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लोकतंत्र से तानाशाही की ओर बढ़ता देश

विरोध-प्रदर्शनों को दबाने पर आमादा मोदी सरकार
News

2026-10-17 17:20:02

बहुजन स्वाभिमान डेस्क

नई दिल्ली। किसी भी जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे प्राथमिक कसौटी केवल चुनाव नहीं, बल्कि चुनाव के बाद नागरिक के असहमति, सवाल और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने के अधिकार की सुरक्षा होती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने का बुनियादी अधिकार देता है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट किया था कि जनता के आंदोलन ही संविधान के सच्चे रक्षक हैं। जब शासन सत्ता नागरिकों से उनकी आवाज छीनने लगे, तो लोकतंत्र का ढांचा केवल औपचारिक बनकर रह जाता है। वर्तमान समय में देश जिस राजनीतिक माहौल से गुजर रहा है, वहां इस मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना सीधे तौर पर राजसत्ता की नजर में अपराध बना दिया गया है। नई दिल्ली के कनॉट प्लेस, जंतर-मंतर और मंडी हाउस में घटित हालिया घटनाएं दर्शाती हंै कि शासन तंत्र अपने ही नागरिकों के शांतिपूर्ण मार्च और राष्ट्रीय ध्वज फहराने के आह्वान तक से भयभीत हो चुका है।

शुक्रवार को कॉकरेच जनता पार्टी द्वारा लहरा दो तिरंगा शांतिपूर्ण मार्च शुरू होने से पहले ही कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके और आॅल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा को मंडी हाउस से हिरासत में ले लिया गया। दीपके तिरंगा रैली में शामिल होने सेंट्रल पार्क जा रहे थे। 6 दिनों में दीपके को दूसरी बार कस्टडी में लिया गया है। इससे पहले 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर प्रदर्शन से पहले दीपके को विमान से हिरासत में लिया गया था, अगले दिन छोड़ दिया गया था। पुलिस के पास इस बात का कोई ठोस आधार नहीं था कि उन्हें किस आरोप में रोका जा रहा है। इसी प्रकार जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की तय सूची से बाहर किए जाने का विरोध कर रहे छात्र-युवा कार्यकतार्ओं—आशुतोष रांका, सौरव दास और उनके साथियों—को राष्ट्रीय ध्वज लहराने के आह्वान के कारण सीधे जेल भेज दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्षी दलों ने तीखा आक्रोश जताया। दिल्ली आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने राष्ट्रपति भवन और संसद के सामने तिरंगा फहराते हुए सरकार से सीधा सवाल किया कि स्वतंत्र देश में अपना ही राष्ट्रीय ध्वज फहराने में शासन को क्या परेशानी है। उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए पूछा कि यदि भारतीय नागरिक अपना ध्वज नहीं फहराएंगे, तो क्या उन्हें किसी पराए देश का झंडा उठाना पड़ेगा।

इस इस संघी-मोदी सरकार की तानाशाही प्रवृत्ति को समझने के लिए वर्ष 2014 से पूर्व के राजनीतिक माहौल और मौजूदा शासन की कार्यशैली की तुलना करना जरूरी है। 2014 से पहले जब भी जनता या विपक्षी दल सड़कों पर उतरे, तो शासन का रवैया बातचीत का रहता था। वर्ष 2011 में जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन रामलीला मैदान में चल रहा था, तब तत्कालीन सरकार ने संसद में विशेष चर्चा कराकर जनता की भावना का सम्मान किया था। उस दौर में बाबा रामदेव का अनशन हुआ हो या निर्भया कांड के बाद इंडिया गेट पर उमड़ा अभूतपूर्व जनसैलाब—पुलिसिया कार्रवाई के बावजूद धरना स्थलों को हमेशा के लिए बंद करने या प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही घोषित करने का संगठित प्रयास नहीं हुआ। जंतर-मंतर, बोट क्लब और रामलीला मैदान जनता के वैचारिक मंथन और गुस्से की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के केंद्र बने रहे। इसके विपरीत, 2014 के बाद सत्ता में आई सरकार ने जनांदोलनों को एक लोकतांत्रिक अधिकार मानने के बजाय अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान लिया। आज स्थिति यह है कि जंतर-मंतर जैसे ऐतिहासिक विरोध स्थलों को प्रतिबंधित किया जा रहा है। प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही निषेधाज्ञा लागू कर दी जाती है और जन-आंदोलनकारियों को संवाद की जगह सीधे जेल या नजरबंदी में धकेल दिया जाता है। पूर्ववर्ती दौर में आंदोलनकारियों को नागरिक समझा जाता था, जबकि वर्तमान दौर में उन पर तुरंत राष्ट्र-विरोधी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। मौजूदा संघी-मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल में जब-जब जनता, किसान, मजदूर या छात्र अपने हकों के लिए सड़कों पर आए, सत्ता ने उन्हें साम, दाम, दण्ड, भेद के सहारे कुचलने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी।

