




2026-04-08 18:07:42
नई दिल्ली। दिल्ली में ट्रैफिक और अन्य वजहों से जाम की समस्या गंभीर रूप धारण करती जा रही है। रास्तों पर आना-जाना कठिन होता जा रहा है। राजधानी दिल्ली में साफतौर से दिखाई देता है कि यहाँ की व्यवस्था के ढांचे के निर्माण की योजना बहुत ही अदूरदर्शी है। दिल्ली के भविष्य को ध्यान में रखकर किसी भी योजना का निर्माण ठीक से नहीं हुआ है। दिल्ली में रिंग रोड जैसी सड़कें जो कुछ साल पहले ही नियोजित करके निर्मित की गई, वे 2-3 वर्षों के अंदर ही अपर्याप्त सिद्ध होती दिख रही है। जिसका सीधा सा अर्थ है कि दिल्ली की सड़कों के नियोजन (प्लानिंग) में दूरदर्शिता की कमी है। अदूरदर्शता के कारण बहुत सारे हो सकते हैं, जैसे- सरकार में गहराई तक व्याप्त भ्रष्टाचार। दूसरा बड़ा कारक सड़कों के बीच में या किनारे पर मंदिर, अन्य धार्मिक ढांचों का निर्माण आदि। इन मंदिरों या धार्मिक ढांचों की आड़ में व्यापारिक धंधे स्थापित किये जा रहे हैं। ऐसे कार्यों में दिल्ली की आम जनता लिप्त नहीं है, बल्कि सत्ता में बैठे राजनैतिक लोगों के दलाल और गुर्गे इन कार्यों में अधिक लिप्त हैं। इस तरह की व्यवस्था के द्वारा सड़कों पर कब्जा करके व्यवसायिक धंधों को बढ़ाना है। धर्म के नाम पर मंदिर या अन्य इमारत पर प्राचीन सनातन का बोर्ड लगा दिया जाता है। दिल्ली में रेखा गुप्ता की संघी सरकार और केंद्र में बैठी मोदी की संघी सरकार इस प्रकार के कार्यक्रमों को अधिक बढ़ावा दे रही है। अगर हम यह कहें कि यहाँ की सरकार सड़कों पर अवैध कब्जे कराने में साजीदार है, तो गलत नहीं होगा। रास्तों पर मंदिरों के नाम पर तीन ईंटें खड़ी करके उसपर लाल रंग की चुंदरी उड़ाकर, जनता की जगह पर कब्जा करना संघी सरकार का आम चलन हो चुका है। उदाहरण के तौर पर मौजपुर चौक पर मंदिर का निर्माण एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ। इसकी वजह से आम मुख्य सड़क का रास्ता बदला गया। मेट्रो लाइन के लिए भी मंदिर के ऊपर से लाइन निकाली गई। इसके अलावा लोनी रोड गोल चक्कर से लेकर भौपुरा बॉर्डर तक सड़क के दोनों किनारों पर मंदिरों के नाम पर अवैध कब्जे कराकर ब्राह्मण-पुरजारियों को सरकार द्वारा संरक्षण प्रदान किया गया। यह तो कुछेक उदाहरण हैं, इसके अलावा दिल्ली क्षेत्र की पूरी सड़कों पर ऐसे हजारों मंदिरों है, जिन पर प्राचीन हनुमान मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर आदि के बोर्ड लगे हुए हैं। उन्हें मनुवादी-ब्राह्मणवादी सरकारों का पूरा संरक्षण प्राप्त है। इस व्यवस्था के सापेक्ष अगर हम अंग्रेजी शासन से तुलना करें तो दिल्ली को उन्होंने एक बहुत ही साफ सुथरा और समृद्ध शहर बनाया था।
ब्रिटिश शासन में दिल्ली की व्यवस्था: ब्रिटिश शासन ने 12 दिसम्बर 1911 में कलकत्ता से राजधानी को जब नई दिल्ली में शिफ्ट किया, तो ब्रिटेन के शासक जॉर्ज पंचम ने दिल्ली को अधिकृत रूप से राजधानी घोषित किया था। दिल्ली के किंग्सवे कैंप इलाके में रेलवे लाइन व सड़कों का निर्माण करके जॉर्ज पंचम के लिए दिल्ली दरबार की व्यवस्था की गई थी। जिसमें सरकारी अधिकारियों के अलावा भारत की रियासतों के रजवाड़े भी शामिल हुए थे। उसके पश्चात दिल्ली में ब्रिटिश शासन द्वारा एक संयुक्त नियोजन के तहत दिल्ली में सड़कों का निर्माण इस प्रकार किया गया कि उन्हें बड़ी-बड़ी कालोनियों से जोड़ा गया। राष्ट्रपति भवन और उसके आसपास की सभी इमारतें, पूराना संसद भवन सहित उसी काल में निर्मित हुर्इं। दिल्ली के चारों