




2026-05-25 16:16:51
देश का शासन-प्रशासन विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक विभागों के द्वारा संचालित होता है। इनका प्रबंधन और संचालन सरकार द्वारा विभिन्न पदों पर भर्ती किये गए व्यक्तियों द्वारा होता है। ये सभी कर्मचारी विभिन्न श्रेणी के पदों पर कार्य करते हैं और इन सभी का दायित्व कार्यालयों को सुचारु रूप से संस्थान के उद्देश्यों के मुताबिक संचालित करके उससे जुड़े कर्मचारियों व आम जनता को अपेक्षित परिणाम भी देना होता है। इन सभी श्रेणी के कर्मचारियों की योग्यताएँ और जिम्मेदारियाँ भी एक-दूसरे से भिन्न होती है। आमतौर पर बड़े स्तर के कर्मचारी संस्थान की जिम्मेदारियों और उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अधिक जिम्मेदार होते हैं। संस्थान के सभी कर्मचारियों को उनका वेतन उनके पद के अनुरूप पहले से ही निर्धारित होता है। सरकारी कार्यालयों में सभी कर्मचारियों का एक निश्चित दायित्व और अधिकार होता है। जिसकी परिधि में रहते हुए प्रत्येक कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करता है। संस्थान के सभी कर्मचारी संस्थान की गरिमा और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होते हैं।
सरकारी कर्मचारियों की मानसिकता में बदलाव: 12 साल के संघी शासन में आमतौर पर यह देखा जा रहा है कि जो कर्मचारी/अधिकारी 12 साल पहले 45 वर्ष की आयु के आसपास था वह 12 साल संघी शासन में रहने के बाद अब 55 वर्ष की आयु पार कर चुका है। ऐसे कर्मचारियों का कार्य करने का जोश जो 12 वर्ष पहले की अवस्था में थी वह 55 वर्ष की अवस्था के बाद उतनी कारगरता के साथ दिखाई नहीं देता, जो स्वाभाविक प्रक्रिया है, इसमें कर्मचारियों का कोई दोष नहीं है। 55-57 वर्ष की आयु होने के बाद अगर कर्मचारी को उसकी बुनियादी ईमानदारी और निष्ठा के अनुरूप कार्य करने का वातावरण नहीं मिलता तो वह थकान महसूस करने लगता है। जब कार्यालय में ऐसे कर्मचारियों की संख्या काफी बढ़ जाए तो वह अपने साथ के अन्य कर्मचारियों से यह बातें करके अपने मन को बहलाते हैं कि अभी हमारे पास सिर्फ 3-4 साल रिटायरमेंट में बचे हैं, हमें किसी तरह वर्तमान संघी व्यवस्था से समझौता करके रिटायरमेंट के पहले का समय पूरा करना है। सरकारी दफ्तरों में आज ऐसे ही कर्मचारियों की अधिकता देखी जा रही है। खासतौर पर वैज्ञानिक व अनुसंधानिक संस्थानों और परिषदों के संस्थानों में। जिसका कारण शायद यह भी है कि मोदी संघी सरकार जबसे सत्ता में आई है तब से उसने नियमित कर्मचारियों की नियुक्तियां नहीं की हैं। अधिकांशतया मनुवादी संघी सरकार में संविदा पर ही कर्मचारियों को रखा जा रहा है। जिनकी सरकारी कर्मचारियों के अनुरूप कोई जिम्मेदारी तय नहीं होती है, संस्थानों के अधिकतर काम लटके रहते हैं और इस देरी का ठीकरा नियमित कर्मचारियों के ऊपर फोड़ा जाता है जबकि वे सब ऐसी स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं।
