ता से हटाने में सफल हुई। केजरीवाल का पूरा का पूरा यह षड्यंत्र संघियों की रणनीति के मुताबिक अदृश्य रूप से चला था जिसमें देश की आम जनता हारी, और संघी मानसिकता की जीत हुई। जिसके फलस्वरूप केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर स्थापित हुए।
केजरीवाल को जेल से निकालना एक षड्यंत्र: केजरीवाल को एक अदृश्य संघी षड्यंत्र के तहत जेल से बाहर लाया गया है क्योंकि अगर यह गेम प्लान न लाया जाता तो शायद पाँच साल के लिए मोदी-भाजपा (Modi-BJP) संघियों को राहुल गाँधी व इंडिया गठबंधन के साथियों के सामने झुककर रहना पड़ता।
मनुवादी-भाजपा सरकार ने केजरीवाल पर एक नहीं दो केस किये थे। पहला केस किया प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने, जो बहुत मजबूत केस था, निचली अदालत ने ही नहीं, बल्कि हाईकोर्ट ने भी बोला था कि इतने सारे सबूत देखकर यह घोटाला बिल्कुल साफ-साफ दिख रहा है, इसलिए कई बार बेल को रिजेक्ट किया गया था। दूसरा केस सीबीआई ने किया था जो बिना सबूतों के इतना कमजोर बनाया गया था कि कोर्ट ने पहले ही बोल दिया कि इस केस को चलाने की परमिशन तक नहीं मिलेगी। ये संघी भाजपा का पूर्व नियोजित षड्यंत्र था, यह पूरा खेल ध्यान से समझना होगा!
लोकसभा चुनाव से एक महीने पहले केजरीवाल को Arrest किया गया मार्च 2024 में। इसका नतीजा क्या हुआ? केजरीवाल की पार्टी और इंडिया गठबंधन की शर्मनाक हार हुई और भाजपा को फायदा हुआ। पर बड़ी चालाकी से सितम्बर 2024 में केजरीवाल को बेल भी मिल गई चूंकि तब हरियाणा में चुनाव होने थे और तब उसका फायदा किसे मिला? केजरीवाल ने कांग्रेस के वोट काटे और भाजपा वहां पर जीत गई। जागरूक लोग अगर डेटा चेक करते हैं तो आपको मालूम हो जायेगा कि भाजपा सिर्फ 0.8 प्रतिशत वोटों से जीती। जिसमें 1.79 प्रतिशत वोट सिर्फ केजरीवाल जी की पार्टी ने ही काटे। लेकिन इसके बाद भी भ्रष्टाचार के आरोप अभी भी थे, इसलिए केजरीवाल दिल्ली जानबुझ कर हार जाते है और यहीं से कांग्रेस को संघियों का मास्टर प्लान समझ में आता है। उसी तर्ज पर अब भाजपा पंजाब में भी भ्रष्टाचार का मुद्दा बना रही है ताकि पंजाब से कांग्रेस को बाहर किया जा सके। पर यहाँ पर भाजपा फिर से अपनी चाल चलती है। एक कमजोर केस जो सीबीआई ने किया था, जो अभी तक एक ठंडे बस्ते में था उसे रणनीति के तहत आगे बढ़ाया जाता है और कोर्ट से केजरीवाल को डिस्चार्ज करा दिया जाता है।
अब कमाल की बात तो यह है कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) का जो इतना स्ट्रांग केस था कि उसमें बेल भी नहीं मिल रही थी, लेकिन जैसे ही सीबीआई के केस से इनको डिस्चार्ज मिला ईडी वाला केस भी खुद-ब-खुद खत्म हो गया। अब इसका फायदा यह होगा कि ईमानदार छवि लेकर केजरीवाल पंजाब के चुनाव में उतरेंगे और कांग्रेस को फिर से हराया जायेगा। बड़ा सवाल यह उठता है कि इन सबसे भाजपा को फायदा क्या हो रहा है?
भाजपा का फायदा? राज्यसभा के अंदर किसी भी संशोधन के लिए 2/3 मैंजोरटी यानि 162 सीटों की जरुरत है, मगर एनडीए के पास 133 सीट है यानि के 29 सीट कम। लेकिन उसके बाद भी एनडीए (NDA) को कोई खास समस्या नहीं हुई। इसमें से 30 सीटें ऐसी है जो एनडीए की नहीं है तो इंडिया गठबंधन (India Alliance) की भी नहीं है। इनमें से 10 सीटें है केजरीवाल की। अब देखो, जिस घोटाले में केजरीवाल को सीधे जेल में डाल दिया जाता है और अगर यह गेम न खेला जाता तो क्या होता? हरियाणा और पंजाब को कांग्रेस जीत जाती। इन दोनों राज्यों की कुल मिलाकर राज्यसभा की 13 सीटें हैं। 13 में से 10 सीटें भी अगर कांग्रेस ले जाती तो पूरा समीकरण बदल जाता कि राज्य सभा के अंदर कांग्रेस की और इंडिया गठबंधन की ऐसी ‘वीटो पॉवर’ बन जाती कि मोदी जी को संशोधन पास कराने के लिए राहुल गाँधी के पास जाना पड़ता। सवाल आपके दिमाग में यह उठ सकता है कि क्या न्यायपालिका भी इस गेम में भाजपा सरकार के साथ थी?