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन: जब देश भर के छात्र और आम महिलाएं संविधान की मूल भावना की रक्षा के लिए धरने पर बैठे, तो उन पर बर्बर लाठियां बरसाई गईं। विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में आंसू गैस छोड़ी गई। इस आंदोलन को बदनाम करने के लिए सांप्रदायिक रंग दिया गया और अंतत: सैकड़ों होनहार छात्रों व बुद्धिजीवियों को कठोरतम कानूनों में फंसाकर बिना किसी सुनवाई के वर्षों तक जेल में बंद रखा गया। ऐतिहासिक किसान आंदोलन: अपनी आजीविका और जमी

न बचाने के लिए जब पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के लाखों किसान दिल्ली की सीमाओं की ओर बढ़े, तो सरकार ने उनके स्वागत में राष्ट्रीय राजमार्गों पर गहरी खाइयां खुदवा दीं, कंक्रीट की ऊंची दीवारें खड़ी कर दीं और सड़कों पर नुकीली कीलें ठोक दीं। किसानों को विदेशी षड्यंत्रकारी, अलगाववादी और उपद्रवी कहा गया। सात सौ से अधिक किसानों की शहादत के बाद जब चुनाव नजदीक आए, तब जाकर सरकार ने कानून वापस लिए, लेकिन आंदोलन को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

महिला पहलवानों का संघर्ष: देश का नाम दुनिया भर में रोशन करने वाली महिला पहलवान जब अपने आत्मसम्मान और यौन शोषण के खिलाफ न्याय मांगने जंतर-मंतर पर बैठीं, तो उन्हें सड़कों पर घसीटा गया। उनके तंबू उखाड़ दिए गए और नई संसद के उद्घाटन के दिन बेटियों को पुलिस की गाड़ियों में ठूंस दिया गया। सत्ता ने आरोपी का संरक्षण किया और पीड़ितों को ही अपराधी बना दिया।

युवाओं और छात्रों का आक्रोश: सेना भर्ती की नई योजना हो या प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली का मुद्दा, जब भी बेरोजगार युवाओं ने आवाज उठाई, उन पर लाठीचार्ज किया गया और उनके भविष्य को मुकदमों के बोझ तले दबाने की कोशिश की गई। विरोध की आवाज दबाने के लिए सरकार ने प्रशासनिक, कानूनी और तकनीकी दमन का एक सुव्यवस्थित तंत्र खड़ा कर दिया है। अब सरकार आंदोलन शुरू होने का भी इंतजार नहीं करती। सामाजिक कार्यकतार्ओं, छात्र नेताओं और जनपक्षधर पत्रकारों को उनके घरों, रेलगाड़ियों या हवाई अड्डों से उतरते ही गैर-कानूनी ढंग से उठा लिया जाता है, ताकि वे जनता के बीच पहुंचकर उनका नेतृत्व न कर सकें। जंतर-मंतर को आधिकारिक विरोध स्थलों से बाहर करने का निर्णय बेहद सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। सत्ता चाहती है कि राजधानी के मुख्य इलाके केवल सत्ताधीशों के भव्य आयोजनों के लिए सुरक्षित रहें और वहां आम जनता के दुख-दर्द या गुस्से की कोई प्रतिध्वनि न सुनाई दे। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा एक सौ तिरसठ (पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा एक सौ चौवालीस) का इस्तेमाल अब आपात स्थिति के लिए नहीं, बल्कि विरोध की हर संभावना को कुचलने के लिए एक स्थायी नियम की तरह किया जाने लगा है। चार लोगों का एक साथ खड़ा होना भी गैर-कानूनी घोषित कर दिया जाता है। जब भी कोई शांतिपूर्ण मार्च प्रस्तावित होता है, मेट्रो के मुख्य दरवाजों को बंद कर दिया जाता है, बस सेवाओं को मोड़ दिया जाता है और मोबाइल नेटवर्क ठप कर दिए जाते हैं। इससे आम जनजीवन अस्त-व्यस्त होता है और फिर पूरा दोष आंदोलनकारियों के सिर मढ़कर उन्हें जनता की नजरों में खलनायक बना दिया जाता है। अदालतों की निष्पक्ष जांच और न्याय के बुनियादी सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए असहमति जताने वालों के घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाना शासन का पसंदीदा हथियार बन चुका है। जो लोग आंदोलनों को नैतिक या आर्थिक सहयोग देते हैं, उनके खिलाफ जांच एजेंसियों के छापे डलवाए जाते हैं ताकि भय का वातावरण बना रहे।