संविदा कर्मचारियों की भर्ती में भ्रष्टाचार: वर्तमान समय में सरकारी संस्थानों में जो कर्मचारी या शिक्षक संविदा पर भर्ती किये जा रहे हैं उसमें भ्रष्टचार का सत्ता के सहारे बड़ा खेल चल रहा है। संस्थान में संघियों ने अपनी संघी मानसिकता का जो व्यक्ति औपचारिक रूप से बैठाया हुआ है उसकी मर्जी के बगैर कोई भी कर्मचारी न संविदा पर नियुक्त हो सकता है और न ही किसी को संस्थान से जुड़े काम के ठेके दिये जा सकते हैं। संस्थान में बैठाया गया संघी मानसिकता का अनौपचारिक व्यक्ति संविदा पर रखे जा रहे व्यक्तियों से या संस्थान से जुड़े अन्य काम कराने के लिए ठेके दिये जाते हैं जबतक अनौपचारिक संघी व्यक्ति की जेब में अवैध रूप से धन नहीं पहुँच जाता, तब तक काम आगे नहीं बढ़ता है। जिन सरकारी संस्थानों में पहले भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं था। वहाँ पर भी अब खुला भ्रष्टाचार चल रहा है। बिना कट मनी दिये किसी का कोई काम नहीं होता है। इसलिए आज संघी सरकारों में कांग्रेसी सरकारों के सापेक्ष भ्रष्टाचार 20 गुना बढ़ चुका है। जनता चुपचाप रहकर इसे सहने के लिए मजबूर है। अवैध रूप से कट मनी के द्वारा इकट्ठे हुए धन से ही देश में अंधभक्तों की फौज खड़ी की जा रही है, यह सबको मालूम है कि आज देश किस स्थिति में पहुँच चुका है। लेकिन फिर भी अंधभक्त संघी-धूर्त जनता को जोर-जोर से बता रहे हैं कि मोदी जी का विश्व में डंका बज रहा है। इन अंधभक्तों से कोई यह पूछे कि मोदी सरकार देश के हर मौर्चे पर विफल है, तो मोदी का डंका कहाँ बज रहा है? नार्वें की एक पत्रकार का मोदी जी ने सीधा जवाब न देकर देश की फजीयत कराई। पत्रकार ने मानव अधिकार हनन के सवाल पर मोदी जी को घेरा, जिनका वे जवाब न देकर देश की बेइज्जती का डंका बजवा रहे हैं।
सरकारी कर्मचारियों में उदासीनता: सरकारी कार्यालयों में काम कर रहे कर्मचारियों व अधिकारियों को देखकर ऐसा महसूस होता है कि वे थके और उदासीन अवस्था से गुजर रहे हैं। चूंकि मोदी-संघी सरकारी तंत्र में उनकी बात को अब न कोई सुनने वाला है और न कोई समझने वाला है। वे तो सिर्फ संघी मानसिकता के द्वारा दफ्तर में बैठाये गए अनौपचारिक संघी मानसिकता के व्यक्ति की आज्ञाओं का पालन करने को मजबूर है। संस्था के उद्देश्यों को पूरा करने के प्रति उनका कोई कर्तव्य नहीं है। वे अब सभी अपने रिटायरमेंट की तारीख की तरफ देख रहे हैं। अगर दफ्तर में उनका कोई पुराना परिचित व्यक्ति आ जाये तो उससे वे अपने मन की बात इसी अंदाज में बयां करते हैं कि अब हमारे रिटायरमेंट में सिर्फ 3-4 साल बचे हैं जिसे हम शांति से पूरा करना चाहते हैं ताकि हमारे सर्विस कैरियर पर कोई दाग न आए और हमें सही सलामत पेंशन मिल सकें। इसी वजह से मर रहे हैं देश के वैज्ञानिक संस्थान व वैज्ञानिक परिषदें।