ओर सड़कों का जाल बिकाया गया। नियोजित करके नई दिल्ली के क्षेत्र में कालोनियाँ बसाई गयी थी। अंग्रेजी शासन के दौरान नियोजित की गई सड़कों और भवनों का जो निर्माण हुआ वह आज भी मजबूती के साथ शानदार अवस्था में खड़े है और अंग्रेजों द्वारा बनाई गई नई दिल्ली की सड़कों पर जाम की आज भी कोई बड़ी समस्या नहीं है। जाम की समस्या केवल उन्हीं क्षेत्रों में है जिन सड़कों का निर्माण आजादी के बाद भ्रष्ट और सांप्रदायिक मानसिकता वाले लोगों द्वारा किया गया। इस तरह की शासन व्यवस्था संघी मानसिकता की सरकारों को एक दर्पण दिखाने का काम करती है, जिससे वे सबक ले सकते हैं। लेकिन यहाँ पर मुख्य बात यह है कि संघी मानसिकता के लोगों में शर्म और हया नाम की कोई चीज नहीं होती है। इसलिए वे सबक लेने के बजाय उसे कुछ न कुछ धार्मिक या सांप्रदायिक रंग देकर देश के भोले-भाले लोगों को उल्लू बनाने का काम करते हैं।
दिल्ली में पानी, सड़क और सफाई व्यवस्था बेहद गंभीर: वर्तमान समय में दिल्ली में चार इंजन की सरकार चल रही है। चारों में बीजेपी सत्ता में है, फिर भी दिल्ली में शासन व्यवस्था बद से बदत्तर होती जा रही है। हालांकि पहले की सरकारों ने भी दिल्ली के नियोजन पर कोई दूरदर्शी योजना नहीं बनाई थी। जिसका कारण उनकी मानसिकता में भी गहराई तक ब्राह्मणवाद बैठा हुआ था, लेकिन वर्तमान संघी रेखा गुप्ता की सरकार ने उन सबको पीछे छोड़ते हुए भ्रष्टाचार में सबसे आगे निकालने का शायद संकल्प लिया हुआ है, इसलिए हाल ही में एमसीडी में लेफ़्टिनेट कर्नल अभिषेक मिश्रा ने अपने असिस्टेंट दिव्यांशु गौतम के माध्यम से चार लाख रुपये की रिश्वत ली, जिसे रंगे हाथों पकड़ा गया। यह तो एक उदाहरण मात्र है, इसके अलावा दिल्ली भ्रष्टाचार के मामले में सर्वोपरि हो चुकी है। भ्रष्टाचार के जाल में दिल्ली के मंत्री और अधिकारी पूरी तरह से अंधे हो चुके हैं। इसलिए पानी, सड़क और सफाई व्यवस्था पर उनका कोई ध्यान नहीं है। सभी में काम की चाहत के बजाय पैसे कमाने की चाहत अधिक बढ़ रही है। यही चाहत अवैध ढंग से धन कमाने की लालसा को जन्म देती है।
रेहड़ी-पटरी के कारण जाम: दिल्ली में सड़क व्यवस्था संघी सरकार के संरक्षण में इतनी बर्बाद हो चुकी है कि जिन सड़कों की चौड़ाई 60 फिट, 80 फिट या 100 फिट है। उन सभी पर सरकार में बैठे अधिकारी और मंत्रियों के संरक्षण में पल रहे भ्रष्टाचारी मानसिकता के लोग एमसीडी कर्मियों को, पुलिस कर्मियों को और दिल्ली सरकार के अधिकारियों के गुर्गों को, प्रति दिन के हिसाब से एक निश्चित धन राशि दिल्ली सरकार के अधिकारियों को भेजी जा रही है। जिससे इन रेहड़ी-पटरी वालों को सरकार के अधिकारियों द्वारा अघोषित संरक्षण दिया जा सके। जिन सड़कों की चौड़ाई 60, 80 या 100 फिट है, इन रेहड़ी पटरियों के मालिक कम से कम आधी से अधिक सड़क पर अपना कब्जा कर लेते हैं जिसके कारण इन सड़कों पर निकलने या पैदल चलने वाले लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है और जाम की स्थिति बनी रहती है। पुलिस व संबन्धित एजेंसियों का मौन रहने का मुख्य कारण रिश्वतखोरी है, जिससे इन अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के अधिकार और कर्तव्य, स्वत: ही मौन हो जाते हैं।
