Saturday, 22nd August 2026
Follow us on
Saturday, 22nd August 2026
Follow us on

समाज में आरक्षण को लेकर फैलायी जा रही भ्रामकता

News

2026-08-22 14:08:27

वास्तविकता के आधार पर भारत में संवैधानिक आरक्षण दो प्रकार का है। पहला- एससी/एसटी वर्ग के समुदाय को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण, इस आरक्षण व्यवस्था की कोई समय सीमा तय नहीं की गई है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के अंतर्गत इससे संबन्धित व्यवस्थाओं को नियमित किया गया है। चूंकि जब तक इस देश की जनता के मन और मस्तिष्क में एससी/एसटी समुदाय के जातीय घटकों के प्रति नफरत और उपेक्षा का भाव रहेगा तब तक यह आरक्षण लगातार भारतीय समाज में लागू रहेगा। मोदी संघी सरकार ने 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद भारतीय समाज में क्रमिक ऊंच-नीच की खाई को और अधिक बढ़ाया है जिसके फलस्वरूप समाज में पहले से ही व्याप्त नफरत का भाव अब और अधिक बढ़ चुका है। पिछले 12 वर्षों से संघी मानसिकता के हिन्दुत्व की वैचारिकी के प्रचारक एससी/एसटी जातीय घटकों के खिलाफ समाज में पहले से ही व्याप्त घृणा और उपेक्षा को और अधिक बढ़ाने का काम कर रहे हैं। एक तरफ ये लोग आरक्षण का विरोध करते हैं और अपने विरोध के माध्यम से देश की जनता को बरगलाने और भड़काने का काम करते हैं। इसी मिथ्या प्रचार और कारनामों के बल पर समाज के आपसी भाईचारेको जहरीला बनाते हैं। यही कारण है कि आज देश का आरक्षित और अनारक्षित वर्ग एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। दोनों में मैत्री और समझ का अभाव है। इसी अभाव को संघी मानसिकता के प्रचारक भाँपकर गाँव-गांव, कस्बे व शहरों में घूमकर जनता में गहराई तक समाहित करते हैं। ब्राह्मणवादी मानसिकता के तथाकथित साधु-संतों को भी मैदान में उतारकर उनसे यही काम कराया जा रहा है। दूसरे प्रकार का आरक्षण- राजनीतिक आरक्षण है, जिसका अर्थ है देश की विधायिकाओं में समाज के पिछड़े या एसटी/एसटी वर्ग के लिए प्रतिनिधित्व तय करना। भारतीय संविधान में लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में एससी और एसटी के लिए आरक्षण सिर्फ 10 वर्ष के लिए तय किया गया था। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 334 के तहत किया गया था, जिसके अनुसार यह व्यवस्था वर्ष 1960 तक प्रभावी रहनी चाहिए थी। जबकि सरकारी नौकरियों, पब्लिक सेक्टर, और शैक्षणिक संस्थानों में मिलने वाले आरक्षण के लिए संविधान में कोई शुरूआती या अंतिम समय सीमा तय नहीं की गई थी। इसी व्यवस्था को लेकर समय-समय पर ब्राह्मणवादी संघी मानसिकता के प्रचारक देश की कमसमझ और अज्ञान जनता को बरगलाकर भ्रमित करते रहे हैं कि आरक्षण सिर्फ 10 वर्ष के लिए था, इसे सरकार बार-बार आगे क्यों बढ़ाए जा रही है, समाप्त क्यों नहीं करती? एसटी/एसटी वर्ग की कमसमझ और अज्ञान जनता इस अतथ्यात्मक भंवर में फँसकर ब्राह्मणवादी संघियों को सटीक जवाब नहीं दे पाती जिसका कारण उनकी इस संबंध में कमसमझ और पूर्ण जानकारी का नहीं होना है।

बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने सैद्धान्तिक रूप से राजनीतिक आरक्षण का समर्थन नहीं किया था, उनका मत था कि एक तय समय सीमा तक कुछ हद तक यह उचित होगा, उसके बाद अगर यह जारी रहता है तो ब्राह्मणवादी वर्चस्व की मानसिकता वाले राजनीतिक दल इसका इस्तेमाल करके एससी/एसटी समुदाय से अपने मानसिक गुलाम ढूंढकर उनके द्वारा समाज का दोहन करेंगे। आज संसद में 131 सांसद एससी/एसटी समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिनमें आधे से अधिक लोग ब्राह्मणवादी मानसिकता से प्रभावित होकर मानसिक गुलाम बने हुए हैं। यह सिद्ध करता है कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने जो आशंका उस वक्त जाहिर की थी, वह आज जमीन पर सिद्ध हो रही है। संसद में बैठे सांसद जिस समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए वहां पहुंचे हैं, उस समुदाय की आवाज को संसद या विधानसभा में रखने में वे विफल है चूंकि उनकी राजनीतिक पार्टी उन्हें ऐसा करने से प्रतिबंधित करती है। वास्तविकता के आधार पर ऐसे चुने हुए प्रतिनिधि राजनीतिक पार्टियों के मानसिक गुलाम है, वे अपने समाज की समस्याओं की कीमत पर जोखिम नहीं उठाते और अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने की नियत से चुप रहना ही बेहतर समझते हैं। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने विधान सभा और संसद में ऐसे प्रतिनिधियों को देखकर, ऐसे प्रतिनिधियों के लिए असंसदीय शब्द ‘भड़वे’ का इस्तेमाल किया था! मगर आज के राजनीतिक परिदृश्य में आरक्षित सीटों से जीतकर आए प्रतिनिधि वास्तव में ‘भड़वे’ और ‘दलाल’ ही साबित हो रहे हैं।