मोदी काल से पहले सेवानिवृत हुए व्यक्तियों की मानसिकता: मोदी शासन से पहले के कर्मचारियों की मानसिकता में मोदी काल के सापेक्ष अंतर साफ दिखाई देता है। पहले के सभी कर्मचारी और अधिकारी अपने रिटायरमेंट के आखिरी मिनट तक अपनी पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ कार्य करते थे, उनमें अपने रिटायर होने की भावना उनकी कार्य करने की क्षमता पर हावी नहीं होती थी और न ही वे अपने रिटायरमेंट की तारीख का इंतजार करने में समय गुजारते थे। जिसकी वजह से संस्थान और उसमें कार्यरत कर्मचारी भी मानसिक रूप से स्वस्थ रहते थे, उनकी मानसिकता में कोई मनोवैज्ञानिक दबाव व दोष नहीं झलकता था। रिटायर होने के बाद भी संस्थान अपनी पूरी जिम्मेदारी के साथ यथावत चलता रहता था। परंतु वर्तमान मोदी सत्ता में कर्मचारी/अधिकारी संस्थान के प्रति जिम्मेदार न होकर वे सिर्फ अपना समय अन्य गतिविधियों में शामिल होकर व्यतीत करते हैं और संस्थान गर्त के तरफ अग्रसर होता रहता है। मोदी काल में ऐसे बहुत सारे संस्थान है जिन्हें इसी कार्यशैली के द्वारा मृतप्राय: करके अंतत: उन्हें बंद कर दिया गया है। जिसके कारण नुकसान मोदी संघियों का नहीं, बल्कि पूरे देश और उसकी नौजवान जनता का ही है।
शोध और तकनीकी नवाचार पर ध्यान नहीं: मोदी संघी शासन काल में ध्यान सिर्फ पाखंडवादी प्रक्रियाओं पर है शोध और तकनीकी नवाचार के कार्य आमतौर पर निम्नतम स्तर पर है। शोध सिर्फ पाखंडी विषयों जैसे गाय-गोबर, पाखंडी काल्पनिक और बनावटी इतिहास पर किया जा रहा है। सारी दुनिया यह जानती है कि किसी भी देश का विकास उसके शोध और तकनीकी नवाचार के बल पर ही संभव हो सकता है। पाखंडी संस्कृति तो देश को सिर्फ गर्त की तरफ ही ले जा सकती है, संघी मानसिकता के तथाकथित विद्वानों के द्वारा देश के वास्तविक इतिहास को बदलकर पाखंड से भरने का काम किया जा रहा है। संघी मानसिकता के लोगों को झूठ के आधार पर उन्हें देश का नायक बनाया जा रहा है और असली नायकों को इतिहास से मिटाया जा रहा है। देश की सजग जनता यह सबकुछ चुपचाप देख रही है और वह यह सब देखकर भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है, मूर्ख-धूर्त संघी मानसिकता के व्यक्तियों को यह भी ज्ञान नहीं है कि जिस वास्तविक इतिहास को तुम छिपाने और ढकने का काम कर रहे हो, वह इतिहास और उसके साक्ष्य सिर्फ भारतीय किताबों में ही नहीं बल्कि वे विदेशी पुस्तकों और वहाँ के संस्थानों की लाइब्रेरी में भी डिजिटल फोरमेट में सुरक्षित है, उसे न तुम छिपा सकते हो और न मिटा सकते हो।
मनुवादी संघी शासन का प्रशासनिक तंत्र: मोदी संघी शासन की शुरूआत 2014 से हुई, अपने शुरूआती कुछेक वर्षों को छोड़कर, उन्होंने अपनी संघी संस्कृति को सरकारी तंत्र में स्थापित करना शुरू किया और धीरे-धीरे देश के सभी सरकारी, अर्द्धसरकारी और सरकार के अनुदान से चलने वाले सभी संस्थानों में संघी मानसिकता के व्यक्तियों को धीरे-धीरे स्थापित किया गया। इसी कड़ी में देश में जितने भी सरकारी