




2026-05-09 17:49:06
संवाददाता
नई दिल्ली। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2024 की रिपोर्ट ने दिल्ली के माथे पर क्राइम कैपिटल का कलंक और गहरा कर दिया है। एक ओर जहाँ आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि दिल्ली की आधी आबादी (महिलाएं), बुजुर्ग और मासूम बच्चे खौफ के साये में जी रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दिल्ली की सत्ता पर काबिज मनुवादी सरकार का सारा ध्यान जनकल्याण और सुरक्षा के बजाय गौशालाओं, कांवड़ कैंपों, धार्मिक आयोजनों और कथा-वाचकों के संरक्षण जैसे लोकलुभावन और कर्मकांडीय कार्यों की ओर है। दिल्ली सरकार ने वास्तविक शासन को धार्मिक पाखंड और प्रतीकात्मक राजनीति की वेदी पर चढ़ा दिया है।
आंकड़ों की भयावहता बनाम सरकारी प्राथमिकताएं
एनसीआरबी 2024 के अनुसार, दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ 13,396 मामले दर्ज हुए। महानगरों में होने वाले कुल महिला अपराधों का 25% अकेले दिल्ली में होना किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए शर्म का विषय होना चाहिए। लेकिन विडंबना देखिए, जिस समय दिल्ली की गलियों में महिलाएं असुरक्षित हैं, उस समय सरकार का पूरा प्रशासनिक अमला कांवड़ कैंपों की भव्यता और धार्मिक शोभा यात्राओं के स्वागत में फूलों की वर्षा करने में व्यस्त रहता है।
क्या एक आधुनिक लोकतांत्रिक सरकार का प्राथमिक कर्तव्य सड़कों पर बेहतर लाइट, सीसीटीवी और महिला सुरक्षा सुनिश्चित करना है, या फिर सरकारी खजाने से धार्मिक आयोजनों का इवेंट मैनेजमेंट करना? जब सरकार बुनियादी सुरक्षा के बजाय कथा-वाचकों के चरणों में शीश नवाती है, तो वह अपराधियों को यह संदेश देती है कि व्यवस्था का ध्यान अब कानून के राज (रूल आॅफ लॉ) पर नहीं, बल्कि धार्मिक भावनाओं को भुनाने पर है।
बुजुर्गों की लाचारी और आध्यात्मिक दिखावा
दिल्ली में बुजुर्गों के खिलाफ 1,267 मामले दर्ज होना यह बताता है कि यह शहर अपनों के लिए ही पराया हो गया है। दिल्ली सरकार ने बुजुर्गों के लिए तीर्थ यात्रा जैसी योजनाएं तो शुरू कीं, लेकिन उन्हें उनके अपने घरों में सुरक्षा देने में विफल रही। सरकार का ध्यान बुजुर्गों के लिए गौशाला प्रेम और धार्मिक पर्यटन पर अधिक है, न कि एक ऐसी कम्युनिटी पुलिसिंग या हेल्पलाइन व्यवस्था पर जो उनकी जान-माल की रक्षा कर सके। धार्मिक कथाओं और पाखंडों के प्रचार-प्रसार में करोड़ों खर्च करने वाली सरकार यह भूल गई है कि एक बुजुर्ग को कथा सुनने से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि वह पार्क में टहलते समय या घर में सोते समय सुरक्षित महसूस करे। धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है, लेकिन सुरक्षा सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
बच्चों का भविष्य
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा बच्चों से जुड़ा है। दिल्ली में बच्चों के खिलाफ 7,662 अपराध हुए और किशोर अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से पांच गुना अधिक है। यह इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली का सामाजिक ताना-बना बिखर रहा है। युवा और बच्चे अपराध की ओर आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें वैज्ञानिक सोच और रोजगारपरक शिक्षा के बजाय धार्मिक कट्टरता और शोभा यात्राओं वाली राजनीति के माहौल में धकेला जा रहा है। जब सरकार वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय पाखंड और कर्मकांडों को बढ़ावा देती है, तो समाज की तार्किक शक्ति क्षीण होती है। स्कूलों में देशभक्ति बजट और धार्मिक शिविरों का शोर तो है, लेकिन बच्चों को अपराध की दलदल से निकालने के लिए कोई ठोस सामाजिक सुरक्षा तंत्र मौजूद नहीं है।
अधिकारों की जंग के पीछे छिपी विफलता
दिल्ली सरकार का यह पुराना तर्क रहा है कि पुलिस उनके पास नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकारी फंड का इस्तेमाल गौशालाओं और धार्मिक आयोजनों के बजाय उन क्षेत्रों में नहीं किया जा सकता था जो अपराध रोकने में सहायक हों?
डार्क स्पॉट्स: आज भी दिल्ली की कई सड़कें अंधेरे में डूबी हैं।
सीसीटीवी का जाल: कैमरों के दावों और उनकी वास्तविकता में जमीन-आसमान का अंतर है।
नशाखोरी: दिल्ली की बस्तियों में बिकने वाला नशा अपराध की जड़ है, जिसे रोकने के लिए धार्मिक कथाओं की नहीं, बल्कि सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। सरकार ने खुद को एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में बदल लिया है। कभी सुंदरकांड का पाठ, कभी कांवड़ियों की सेवा, तो कभी बड़े-बड़े धार्मिक पंडालों का आयोजन—ये सब केवल इसलिए किए जा रहे हैं ताकि जनता का ध्यान असल मुद्दों (महंगाई, अपराध, प्रदूषण) से हटकर भावनात्मक मुद्दों पर केंद्रित हो जाए।
पाखंड बनाम जवाबदेही
एनसीआरबी की रिपोर्ट एक चेतावनी है। यह बताती है कि दिल्ली विकास के रास्ते पर नहीं, बल्कि असुरक्षा की खाई की ओर बढ़ रही है। सरकार का सॉफ्ट हिंदुत्व या धार्मिक कार्ड उसे चुनाव तो जिता सकता है, लेकिन वह दिल्ली की उन हजारों बेटियों को न्याय नहीं दिला सकता जिनका अपहरण या बलात्कार हुआ है। अगर दिल्ली सरकार वास्तव में जनता की फिक्र करती है, तो उसे गाय, कांवड़ और कथा-वाचकों के मोहजाल से बाहर निकलकर शासन के कठिन सवालों का सामना करना होगा। उसे जवाब देना होगा कि क्यों दिल्ली आज भी बुजुर्गों के लिए नर्क बनी हुई है। जब तक सरकार पाखंड और प्रतीकों की राजनीति को त्याग कर कानून और व्यवस्था के प्रति जवाबदेह नहीं होती, तब तक एनसीआरबी के ये आंकड़े साल-दर-साल हमें डराते रहेंगे। दिल्ली को धार्मिक आयोजनों की राजधानी नहीं, बल्कि सुरक्षित राजधानी की जरूरत है। सरकार को याद रखना चाहिए कि धर्म लोगों को निजी शांति दे सकता है, लेकिन जनता की रक्षा करना केवल और केवल सरकार का धर्म है।





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