आरक्षित जातीय घटकों में भ्रामक प्रचार: ब्राह्मणवाद का सबसे बड़ा हथियार है समाज में तथ्यहीन भ्रामक प्रचार करो कि तुम्हारा आरक्षित हिस्सा आरक्षित वर्ग का आमुख जातीय घटक खा रहा है। इस प्रकार के भ्रामक प्रचार के पीछे उनकी राजनीतिक भावना छिपी होती है। उदाहरण के तौर पर हम देश की प्रबुद्ध जनता को बताना चाहते हैं कि जब देश में गृहमंत्री सरदार बूटा सिंह थे तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, तब बूटा सिंह ने अपने कांग्रेसी आकाओं के निर्देशन पर समाज में यह प्रचार फैलाना शुरू किया, जगह-जगह पब्लिक प्लेस पर होर्डिंग भी लगे कि आरक्षण का लाभ सिर्फ एक ही जाति को क्यों? इस राजनीति के पीछे का मकसद था, वाल्मीकि समुदाय और जाटव समुदाय के बीच एकता को विखंडित करके वैमनष्यता को पैदा करना। क्योंकि राजनीतिक आकांक्षाओं और रणनीतिककारों को पता है कि आरक्षित वर्ग के वाल्मीकि समुदाय और जाटव समुदाय की संख्या महत्वपूर्ण है। आरक्षित वर्ग में वाल्मीकि समुदाय की संख्या करीब 7-8 प्रतिशत है और जाटव/चमार समुदाय की संख्या करीब 12 प्रतिशत है। संख्याबल के आधार पर दोनों की राजनीतिक शक्ति महत्वपूर्ण है। कांग्रेस में ब्राह्मणवादी वर्चस्व शुरूआत से ही हावी रहा और उसकी राजनैतिक नीतियों को प्रभावित करता रहा है। वर्तमान कांग्रेस में ब्राह्मणवादी वर्चस्व कुछ हद तक कमजोर हुआ है परंतु खत्म नहीं हुआ है। इसलिए बहुजन समाज के जातीय घटकों को कांग्रेस का आँख मूंदकर समर्थन नहीं करना चाहिए, पहले उसके आचरण का विश्लेषण करके देखना चाहिए अगर बहुजन समाज के कुछेक महत्वपूर्ण जातीय घटकों को कांग्रेस की नीतियों का समर्थन करना है तो पहले वे कांग्रेस से खुला वचन पत्र लें कि कांग्रेस आरक्षित समुदायों के लिए क्या करने जा रही है? और इन आरक्षित समुदायों को बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के उस संदेश को भी याद रखना चाहिए, कि कांग्रेस एक जलता हुआ महल है इसलिए हमारे समुदाय को कांग्रेस में शामिल नहीं होना चाहिए। समुदाय के जागरूक और प्रबुद्ध लोग यह सब बातें जानते हैं परंतु उन्हें मानते और आत्मसात करते वक्त वे अपने स्वयं के हित को अधिक भाव देने लगते हैं। जिसके कारण बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के संदेश इन कथित पढेÞ-लिखे विद्वानों को कमजोर और समाज के हित के विपरीत लगने लगते हैं। ऐसे लोगों को ठीक से समझने के लिए कुछेक उदाहरण है-राजेन्द्र पाल गौतम, प्रो. रतन लाल, डॉ. रविकांत, आईपीएस अशोक आदि। ये वे व्यक्ति है जो अपने आपको कट्टर अम्बेडकरवादी और बुद्धवादी बताते थकते नहीं हैं। जनता को इनसे सवाल करना चाहिए कि क्या ये बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के संदेश को फॉलो कर रहे है।

शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की स्थिति: बाबा साहेब का सबसे अधिक जोर बहुजन समाज के समुदायों की शिक्षा पर था। इसलिए उनका नारा भी था कि ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’। इससे प्रतीत होता है कि बाबा साहेब के मन और मस्तिष्क में आरक्षित वर्ग के सभी जातीय घटकों के लिए शिक्षा ही अधिम महत्वपूर्ण थी। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा था कि ‘शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो जितना पियेगा वह उतना ही दहाड़ेगा’। उनका यह कथन पूर्णतया सत्य और तथ्यात्मक है, उन्होंने अपने जीवन में इस कथन को साबित करके भी दिखाया। उन्होंने देश-विदेश और भारत की संसद में शेर की तरह दहाड़कर आरक्षित और पिछड़े समुदायों के लिए संवैधानिक अधिकार भी सुनिश्चित कराये। आज करीब 77 वर्षों के बाद भी संविधान में निहित किए गए शिक्षा से संबन्धित प्रावधान आधे-अधूरे ही हैं।

