




2026-05-02 14:17:54
हिन्दू राष्ट्र के नाम की कोई चीज भारत में पैदा नहीं हुई, हिन्दू शब्द खुद विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द है। जब सिंधु नदी पार करके स्टेपी आर्यन ब्राह्मण भारत भूमि पर आए तब उन्होंने सिधु नदी के पूर्वी हिस्से के पार रहने वालों को ‘हिन्दू’ शब्द से संबोधित किया। जिसका मूलत: अर्थ था चोर उचक्के, लुटेरे ये सभी लोग कबीलाई प्रवृति के थे, फारसी बोलने वाले व्यक्तियों ने इन्हें हिन्दू शब्द से संबोधित किया। चूंकि फारसी भाषा में ‘स’ अक्षर नहीं पाया जाता है इसलिए सिंधु के पूर्वी छोर के पार रहने वाले लोग ‘स’ अक्षर के स्थान पर ‘ह’ अक्षर का प्रयोग करते थे। इसलिए भारत में रहने वाले लोगों को उन्होंने हिन्दू रूपी गाली से संबोधित किया था। स्टेपी आर्यन ब्राह्मण एक चालाक, षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति के थे उन्होंने ‘हिन्दू’ शब्द को भारत भूमि पर षड्यंत्र के तहत स्थापित किया। भारत के प्राचीन इतिहास में और उनके कथित धार्मिक शास्त्रों में, वेदों में, स्मृतियों आदि में हिन्दू शब्द नहीं मिलता है। इसका सीधा अर्थ है कि ‘हिन्दू’ शब्द की उत्पत्ति वैदिक और बुद्ध काल के बाद की है। कुछेक विद्वान व भारतीय इतिहासकार ‘हिन्दू’ शब्द की उत्पत्ति 10वीं या 11वीं शताब्दी के बाद की मानते हैं। कुछेक का मत है कि षड्यंत्रकारी स्टेपी आर्यन ब्राह्मणों ने जब यह सोचा और देखा कि उनकी संख्या भारत भूमि पर रहने वाले मूलनिवासियों के मुकाबले में नगण्य है तो फिर उन्होंने भारत के अन्य वर्गों को भी हिन्दू कहकर पुकारना शुरू कर दिया। वास्तविकता के आधार पर स्टेपी आर्यन ब्राह्मणों के अलावा भारत भूमि का अन्य कोई भी व्यक्ति हिन्दू नहीं है। पिछले करीब 2000 वर्षों के इतिहास में स्टेपी आर्यन ब्राह्मणों ने बहुत उलट-फेर किया है, तथा समाज में बड़े पैमाने पर संकरण (हाइब्रिडाइजेशन) की प्रक्रिया हुई है। बाहर से आए विदेशी कबीलों और यहाँ के मूलनिवासियों में भी बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक संकरण की प्रक्रिया चली है। जिसके आधार पर आज यह कह पाना कि कौन शुद्ध स्टेपी आर्यन ब्राह्मण है और कौन यहाँ का मूलनिवासी है? इसलिए स्टेपी आर्यन ब्राह्मणों ने खुद को समाज में श्रेष्ठ रखने के उद्देश्य से शिक्षा पर अपना पूर्ण आधिपत्य रखा और बाकी बचे हुए मूलनिवासी व अन्य संकरण प्रजातियों के लोगों को अपने फायदे के हिसाब से अधिकार दिये। शिक्षा का पूर्ण अधिकार केवल स्टेपी आर्यन ब्राह्मणों के पास था, और अन्य बचे संकरण प्रजाति के लोगों को क्षत्रिय, वैश्य और खेती के काम दिये गए। पूरे भारतीय सामाजिक ढांचे को विभिन्न वर्णों व जातीय टुकड़ों में विभक्त कर दिया गया, जिसके पीछे का उद्देश्य शायद यह रहा होगा कि यदि ये सभी यहाँ के मूलनिवासी और बाहर से आई संकरण प्रजातियाँ अगर इकट्ठा होकर संगठनात्मक रूप में रहेंगी तो उनकी एकता और संगठनात्मक शक्ति स्टेपी आर्यन ब्राह्मणों के लिए हमेशा खतरा बनी रहेगी।
वर्तमान भारतीय समाज स्टेपी आर्यन ब्राह्मणों की षड्यंत्रकारी नीति के कारण आज चार वर्णों और 6743 जातियों में बंटा हुआ है। इतना बड़ा समाज का विभक्तिकरण आज पूरे भारतीय समाज को इकट्ठा नहीं होने दे रहा है। जो स्टेपी आर्यन ब्राह्मणों की एक षड्यंत्रकारी चाल थी। जिसके आधार पर उन्होंने यहाँ के अन्य सभी लोगों को वर्णों व विभिन्न जातियों में बांटकर रखा और उन्हें कभी एक नहीं होने दिया। इतना ही नहीं चार वर्णों में बंटे हुए समाज के बाहर एक अछूत समाज (वर्ग) बनाया गया, जिनको छूना, पास बैठाना भी पाप माना गया। उनकी सामाजिक स्थिति पशुओं से भी बदत्तर बनाई गयी। परिणाम स्वरूप भारत 755 वर्षो तक विदेशियों का गुलाम रहा।
