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भारत एक ऐसा देश है जो सामुदायिक व सांस्कृतिक विभिन्नताओं से मिलकर बना है। यहाँ किसी एक संस्कृति या किसी एक सामाजिक मान्यता का वर्चस्व नहीं है। इसलिए भारतीय संविधान में देश की एकता और अखंडता को ध्यान में रखते हुए देश में रह रहे सभी संस्कृति व धर्मों के लोगों को समान माना गया और उन सभी को समान अधिकार और अवसर प्रदान करने की व्यवस्था की गई। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का आधिपत्य रहते हुए भी यहाँ के सभी नागरिकों को शिक्षा व अन्य मानवीय अधिकार एक समान नहीं थे। यहाँ पर दलितों, श्रमिकों, वंचितों और शोषित समाज व सभी वर्गों की महिलाओं (बहुजन समाज) को शिक्षा का अधिकार नहीं था। ब्रिटिश साम्राज्य में लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति ने यहाँ पर सबसे पहले सभी वर्गों के पुरुष व महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वारा खोले, जिसका समाज में असर धीरे-धीरे होना शुरू हुआ। इस शिक्षा नीति का सबसे पहले असर शहरों व बड़े-बड़े कस्बों में दिखाई देने लगा। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को जमीन पर उतरने में एक शताब्दी का समय लगा। चूंकि भारतीय समाज की सामाजिक जमीन ब्राह्मणी संस्कृति से संक्रमित थी जो भारतीय समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार का विरोधी थी। ब्राह्मणी संस्कृति के आलंबरदारों का मानना था कि शिक्षा पर आधिपत्य केवल ब्राह्मणों का ही होना चाहिए। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में क्षत्रिय व वैश्यों को भी शिक्षा के लिए आंशिक अधिकार ही थे। दलितों, वंचितों व श्रमिक समाज में शिक्षा का चलन 1930 के उत्तरार्ध में आंशिक रूप से शुरू हुआ। उसके उपरांत दलित वंचित व शोषित समाज से कुछेक लोग पढ़-लिखकर तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी बनकर सरकार में नियुक्त होने लगे। साथ ही कुछेक अपेक्षाकृत समृद्ध परिवारों के बच्चे बीए या बीएससी की शिक्षा प्राप्त करके प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं में भी शामिल होने लगे। जिसके फलस्वरूप कुछेक शोषित व वंचित समाज के बच्चे प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं में पास होकर आईएस, आईपीएस, आईआरएस और अधीनस्थ सेवाओं में नियुक्त होकर अधिकारी भी बनने लगे। यह सब दलित, शोषित व वंचित समाज के लिए गौरव के समय की शुरूआत थी।
अधिकारी तो बने, लेकिन समाज को क्या दिया? अपने समाज के अधिकारियों को देखकर समाज प्रफुल्लित था और अपने अधिकारियों से अपेक्षा कर रहा था कि अब हमें समता, समानता न्याय और बंधुत्व का सामाजिक स्तर प्राप्त हो सकेगा। लेकिन समाज को अपने समाज के अधिकारियों से आशा पूर्ण लाभ नहीं मिला। समाज में आरक्षण से बने अधिकारियों में अपने ही समाज के सापेक्ष श्रेष्ठता का मनोवैज्ञानिक भाव उभरने लगा और अधिकांशत: ये अधिकारी अपने समाज के दलितों, वंचितों व शोषित लोगों से अपने आपको श्रेष्ठ समझने लगे। इन अधिकारियों में अपने ही समाज के निम्न स्तर के कर्मचारियों के प्रति उपेक्षा का भाव भी पनपने लगा। इस सबके फलस्वरूप दलित, शोषित व वंचित समाज के कर्मचारी व अधिकारी तीन वर्गों में विभाजित होने लगे। पहला अधिकारी वर्ग का समाज, दूसरा लिपिक व सहायक कर्मचारी वर्ग, तीसरा समाज की आम जनता। आम जनता का स्वभाव और अपेक्षा स्वाभाविक थी कि हमारे समाज के अधिकारी हमारी रक्षा, सुरक्षा और सम्मान के मामले में अग्रणीय बनेंगे और आम जनता का नेतृत्व करेंगे। मगर दलित, शोषित व वंचित समाज के कर्मचारी व अधिकारियों ने समाज की कोई परवाह नहीं की। समाज के इन अधिकारियों ने अपने आपको समाज में बड़ा दिखाने के लिए वैध और अवैध तरीके से धन कमाकर, अपने व अपने परिवार के लिए बड़े-बड़े मकान व संसाधन निर्मित किये और अपने आपको समाज से अलग समझने लगे। जिसके कारण