नई शिक्षा नीति-2020 में मोदी सरकार ने जो संघी मानसिकता के तहत प्रावधान रखे हैं, वे देश के एससी/एसटी व अति पिछड़े समुदायों को पीछे धकेल रहे हैं। हाल ही में संसद में एससी/एसटी और पिछड़े वर्ग से जुड़े आंकड़े पेश किये गए जो सभी प्रकार से निराशा जनक थे। नई शिक्षा नीति के द्वारा शिक्षा का निजीकरण करके, शिक्षण संस्थानों में फीस बढ़ोत्तरी पर जोर, सरकारी स्कूल बंद करने पर जोर, पाठ्यपुस्तकों व पाठ्य सामग्री की गुणवत्ता को कमजोर करने पर जोर, व्यापारी मित्रों के निजी स्कूलों को बढ़ावा देने पर जोर, शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षक कम करने पर जोर, शिक्षा से जुड़ी गुणवत्ताओं को कम करने पर जोर आदि के कार्यक्रम मोदी-संघी सरकार द्वारा देशभर में चलाये जा रहे हैं। एससी/एसटी व पिछड़े वर्ग की जनता को इन मामलों पर गंभीर संज्ञान लेना चाहिए। किसी भी हालत में ऐसी सरकारों को सत्ता में नहीं आने देना चाहिए। समाज की एकजुटता ही शिक्षा व्यवस्था को सुधारने में कामयाब हो सकती है। मगर विडम्बना यह है कि एससी/एसटी व पिछड़ा समाज बिना किसी कारण के सरकारों की चाटूकारिता और मानसिक गुलामी में फंसा हुआ है जो जनता के लिए कोई भी उचित समाधान नहीं होने दे रहा है।

प्रभावशील पदों पर भागीदारी नगण्य: देश के अति पिछड़े समाज की सरकारी संस्थाओं में भागीदारी नगण्य है, इन जातियों में नाई, कुम्हार, गड़रिये, लौहार, बढ़ई, तेली, तमोली, शक़्का, आदि सैंकड़ों जातियाँ है जो अत्यंत पिछड़ी स्थिति में हैं। सत्ता के शीर्ष प्रभावशाली पदों पर बैठे पदाधिकारियों में उनकी संख्या नकारात्मक है। सरकार स्वयं इस बात की पड़ताल करे कि इस अत्यंत पिछड़े समाज की भागीदारी नगण्य क्यों है? सरकार से निवेदन है कि इस अत्यंत पिछड़े समाज के लिए सरकार विशेष योजनाएँ बनाकर इन अत्यंत पिछड़ी जातीय समुदाय के लोगों को संख्याबल के हिसाब से प्रभावशाली पदों पर एक निश्चित समय अवधि में नियुक्त करें। ऐसा करके ही संविधान सम्मत सामाजिक न्याय की धारणा को मजबूत किया जा सकता है।

ब्राह्मणवादी वर्चस्व के कारण सामाजिक न्याय फेल: आजादी के आंदोलन के समय से ही आंदोलनकारियों में ब्राह्मणवादी वर्चस्व हावी रहा और इसी ब्राह्मणवादी वर्चस्व के कारण समाज के अन्य समुदायों की भागीदारी कम और प्रभावहीन रही। आंदोलन की बागडोर और उसके नेता ब्राह्मणवादी मानसिकता के ही थे और उन्होंने ब्राह्मणवाद को आगे बढ़ाने के लिए कट्टर ब्राह्मणवादियों को आंदोलन का नेता बनाया। आजादी के बाद सत्ता की बागडोर ब्राह्मणवादियों के हाथों में आई। सत्ता के बल पर ब्राह्मणवादी मानसिकता के नेताओं ने ब्राह्मणवाद के वर्चस्व को समाज में कायम रखा और एससी/एसटी व अति पिछड़े समाज को भागीदारी न देने का सतत: प्रयास किया। जिसका प्रतिफल वर्तमान समय में यह दिखाई दे रहा है कि मनुवादी-ब्राह्मणवादी संघी सत्ता सरकार में है और वह देश की वंचित शोषित जनता को विभिन्न माध्यमों से मनुवादी जाल में फंसाकर लूट रही है। देश की जनता को अपने वर्तमान और भविष्य को सुधारने के लिए जागरूकता और एकजुटता के साथ ब्राह्मणवादी सरकारों से मुकाबले के लिए डटकर खड़ा होना होगा।

Post Your Comment here.
Characters allowed :


01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05