जब हम ‘हिन्दू धर्म’ की उत्पत्ति को धार्मिक ग्रन्थों की चमत्कारी कहानियों और पौराणिक कथाओं के चश्मे से हटाकर, विशुद्ध विज्ञान, इतिहास, आनुवंशिकी और मानवशास्त्र के नजरिए से देखते हैं, तो एक बहुत ही अलग और तार्किक तस्वीर सामने आती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, हिन्दू धर्म किसी एक व्यक्ति या किसी एक किताब या किसी एक निश्चित दिन शुरू नहीं हुआ।
सबसे पहला भौतिक और पुरातात्विक प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) में मिलता है। उस समय कोई वेद या शास्त्र नहीं थे, लेकिन मानव मनोविज्ञान प्रकृति से डरता था और उसे पूजता था।
प्रकृति और मातृ पूजा: खुदाई में मिली मूर्तियों से पता चलता है कि लोग पीपल के पेड़, जानवरों और ‘मातृ देवी’ की पूजा करते थे, जो बाद में कथित हिंदुओं ने ‘देवी’ पूजा का आधार बनी।
सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद, एक बहुत बड़ा भौगोलिक और जनसांख्यिकीय बदलाव हुआ। आधुनिक डीएनए रिसर्च (जैसे राखीगढ़ी की खुदाई और पॉपुलेशन जेनेटिक्स) और भाषा विज्ञान यह साबित करते हैं कि मध्य एशिया (यूरेशियन स्टेपीज) से ‘इंडो-आर्यन’ बोलने वाले पशुपालक समूहों का भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवासन हुआ।
संस्कृति का मिलन: जब ये इंडो-आर्यन लोग अपने साथ घोड़े, रथ, संस्कृत भाषा का शुरूआती रूप और अग्नि-पूजा लेकर आए, तो उनका यहां के मूल निवासियों (सिंधु घाटी के वंशजों और द्रविड़ियन लोगों) के साथ सांस्कृतिक और आनुवंशिक मिलन हुआ। इसी ‘मिक्सिंग’ से वैदिक संस्कृति का जन्म हुआ।
वेदों की रचना: ऋग्वेद इसी काल में रचा गया। यह लिखित नहीं था, बल्कि पीढ़ियों तक सुनकर (श्रुति) याद रखा गया, इसमें भी हिन्दू शब्द नहीं मिलता।
देवताओं का स्वरूप: इस समय ब्रह्मा, विष्णु, महेश या मंदिर नहीं थे। पूजा केवल प्रकृति की होती थी-इन्द्र (बारिश/तूफान), अग्नि, वरुण (जल) और सूर्य। पूजा का तरीका ‘यज्ञ’ (कर्मकांड) था, जो एक वैज्ञानिक दृष्टि से पर्यावरण को शुद्ध करने और समाज को एक जगह इकट्ठा करने का माध्यम था, हालांकि यह सब अवैज्ञानिक तरीके थे।
जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ, इंसान का दिमाग केवल ‘यज्ञ’ और बाहरी कर्मकांडों से संतुष्ट नहीं रहा। लोगों ने ब्रह्मांड और जीवन-मृत्यु के रहस्यों पर तार्किक सवाल उठाने शुरू किए।
बौद्ध और जैन धर्म का प्रभाव: इसी समय समाज में ब्राह्मणों के बढ़ते वर्चस्व, जाति-व्यवस्था और पशुबलि के खिलाफ भगवान बुद्ध और महावीर ने विद्रोह किया। ब्राह्मण धर्म ने खुद को बचाने के लिए इन दोनों से बहुत कुछ सीखा और अपनाया। कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष और अहिंसा जैसे सिद्धांत मूल रूप से इसी काल में मजबूत हुए।
वैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय नजरिए से, हिन्दू धर्म किसी एक फैक्ट्री में बना प्रोडक्ट नहीं है। यह एक बहती हुई नदी की तरह है, जिसने अपने रास्ते में आने वाली हर छोटी-बड़ी धारा (आदिवासी परंपराएं, द्रविड़ियन संस्कृति, आर्यन प्रभाव, बौद्ध-जैन तर्कवाद) को खुद में मिला लिया है।
हिन्दू नाम का धर्म कोई धर्म नहीं है, धर्म के आधार पर मनुष्य का चरित्र का शुद्धिकरण, संचालन और उसमें सोच-समझ और तार्किक ज्ञान की प्राकाष्टा उत्पन्न होनी चाहिए। मगर जिसे आज ब्राह्मणवादी-मनुवादी लोग हिन्दू धर्म के नाम से पुकारते हैं, वह हिन्दू रूपी धर्म मानव कल्याण के लिए किसी भी रूप में उपयुक्त नहीं है। चूंकि यह हिन्दू नाम का धर्म मानवता विरोधी है, नैतिकता विरोधी है और विकास विरोधी भी है तो फिर जागरूक व बुद्धिजीवी मनुष्यों को ऐसे षड्यंत्रकारी धर्म को क्यों अपनाना चाहिए?