समाज में बंटवारा साफ दिखने लगा, समाज के जो अधिकारी और कर्मचारी अपने ही समाज के साथ ब्राह्मणी संस्कृति जैसा व्यवहार कर रहे थे, अब समाज भी उनको उनकी इच्छा के अनुरूप सम्मान देने से पीछे हटने लगा। समाज के ऐसे अधिकारियों ने अपने संसाधनों के बल पर अपने पास कुछ गुर्गों को भी पाल लिया, जिनका कार्य सिर्फ समाज में ऐसे उपेक्षित अधिकारियों की तारीफ करना होता था, और समाज में उनको बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना होता था। इस तरह के चलन के आधार पर ही गुर्गों की रोजी-रोटी चलती थी, तभी वे ऐसे अपेक्षित अधिकारियों का गुणगान करते रहते थे। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने समाज की ऐसी दशा को देखकर 18 मार्च 1956 को आगरा की एक सभा में भारी मन से कहा था कि ‘मुझे मेरे पढेÞ लिखे लोगों ने धोखा दिया’ क्योंकि उनकी अपेक्षा थी कि मेरे समाज से बने अधिकारी अपने समाज के लिए काम करेंगे। साथ ही जो लोग गाँव या अन्य इलाकों में पीछे छूट गए हैं, उन्हें भी वे यथा संभव आगे लाने का प्रयास करेंगे, मगर समाज में ऐसा नहीं हो पाया। आज समाज के सभी लोग अपने हित साधने के लिए वैध और अवैध रास्ते अपना रहे हैं। समाज के कुछेक लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरने के बाद वे अपने समाज से अलग जाकर दूसरे समाज की बस्तियों, गलियों या कालोनियों में अपने आपको बड़ा मानकर दूसरे समाज के सामने मनगढ़ंत काल्पनिकता का व्यवहार कर रहे हैं।
समाज में बढ़ रहे राजनैतिक दलाल: वर्तमान समय की राजनीति में राजनीतिक दलालों का बोलबाला है। समाज के ये राजनीतिक दलाल ब्राह्मणवादी संघी संस्कृति से तालमेल करके समाज को अपने राजनैतिक लाभ के लिए बेचने का काम करते हैं। जिसका बिकने वाले दलित, शोषित व वंचित समाज को पता ही नहीं चलता। वह यही सोचता रहता है कि मैं किसके द्वारा बेचा गया और किसके द्वारा खरीदा गया? वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि मनुवादी संघी संस्कृति के लोग दलित, शोषित व वंचित समाज के मतदाताओं को हर वक्त यह समझाने में लगे रहते हैं कि मोदी जी आपको 5 किलो फ्री का राशन देकर आपके परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। इसलिए आपकी वोट मोदी के द्वारा नामित व्यक्ति को ही जानी चाहिए। इसलिए मुफ्त के राशन के चक्कर में श्रमिक कामगार समाज निठल्ला और अस्वाभिमानी बन चुका है, जो समाज हजारों साल से अपने श्रम के बल पर कमाकर खाने में गौरव महसूस करता था वही समाज आज मुफ्त में राशन पाकर अपने आपको मनुवादी संघियों की गुलामी में समर्पित करके उन्हें सत्ता में बैठा रहा है। दलित शोषित व वंचित समाज के श्रमिक लोगों को सरकार से अपने लिए रोजगार मांगना चाहिए, अनुदान और मुफ्त का राशन नहीं मांगना चाहिए और न खाना चाहिए। जिन समुदायों में मुफ्त का राशन, पानी, खाने की आदत बन जाती है वह समुदाय अपना सम्मान और गौरव खो चुका होता है। उसके सम्मान की कीमत पर ही संघी मानसिकता की सरकार उन्हें मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए मुफ्त का राशन खिला रही है।
शोषित वंचित समाज में विचार-विमर्श जरूरी: समाज में बौद्धिक विकास के लिए तर्क आधारित विचार-विमर्श होना आवश्यक है। आज से 75 साल पहले का समाज अगर हम देखें तो पाते हैं कि उस समय का समाज खाली समय में या विशेषकर शाम के वक्त काम से घर लौटने पर समाज के वरिष्ठ व्यक्तियों के साथ बैठकर पूरे दिन की दिनचर्या पर विचार-विमर्श करते थे। इस तरह की विचार-विमर्श की प्रक्रियाओं से सामाजिक ज्ञान का आदान-प्रदान भी होता था। इन आपसी सामाजिक परिचर्चाओं में सभी उम्र के व्यक्ति होते थे जिनकी उम्र 15 साल के लेकर 95 साल तक भी होती थी। 