पिछले कुछ वर्षों से देखा जा रहा है कि न्यायपालिका के पास जो भी केस जा रहे हैं उनमें अधिकतर फैसले भाजपा के ही पक्ष में दिख रहे हैं। यह गेम स्वत: ही नहीं चल रहा है देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं और संवैधानिक निकायों पर संघी मानसिकता के लोगों को पहले से ही स्थापित किया जा चुका है जिसके कारण पूरा का पूरा गेम संघियों के पक्ष में होता जा रहा है। न्यायपालिका में भी उन्हीं न्यायाधीशों को आगे बढ़ाया जा रहा है जो कहीं न कहीं ब्राह्मणवादी संस्कृति से संक्रमित है। देश चुपचाप देख रहा है और समझ भी रहा है कि मोदी संघी शासन में जातिवाद और ब्राह्मणवाद चरम पर है। सभी शैक्षणिक संस्थानों में संघी मानसिकता के व्यक्तियों को स्थापित कर दिया गया है। इसी नीति के तहत बहुजन समाज के जिन जातीय घटकों के लिए सीटें आरक्षित है उन्हें जानबूझकर खाली रखा जा रहा है। आज देश के सभी संस्थानों के हालात ऐसे मोड पर है जहां पर बिना संघी राजनीतिक दलालों के जनता का कोई भी काम नहीं होता। इस गेम प्लान में देश की न्यायपालिका भी अछूती नहीं है। मोदी संघी सरकार ने न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनकी वरिष्ठता के लिए जो मापदंड बनाए हैं उसमें भी बड़ा खेल है, जो न्यायाधीश स्पष्टवादी और संवैधानिक मानसिकता के अनुरूप आचरण करते हैं उन्हें किसी न किसी तरीके से उनकी वरिष्ठता से नीचे कर दिया जाता है। इसी प्रकार उच्च व उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों को चुनने की प्रक्रिया में भी घालमेल है। हाल ही में ऐसे कई केस जनता को देखने को मिले हैं जो न्यायाधीश स्वतंत्र रुप से संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए फैसले दे रहे थे, उन्हें किसी न किसी तरीके से वहाँ से हटाकर किसी दूसरी अदालत में भेज दिया जाता है, जहां पर जाकर उनकी वरिष्ठता प्रभावित होती है। ऐसा अपने-आप नहीं नहीं होता है, यह सिर्फ मोदी-संघी सरकार की एक सोची-समझी रणनीति के तरह किया जाता है, ताकि संघी मानसिकता के न्यायाधीश की वरिष्ठता सबसे ऊपर रहे।
केजरीवाल से दलितों को रहना होगा सावधान: केजरीवाल के अभी तक के सभी कार्यकलापों को देखकर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि उनकी मानसिकता पूर्ण रूप से दलित व पिछड़े समाज की विरोधी है। केजरीवाल ने दिल्ली और पंजाब में सरकार बनाकर यह भी संदेश साफ तौर पर दिया है कि वह दलित व पिछड़ी जातीय घटकों का वोट लेकर सरकार में रहना तो चाहते हैं लेकिन जब इन वर्गों से राज्यसभा में सांसद बनाने की बारी आती है तो उनका ध्यान दलित व अत्यंत पिछड़ी जातीय घटकों की तरफ नहीं जाता। राज्य सभा में भेजने के लिए उन्हें सिर्फ सवर्ण जाति के उम्मीदवार ही याद आते हैं। दिल्ली और पंजाब में केजरीवाल ने यही खेल खेला है। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया पूर्ण रूप से संघी संक्रमण से संक्रमित होकर कार्य करते हैं। दलित जातीय घटकों से चुनकर आए विधायकों से वे अधिकांशत: दूरी बनाकर ही रखते हैं और मौका मिलने पर उनका अपमान भी करते हैं। कमोवेश संजय सिंह भी इसी मानसिकता के व्यक्ति है, संसद में मोदी संघी सरकार के विरुद्ध अच्छा बोलते हैं। दलित व पिछड़ी जातियों के लोग इस छलावे में न रहे कि संजय सिंह, मनीष सिसोदिया व केजरीवाल साफ-सुथरी नियत के व्यक्ति है। दलित व अति पिछड़ी जातियों को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि अच्छा बोलना एक अलग कला होती है, लेकिन समतावादी और मानवतावादी आचरण करना दूसरी बात होती है। केजरीवाल की पार्टी के इन तीनों व्यक्तियों में समता, समानता और मानवतावादी आचरण करने का घोर अभाव है। इन पर बिल्कुल भी भरोसा न किया जाये और दलित व पिछड़ी जातीय घटकों के मतदाता सजग रहकर इन्हें अपना वोट न देने का दृढ़ संकल्प ले। केजरीवाल के मन और मस्तिष्क में बनिया-ब्राह्मण अबाध्य गठबंधन है, जो देश के लोकतंत्र और दलितों व अत्यंत पिछड़े जातीय घटकों के हितों के विरुद्ध है।





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