डरी हुई अलोकतांत्रिक सत्ता: जब कोई चुनी हुई सरकार अपने ही नागरिकों की बात सुनने से कतराने लगे, देश के राष्ट्रीय ध्वज से डरने लगे और शांतिपूर्ण सभाओं को दबाने के लिए हजारों की संख्या में पुलिस बल तैनात करने लगे, तो यह उसकी मजबूती का नहीं, बल्कि उसकी गहरी वैचारिक कमजोरी और डर का परिचायक होता है। एक सच्चा लोकतांत्रिक शासक जनता के असंतोष को आत्मनिरीक्षण का जरिया मानता है। इसके विपरीत, निरंकुश मानसिकता वाली सत्ता हर सवाल को अपनी गद्दी के लिए खतरा समझती है। इस अलोकतांत्रिक कार्यशैली की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए, क्योंकि इसने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को कार्यपालिका की दया पर लाकर खड़ा कर दिया है। संसार का इतिहास साक्षी है कि दमनकारी नीतियां कभी भी जन-आकांक्षाओं को हमेशा के लिए शांत नहीं कर सकी हैं। जंतर-मंतर पर ताले लगाकर, कंक्रीट की दीवारें खड़ी करके और छात्र नेताओं को जेलों में भरकर सत्ता कुछ समय के लिए सड़कों को खाली करा सकती है, लेकिन वह जनता के दिलों में सुलग रही असंतोष की आग को नहीं बुझा सकती। जब तक भारत का नागरिक अपने बुनियादी अधिकारों और संविधान की रक्षा के लिए खड़ा है, तब तक देश में विरोध-प्रदर्शनों को समाप्त करने की कोई भी सरकारी कोशिश कभी सफल नहीं हो सकेगी।

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02 अक्टूबर (1869) : महात्मा गांधी जयंती

02 अक्टूबर (1904) : लाल बहादुर शास्त्री जयंती

02 अक्टूबर (1911) : मासूरिया दीन पासी जयंती

03 अक्टूबर (1957) : रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) का विधिवत गठन (नागपुर प्रेसीडियम)

05 अक्टूबर (1968) : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल स्मृति दिवस

06 अक्टूबर (1940) : डॉ. एस. पी. सुमनाक्षर जयंती

07 अक्टूबर (1951) : शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन द्वारा प्रथम आम चुनाव हेतु घोषणा-पत्र जारी

09 अक्टूबर (1900) : फातिमा शेख स्मृति दिवस

09 अक्टूबर (2006) : मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस

09 अक्टूबर (1924) : इमैनुअल सेकरन जयंती

13 अक्टूबर (1935) : नासिक के येवला सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा की

14 अक्टूबर (1956) : ऐतिहासिक धम्मदीक्षा दिवस: नागपुर दीक्षाभूमि में बाबा साहब द्वारा लाखों अनुयायियों संग बौद्ध धम्म ग्रहण किया गया।

15 अक्टूबर (1902) : कर्मवीर दादासाहेब भाऊराव कृष्णराव (बी. के.) गायकवाड़ जयंती

15 अक्टूबर (1931) : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जयंती

16 अक्टूबर (1956) : चंद्रपुर (महाराष्ट्र) में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को दी धम्मदीक्षा

19 अक्टूबर (1882) : महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दलित वर्गों में निरक्षरता के बारे में हंटर कमिशन को दिया ज्ञापन

20 अक्टूबर (2026) : अशोक विजय दशमी

22 अक्टूबर (1947) : जनकवि अदम गोंडवी (रामनाथ सिंह) जयंती

25 अक्टूबर (1800) : लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले जन्मदिवस

27 अक्टूबर (1920) : भारत के प्रथम दलित राष्ट्रपति के. आर. नारायणन जयंती

29 अक्टूबर (1912) : इंकलाबी कवि गुरदास आलम जन्म दिवस

31 अक्टूबर (2004) : त्यागमूर्ति आर.एल. चंदापुरी समृति दिवस

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