




2026-05-09 16:56:28
लखनऊ/नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश को देश का एविएशन हब बनाने और हवाई चप्पल पहनने वालों को हवाई जहाज में बिठाने के जो दावे मंचों से किए गए थे, वे अब जमीनी हकीकत के आगे दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। उड़ान योजना के तहत प्रदेश में जिन 7 से 8 नए एयरपोर्ट्स का फीता काटा गया, उनमें से अधिकांश आज भूतिया हवाई अड्डों में तब्दील हो चुके हैं। इस सूची में न केवल पूर्वांचल और बुंदेलखंड के छोटे शहर शामिल हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सटा गाजियाबाद का हिंडन एयरपोर्ट भी इसी विफलता का जीता-जागता स्मारक बन गया है। हिंडन एयरपोर्ट से पहले 25 फ्लाइट का आॅपरेशन होता था। अब इसकी संख्या 5 रह गई है। एयर इंडिया एक्सप्रेस की तरफ से अपने सभी उड़ानों को हिंडन से बंद करने के बाद लोगों में काफी नाराजगी देखी जा रही है। जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से बने इन एयरपोर्ट्स का निर्माण और अब इनके भारी-भरकम रखरखाव का खर्च उत्तर प्रदेश के खजाने पर एक ऐसा बोझ बन गया है, जो किसी आर्थिक त्रासदी से कम नहीं है।
दिल्ली के करीब होकर भी फ्लॉप
इस पूरी विमानन क्रांति की सबसे बड़ी विफलता गाजियाबाद का मोहन नगर (हिंडन सिविल एन्क्लेव) एयरपोर्ट है। इसे लगभग 40 करोड़ रुपये की लागत से इसलिए बनाया गया था ताकि दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का बोझ कम किया जा सके। दावा किया गया था कि यहाँ से पिथौरागढ़, हुबली, कलबुर्गी और शिमला जैसे टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए नियमित उड़ानें होंगी। लेकिन हकीकत यह है कि उद्घाटन के कुछ समय बाद ही यहाँ से एयरलाइंस ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया। पर्याप्त यात्री न मिलने और एयरलाइंस के साथ ठोस रणनीतिक करार न होने के कारण दिल्ली-एनसीआर की नाक के नीचे बना यह एयरपोर्ट भी आज पूरी तरह से बंद और वीरान पड़ा है।
जनता के खजाने पर 700 करोड़ रुपये की सालाना डकैती
सबसे चौंकाने वाली और दर्दनाक बात यह है कि इन बंद पड़े एयरपोर्ट्स पर खर्च का मीटर आज भी चालू है। एयरपोर्ट से भले ही कोई जहाज न उड़े, लेकिन नागरिक उड्डयन नियमों के तहत वहाँ सुरक्षा व्यवस्था, फायर टेंडर, एटीसी स्टाफ, बिजली और रखरखाव की मशीनरी को चौबीसों घंटे स्टैंडबाय मोड पर रखना पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार, प्रति एयरपोर्ट रखरखाव का न्यूनतम खर्च 50 करोड़ रुपये से ऊपर बैठ रहा है। इस तरह कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के खजाने से हर साल लगभग 700 रुपये करोड़ केवल इन खाली और वीरान इमारतों की रखवाली पर फूंके जा रहे हैं। यह वह पैसा है जिसे प्रदेश के जर्जर सरकारी अस्पतालों को सुधारने, प्राथमिक विद्यालयों में छतें डलवाने या गड्ढामुक्त सड़कों के वादे को पूरा करने में लगाया जा सकता था।
गाजियाबाद के हिंडन से लेकर पूर्वांचल के आजमगढ़ और श्रावस्ती तक फैले ये भूतिया एयरपोर्ट योगी सरकार की इवेंट मैनेजमेंट वाली राजनीति का सबसे बड़ा सबूत हैं। विकास के नाम पर जल्दबाजी में बिना प्लानिंग के किए गए ये निर्माण अब गले की फांस बन चुके हैं। जब तक सरकार यह नहीं समझती कि केवल रिबन काटने से शहर का विकास नहीं होता, तब तक ऐसे ही जनता के करोड़ों रुपये बर्बाद होते रहेंगे। एक राज्य को विमानन हब बनाने के लिए पहले लोगों की क्रय शक्ति और औद्योगिक विकास की आवश्यकता होती है। जब जमीन पर रोजगार और उद्योग नहीं होंगे, तो हवा में उड़ने वाले यात्री कहां से आएंगे? ये बंद पड़े एयरपोर्ट न केवल प्रशासनिक विफलता हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश के करदाताओं के साथ एक बहुत बड़ा धोखा हैं।
7 का उद्घाटन, 6 हुए बंद
कुशीनगर एयरपोर्ट :- 435 करोड़ 2 साल चला।
अलीगढ़ एयरपोर्ट :- 29 करोड 9 महीने चला।
आजमगढ़ एयरपोर्ट :-30 करोड़ 8 महीने चला।
चित्रकूट एयरपोर्ट :- 146 करोड़ 9 महीने चला।
श्रावस्ती एयरपोर्ट :- 29 करोड़ 9 महीने चला।
मुरादाबाद एयरपोर्ट :- 29 करोड़ 3 महीने चला।
अब बताओ 29 करोड़ में एक किलोमीटर सड़क नहीं बनते हमें 29 करोड़ में एयरपोर्ट बना दिया। अब रख-रखाव पर 50+करोड़ खर्च हो रहे है, हर साल 700 करोड़ खर्च हो रहे है। यह यूपी के विकास की तस्वीर है या फिर घोटाला कि।





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