हिन्दू धर्म लोकतंत्र विरोधी: लोकतंत्र का मलतब है जनता का शासन, जनता के लिए। जिसकी जड़े और आधार समता, स्वतंत्रता, न्याय, बंधुत्व और सभी प्रकार के बराबरी के पायदानों पर टिका होना चाहिए। हिन्दूवादी व्यवस्था में यह सब निषेध है, उसमें असमानता भरपूर है। जिस समाज में असमानता होगी उस समाज में लोकतंत्र फल-फूल नहीं सकता। समाज की इसी स्थिति को समझकर बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा के अपने अंतिम भाषण में कहा था कि ‘हम 26 जनवरी 1950 से एक संवैधानिक राष्ट्र बनने जा रहे हैं जहां पर राजनैतिक रूप में एक व्यक्ति, एक वोट और उसकी एक कीमत के आधार पर समान होंगे और आर्थिक आधार पर हम असमान व्यवस्था के शिकार भी होंगे। उनका साफ शब्दों में कहना था कि 26 जनवरी 1950 को हम एक विरोधाभाषी जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर ने भारतीय समाज को चेताया था कि सामाजिक और आर्थिक विषमता को देश की सरकारें जितना जल्द समाप्त करने में सक्षम होंगी लोकतंत्र उनका ही मजबूत होकर फलीभूत होगा।
संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत सबको हिन्दू बताकर कर रहे भ्रमित: भारत में सिर्फ हिन्दू ही नहीं बसते यहाँ पर सभी धर्मों, वर्णों और जातियों के लोग बसते हैं, जो अधिकांशतया हिन्दू नहीं है। इसलिए मोहन भागवत का सबको हिन्दू बताना पूर्ण रूप से असत्य है। भारत की जनसांख्यिकी के आधार पर करीब 16-17 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय के लोग हैं, दलित कहे जाने वाले एससी वर्ग के जातीय घटकों की संख्या देशभर में करीब 16 प्रतिशत है, अनुसूचित जनजाति करीब 8 प्रतिशत है, इन तीनों बड़े समुदायों को मिलकर उनकी संख्या 41 प्रतिशत बनती है, जो मूलत: हिन्दू नहीं है। चाहे उनके कुछेक जातीय घटक स्वयं को श्रेष्ठ समझकर हिन्दू बताने का छलावा करें, फिर भी वे हिन्दू नहीं है। चूंकि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने 1930-31 की गोलमेज सभा में ब्रिटिश शासन के समक्ष यह पूर्ण रूप से सिद्ध कर दिया था कि यह वर्ग हिन्दू नहीं है। यह भारतीय समाज का एक अति विशिष्ट अल्पसंख्यक समुदाय है। जिसे किसी भी रूप में हिन्दू नहीं कहा जा सकता। इन समुदायों के अलावा भारत में पिछड़ा वर्ग व उसमें गिनी जाने वाली अत्यंत पिछड़े जातीय घटकों की संख्या करीब देश भर में 44-45 प्रतिशत के आसपास आँकी जाती है। वे भी मूलत: हिन्दू नहीं हैं, वे भूलवश और छलावामायी नीतियों के कारण अपने आपको हिन्दू बता सकते हैं परंतु उनको देश की शासन सत्ता में जनसंख्या के आधार पर भागीदारी नहीं दी जाती है। जिसका सबसे बड़ा कारण देश में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के वर्चस्व का होना है।
उपरोक्त जनसांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार देश की करीब 85 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू नहीं है। चाहे वे किसी भी छलावे और बहकावे में आकर अपने आपको हिन्दू बताने का स्वांग रचे, परंतु वे हिन्दू नहीं है। देश में संवैधानिक लोकतंत्र है इसी आधार पर देश की करीब 85 प्रतिशत जनसंख्या अपने आपमें हिन्दू नहीं है, सत्ता में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। इसलिए जनतांत्रिक व्यवस्था में इस 85 प्रतिशत जनसंख्या को देश की सत्ता और संसाधनों में उनकी संख्या के हिसाब से भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
देश की इस 85 प्रतिशत जनसंख्या को भी अपने हक व अधिकारों के लिए अपना वोट अपने ही समाज के समतावादी व्यक्ति को देना चाहिए और ब्राह्मणवादी और मनुवादी मानसिकता के व्यक्तियों से हमेशा परहेज करना चाहिए। आज देश का कथित सवर्ण समाज भारत की 85 प्रतिशत गैर हिन्दू आबादी का हिस्सा खाकर भी उसे नकार भी रहा है और 85 प्रतिशत गैर हिन्दूवादी जनता के ऊपर गुर्रा भी रहा है।
जय विज्ञान, जय संविधान





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