शैक्षणिक संस्थान है, उनमें भी संघियों ने अपनी मूल मानसिकता के अनुसार कठोर संस्कृति के मनुवादियों को स्थापित किया। किसी भी सरकारी, अर्द्धसरकारी दफ्तर में कोई भी काम बिना संघी मानसिकता के व्यक्ति की अनुशंसा के आगे नहीं बढ़ता है, संस्थान से जुड़ा कोई भी कार्य हो वह बिना किसी अवैध लेन-देन के अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचता है। यह प्रक्रिया अब मोदी सरकार के सभी दफ्तरों में आम हो चली है, जिसे देखकर ईमानदार और अनुशासित कर्मचारी भी अपने मन और मस्तिष्क में दुखी तो है लेकिन वे कुछ न करने की स्थिति में है। इसलिए वे दफ्तर जाकर अनमने मन से दफ्तर में निर्धारित समय तो पूरा करते हैं मगर वे अपनी पूर्ण निष्ठा और दायित्व के साथ किसी भी कार्य को अंजाम देने में अक्षम रहते हैं।
सत्य मिटाने और छिपाने से संस्कृति महान नहीं बनती: किसी भी देश व समाज की संस्कृति उसके इतिहास, सत्य और निष्ठा से ही महान बन सकती है। झूठ और छलावे परोसने से किसी भी देश की संस्कृति महान नहीं बन सकती। मनुवादी मानसिकता वाले व्यक्तियों का इतिहास हमेशा ही झूठ और छलावों पर आधारित रहा है। उनमें न मानवता है और न सत्यता है, मनुवादी संघियों का कोई भी कृत्य किसी भी साक्ष्य को सत्यापित नहीं करता। ब्राह्मणों और बुद्ध के बीच साक्षात्कार हुआ कि सत्य क्या है?
ब्राह्मणवादी व्यक्तियों का कथन था कि वेदों में जो लिखा वही सत्य है, शास्त्रों में जो लिखा है वही सत्य है, भगवान बुद्ध ने इस तर्क को नहीं माना, तब बुद्ध से पूछा गया कि आप बताइये कि सत्य क्या है? तब भगवान बुद्ध ने कहा कि मनुष्य की 6 इंद्रियों (5 ज्ञानेंद्रिया और 1 मन) में से अगर कोई एक भी उसका साक्षी बनता है तो वही सत्य है। भगवान बुद्ध का यह तर्क सर्वसम्मति से सभी ने माना और स्वीकार किया। इस तरह ब्राह्मणवाद हमेशा असत्य और पाखंडवाद की नींव पर खड़ा रहता है और सत्य को नहीं मानता। जबकि मनुष्य और मानव कल्याण के लिए सत्य बहुत ही आवश्यक तत्व है। भगवान बुद्ध ने अपने पाँच शीलों ‘अहिंसा’, ‘चोरी न करना’, ‘व्याभिचार न करना’, ‘सत्य बोलना’, ‘मादक पदार्थों से दूर रहने’ के सिद्धान्त मानव कल्याण के लिए आवश्यक बताए हैं। इन्हीं पाँच शीलों के पालन से मनुष्य का कल्याण संभव है।
मानव कल्याण के लिए पाखंडी मनुवादी संस्कृति का त्याग करना सजग और जागरूक व्यक्तियों के लिए परम आवश्यक है। समाज में कभी भी मनुवादी संघी प्रवृति को स्थापित नहीं होने देना चाहिए, हर मनुष्य को यथासंभव कोशिश करनी चाहिए कि समाज में हमेशा सत्य, भाईचारा और न्याय की भावना बनी रहे। कर्मचारी/अधिकारियों में संस्थान के उद्देश्यों के अनुरूप कार्य करने के लिए यथासंभव आजादी और आवश्यक संसाधन सरकारों द्वारा मौजूद कराते रहना चाहिए और किसी भी संस्थान को, मानव विरोधी वैचारिकी के रंग में नहीं रंगा जाना चाहिए।





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