सड़क पर रेहड़ी पटरी लगाने वालों की मजबूरी: सड़क के किनारे रेहड़ी-पटरी लगाने वाले अधिकांशतया बेरोजगार लोग है, जिन्हें सरकार की योजनाओं और नौकरी आदि की व्यवस्था से कोई लाभ नहीं हो रहा है। इसलिए ऐसे सभी लोग अपना और अपने परिवार का पालन करने के लिए रेहड़ी-पटरी लगाकर जीवन यापन करने का आश्रय ले रहे हैं। इस पर वर्तमान सरकारों का न ध्यान है और न वे इन रेहड़ी-पटरी वालों की समस्या का समाधान करना चाहती है। चूंकि सरकार में बैठे मंत्री और अधिकारियों को इस प्रकार की व्यवस्था से करोड़ों रुपये की अवैध धन राशि इकट्ठा होकर निरंतरता के साथ पहुँच जाती है। रेहड़ी पटरी लगाने वाला हर व्यक्ति रोड के किनारे बैठकर भी एमसीडी और सरकारी अधिकारियों द्वारा बैठाये गए एजेन्टों, इलाके के पार्षद और विधायक को एक निश्चित धन राशि देता हैं, इतने शोषण के बाद भी मजबूरी में वे वहाँ बैठकर अपने परिवार का पालन-पोषण करने में मुश्किल से सक्षम हो पा रहे हैं। दिल्ली या देश की आम जनता आसानी से आंकलन कर सकती है कि जब दिल्ली जैसे बड़े शहरों में करोड़ों रुपये की अवैध धन राशि पार्षद, विधायक और अधिकारियों को जा रही है तो यह धन राशि मासिक और वार्षिक आधार पर कितनी बड़ी संख्या में बनती होगी? रिश्वतखोरी का यह अवैध धंधा ब्राह्मणवादी संघी सरकारों में पहले के सापेक्ष अब कई गुणा बढ़ चुका है।
गाय पालने से लेकर काटने तक भाजपा का भ्रष्टाचार: जब देश में मोदी-संघी सरकारें स्थापित हुई हैं तभी से गायों के नाम पर कॉलोनियों से रोटी और रुपये इकट्ठा करना तथा उनको बांधने के लिए सड़कों के किनारे जनता की जमीन पर कब्जा करना एक आम बात हो चली है। गाय जहां पर बंधी होती हैं उनके लिए आसपास के इलाकों से चारा और पैसा इकट्ठा किया जाता है। हिन्दुत्व की वैचारिकी वाली जनता गायों के चारे के नाम पर भारी मात्रा में दान देती है। और वहां की गऊ शालाओं में पल रहे मुशतंडे गाय का मुफ्त में दूध पीकर सांड की तरह अपना जीवन बीता रहे हैं साथ में ये मुशतंडे हर रोज गाय का दूध बेचकर मोटा पैसा भी कमा रहे हैं। इस धन से ये लोग क्षेत्रिय नेताओं को भी पोषित कर रहे हैं और जब ये गायें दूध देने लायक नहीं रह जाती तो ये लोग इन गायों को कटवाकर विदेश में भेजकर भी धन कमा रहे हैं। ये वही लोग है जो गौभक्त बनकर आये दिन मुस्लिम और दलितों पर अत्याचार करते हैं। वहीं हाल ही में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने गौमाता संरक्षण के नाम पर दिल्ली 10 बड़ी गौशालाओं में लीज एक्सटेंशन प्रमाणपत्र प्रदान किए और इस पहल के तहत लगभग 20.26 करोड़ रुपये भी जारी किए हैं।
देश में अवैध अतिक्रमणकारी कौन? इस समस्या से निजात पाने का समाधान सिर्फ एक ही है कि रेहड़ी-पटरी लगाने वालों को सरकार वैध रुप से अधिकृत सुरक्षित स्थान दे या फिर उन्हें एक निश्चित किसी भी सरकारी विभाग में नौकरी दें। साथ ही जो पार्षद, विधायक, मंत्री सरकार में हैं, उनकी और उनसे संबन्धित रिश्तेदारों की संपत्ति का वार्षिक आधार पर नियमित आंकलन किया जाये और उसे सार्वजनिक भी किया जाए। साथ में यह भी देखा जाये कि क्या उन सभी की आमदनी के मुताबिक वार्षिक संपत्ति में कितनी बढ़ोत्तरी हो रही है, और उस आमदनी में कितनी अवैध धंधे लिप्त है। इस तरह का आंकलन बहुजन समाज के जातीय घटकों से जुड़े सेवानिवृत अधिकारियों व कर्मचारियों से कराया जाये। चूंकि बहुजन समाज के जातीय घटकों से जुड़े लोग ब्राह्मणवादी संघियों के सापेक्ष भ्रष्टाचारी कम होते हैं। देखने और अनुभव के आधार पर ऐसा महसूस किया जा रहा है कि देश में सवर्ण समाज के तथाकथित राजनीतिक दलों से जुड़े नेता ही अन्य के सापेक्ष अधिक भ्रष्टाचारी और अतिक्रमण करने वाले हैं।





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