




2026-02-14 16:23:06
नई दिल्ली। 12 फरवरी 2026 सिर्फ एक तारीख नहीं है, यह बहुजन आंदोलन के इतिहास में दर्ज हो गई है। यह तारीख अन्याय के खिलाफ एक खुला ऐलान था। पूज्य भंते विनाचर्या जी के जनसमर्थन में गुरुवार 12 फरवरी 2026 को भारत के विभिन्न प्रदेशों से हजारों की संख्या में दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोग ‘महाबोधि महाविहार मुक्ति के विशाल जन आक्रोश प्रदर्शन में BT Act 1949 रद्द करो’ आंदोलन में शामिल हुए। देश के बुद्ध अनुयायी किसी साधारण सभा में नहीं, बल्कि इतिहास बदलने के लिए इकट्ठा हुए थे। महाबोधि महाविहार कोई साधारण इमारत नहीं, यह भगवान बुद्ध की ‘ज्ञानभूमि’ है, यह करुणा, समता और मानवता का केंद्र है। वक्ताओं ने कहा कि जब तक यह भगवान बुद्ध की भूमि अपने असली उत्तराधिकारियों को नहीं मिलती, तब तक हमारा यह संघर्ष रुकेगा नहीं; थमेगा नहीं; चलता रहेगा; हम इसे मुक्त कराकर ही सांस लेंगे।
भारत की मानवतावादी धार्मिक चेतना में महाबोधि महाविहार का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिहार के बोधगया स्थित यह वही पवित्र स्थल है जहां गौतम बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर ‘ज्ञान’ प्राप्त किया था। 12 फरवरी को दिल्ली के जंतर-मंतर पर महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन ने इस ऐतिहासिक स्थल के प्रबंधन को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर लाकर खड़ा किया है।
पूज्य भंते विनाचर्या के नेतृत्व में अनेक सामाजिक व धार्मिक कार्यकतार्ओं की भागीदारी ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी, कई हजारों की संख्या में बौद्ध अनुयायी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि जंतर मंतर पर एकत्र हुए और BT Act 1949 को रद्द करने की मांग को दोहराया।
महाबोधि महाविहार का ऐतिहासिक महत्व
महाबोधि महाविहार केवल एक बौद्ध मंदिर नहीं, बल्कि ‘विश्व बौद्ध’ समुदाय की आस्था का केंद्र है। सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यहाँ इस मंदिर और वज्रासन का निर्माण करवाया था। बाद में गुप्त और पाल शासकों के काल में भी इसका विस्तार हुआ था। आज यह स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और विश्वभर से लाखों श्रद्धालु यहां पर दर्शन के लिए आते हैं। इसकी वास्तुकला, 55 मीटर ऊंचा केंद्रीय शिखर और ऐतिहासिक महत्व इसे विशिष्ट बनाता हैं।
BT Act 1949 पर विवाद क्यों?
1949 में पारित बोध गया टेंपल एक्ट के तहत मंदिर के प्रबंधन के लिए बोध गया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी (बीटीएमसी) का गठन किया गया। इस समिति में चार हिंदू और चार बौद्ध सदस्य होते हैं, जबकि अध्यक्ष गया जिले के जिलाधिकारी होते हैं। आंदोलनकारी बौद्ध संगठनों का मानना है कि यह व्यवस्था पूर्ण रूप में धार्मिक स्वायत्तता प्रदान नहीं करता है। उनका तर्क है चूंकि यह स्थल बौद्ध धर्म का सर्वोच्च तीर्थ स्थल है, इसलिए इसका पूर्ण प्रबंधन बौद्ध समुदाय के हाथों में ही होना चाहिये। इसी मांग को लेकर समय-समय पर अनेक प्रदर्शन होते रहे हैं। परंतु इस मुद्दे पर 1891 में अनगारिक धर्मपाल ने इस आंदोलन को शुरू किया और यह आंदोलन 2013 के बाद से तेजी के साथ इस मांग या मुद्दे को लगातार उठा रहा है। आंदोलन के संयोजकों ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का प्रयास किया और कहा कि यह संघर्ष किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि अधिकारों की स्पष्टता और प्रबंधन संरचना में बदलाव की मांग के लिए है।
सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ
महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन केवल धार्मिक प्रबंधन का प्रश्न नहीं है। इसे कई लोग सामाजिक न्याय और समानता के व्यापक विमर्श से जोड़कर भी देखते हैं। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 1956 के बौद्ध दीक्षा आंदोलन के बाद से भारत में बौद्ध पहचान और उनके अधिकारों को लेकर जागरूकता और जन-जागरण बढ़ा है। ऐसे में यह मुद्दा दलित-बौद्ध समुदायों के आत्मसम्मान से भी जुड़ गया है। राजनीतिक रूप से भी यह विषय महत्वपूर्ण है, क्योंकि विभिन्न दल और संगठन इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते हैं। हालांकि, वर्तमान सरकार की ओर से बीटी एक्ट 1949 में किसी बड़े संशोधन की घोषणा नहीं हुई है, जिसे देखकर बुद्ध अनुयायियों में आक्रोश पैदा होता दिख रहा है।
आंदोलन का संदेश और आगे की राह
जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा और लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर अपनी मांग रखने का उदाहरण बना। आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया, तो भविष्य में बड़े स्तर पर संवाद और प्रदर्शन की योजना बनाई जाएगी। इस विषय पर सभी पक्षों के बीच संवाद की आवश्यकता है, ताकि धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक परंपरा और संवैधानिक प्रावधानों के बीच संतुलन स्थापित हो सके। महाबोधि महाविहार भारत की बहुलतावादी संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। इसलिए इससे जुड़ा कोई भी निर्णय व्यापक सहमति और संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ लिया जाना आवश्यक है।
प्रशासन और पुलिस प्रबंधन: 12 फरवरी को महाबोधि महाविहार के आंदोलन के लिए जंतर-मंतर पर पुलिस प्रशासन ने सिर्फ 1 बजे तक का ही समय दिया, जबकि 11 फरवरी 2026 को यूजीसी के समर्थन में सांसद चंद्रशेखर द्वारा किए गए आंदोलन को पुलिस प्रशासन ने सुबह 10 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक का समय दिया। महाबोधि महाविहार के आंदोलन में कई-कई बार आंदोलन को अव्यवस्थित करने के लिए माइक के तारे के साथ भी छेड़छाड़ की गई जिससे आन्दोलन में बाधा उत्पन्न हो। पुलिस और आम प्रशासन को देखकर वहाँ पर आए आंदोलनकारियों को लगा कि वर्तमान में सत्ता में बैठी मनुवादी सरकारें बौद्ध अनुयायियों के आंदोलन को देखकर अंदर से विरोधी है और वे किसी भी कीमत पर इस आंदोलन को सफल नहीं देखना चाहते हैं इसलिए इस शांति पूर्ण आंदोलन में बार-बार बाधा उत्पन्न करके माइक को बंद करना, बार-बार स्टेज पर बैठे भिक्खू संघ को निर्देशित करना कि आपके आंदोलन का समय सिर्फ 1 बजे तक था इसलिए आप 1 बजे तक अपना आंदोलन खत्म करके यहाँ से जाओ। प्रशासन का ऐसा व्यवहार देखकर आंदोलन में आए विभिन्न प्रदेशों के बुद्ध अनुयाइयों ने महसूस किया कि वर्तमान संघी सरकार बुद्ध अनुयाइयों की संवैधानिक मांग और शांति पूर्ण आंदोलन को जान बूझकर बर्बाद करना चाहती है। मगर फिर भी भगवान बुद्ध के अनुयायी समता, शांति और करुणा में विश्वास रखते हैं इसलिए उन्होंने अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए आक्रोशित और आक्रामक रुख नहीं अपनाया और उन्होंने एक अनुशासनात्मक तरीके से अपने आंदोलन को बिना की विवाद के समाप्त किया
निष्कर्ष: महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन ने एक बार फिर यह दिखाया कि भारत में धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता और भागीदारी निरंतर बनी हुई है। 12 फरवरी का जंतर-मंतर का प्रदर्शन इस बहस को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का महत्वपूर्ण क्षण साबित होगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित पक्ष इस मांग पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देते हैं। फिलहाल, यह आंदोलन संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वायत्तता और सामाजिक न्याय की चर्चा को आगे बढ़ाता रहेगा।





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