15 से 25 वर्ष की आयु वाले नवयुवक अपने वरिष्ठों की सेवाभाव में लगे होते थे और अन्य सभी समय की घटनाओं पर विचार-विमर्श और परिचर्चा करते थे। इन सामाजिक परिचर्चाओं का फायदा यह होता था कि सभी उम्र के व्यक्तियों में करीब 150-200 वर्ष के बीच उपजे सामाजिक ज्ञान का आदान-प्रदान हो जाता था। आज समाज में यह प्रक्रिया शून्य स्तर पर है। आज की युवा पीढ़ी अपने वरिष्ठ व्यक्तियों के पास, यहाँ तक की अपने माँ-बाप, दादा-दादी के पास बैठकर विचार-विमर्श व संवाद करना नहीं चाहते। जिसके कारण समाज को बड़ा नुकसान यह है कि बुजुर्गों द्वारा उनकी पीढ़ियों द्वारा अर्जित सामाजिक ज्ञान युवा पीढ़ी को हस्तांतरित नहीं हो पा रहा है और जो उनके मार्ग में कठिनाईयां आ रही है, आमतौर पर वे उन्हें सुलझाने में ना कामयाब हो रहे होते हैं। ऐसे विचार-विमर्श के द्वारा समाज में सामाजिक ज्ञान के प्रेरक भी पैदा हो रहे थे, जिसे वे अपने स्थानीय लोक गीतों के माध्यम से समाज को प्रेरित व जागरूक भी कर रहे थे।
आज पहले की अपेक्षा समाज शिक्षित और समृद्ध तो हुआ है, परंतु उनमें सामाजिक ज्ञान और सामाजिक प्रेरणा का भाव कमजोर होता दिखाई पड़ रहा है। आज की वर्तमान पीढ़ी सिर्फ अपने आप तक सीमित है, उनमें न सामाजिकता का भाव है और न परस्परता का भाव है, न आपस में एकता और न एक-दूसरे के लिए सम्मान है, प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको दूसरे से बड़ा और श्रेष्ठ मान रहा है। इस प्रकार के सभी लक्षण बाबू व शिक्षक मानसिकता के व्यक्तियों में अधिक पाये जाते है।
समाज में प्रेरक पैदा होने चाहिए: वर्तमान समय में महिला और पुरुष प्रेरकों की अधिक आवश्यकता है। चूंकि आज के युवा वर्ग में पाखंडी संस्कृति का प्रादुर्भाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। आज के युवा वर्ग में अपने महापुरुषों की शिक्षा और संघर्ष का न तो ज्ञान है और न उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करके उनके बताए गए मार्ग पर चलने का मन और न साहस है। अधिकांश युवाओं में अपने आपको ब्राह्मणवादी संस्कृति में लपेटकर अपने ही समाज के अन्य साथियों से श्रेष्ठ बनकर दिखाने की प्रबलता बढ़ रही है। ऐसी मानसिकता के युवा अब यह समझ रहे हैं कि ब्राह्मण अब हमसे कोई भेदभाव या नफरत नहीं करते हैं, इसलिए हम सभी ब्राह्मणों के बराबर बन चुके हैं। यह उनकी एक भ्रामक मानसिक स्थिति है, चूंकि ब्राह्मण पहले भी और आज भी दलितों व पिछड़ों को अपना गुलाम और शत्रु ही मानता रहा है। जिसका सबसे उत्कृष्ट प्रमाण यह है कि ब्राह्मणों ने कभी भी दलित, वंचित समाज में पैदा हुए महापुरुषों का सम्मान नहीं किया और न उन्हें समाज और देश के हित में माना। वर्तमान में सबसे उत्कृष्ट उदाहरण बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का है जिनकी बौद्धिक उत्कृष्टता सारे विश्व को पता है। फिर भी ब्राह्मणवादी-संघी संस्कृति के धूर्त प्रचारक समाज में बड़े पैमाने पर खुलेआम यह प्रचार करते हैं कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने सिर्फ दलित वर्ग के लोगों के लिए ही काम किया और ऐसा कहकर वे बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को दलितों का नेता बनाकर ही सीमित करना चाहते हैं, जबकि पूरे विश्व को पता है कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का योगदान मानव समाज के लिए सर्वश्रेष्ठ है। विशेषकर महिलाओं और श्रमिक वर्ग के व्यक्तियों के लिए उनका योगदान मानव इतिहास में सबसे उत्तम और अग्रणीय है।
उपरोक्त चर्चा के आधार पर वंचित शोषित समाज के सामाजिक संस्थाओं के संचालकों से आग्रह है कि वे अपने आपको चमकाने, समाज में श्रेष्ठ दिखाने, अपने ही समाज के दूसरे व्यक्तियों की बात को न सुनने, न समझने की कोशिश करने, और उन्हें अपने से छोटा समझने की प्रवृति का त्याग करना पड़ेगा। अन्यथा आप कितने भी बड़े अधिकारी रहे हों, समाज के सामने उसका कोई औचित्य नहीं है चूंकि आपका पूर्व का पद या स्थिति समाज के सामने हमेशा छोटी रहेगी, समाज हमेशा सर्वोपरि ही बना रहेगा।





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